अद्यतन कहानी संग्रह मैं, फूलमती और हिजड़े’, अद्यतन उपन्यास बिन ड्योढ़ी का घर

लगातार पानी बहने से लान से होकर सड़क पर पानी रेला सा बह आया था।वे बेचैन हो उठीं।उठकर उनके गेट तक गईं।भीतर झांककर देखा, कोई सुगबुग दिखे तो बता दें कि… मगर भीतर कोई हलचल नहीं।हार कर लौट आईं, मगर पानी का बहना उन्हें इस कदर बेचैन कर रहा था कि फिर बाहर आ गईं।उस घर के सामने देर तक टहलती रहीं।फिर घंटी बजाईं और इंतजार करती रहीं कि कोई बाहर आए, मगर कोई नहीं आया।आता भी कैसे।वह एक अति आधुनिक परिवार था, जिसकी सुबह दोपहर बाद हुआ करती थी।वे प्रतीक्षा करती रहीं कि कोई इधर से गुजरे तो उससे ही वाल्ब बंद करने को कहें।कुछ देर बाद चौकीदार दिखा। ‘सुनो! जरा वो वाल्ब बंद कर दो।’

‘पर गेट में लाक है?’

‘हां तभी तो तुमसे कह रही हूँ।वरना मैं खुद बंद कर देती।’

‘क्या मैडम? आप भी न? पानी ही तो है।कउनो आगि तो लागी नहीं है कि हम किसी के घर में कूद जाएं।’ वह चलता बना।

वे उसे और उसकी उस बेपरवाही को देखती रह गईं।ऐसे कह गया ‘पानी ही तो है, जैसे पानी कुछ है ही नहीं!’

जब पानी का रेला और दूर तक बह चला, तो उनकी बेचैनी और बढ़ गई, मगर उपाय कुछ न था।गेट इतना ऊंचा था कि उनके लिए उसे फांदना भी संभव न था।

शायद कालोनी के गेट पर कोई मिल जाए।सोचकर वे कालोनी के गेट की ओर बढ़ीं, मगर ऐसा कोई नजर नहीं आया जिससे…।उन्हें अपनी असमर्थता पर हताशा हुई, तभी अखबार वाला लड़का नजर आया।उसने उन्हें नमस्ते किया।

‘सुनो!’

‘जी मैडम।’

‘एक काम है।करोगे क्या?’ चौकीदार के उस जवाब से उनके स्वर में झिझक सी उतर आई थी।

‘जरूर मैडम।कहिए न क्या करना है?’

‘वो क्या है, सामने वाले घर की टंकी बड़ी देर से ओवरफ्लो हो रही है।पानी की यूँ बर्बादी…।सो उसे तुम बंद…?’ झिझकते हुए कहा।

‘जी जरूर!’ वह तत्काल उनके साथ चल पड़ा।

‘उफ़! पानी की ऐसी बर्बादी!’ सड़क पर बहते पनाले को देख उसने अफसोस किया और गेट फांदकर वाल्ब बंद कर दिया।

‘थैंक्यू बेटा।’

‘थैंक्स तो आपको देना चाहिए।कम से कम आपने इतना सोचा तो, वरना लोग पानी की कदर ही कहां करते हैं।वो देखिए कितना मोटा पाइप लगाकर गाड़ी धोई जा रही है।जो काम आधी बाल्टी पानी में हो जाता, उसके लिए पचासों बाल्टी का खर्च? पानी की कीमत तो हम झुग्गी वाले जानते हैं।चौबीस घंटे में एक बार आता है नल, वह भी सिर्फ एक घंटे के लिए।उसी एक घंटे में पूरी झुग्गी को पानी भरना होता है।दो बजे रात को उठकर अपनी ओसरी (अपना बर्तन रखकर नंबर लगाना) लगाना।फिर बर्तन की रखवाली में अधरतिया से जागरण  करना।बिन पानी सब सून।हम जानते हैं इसका मर्म।आप भी समझती हैं।सो आपको थैंक्स।’

वे भीतर जाने को मुड़ीं।कुछ शब्द उछल कर कानों के भीतर जा पहुंचे।चौकीदार सबेरे की पाली वाले गार्ड से कह रहा था-

‘ई देखो! ई पानी जैसी चीज के लिए किस कदर परेशान थीं कि दूसरा के घरवा में आदमी कुदाय दिया।’

वे घर के भीतर घुस ही रही थीं कि, ‘पगला गई हैं शाईद।’

यह वाक्य उनकी पीठ पर धप्प से लगा।फिर उन दोनों की हँसी का समवेत स्वर।उनकी हँसी कानों में ठहर गई, ‘ये इलाहाबाद से हैं।वहां गंगा और यमुना का असीम जल है।सो ये क्या जानें कि पानी क्या है? पहले मैं भी कहां जानती थी, तभी तो अम्मा से कुतर्क करती।’

‘पानी बहाए से धन कय नास होत है।दारिद्र्य आता है।’ वे कहतीं।

‘का अम्मा, तुम भी न? पानी और धन का कोई मेल है क्या? पानी से धन मिलता है भला?’

तब पानी का बाजार नहीं पनपा था और पानी सहज सुलभ था।अम्मा पढ़ीलिखी नहीं थीं।उनके पास विज्ञान आधारित तर्क नहीं थे, मगर अनुभव की थाती थी? उन्होंने बाढ़सूखा सब देखा था।पानी की अहमियत जानती थीं।अब?’ अब तो वक्त ने मुझे भी समझा दिया है कि पानी क्या है? इसी पानी की खातिर तो और  उनकी आंखों में बीस साल पहले के दृश्य उतर आए

पहली पोस्टिंग थी।महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा गांव निपनिया।उस गांव के आस- पास का इलाका बहुत पथरीला था और वैसे ही पथरीले थे वहां के लोग।उसी गांव में एक पहाड़ी पर बना था उनका स्कूल।स्कूल भवन तो था, मगर बच्चे नदारद? गांव के लड़के दिनभर रेलवे लाइन के किनारे भटकते कि कोई माल गाड़ी रुके, तो माल चुराएं! और लड़कियां या तो छोटे भाई बहनों को पोसने में जुटी रहतीं या मां के साथ पानी जुगाड़तीं।फिर भी उन्होंने कोशिश की।गांव में जाकर उनके मां बाप से मिलीं, पर किसी ने सीधे मुंह बात नहीं की।एक ने जवाब दिया।—

‘हो मी पढ़ने को भेजेगी।फेर मेरा घर वास्ते पानी तेरे कू लाना होयेगा।बोल लाएगी?’

वे चकित! लोगों ने गांव की सारी कल्पनाएं ही ध्वस्त कर दीं।उस गांव से दूर एक कस्बे में रहती थीं वे।सो उन्हें स्थितियों का अंदाजा ही नहीं था।अंदाजा होता भी नहीं, अगर भास्कर से मुलाकात न होती।

ब्लॉक आफिसर भास्कर।वह गांव भी उनके एरिया में आता था।सो अक्सर उनसे मुलाकात हो जाती।बाद में तो वे साथ आने जाने लगे थे।

 ‘मैं सोच रही हूँ, अपना तबादला करवा लूँ।’ उनकी नजरें शहर को जाती पगडंडी पर जा टिकीं।

‘क्यों?’

‘इस गांव में रहने से कोई फायदा नहीं।इतनी कोशिश की, मगर…? यहां के लोगों को पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता ही नहीं।लड़कियां सारे दिन पानी ही भरती रहती हैं और लड़के? रेल लाइन के किनारे डोलते रहते हैं।’

‘आपको क्या लगता है? पानी जरूरी नहीं है?’

‘जरूरी है, मगर सारा दिन उसी के लिए!’

वे उसे समझाना चाहते थे कि दो पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव का नाम यूं ही निपनिया नहीं है।पानी का ऐसा अभाव है यहां कि अभाव शब्द भी बेमानी हो उठता है।जब जीवन का आधार पानी न मिले, तब जीवन जीने के और साधन भी कहां मिलते हैं।इस गांव में न तो खाने के लिए अन्न है और न पीने को पानी।फिर भी जी रहे हैं लोग।अगर वे यह सब उनसे कहते, तो उन्हें यकीन ही नहीं होता।

‘आप जानती हैं, ये पानी कहां से लाती हैं? नहीं न।चलिए मैं आपको दिखाता हूँ।’

मीलों पैदल चढ़ाई के बाद वे एक ऊंची पहाड़ी पर पहुंचे।वहां पहाड़ी से नीचे रेत की एक पतली सी रेखा नजर आ रही थी।वहां तक जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था।फिर भी वहां भीड़ लगी थी।उस खड़ी उतराई से नीचे जाने की हिम्मत नहीं थी उनमें।वहीं ठिठक गईं।

‘क्यों हिम्मत पस्त हो गई? आप देख रही हैं न? न तो यह उतराई आसान है और न ही चढ़ाई।और नीचे उतर कर भी पानी मिल ही जाए ये जरूरी नहीं है।यह एक बरसाती नदी है।साल में कुछ दिन ही पानी रहता है इसमें।बाकी समय रेत से पानी ओगारना होता है।आसान नहीं है रेत से पानी ओगारना, मगर ये ओगारती हैं, इस नदी में छोटे छोटे गड्ढे खोदकर।फिर कटोरी और कभी-कभी तो चम्मच से उस पानी को मटकी में सहेजती हैं।फिर मटकी लेकर यह खड़ी चढ़ाई चढ़ना? कई बार पानी ओगारने के इंतजार में यहीं रात बीतती है।बहुत सी लड़कियां जानवरों का ग्रास भी बन जाती हैं और आप कहती हैं…?’

‘सॉरी।मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी कि पानी के लिए इतनी जद्दोजहद कि जिंदगी तक दांव पर…।’

फिर गांव के लोगों से उन्हें कोई शिकायत नहीं रह गई।ऐसा नहीं था कि गांव के लोग बदल गए थे।वे अभी भी वैसे ही थे।उतने ही पथरीले, मगर अब उनका नजरिया बदल गया था और बदल गया था तबादले का फैसला।उन्होंने नए सिरे से कोशिश शुरू की।अब दिन की जगह शाम को गांव आतीं।रात को सब अपने अपने काम से निपट लेते, तब लोगों के घर जातीं, मगर उनसे पढ़ाई की बात न करके, उनके सुख दुख पूछतीं।धीरे-धीरे मन की गांठें खुलने लगीं।फिर उन्होंने पढ़ाई का महत्व समझाया।बताया, पढ़ना भी जरूरी है।विश्वास दिलाया, इसमें काम का अकाज नहीं होगा।वे बच्चों को रात में पढ़ाएंगी।बात समझ में आई।वे राजी हो गए।रात को निर्जन पहाड़ी पर जाकर पढ़ाना तो संभव नहीं था।सो मुखिया की परछी (बरामदे) में क्लास लगने लगी।

वे खुश थीं।बच्चे स्कूल आने लगे थे।एक सपना सा पलने लगा था उनकी आंखों में।उस सपने में था निपनिया गांव।भास्कर का सपना भी तो यही था।सो उनके सपने करीब आते गए और वे भी।अपने सपने की चांदनी में विचरते वे, कहां जानते थे कि राहू काला बुखारका रूप धर उनके सपने को ऐसे ग्रसेगा कि

सर्दियों में सब ठीक ही रहता था।पानी की कठिनाई होती थी, मगर काम चल जाता था, पर गर्मी? गर्मी आते ही कर्करेखी सूरज ऐसा तपता कि ताप भी त्राहि-त्राहि कर उठता।भास्कर ने कोशिश की कि पहाड़ी काटकर उस पार वाली नदी का पानी गांव में लाया जाए, मगर कामयाबी नहीं मिली।उनकी कोशिशें दो प्रांतों के दफ्तरों में उलझकर रह गईं।तब भास्कर ने योजना बनाई, पहाड़ी के पास एक कुआं खोदा जाए।उस पार बहती नदी ने उनका विश्वास बढ़ाया, पर इसके लिए श्रम और पैसे दोनों की जरूरत थी।पैसे तो उन्हें जुगाड़ना था, मगर श्रम? उन्होंने गांव वालों से बात की।

‘का बाबू! तू फत्थर से पानी निथारने का सपना देखता।ये सुक्खा पहाड़ में पानी है कहां।’ सुखु बाई के ससुर ने कहा।

‘काकू सहीच बोलता।ये पत्थर में पानी? नको।हम लोग कितना दफा कोसिस किया।फेर सब?’ सखाराम ने कहा।

सखाराम गांव का नेता जैसा था।सो सबने उसका समर्थन किया, मगर नाउम्मीदी में उम्मीद भर देने का नाम ही तो भास्कर था।

‘पहाड़ी के उस पार नदी है न?’

‘हव! नदी तो है।’

‘नदी के तीर तखार की जमीन में पानी होता है न।’

सब ने ‘हां’ में सर हिलाया। ‘फिर पानी क्यों नहीं निकलेगा? पानी जरूर निकलेगा।इस काम में जो भी पैसा लगेगा मैं लगाऊंगा और मेहनत हम सब करेंगे।ठीक है न?’

नाउम्मीदी के अंधेरे में उम्मीद की एक किरण दिखी, तो सबने हामी भर ली।पर उस बरस बरसात हुई ही नहीं।सर्दियों की जगह बरसात में ही काम शुरू कर लिया।गांव के सब माई पिला पूरे उत्साह से जुट गए, पर काम उतना आसान नहीं था, जितना लगा था।पथरीली जमीन सब्बल और कुदाल की नोक को टेढ़ा कर उसे बेकार कर देती।फिर नई कुदाल और सब्बल लाए जाते।काम अनुमान से बहुत अधिक खर्चीला हो उठा।भास्कर ने अपना पूरा पी. एफ. लगा दिया।

कई महीने की मेहनत के बाद कुछ नम मिट्टी मिली, तो लगा कि अब मंजिल करीब है।सचमुच मंजिल करीब ही थी।कुछ दिन के बाद गीली मिटटी निकलने लगी।फिर एक दिन मिट्टी के साथ कुछ पानी भी ओगरा, तो लोग खुशी से नाच उठे।वह दिन एक उत्सव जैसा हो गया था।बिलकुल होली सा माहौल।लोग देर तक मटमैले जल को एक दूसरे पर उलीचते रहे।अब उनके दुख के दिन दूर हो जाएंगे, इस सोच ने उनमें एक नई शक्ति भर दी और वे दुगने उत्साह से खुदाई में जुट गए, मगर नियति ने तो कुछ और ही सोच रखा था।सो उसने भेजा- काला बुखार।

अस्पताल, सड़क और पानी रहित गांव के लिए, वह बुखार किसी महामारी से कम नहीं था।उधर सूरज की तपिश ने गांव का बचा खुचा पानी भी सोख लिया।मृत्यु का ऐसा तांडव शुरू हुआ कि लगा मानो यमराज ने वहीं डेरा डाल लिया हो।भास्कर ने अपनी सारी ताकत झोंक कर दवाई की व्यवस्था की, मगर उन लोगों के लिए दवा से ज्यादा जरूरी था पानी।भास्कर ने पानी के सैकड़ों कैन खरीदे, मगर प्यास तो सुरसा हो गई थी।सुबह से शाम तक गांव और कस्बे के बीच चकरघिन्नी सा चक्कर मारते रहे वे, मगर बुखार से तपते लोगों की प्यास नहीं बुझी और काला बुखार लोगों को निगलता चला गया।सबसे त्रासद तो था वह क्षण जब सुखु बाई ने अपने ससुर को…

अभी फागुन बीता भी नहीं था, मगर सूरज की तपिश जेठ को मात कर रही थी।उसने कुएं का पानी सोंख कर उसे कीचड़ में बदल दिया था।दोपहर से पहले ही लू के थपेड़े चलने लगते।ऐसे में आदमी को भोजन भले न मिले, मगर पानी! पर पानी! दोहरे ताप से तपते मरीजों की जुबान पर बस एक ही शब्द उभरता—पानी-पानी-पानी।सुखु बाई के ससुर की जुबां भी यही रट लगाए हुए थी।

‘हव! मी देती।अब्भी देती।’ सुखु बाई ने कहा और उसकी नजरें, शहर वाली पगडंडी पर जा ठहरीं।

पर पगडंडी तो सूनी थी।भास्कर पानी जुगाड़ने गए थे, मगर कस्बे की दुकानों पर तो ताला लटका हुआ था।उस दिन कोई हड़ताल नहीं थी और न ही बंद का कोई एलान था।फिर भी पूरा कस्बा बंद था।कारण कोई बाबा आए हुए थे।कुछ ने अपनी मर्जी से दुकान बंद कर ली, बाकी दुकानें बाबा के चेलों ने बंद करवा दीं।वे टोला मोहल्ला से सबको सकेल ले गए।ऐसे माहौल में वे पानी कहां से खरीदते।बहुत भटकने के बाद एक घरनुमा दुकान से दो बाटल पानी मिला।उनकी मोटर साइकल दौड़ पड़ी।उस बीहड़ की पथरीली राह पर भी उसकी रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही थी, मगर मौत! मौत से आगे भला कौन निकल पाया है।वे पानी लेकर पहुंच पाते, उससे पहले ही मौत आ पहुंची।

‘पानी-पानी’ रटती जुबाँ के साथ जब आंखें पलटने लगीं, तो सुखु से रहा नहीं गया और वह उस लोटे को उठा लाई।उसने लोटा टेढ़ा करके ससुर के मुंह से सटा दिया, ‘घेव गंगाजल घेव।यहीच हमारा गंगाजल है।’

जब मुंह से लोटा हटाया, उन्हें मोक्ष मिल चुका था।अब सब कुछ शांत था।कोई प्यास नहीं, कोई आवाज नहीं।सुखु बाई ने ओंठ के कोर तक पसर आए कीचड़ को पोछा और दहाड़ मार कर रो पड़ी।

उन्हें जोखू याद हो आया।ठाकुर का कुआं वाला जोखू।सदियों का फासला, मगर स्थितियां वैसी की वैसी।जोखू ने भी तो गंदा पानी पीकर जान गंवाई थी।उन्होंने भीगी आंखों से बाहर देखा, झोपड़ी के द्वार पर भास्कर खड़े थे।उनकी आंखों में हताशा की राख थी।

उस अजार ने गांव को लगभग खाली ही कर दिया।भास्कर ने फिर भी अपना हौसला नहीं छोड़ा।बचे हुए लोग और बचे हुए पैसे से फिर जुट गए।पैसा कम पड़ा तो भास्कर ने कस्बे का अपना प्लाट बेच दिया।यह प्लाट मात्र जमीन का टुकड़ा नहीं था।उनके सपनों का आधार भी था।उसी प्लाट पर तो उनका स्वप्न नीड़ बनने वाला था, मगर गांव का यह सपना भी तो उन्होंने ही देखा था।

बहुत मशक्कत के बाद कुएं में पानी आया, मगर कुआं इतना गहरा हो चुका था कि उसे पक्का करना जरूरी था और वह करने के लिए लाखों रुपये की जरूरत थी।ये रुपये कहां से आए, यह एक बड़ी समस्या थी।अब उनकी बारी थी।उन्होंने अपना पी. एफ. निकालकर भास्कर को सौंप दिया।पैसे फिर भी पूरे नहीं हुए, तो भास्कर ने कस्बे में जाकर चंदा मांगा।घड़ी ने टन्न टन्न टन्न, घंटा बजाया, तो उनकी तंद्रा टूटी।तीन बज गए थे।नजरें घड़ी पर रहीं, मगर मन? वह फिर उसी गांव में जा पहुंचा…।

पैसे की व्यवस्था हुई, तो काम ने फिर गति पकड़ी।उन्होंने अपना पैसा लगाया, तो गांव वालों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी।उन लोगों ने भी अपनी पूरी शक्ति झोंक दी।कामयाबी तो मिलनी ही थी।वह मिली मगर…

अगले दिन कुएं की पूजा होनी थी।उस गांव में पूजा की सामग्री तो थी ही नहीं।वे उसे जुटाने गई थीं।लौटकर आईं, तो कुएं के इर्द गिर्द भीड़ देख उन्हें लगा कि लोग पूजा के लिए इकट्ठे हैं, मगर सुखु बाई दौड़कर आई और… —

‘ये गो ताई सब्ब खतम हो गया रे।ये पापी कुआं सब्ब लील गया रे।’ सुखु बाई बुक्का फाड़कर रो पड़ी।

सुखु बाई के रुदन के साथ ही औरतों का ऐसा रुदन उठा कि वे उधर देख न सकीं।उन्होंने तत्काल अपनी नजरें फेर लीं और भीड़ में भास्कर को तलाशने लगीं।वे दौड़कर उनसे लिपट जाना चाहती थीं कि उनकी पीड़ा को उनका कंधा मिल जाए।उन्हें कहां मालूम था कि कंधा तो अब…।उनकी नजरें देर तक उन्हें तलाशती रहीं।फिर सोचा,—‘वे कहीं गए होंगे।शायद कस्बे तक।इस विपदा से निपटना भी तो उन्हें ही पड़ेगा।’ सोचा फिर मन कड़ा करके उस ओर देखा तो काठ मार गया।पुलिस आई।फाजिलग्रस्त सत्या ने पुलिस को बताया।

‘कुएं का काम पूरा हो चुका था।बस नीचे की तरफ का हिस्सा ही छूट गया था।उसके लिए चार लोग कुएं में उतरे थे।अब तक पानी का सोता भी अपनी पूरी गति पकड़ चुका था।उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही थी।भास्कर ने समझाया कि इंटों का एंगल बदल लें, मगर कुएं की गहराई इतनी अधिक थी कि उनकी आवाज उन तक पहुंची ही नहीं।उस हिस्से में ईंटों को फंसाना जरूरी था।भास्कर कुएं में उतरे।उन्होंने ईंटों को वांछित एंगल में फंसा दिया।काम पूरा हुआ।अब उन्हें रस्से के सहारे बाहर आना था।लोग चाह रहे थे कि पहले भास्कर को बाहर भेजें, मगर भास्कर ने देखा पानी में डूबे रहने से तुका का हाल बेहाल हो रहा था।उन्होंने उसे पहले ऊपर भेजा।रस्से के सहारे वह ऊपर जाने लगा।ऊपर खड़े लोग उसका हौसला बढ़ाते रहे।तुका ऊपर पहुंचने ही वाला था कि दूसरे छोर वाला हिस्सा भराकर नीचे गिरा और….. देखते ही देखते उन सबकी कुएं में जल समाधि हो गई।

पुलिस ने शवों का पंचनामा कर लिया।उनके कान सब सुन रहे थे, मगर देह! लाशें पानी में फूल गई थीं।सो जल्दी ही कफन-दफन करना था।लोग शवों को गांव ले गए।लोग भी चले गए, मगर वे वैसी ही खड़ी थीं।

‘ये बाई चल न।नइ तो कफन-दफन को देरी होयेंगा।’ सत्या की आजो ने कहा।

‘ये पोरगी? चल न रे?’ आजो ने उन्हें पकड़कर झिझोड़ा और जोर से रो पड़ीं।

उन्होंने उनकी ओर देखा।देर तक टकटकी लगाए उन्हें ही देखती रहीं।फिर रुदन का एक सोता फूटा और वे उनसे लिपट गईं।उनका रुदन कलेजा चीरने लगा।भास्कर को पूरा गांव चाहता था, मगर आजो के लिए वे उनके सतिया से कम नहीं थे।बहुत चाहती थीं उन्हें।दोनों देर तक रोती रहीं।जी भर रो लेने के बाद वे गांव पहुंची।गांव वालों में शव को दफनाने की प्रथा थी।वहीं पास ही उनका कब्रिस्तान था।सबने तय किया पहले भास्कर की अंत्येष्टि करके, फिर बाकी शव दफनाए जाएं।भास्कर की अरथी तैयार थी।उसका और कोई तो था नहीं।लोगों को उनकी ही प्रतीक्षा थी।उन्होंने देखा भास्कर के चेहरे पर गुलाल लगा हुआ था और उनके गले में पत्तियों की माला डली थी।यह इधर की परंपरा थी।

यादों का एक झकोरा उठा- ‘सुनो! हम अपना ब्याह इन्हीं की तरह एकदम सादगी से करेंगे।कोई तामझाम नहीं।फूल की माला भी नहीं।बस सरइ (साल) के पत्तों की माला डाल कर एक दूसरे के हो जाएंगे।’

‘जब कोई तामझाम नहीं करना है, तो क्यों न आज ही…।’

‘चाहता तो मैं भी हूँ, मगर पानी? यह जिम्मेदारी…? पर फिकर नको? ये बरस सब हो जाएगा? तुम देखना ये बरस सरइ में खूब हरियर पाना (पत्ते ) आएगा।उससे मैं माला बनाऊंगा।दो माला समझी।’

तभी लू का एक थपेड़ा लगा और यादों के झोंके बिखर गए।उनकी नजरें सत्या की दूआरी की ओर उठीं।देखा, सरइ का पेड़ हरे-हरे पत्तों से भरा हुआ था।मन में एक हूल सी उठी और आंखें बरस पड़ीं।फिर सरइ के मुलायम मुलायम पत्ते तोड़े।उन्हें आपस में गूंथकर माला बनाई और भास्कर के गले में डाल, उनसे लिपट गईं और बुक्का फाड़कर रो पड़ीं।आंसू रुक ही नहीं रहे थे, मगर उन्हें बरबस रोका और उठकर अरथी का एक बांस थाम लिया।

अंत्येष्टि के दसवें दिन, उसी कुएं के किनारे नहान रखा गया।देखा, पानी से भरे कई घड़े रखे थे।उन्होंने अंजलि में जल भरा।उसे गंगाजल की तरह अपने ऊपर छिड़का और घड़े का सारा पानी कुएं में उड़ेल दिया था।…

उनकी नजरें भास्कर की तस्वीर पर जा ठहरीं ‘पानी की कितनी बड़ी कीमत चुकाई है मैंने और लोग कहते हैं कि पानी जैसी चीज…! बदलने ही होंगे वे मुहावरे, जो पानी को यूं बेमोल मान लेते हैं …।यह सोच तो बदलनी होगी।’

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