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उत्तम कांबले मराठी के चर्चित लेखक। दो उपन्यास, चार कथा संग्रह, दो काव्य संग्रह सहित कई पुस्तकें प्रकाशित। कंपाउंडर, हमाल, दिहाड़ी मज़दूर और हॉकर का काम करते–करते बीए तक शिक्षा हासिल की। कई सम्मान और पुरस्कार। |
किशोर दिवसे वरिष्ठ लेखक और अनुवादक। सद्यः प्रकाशित हिंदी कहानी संग्रह–‘हायऽऽऽ चिमी’। नवभारत समाचारपत्र समूह में 36 वर्षों का संपादकीय अनुभव। |

वैजयंती अपने दोनों बच्चों को थपथपा कर सुला रही थी। उसका एक हाथ छह वर्ष के बेटे मौज पर तो दूसरा तीन वर्ष के बंटी पर था। मां की थपकी के बगैर बच्चों को नींद कभी नहीं आती थी। वैजयंती को जब उकताहट होती तब वह मुझे थपकियां देने को कहती, लेकिन बच्चे भी बेहद चालाक। वे मेरे और पति के हाथ का स्पर्श पल भर में पहचान जाते। आंखें खोलकर सीधा पूछते, ‘मां कहां है?’ तब वैजयंती भागकर आती। झूठा गुस्सा जताती।
‘थोड़ी देर पापा ने थपकियां दीं तब शरीर पर फुंसियां थोड़े ही आ जाएंगी?’ वैजयंती कहती थी। लेकिन बच्चे भी उनकी बात पर ध्यान न देकर सीधे मेरी गोद में आ जाते।
प्रतिदिन सोने से पहले घर में दिखाई देने वाला यही चित्र था। मां के हाथों की स्नेहिल ऊब अपने नाजुक अंगों के पोर-पोर से खींचकर बच्चे सो जाया करते थे। उनके सोने के बाद वैजयंती अपनी अंगुलियां मोड़कर उनके गालों पर बलैया लेती। उनके गालों का दीर्घ चुंबन लेकर उनकी निरागसता अपनी जीभ पर सोख लेती। कुछ पल वह भी बच्चों जैसी निश्छल और मासूम दिखाई देती। बच्चों की वजह से माता-पिता भी कितना बदल जाते हैं न! वैजयंती ने बच्चों के शरीर पर शॉल ओढ़ा दी। मैं पलंग के बाजू में आरामकुर्सी पर बैठ गया। वैजयंती दीवार से टिककर बैठ गई। मैंने अपने हाथ का कागज उसके हाथ में देते हुए कहा, वैजयंती यह देखो जरा? वैजयंती ने वह कागज ऊपर से नीचे तक देखा। मुझे अपेक्षित उत्साह उसकी नजरों में दिखाई नहीं दिया। थोड़ा परेशान होकर उसने कहा, ‘सुनो जी! कितनी बार आपसे कहा है कि सब कुछ बच्चों और मेरे नाम पर मत कीजिए। अब तक बच्चों के नाम चार बार तुमने कितनी ज्यादा राशि जमा की है।’
‘फिर अब बच्चों के ही नाम पर? …जाने भी दो वैजयंती, जो उगते सूरज की मानिंद वारिस होते हैं उनके लिए ही तो पैसा इकट्ठा करना है न! जिन्होंने इन बच्चों की ओर पीठ दिखा दी उनके बारे में क्या सोचना?’ मैंने वैजयंती को समझाइश देते हुए कहा। लेकिन वैजयंती शांत होने को तैयार नहीं थी। उसने चिढ़कर कहा, ‘अजी! पूरब-पश्चिम की बात क्यों करते हैं आप? आपकी उम्र ही क्या हुई है? सिर्फ चालीस बरस? सासूजी की आयु तिरसठ वर्ष और ससुर जी पिचहत्तर के, वे कभी पश्चिम या ढलते सूरज की बातें करते हैं क्या?’
‘देखो वैजयंती! ये जीवन और कुछ नहीं सूरज के उगने से लेकर ढलने तक का सफर ही तो होता है।’
‘तब तो अपने बच्चों के लिए भी यही नियम लागू होना चाहिए न!’
‘हां, उनके लिए भी यही नियम लागू होगा। लेकिन कुछ समय बाद। इनमें और हममें सिर्फ इतना ही फर्क है। इस अंतर की वजह से ही मैं यह निवेश कर रहा हूँ।’
वैजयंती ने कहा, ‘सुनो जी! यह समझती हूँ मैं। लेकिन ऐसा करने के समय हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो रहा है, ऐसा क्यों सोचते हैं आप?’
मैंने कहा, ‘खत्म हो चुकी जिनगाई और समाप्त होने वाले जीवन का एहसास मुझे बहुत हुआ है। सिर्फ इतनी ही बात उसमें समझने की है। मेरा मानना यह है कि जिन्हें इस सचाई की अनुभूति नहीं होती वे अपने आपको धोखा देते हैं।
वैजयंती ने कहा, ‘देखिए जी! कोई भी अपने आपको धोखा नहीं देता, सभी फंसाते हैं। भगवान भी खुद को फंसाता है। खुद को फंसाने में समाज का कोई नुकसान नहीं है। अच्छा! चलो यह बताओ कि हम खुद को फंसाते हैं, इसका सही मतलब आखिर है क्या, यह तो बताइए?’
‘अब यह भी मैं ही बताऊं क्या? हम सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है फिर भी दीर्घावधि के लिए निवेश करते हैं। इसका मतलब हम ख़ुद को फंसाते या धोखा देते हैं या नहीं? हम अपना बुढ़ापा छिपाने की कोशिश करते हैं। यह धोखा देना नहीं है क्या? इतना ही क्यों? घर से बाहर जाते वक्त आ रहा हूँ, कहते हैं। घर के बाहर तूफानी भीड़, जानलेवा प्रतिस्पर्धा, आसमान में हवाई जहाजों की, उपग्रहों की, रास्ते पर इंसानों की, हवा में प्रदूषण, सारी दुनिया रेस के घोड़ों की तरह रफ्तार से भाग रही है। समूची दुनिया ही भयानक तेजी से भागने वाली मशीन बनकर रह गई है।
‘उसका एक हिस्सा भी अगर बिगड़ गया तब यह मशीन बंद हो जाएगी। लेकिन वह अपने साथ अनेक मशीनों को भी बंद कर देगी। इंसान बस में चढ़ते वक्त मरता है, उतरते समय भी। गैस रिसने से मरता है। खुद की गलती हो या न हो किसी न किसी दुर्घटना में भी मरता है। लेकिन हम उन्हें बाईपास कर आगे बढ़ जाते हैं। यही जीवन की रीत भी है। सिर्फ यही हमारा पराक्रम है। आखिर कितने दिन तक यह लुका-छिपी का खेल चलता रहेगा? एक न एक दिन तो हमें धर दबोचेगा ही! कब दबोचेगा! यह किसी की भी समझ में नहीं आता।’ वैजयंती झुंझला गई। अपनी जगह से उठकर उसने चादर साफ की। मुझे लगा मानो वह चादर नहीं बल्कि मेरी फिलॉसॉफी ही साफ कर रही है।
उसने बच्चों के शरीर से उठाई चादर फिर ओढ़ा दी। अपनी चादर ओढ़ते हुए उसने कहा, ‘तुम्हारी इस फिलॉसॉफी पर अगर अमल कर लिया तब सारी दुनिया ही पागल हो जाएगी। मृत्यु सुनिश्चित है इसलिए जीना ही नीरस कर देने को समझदारी बिलकुल नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसे पागलपन ही कहा जाएगा। किसने आपके दिमाग में यह बात भर दी?’
‘कौन जाने? सो जाओ अब चुपचाप।’
‘अरे! कैसे सो जाऊं शांति से? दुनिया की पचीस फीसदी मौतें नींद के दौरान ही होती हैं।’ मेरी इस दलील पर वह बिफर गई, ‘मृत्यु अगर नींद के दौरान आती है तो घर के सारे लाइट जला दो और जोर-जोर से शनि चालीसा पढ़नी शुरू कर दो। सोने जैसे दो बच्चे, सोने जैसी नैकरी, सोने जैसे ही माता-पिता होने के बावजूद तुम्हें तो हर समय मौत ही दिखाई देती है…! चलो, अब मुझे सोने दो।’ वैजयंती ने तुरंत अपना मुंह छिपा लिया। दोनों बच्चों पर हाथ रखकर वह सो गई।
मैं शांति से कुर्सी पर बैठा था। कई दिनों के बाद मुझे जिस सत्य से साक्षात्कार हुआ था, उसे वैजयंती पागलपन करार दे रही थी। लेकिन मेरा सत्य अनेक दफे सचाई में बदल गया था। भूकंप, हवाई दुर्घटना, विभिन्न शहरों में होते बम विस्फोट, बस और रेलवे हादसे, रास्ते के बाजू में बने घरों में अचानक वाहनों का घुसना, हवाई जहाज में हृदयाघात, दफ्तरों में एकाएक मौत, धार्मिक स्थलियों में जाने या लौटने के दौरान लोगों की दुर्घटनाओं में मृत्यु, अनेक प्रसंगों में मुझे सचाई दिखाई दे रही थी। ये सारी सचाइयां जहां पर नजर न आएं, ऐसी कोई जगह मुझे दिखा दो अगर मैंने ऐसी चुनौती दी तब उसे भगवान भी स्वीकार नहीं सकेगा। लेकिन वैजयंती मुझे ही पागल कहती है। बंदर और जामुन का पेड़ वाली कहानी की तरह कलेजा जामुन के पेड़ पर रखकर जाने के दिन अब नहीं रहे। अब तो पेड़ ही वह कलेजा खा लेगा। फिर भी लोग यह समझते क्यों नहीं?
वैजयंती ने मुझे सो जाने का आदेश दिया। ऐसा वह रोज ही करती है। फिर भी नींद मुझसे कोसों दूर रहती है। अलसुबह, हलकी-सी नींद लगती है, लेकिन आंखें मूंदने के बावजूद सारी दुनिया में फैली असुरक्षा संबंधी दीर्घ चित्रावली मेरे सामने धूमने लगती है और मैं बेचैन होकर करवटें बदलने लगता हूँ। कभी इन चित्रों से चीखें गूंजती हैं और कभी रक्तधाराएं भी बहती दिखाई देती हैं। कई बार तो शरीर के बिखरे हुए अंगों के ढेर भी दिखाई देते हैं। आखिर क्या होगा इस दुनिया का? क्या होगा हम सबका? स्कूटर पर अपने दफ्तर जाने के वक्त भी मन में यही ख्याल विस्फोटक हो जाता है। अगर अचानक सड़क हादसे में मेरी मौत हो जाती है, तब घर के नन्हे मासूम बच्चों का क्या होगा? बूढ़े मां-बाप को कौन संभालेगा? वैजयंती को बिना सिंदूर का माथा लेकर घूमना होगा… और बच्चों का पालन- पोषण भी संकट में पड़ जाएगा। वैजयंती अल्पशिक्षित है। उसे नौकरी मिलेगी नहीं। उसकी नौकरी के बगैर बच्चों का क्या होगा? उसके जीवन का स्तर मेरे रहते काफी ऊंचा हो चुका है। मेरी मौत के बाद इसका टिकना संभव नहीं।
क्योंकि नौकरी कर परिवार पालनेवाला ही कोई नहीं होगा। माता-पिता की पेंशन के भरोसे ही घर की गाड़ी कितनी खिंचेगी? पेट भूखा रहे तो इंसान भीख मांगने पर विवश हो जाता है। अगर मेरे बच्चों पर भीख मांगने की नौबत आ गई तब! कितना भयानक मंजर होगा वह! मेरे मासूम बच्चे भीख मांगेंगे? सचमुच अपनी ही गलती है… बच्चों को जन्म ही नहीं देना था… मेरे ही मां-बाप ने गलती की… लेकिन उनकी ही गलती कैसे कही जा सकती है… उन्हें भी तो उनके माता-पिता ने पैदा किया है… कितना जटिल चक्र है यह! उनके और उनके भी माता-पिता करते हुए हम कहां तक पहुंच जाएंगे भला? बंदर से इंसान बना, वहां तक! काश! विकासवाद बंदर तक होने के बाद ही रुक गया होता…! कितनी अच्छी कल्पना है यह! …इंसान ही जन्म नहीं लेता…! जन्म नहीं होता तब मृत्यु भी नहीं होती …डर पैदा नहीं होता और असुरक्षा भी महसूस नहीं होती …लेकिन बंदरों की टोलियां कितनी बढ़ गई होतीं! …मैं पल भर के लिए हँसा।
मेरी अलहदा विचार शृंखलाओं के ऐसे ही चक्रव्यूह बना करते हैं। कई घंटों तक मैं विचारों के भूतों से संघर्ष करता रहता हूँ। दुनिया के निर्माण के समय से रास्ते पर बेफिक्री से स्कूटर चलाने वालों के समय तक… हृदयाघात के झटके तक… कैंसर और प्रदूषण तक। अपने विचारों में पूरी दुनिया का एक चक्कर लगा लेता हूँ। लेकिन हर जगह वही चित्र नजर आता है। सारे इंसान झूठे चेहरे लेकर जी रहे हैं। मौत की दहशत पर… असुरक्षा पर झूठी हँसी का भुलावा देकर जी रहे हैं लोग। सारी दुनिया ही दुख का आईना है इसी सिद्धांत को वे सहला रहे हैं…
यह सारा सच है। जानलेवा सच ही तो है! फिर भी इसे स्वीकार करने का साहस इंसान के मन में नहीं है। उन्हें लगता है कि अगर ऐसा होगा तब जीने की पूरी लालसा ही समाप्त हो जाएगी। लेकिन ऐसी भी लालसा का क्या मतलब? हमारे ही दफ्तर का एक कर्मचारी बैंक से पैसे निकालने की कतार में हृदयाघात के झटके से मर गया। तेरहवीं पर उसके पिंड को कौए ने भी नहीं छुआ। अगर उसने जिंदगी में मजे किए होते तब कौए ने उसके पिंड को जरूर छुआ होता न! जिंदगी भर मौत के डर से भागने वाले इंसान के जीवन में भला क्या और कितना आनंद होता होगा? पिकनिक गए छह बच्चे हादसे में मर गए। अगर वे नहीं गए होते तब…!
एक दिन मैं किसी ज्योतिषी के पास गया था। उसे अपना हाथ दिखाया। उसने कहा, ‘अरे बाप रे! अब तक तुम चार-छह भयंकर दुर्घटनाओं से बचे हो। अब जरा संभलकर रहना।’ मैंने हामी भर कर कहा, ‘बाबा, आपने अचूक भविष्यवाणी की है। बचपन में साइकल चलना सीखते समय जोर से गिर गया था। एक बार सीढ़ियों से फिसलकर गिर गया। एक बार स्कूटर से गिरा और एक बार स्टोव के भभके से भी बच गया।’ ज्योतिषी से मिलकर वापस लौटते वक्त मैं अपने जीवन में घटे ऐसे ही छोटे-बड़े हादसों पर विचार करता रहा। कुछ दुर्घटनाएं याद आईं, बाकी स्मरण की परिधि से बाहर थीं। यह आने वाली दुर्घटनाएं हजार से भी अधिक और याद न आनेवाली का तो पता ही नहीं।
कुल जमा-खर्च का हिसाब करने पर मुझे भरोसा हो गया कि इंसान का जीवन ही एक हादसा है। इससे आगे विचार करने पर यह बात ध्यान में आई कि इंसान का जन्म ही एक बड़ा हादसा है। इस हादसे में कुछ बच्चे बच जाते हैं और कुछ अपनी मां के साथ ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बचने वाले सारे बच्चे जीवन भर हादसों से बचने की कोशिश करते हैं। हादसे और उनसे बचना ही उनका जीवन बन जाता है। ऐसी स्थिति के बीच में ही मैंने कार चलाना सीखने का फैसला किया लेकिन दूसरे ही पल रद्द भी कर दिया। पिछले कुछ दिनों से मुझे ऐसा लग रहा है कि रास्ते पर चलनेवाली प्रत्येक कार की नजर मुझपर ही है… मुझे कुचलने की फिराक में है। भला, कार सीखने के बाद भी क्या खास बदल जाता! मैंने कार चलाना सीखना पूरे गर्व से खारिज कर दिया।
अब तो होटल में खाना भी बंद कर दिया है। तीर्थ-प्रसाद खाकर, उत्सव में मिठाई खाने से, शादी समारोह के भोजन से भी मरने की घटनाएं बढ़ रही हैं। बेवजह जोखिम क्यों लेना, इसलिए बाहर का खाना भी बंद कर दिया। शुद्ध हवा के लिए मास्क लगाना शुरू कर दिया है। सर पर हेलमेट भी लगाता हूँ। लेकिन मौत क्या इतने क्षुद्र कारणों से डरेगी भला? अच्छा हुआ, मेरी आयु अब चालीस पार हो चुकी है। नहीं तो आयु के संबंध में भी परिपक्वता जल्दी नहीं आती। पहले मैं बहुत बेफिक्र रहता था। कुएं में कूदकर नहाता। स्कूटर चौथे गियर में तेजी से चलाया करता। बहुत मूर्खताएं की। अब मैं मजबूती से कह सकता हूँ कि मेरे बच्चे ही क्या किसी को भी ऐसी गलतियां नहीं करनी चाहिए। वैजयंती मुझे मजाक ही मजाक में सलाह देती है। मैं भी सारी बातें हलके में ले लेता हूँ। मानसिक उपचार और कुछ नहीं, इंसान के वैचारिक अंतर्द्वंद्व के दौरान होने वाले संघर्ष मापने का पैमाना मात्र है इसे मानव समाज ने ही विकसित किया है।
कभी-कभी इन सभी कल्पनाओं के विषैले रसायन तैयार हो जाते हैं। वे शरीर में पसर जाते हैं उसी तंद्रा में मुझे नींद आ जाती है। सुबह नींद खुलने पर सारी रात किए चिंतन का समाधान होता है। आज भी वैसा महसूस हुआ। नहा धोकर सब्जी खरीदने बाहर निकला। मंडी के बाहर स्कूटर स्टैंड पर लगाया। सब्जी मंडी मतलब ही वाहनों की भक्कम भीड़। ऐसा लगता है कि दुनिया भर वे सारे वाहन और सारी अनुशासनहीनताएं यहीं इकट्ठा हो जाती हैं। इस भीड़ में जो भी चलना और वाहन चलाना सीख जाए उसे शूरवीर समझा जाना चाहिए। सब्जी खरीदकर बाहर निकला। भीड़ पर नजर डाली। सड़क पर सारे वाहन चार-चार कतार बना कर तेज रफ्तार से आ-जा रहे थे। हर किसी को सबसे आगे निकलने की जल्दबाजी थी। इस जबरदस्त भीड़ में मेरी नजर एक दिव्यांग पर टिक गई। घुटने से नीचे उसके पैर नहीं थे। आधे फुट ऊंचे तख्ते में उसने चक्के लगा के रखे थे। अपने दोनों हाथ जमीन पर घिसटते-घिसटते वह आगे बढ़ रहा था। यह तख्ती ही मानो उसकी गाड़ी थी। फिर भी वह उसे रफ्तार से आगे ले जा रहा था।
अनेक चार पहिए और दो पहिए वाहनों से बचकर वह दिव्यांग रस्सा काट रहा था। उसके चेहरे पर डर के बजाए आत्मविश्वास झलक रहा था। गले में एक थैली लटक रही थी। चेहरा पसीने से भीगा था। सर पर बालों का जंगल दिखाई दे रहा था। घुटनों के ऊपर का हिस्सा केले के तने का ठूंठ दिख रहा था। वह अपनी चार पहियों वाली गाड़ी लेकर सीधे मेरे पास आया। मुझे उसके भरोसे पर बड़ी हैरत हुई। स्कूटर के बाजू में आकर उसने गले में लटकी थैली से एल्युमीनियम की थाली निकाली।
‘साहब! कुछ तो दे दो!’ दयनीय आवाज में उसने गुहार लगाई। मैंने उसकी थाली में एक रुपया डालते हुए कहा, ‘क्यों रे! इतनी भीड़ में भी तू इतनी तीर की तरह आ जाता है, तुझे डर नहीं लगता?’ वह हँसा लेकिन कुछ बोला नहीं। मैंने फिर कहा, ‘अरे! तुझे डर नहीं लगता क्या?’
उसने कहा, ‘साहब! डरने से काम कैसे चलेगा? जन्म से ही मेरा पैर नहीं है। फिर भी मैंने इसका दुख नहीं मनाया। डरना सीखा होता तो जिंदगी जीना नहीं सीख पाता। मौत… उसका कभी न कभी आना तय है। भगवान भी मौत से नहीं बच सका, तब मेरे जैसे अपाहिज की क्या बिसात? लेकिन साहब! मैं एक बात कहता हूँ, संघर्ष करने में जो मजा है वह जिंदगी से भागने में नहीं। इस हाइवे पर मैं पिछले दस वर्ष से आना-जाना कर रहा हूँ। मेरे साथ कभी कोई हादसा नहीं हुआ। मामूली-सा जख्म भी नहीं और मान लिया हल्की-सी चोट भी लगी तो क्या इसके डर से चलना भी बंद कर दूं?’
मैंने कहा, ‘अरे! लेकिन सभी तरफ दुर्घटनाओं की स्थिति है इसके बावजूद!’
मुझे बीच में ही रोककर उसने कहा, ‘साहब! ऐसा आज ही नहीं हो रहा है। हमेशा से ऐसा ही होता आया है। आप जैसे मजबूत लोग अगर ऐसा सोचने लगे तब हमारे जैसे लाचार और अपंग लोग क्या करेंगे? मुझे पैर न होने का दुख अब बिलकुल नहीं होता, बल्कि इस बात की खुशी होती है। इसकी वजह यही है कि मेरे अदृश्य पैर की ताकत भी मेरे हाथ में आ गई है। सच बताऊं साहब…!’
मैंने उसके कहने पर कोई ध्यान नहीं दिया। स्कूटर स्टार्ट किया और घर की ओर मुड़ गया। उस दिव्यांग के शब्दों से अपने सर्वांग में असीम शक्ति महसूस करने लगा था मैं। लहुलूहान हो गया था …और शर्म आ रही थे मुझे अपने आप पर। पैरविहीन इंसान ने मुझे असीम आत्मबल से लैस कर दिया। मेरे अपाहिज बन गए मन को गतिशील कर दिया। उस सम्मोहन में मैं घर पहुंचा। वैजयंती अपने बच्चों से लड़ रही थी। बच्चों को हॉकी खेलने जाना था, लेकिन वैजयंती उन्हें मना कर रही थी। दरअसल बच्चों को हॉकी जैसा जोखिम भरा खेल नहीं खेलना चाहिए बल्कि इसके बजाए ताश या कैरम खेलें, यह नियम मैंने ही बनाया था। मां-बच्चों की लड़ाई में हस्तक्षेप करते हुए मैंने वैजयंती से कहा, ‘वैजयंती! जाने दो न बच्चों को खेलने!’
वैजयंती कहने लगी, ‘नहीं नहीं, हॉकी स्टिक पैर में अटककर गिर जाएंगे। दांत टूट जाएगा। जबरन का सरदर्द क्या मोल लेना?’
मैंने कहा, ‘गिर गए तो गिरने दो न! चोट लगती है तो लगने दो। ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ेगा। घर में बैठकर भी क्या करेंगे? उन्हें जो करना है करने दो।’
‘अरे लेकिन इतनी भीड़, गाड़ियां’ वैजयंती ने कहा।
‘कुछ नहीं बिगड़ेगा। भीड़ कोई बच्चों को खा नहीं जाएगी।’ मैंने कहा।
‘अजी! बच्चे अभी छोटे हैं न!’
‘मैंने कह दिया न, बच्चों को जाने दो। अरे! भीड़, दुर्घटना, चोट लगना, जख्म, जोखिम यह भी तो एक अनुभव ही है।’
मेरी यह बात सुनकर वैजयंती का मुंह खुला का खुला रह गया। न जाने कितने दिनों बाद उसके चेहरे पर पूरनमासी का चांद खिला था। लेकिन अपने चांद को छोड़कर वह मेरे चेहरे पर खुशियों की खिली चांदनी टकटकी लगाकर निहारने लगी।
द्वारा साकार दिवसे, सी–ब्लॉक, फ्लैट नंबर 702, साई लक्सुरिया,अक्षरा इंटरनेशनल स्कूल के पास, वाकड, पुणे–411057, मो.9827471743
Paintings by Gautam Mukherjee



