वरिष्ठ कवि। कविता संग्रह ‘चीख सकते तो पहले पेड़ चीखते’ तथा शहरनामा ‘एक शहर मेरे आस-पास’। ‘आरोह’ साहित्यिक पत्रिका का संपादन।

घर लौटते हुए

कितने समय तक
रोक कर रख सकते हो मुझे!

रात चाहती है
बिफोर टाइम झपट्टा मार दे
गांव की ललचाती शाम पर

पर जब तक
आखिरी आदमी की साइकिल की वही घंटी
जंगल से गुजरते हुए
गांव में सुनाई पड़ती रहती है

शाम रोके रहता है
आंगन की दहलीज पर
किसी इंतजार की तरह
रात को
दूर की आती कोई मद्धिम रोशनी
रोके रखती है
बाघ को
शाम को
घर लौटते हुए आदमी का
रास्ता कभी मत रोकना
ओ अंधेरे!

भालोबाशा

शारदीय नवरात्र की सुबहें
बंगाल में मुहब्बतों के कास खिलने
और हरसिंगार के झरने से
शुरू होता है
भालोबाशा शब्द
नए जामा-कापोड़ पहनता है
माठ में, पंडालों में देर रात तक
टहलता है, इतराता है…

इंद्रोनील की आंखें तलाशती हैं
पहली बार हाथ में हाथ डालकर
घूमती उस तल्लीन लड़की को
जिसने कभी कोई वायदा नहीं किया
पर किसी पूजो में उसे भूली नहीं

पुलकित है यह संसार
नए मौसम को छूते हुए निकल जाने के लिए

पकते धान और कांपते ओठों पर
ठहर नहीं रहीं शबनम की बूंदें

उम्मीद कोई कांच का बर्तन हो जैसे
ज्यादा इस्तेमाल से डरता है मन
कभी कभी देखना
छूने जैसा हो जाता है।

गंध

जारा को
मंकी पसंद नहीं है
ओरांग ओटांग उसका फ्रेंड है

पंद्रह महीने की बच्ची ही
समझना चाहती है कि
कौन उससे प्यार कर सकता है!

पता नहीं रंगों में
और लोगों में कल उसे
क्या जंचेगा और वह किसे
रिजैक्ट कर देगी!

सोच रहा हूँ
आखिर खरगोश, तितलियां या कबूतर
उसे ज्यादा पसंद क्यों नहीं हैं!

जासूस

सोए हुए आदमी के सामने
शोर मचाना एक तरह का
अपराध है
या इसे हिंसा की श्रेणी में
रखा जा सकता है

बहेलिए को क्या पता
कि चिड़िया अपनी चोंच में दाने लेकर
लौट रही थी
उड़ नहीं पाने वाली नन्ही चिड़िया के लिए

एक ठहरे हुए शहर की मति को
ठेलकर कितनी दूर तक
ले चलोगे!

शवगृहों में पड़े इतिहास को
कौन ले जाएगा श्मशान!

एक-एक आदमी की खबर रखता है
अमेरिका।

क्रैश

अभागा है वह सत्यवादी
ऐन वक्त गले में अटक जाते हैं जिनके
शब्द
फिसलकर फिर से मछली
तालाब में जा गिरी
इल्जाम लगाकर क्या होगा
कॉकपिट में पायलेट को
नींद बहुत आती है

युधिष्ठिर ने कभी मछली नहीं मारी
लेकिन फंस गया गले में
अर्धसत्य का कांटा

स्वप्न-सा रंगीन हवाई जहाज
क्रैश हो गया।

विदाई

कब का उठकर चला आया महफिल से
रास्ते में जमकर बारिश हुई
और मेरी छतरी उड़ने को हुई
चश्मे पर टिक गई
कुछ बूंदें असंभली

एक धीमा ठंढापन, कुछ आवारा अंधेरा
और अपना ही अकेलापन

लेकिन खुद से बातें करने का
यह सबसे बेहतरीन अवसर
स्मृतियों की गलियों से गुजरते हुए

सुना कि अंत में लोगों ने
मेरा नाम भी पुकारा था
यह जानते हुए भी कि
अब मैं वहां नहीं हूँ
था भी तो दिखा नहीं था…

आहिस्ते-आहिस्ते मृत्यु की ओर बढ़ते
कदमों को
किसी आकाशवाणी की
उम्मीद नहीं रखनी चाहिए
कपड़े बदलूंगा, चाय पीऊंगा
यह सोचकर घर लौटा
पर ऐसा लेटा कि नींद आ गई
और फिर कभी उठ न सका।

मुझे जो होना था

मुझे क्या हुआ अब
जो नहीं हुआ हो
अंधा नहीं हूँ पर दिखाई नहीं देता
लंगड़ा नहीं हूँ पर चल नहीं सकता
गूंगा नहीं हूँ पर बोल नहीं सकता

हाथ किसी भी रथ को रोक सकते हैं
पर रोक नहीं पाता
एक भी वार निर्लज्ज

यह किसी बीमारी का लक्षण नहीं है
पर इसका कोई नाम नहीं है

संख्या हूँ, नाम हूँ, जाति हूँ
लिंग हूँ, भाषा हूँ
पर मुझे जो होना था- वह नहीं हूँ

इस देश को जो चाहिए
वह सब हूँ मैं
सामाजिक, सांस्कृतिक, जागरूक, कर्तव्यनिष्ठ…

लेकिन वह नहीं हूँ
जो मुझे होना था
होना चाहिए था…

ब्लैक मेल

ढीठ है तुम्हारा प्रस्ताव
धोखा लचीले पेड़ पर उग आया है
प्यार बंकरों में छुपकर बैठा है
दुबककर

तुम एक ही पॉकेट में हाथ डाल कर
खरीद लेना चाहते हो
मेरा देश
ऐसा तुम समझते हो

तुमने खरीदे हैं और बेचे हैं
बहुत सारे भू-भाग
और जो कब्जा न पाए उसे
उड़ा देना चाहते हो बारूद से
यह तुम्हारे अभ्यास में है

मरीज को तत्काल ऑक्सीजन की जरूरत है
बाढ़ में डूबते लोगों को रसद और नाव की

तुम कहते हो
पहले यह इलाका तुम्हें सौंप दूं
तब तुम मानवता का संदेश भेजोगे
राशन, कपड़े, टैंट, दवा,
सफलता प्राप्त करने वाली
किताबें सब भेजोगे

जब झुकी रहेगी हमारी गर्दन
तब तुम पास करोगे
हमारे हित में प्रस्ताव…
जिंदा रहने के अधिकार का।

संपर्क : ‘मल्हार’ टूयूलिप 2823, एस के ए मेट्रो विले, ग्रेड्स इंटरनेशनल स्कूल के सामने, ई टी ए 2,  ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश)