शंभुनाथ

गांव में एआई आया। किसान ने पूछा- ‘मौसम बता सकते हो?’ एआई ने कहा- ‘हां’। किसान- तो पहले यह बताओ कि मेरा बैल तुम्हें घूर क्यों रहा है?’ एआई चीखा- ‘सिस्टम अलर्ट’… एक्जिट करो!’ विद्यार्थी खुश हैं कि एआई उनका होमवर्क कर देगा, बल्कि वह पीएचडी की थीसिस भी लिख देगा!
क्या एआई हमारे बदले हँस सकता है? मनुष्य जिस बात पर हँसते-हँसते पेट पकड़ लेता है, एआई उस बात पर दस सेकेंड सोचकर बताएगा कि यह मजाक किस श्रेणी में आता है। वह सूचित करेगा कि यह व्यंग्य, तंज, विनोद, उपहास, आत्मव्यंग्य है या आदमी की निरी बेवकूफी। फिर वह एक प्रोसेस्ड हँसी निकालेगा जैसे सरकारी दफ्तर की कोई फाइल हो।
मनुष्यों की हँसी में जो स्वाभाविकता, निश्छलता और अचानक फूट पड़ने वाला हर्ष है वैसी हँसी एआई के पास नहीं है। इसकी संभावना जरूर है कि भविष्य में एआई ही व्यवस्थित हँसी के मॉडल दे और इंसान स्वाभाविक रूप से हँसना भूल जाए!
एआई इतना आज्ञाकारी है कि यदि उसे आप सोचने को कह दें तो वह पहले पूछेगा, ‘कितने सेकेंड?’ लोग कहते हैं, एआई दुनिया बदल देगा। किस दिशा में बदलेगा, किस दिशा में बदल रहा है? एआई को तब काफी परेशानी होगी जब कोई संपादक उससे कहेगा- अगले अंक के लिए कोई रचना दो! वह गोल घूमता दिखेगा। ऐसा है एआई कि वह साथ बैठकर कॉफी नहीं पी सकता, और संसार से एक दिन हमारी हँसी जरूर छीन लेगा जैसे घरों से आंगन गायब हो गया।
हम पहले इंसानों की तरह हँसते थे
हमारी हँसी खोती जा रही है। इसकी जगह दूसरे का उपहास बढ़ रहा है जो एक किस्म की हिंसा है। एक जमाने में जो एक निर्मल छत-फाड़ ठहाका था, बहुत कुछ हजारी प्रसाद द्विवेदी की हँसी जैसा या एक समय दुख-कष्ट के बीच भी लाखों-करोड़ों हिंदी भाषियों के चेहरे पर जैसी हँसी फूट पड़ती थी वैसा ठहाका, वैसी हँसी अब कहीं दिखाई नहीं देती। हँसी में अब कैसा तो एक शातिरपन है, मानो धर्म स्थान में कोई कातिल बैठा हो।
आज की हँसी किसी न किसी का ट्रोल करने जैसा है, वह सोशल मीडिया हो या कोई अन्य सार्वजनिक मंच। ‘ट्रोल’ की एक कथा है। इसका संबंध नार्वे-स्वीडेन क्षेत्र के एक प्राचीन मिथ से है। ट्रोल पहाड़ों-जंगलों में रहने वाला एक मंद बुद्धि का क्रूर दानव था जो मनुष्यजाति का शत्रु था। वह भयंकर तबाही मचाता था, बच्चों का अपहरण कर लेता था। उसके पास जादुई ताकत थी। लोग उससे कष्ट पाते थे। ट्रोल शब्द वहीं से निकला।
वर्तमान समय का ट्रोल उपर्युक्त दानव जैसा ही है। उसका संबंध ऑनलाइन पर अप्रासंगिक, अपमानजनक और विध्वंसक सामग्री पोस्ट करने, किसी का उपहास करने और भद्देपन से किसी को भावनात्मक आघात पहुँचाने से है। ट्रोलिंग ऑनलाइन से बाहर राजनीतिक मंच पर भी है। अब ट्रोल के लिए विपुल एनीमेशन सामग्री एआई से बनाई जा रही है। नए दानव-अवतार का असर हम अपनी भाषा और सामाजिक संबंधों पर देख सकते हैं।
पहले की हँसी आत्मा में खिड़की खोलने जैसी थी जिससे एक बड़ा आकाश दिखता था। वह इमोजी की हँसी नहीं थी और न वह हास्यास्पद कवियों के हास्य जैसी थी। दरअसल एक सच्ची हँसी मनुष्य की संपूर्ण चेतना का खेल है जो हमेशा एक नया अनुभव देता है। ऐसी हँसी किसी अजीब स्थिति, रोचक स्मृति, विडंबना या बेतुकेपन से अचानक मिले अनमोल उपहार की तरह है। ऐसी हँसी आहत करने वाली नहीं होती, बल्कि सच्चा आनंद और राहत देती है। वह एक निश्छल हँसी होती है, जिसमें हँसी का पात्र भी साथ हँसता है। ऐसी हँसी ‘अंधे का बेटा अंधा’ जैसी यांत्रिक तर्कबुद्धि से नहीं चलती। वह केवल तर्क का नतीजा न होकर और मशीनी न होकर प्रफुल्लता की एक सामूहिक लहर होती है। कहा जा सकता है, पहले हम इंसानों की तरह हँसते थे।
खुद पर हँसने की क्षमता खो देने का अर्थ
भारतेंदु का काशी नरेश से मधुर संबंध था। अंग्रेज वायसराय के दरबार (1877) में उनका अभिनंदन करने तथा उनसे खिताब पाने के लिए देश के राजा-महाराजाओं का एक बार भारी जुटान हुआ। उनके हास्यास्पद व्यवहार का भारतेंदु ने ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ में बड़ा मजेदार चित्र खींचा है। उन्होंने बनारस में रहते हुए काशी नरेश की भी खिल्ली उड़ाई है, ‘वायसराय ने कहा कि आपका नगर (काशी) तो तीर्थ गिना जाता है, पर हम आशा करते हैं कि आप इस समय दिल्ली को भी तीर्थ ही के समान पाते हैं। इसके जवाब में वे बेधड़क बोल उठे कि यह जगह (दिल्ली) तो सब तीर्थों से बढ़कर है, जहां आप हमारे खुदा मौजूद हैं।’ यह लिखने के बावजूद भारतेंदु और काशी नरेश के संबंध खराब नहीं हुए। यदि आज इस तरह कोई आलोचना कर दे, वह शत्रु हो जाएगा।
भारतेंदु में अपने पर भी हँसने की क्षमता थी। उन्हें ‘ऑनरेरी मजिस्ट्रेट’ का पद मिला था। वे इसे ‘अंधेरी मजिस्ट्रेट’ कहकर अपने पर हँसते थे।
वे लोग बड़े चित्त के मनुष्य थे, उनमें आज-सी संकीर्णता नहीं थी। वे देश को एक बड़े अर्थ में देखते थे, वे भारत भाव से भरे रहते थे। वे विस्मय से भरे रहते थे, कल्पनाशील थे। उनके अनुभव में विविधता थी। उन्हें किसी ऊंचे तर्क तक पहुंचने और अपने को विकसित करने के लिए आत्म-विखंडन में शर्म महसूस नहीं होती थी। वे छोटे स्वार्थों से परिचालित नहीं थे। उनकी हँसी में इन्हीं वजहों से पारदर्शिता थी। वह हँसाती थी और सुधरने के लिए प्रेरित करती थी।
विवेकानंद अपने बारे में अक्सर कहते थे, ‘मैं फैटिया गया हूँ।’ ‘फैट’ हो गया हूँ! उन्होंने कहा है, ‘हमारे यहां लोग आध्यात्मिकता की बातें खूब करते हैं, लेकिन पूजा घर में घंटा बजाकर और तिलक लगाकर ही समझ लेते हैं कि उन्होंने सब कुछ कर लिया!’
महात्मा गांधी अपने आदर्श से फिसल जाने पर चुप नहीं रहते। उन्होंने एक जगह लिखा, ‘मैं दूसरों को संयम रखने की शिक्षा देता हूँ और मिठाई देखकर खुद संयम खो बैठता हूँ!’ (सत्य के प्रयोग)। गांधी जब गोलमेज कान्फ्रेंस में भाग लेने के लिए लंदन में थे, उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि राजा से मिलने के लिए उनके पास सही कपड़े हैं या नहीं। उन्होंने विनोदपूर्ण जवाब दिया, ‘मेरे कपड़ों की चिंता मत करो। राजा के पास हम दोनों के लिए काफी कपड़े हैं!’
जब उनसे एक बार बकरी के दुग्ध सेवन के बारे में पूछा जाता है, वे कहते हैं, ‘मेरी कनपटियों में खुजली हो रही है। हो सकता है सींग निकलने वाले हों!’ वे महान लोग अपने पर भी हँसते थे। उन्हें इसमें संकोच न था। नेल्सन मंडेला ने एक बार कहा था, ‘सत्ताइस साल जेल में बिताने के बाद मैंने यह सीखा कि यदि आप खुद पर हँस सकते हैं तो कोई आपको दुखी नहीं कर सकता!’
निश्छल हँसी वही हँस सकता है और खुद पर भी वही हँस सकता है जिसे अपने अधूरेपन और भूलों का अहसास होता रहता है।
मनुष्य जब अपने ऊपर हल्का-फुल्का मजाक भी सहन न कर सके, समझ जाना चाहिए कि उसने अपना आत्मविश्वास खो दिया है। उसमें तब अपनी कमियों को स्वीकार करने की क्षमता नहीं रह जाती। उसे मामूली असहमति भी हमले की तरह लगती है, क्योंकि अपनी छवि की चिंता बढ़ जाती है। वह अपने को बचाने के लिए दूसरों पर मिथ्या आरोप लगाता है, क्योंकि दिमाग ‘डिफेंसिव मोड’ में रहता है। वह खुलकर हँसने की जगह हमेशा चिड़चिड़ेपन से भरा रहता है।
खुद पर हँसना अपने अहंकार से बाहर निकलना है। यह आलोचनात्मक आत्मनिरीक्षण है। लोग हँसते-बोलते रहें तो इससे सामाजिक लचीलापन बना रहता है। मन में कुंठा नहीं जमती। मतभेद शत्रुता तक नहीं पहुंचता। स्वस्थ हँसी आपस में मतभेद होने पर भी बोलना-चालना बंद नहीं कराती। किसी समाज में यदि ऐसी हँसी और विनोद को दूसरों के अपमान के अस्त्र में सीमित कर दिया जाता है, समझ जाना चाहिए कि वह समाज कठोरता की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समाज के लोग आलोचनात्मक आत्मनिरीक्षण से बचते हैं। उनके मन में यह धारणा होती है, ‘मैं ही सही हूँ’! मनुष्य में अपने पर हँसने की क्षमता का गायब होना वस्तुत: अहंकार, असुरक्षित मनोदशा और भावनात्मक अपरिपक्वता का लक्षण है।
कहां गई वह मधुरता और निश्छलता
हरेक को जीवन में थोड़ी हँसी चाहिए। यह खुश ही नहीं रखती, मन की धूल भी हटाती है। यह मानसिक कठोरताओं को तोड़कर मनुष्य को अधिक करुणामय बनाती है। ऐसी हँसी एक जीवनशक्ति है। यह मन को उदार बनाती है, संघर्षों से गुजरने की क्षमता प्रदान करती है। निश्छल हँसी रिश्तों को गहरा करती है, दृष्टि में लचीलापन लाती है। हम गौर कर सकते हैं कि कठोर और क्रूर किस्म के लोग बिलकुल नहीं हँसते। ऐसे व्यक्ति हमेशा दूसरों पर हँसते हैं जो उपहास उड़ाना है। राक्षस हँसते नहीं थे, अट्टहास करते थे। आज का समय कुछ ऐसा ही है।
तुलसी के रामचरितमानस में राम की हँसी अत्यधिक संयत है। यह ‘मुसकाइ’, ‘हरषि’, ‘मंद हँसि’ जैसे रूपों में है। लक्ष्मण जरूर परशुराम और शूर्पनखा प्रसंग में उपहास करते दिखते हैं। भक्ति काव्य के कृष्ण-प्रसंग में पहली बार हँसी की एक निर्मल यमुना है। गोपिकाओं और उद्धव के बीच बड़े सरस वातावरण में हँसी और व्यंग्य के रंग पड़ते हैं, ‘आयो घोष बड़ो व्यापारी’। गोपियाँ हँसकर तंज करती हैं- ब्रह्मचारी जी, पहले यह बताओ कि जिसके भेजे आए हो वह हमें छोड़कर गया क्यों!’ जरा बालक कृष्ण का हँसता मुखमंडल देखिए। उनकी हँसी-ठिठोली-शैतानी में एक मधुरता है, कहीं उपहास नहीं दिखेगा। अयोध्या रस से ब्रज रस भिन्न है। हमारे देश ने ब्रज रस की जरूरत का अनुभव किया था!
मुक्त हँसी के लिए बेफिक्री चाहिए जो कबीर में थी। वे कहते हैं, ‘पानी बिच मीन पियासी मोहि सुन सुन आवत हाँसी/ आतम ज्ञान बिना नर भटके कोई मथुरा कोई कासी।’ कबीर अपने समय पर खूब हँसते हैं और निर्भयता से हँसते हैं। उनकी हँसी नपी-तुली या ‘कलकुलेटेड’ नहीं है। उनमें यह कहने की क्षमता थी, ‘कंकड़-पाथर जोड़ि कै मस्जिद लई बनाय/ता चढ़ि मुल्ला बांग दै क्या बहिरा हुआ खुदाय’!
पहले ऐसी चीजों पर हँसने के लिए लोगों के मन में मधुरता और निश्छलता थी, लेकिन अब साहस की भी जरूरत है। प्रेमचंद के ‘गोदान’ में गोबर देवता को बटखरा और नमाज को उठा-बैठकी कहता है, हालांकि प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ में सूरदास जैसे आस्थावान संघर्षरत चरित्र का अतुलनीय आत्मबल दिखाया है और धर्म से परहेज नहीं किया है। अज्ञेय का शेखर ईश्वर और धर्मांधता का विरोधी है। हालांकि इसके समानांतर ‘शेखर एक जीवनी’ में एक अन्य चरित्र मोहसिन है। कथाकार ने उसकी आस्था में अंग्रेजी राज के दमन के विरुद्ध छिपी उसकी हिम्मत को बेहिचक उभारा है। किसी अंधविश्वास या विसंगति पर हँसने का अर्थ किसी धर्म या व्यक्ति को अपमानित करना न होकर सुधार की जरूरत बताना है।
प्रेमचंद अंग्रेजी राज का विरोध करते थे, पर कहते थे, ‘मैं इंग्लैंड का शत्रु नहीं हूँ।’ उस युग की हँसी शत्रुता से नहीं जन्मी थी। प्रेमचंद कई जगहों पर ग्रामीण चतुराई को भी निशाना बनाते हैं। उनकी कृति ‘गोदान’ में शहर से नई बुद्धि पाकर लौटा गोबर गांव में झिंगुरी सिंह पर प्रहसन बनाता है। रायसाहब और खन्ना की मंडली के अधिकांश लोग ही कॉमिक चरित्र जैसे लगते हैं। प्रेमचंद अपने साहित्य में आधुनिक सभ्यता के दोहरेपन पर हँसते हैं।
रामचंद्र शुक्ल व्यक्तित्व से शुष्क समझे जाते रहे हैं। वह हँसते नहीं थे। एक बार कुछ मित्रों के साथ मिर्जापुर से लौटते समय सांझ हो रही थी। चाय की तलब हुई। पान की एक दुकान मिली, जहां केतली में चाय थी। एक चुलबुली स्त्री ग्राहकों में व्यस्त थी। दुकान से लगी झोपड़ी में एक झूला पड़ा था। जगन्नाथ प्रसाद शर्मा ने शरारतन पूछा, ‘का हो तहरे घर मा झूला पड़ा है। कोऊ झूलत नाहीं?’ स्त्री कनखियों से देखती हुई झटके से बोली, ‘आईं सरकार झूलीं, आपै लोगन के बर तो है।’ शर्मा जी हुलसे, पर चुप रह गए। चाय पीकर आगे बढ़ते हुए रामचंद्र शुक्ल अपने को रोक नहीं पाए। वे केशव प्रसाद की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘पंडित जी, हम तो यह समझे कि आज इसने शर्मा जी को झुलाया!’ और हँस पड़े। (चंद्रशेखर शुक्ल की जीवनी)। इसमें संदेह नहीं कि क्रोध और हँसी में शुक्ल जी क्रोध के ज्यादा साथ थे- अत्याचारी पर क्रोध के!
निराला ने अपने जीवन में साहित्यिक विरोध से अधिक गरीबी झेली थी। रामविलास शर्मा ने निराला और महादेवी दोनों की हँसी पर टिप्पणी की है। एक के बारे में लिखा है, “जो लोग उनके कलकत्ते के दिनों का याद करते थे वे उन्हें ओठों, आँखों, भौंहों में हँसते हुए देखते थे।… ‘कुल्ली भाट’ और ‘कुकुरमुत्ता’ में उनकी हँसी कायम रही, पर यह पहले वाला मुक्त हास्य न था।” (निराला की साहित्य साधना-1)। गरीबी और अभाव ने हिंदी के कई लेखकों की हँसी छीनी है। सामान्यत: हँसी छीनी जाने लगी या विरूपित होती गई।
महादेवी की हँसी पर रामविलास जी की टिप्पणी है, ‘मुझे लगा कि वह बात-बात पर हँसती हैं और बिना बात के भी हँसती हैं। मैं कभी किसी स्त्री की हँसी से इतना हतप्रभ नहीं हुआ।’ समाज को स्त्री का ज्यादा हँसना विचलित करता है।
आजकल की हँसी में आक्रामकता है
मनुष्य सामान्यत: हँसता है- कभी सामाजिक विसंगति, कभी किसी बेतुकेपन पर और कभी अपने दुख पर। हँसी का आनंद तभी है जब इसका संबंध किसी त्रुटि, विडंबना, दुख या शर्म से हो। मेधाबोट हँसी की घटना को समझ लेगा और उसका विश्लेषण भी कर देगा पर वह कभी हँस नहीं सकता, क्योंकि दुख और विडंबना की प्रोग्रामिंग नहीं हो सकती। वह यदि हँस पाता, सबसे पहले राजनीतिक नेताओं के भाषण पर हँसता!
हम इसका परीक्षण कर सकते हैं कि हमारे युग में लोग कैसी चीजों पर हँस रहे हैं। इससे हँसी के बदलते स्रोतों के साथ लोगों की बदल रही मानसिकता को भी समझा जा सकता है। हम गौर कर सकते हैं कि आजकल लोग रील, मीम (नकल) और विचारहीन राजनीतिक प्रहारों पर ज्यादा हँसते हैं। किसी प्रतिद्वंद्वी की विफलता, कोई चरित्र हनन या ट्रोल बहुत मजा देता है। समाज में प्रतिद्वंद्विता जितनी तीव्र होती जा रही है, ‘दूसरों’ के प्रति सौहार्द का उतना अभाव होता जा रहा है। ‘दूसरे’ या ‘प्रतिद्वंद्वी को चरम हास्यास्पद बनाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ती जा रही है। हँसने की इतनी चीजें किसी युग में नहीं थीं, पर अब सच्ची हँसी गायब है।
चार्ली चैपलिन और राजकपूर के जमाने की हँसी में आज जैसे छलतंत्र की जगह मासूमियत और निश्छलता थी। उनकी हँसी युद्ध, उद्योगीकरण और विषमता पर एक टिप्पणी होती थी। वह मानवीय संवेदना का नतीजा थी। वे लोग दुनिया की कठोरताओं पर बच्चों जैसी सरलता से मुस्कुराते थे। उनकी हँसी दुखों से लड़ने का कोमल तरीका है, जिसमें पीड़ा को हास्य में बदलने की ताकत है। चार्ली चैपलिन और राजकपूर दोनों शारीरिक हाव-भाव को प्रधानता देते थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे हँसाते थे तो सोचने के लिए विवश भी करते थे। चार्ली चैपलिन की ‘माडर्न टाइम्स’, ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ तथा राजकपूर की ‘आवारा’, ‘श्री 420’ जैसी फिल्में याद आती हैं। उनकी फिल्में ऐसी थीं जिनमें किसी पर हँसने की जगह सब लोगों के साथ हँसने वाली हँसी थी। वह किसी का अपमान नहीं करती थी।
इन दिनों जैसी फिल्में बन रही हैं उनसे मानवीय हास्य गायब है। इधर कई उद्देश्यप्रेरित बायोपिक बने हैं। हर जगह ही हँसी पहले से काफी बदली हुई है। उसमें निष्कपटता और मासूमियत की जगह शत्रुता शामिल है, चालाकी भी। ऐसी हँसी किसी न किसी व्यक्ति, समुदाय या विचारधारा को अपमानित करने के उद्देश्य से प्रेरित रहती है।
इन दिनों हास्य वस्तुतः छोटे टुकड़ों, तेज आवाज और विद्वेष में सीमित होता जा रहा है। किसी की विफलता पर उसे ‘लूजर’ कहकर हँसा जाता है। आज की हँसी में वैसी देह भाषा का स्थान सिकुड़ा है जिसका इस्तेमाल महमूद, कादर खान, जॉनी लीवर जैसे अभिनेता करते थे। हँसी में तंज, उपहास और आक्रामकता बढ़ गई है। इसकी जगह नकल वाली मीम संस्कृति छाई है। ऐसी सारी चीजें लोगों की सोचने की शक्ति नष्ट कर देती है।
ओटीटी ने अज्ञानता बढ़ाने वाले हास्य के सैकड़ों दरवाजे खोल दिए हैं। एडल्ट हँसी-मजाक बढ़े हैं। पहले की हँसी दुखों से लड़ रही हमारी मानवता थी, वह भावपूर्ण थी। आज की हँसी तकनीकी क्षमता के बल पर खड़ी की जा रही दानवता है। यह मानो एक अट्टहास है।
आज का हँसना श्रेष्ठता प्रदर्शित करने का औजार है
हमने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कई भाषणों में पत्रकारों, विश्वविद्यालय के शिक्षाविदों तथा विरोधियों का मजाक उड़ाते देखा है। निश्चय ही उनकी भी हँसी उड़ी है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भी विरोधियों को अपने आगे हल्का करके उनकी खिल्ली उड़ाते हैं, जैसा असीमित पावर आने पर होता है।
हमारे देश में धर्म, जाति और जेंडर आधारित मामलों में उपहासों की एक लंबी शृंखला है। आखिर इस तरह कोई अपने अच्छे लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकता है। गौर करने की चीज है कि ज्ञानपीठ से सम्मानित एक विभूति ने हाल में ‘वाइफ’ के चार अंग्रेजी अक्षरों के आधार पर पत्नी को ‘वंडरफुल इंस्ट्रुमेंट फॉर इंज्वायमेंट’ कहा! आजकल किसी व्यक्ति या समुदाय के प्रति सम्मान की चिंता किए बगैर ऐसी ही संकीर्ण टिप्पणियों पर हँसने की मानसिकता छाई हुई है। लोग गालियों पर हँसते हैं और मजा लेते हैं। इस समय न्यूनतम भद्रता से भी तलाक है।
हँसी जब किसी व्यक्ति की गरिमा पर आघात करे, उसके महत्व की उपेक्षा करके उसकी छोटी कमजोरियों को बड़ा बनाकर उपस्थित करे और हँसी जब शत्रुता का हथियार बना ली जाए तो ऐसी हँसी एक हिंसा है। यह महान से महान व्यक्तित्वों को भी नहीं छोड़ती।
कई बार वर्चस्वशाली जातियों, नस्लों और जातीयताओं का समर्थ आदमी अपने से कमजोर वर्गों पर और उनके विश्वासों पर हँसता है ताकि अपना वंशानुगत प्रभुत्व जता सके। ऐसे लोग बढ़े हैं जो असहमति का मखौल उड़ाते हैं और किसी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत का और खानपान का भी। हम अक्सर शिक्षकों, स्त्रियों, लेखकोेंं और निम्न समझी जाने वाली जातियों और अल्पसंख्यकों को हिंसक हँसी का शिकार होते देखते हैं। कुछ की आदत होती है, वे ‘दूसरों’ पर हँसकर उन्हें ‘ह्यूमिलिएट’ करते हैं।
21वीं सदी में भी लोग इसपर हँसते हैं- ‘क्या लड़की भी क्रिकेट खेलेगी?’ शहरों में गांव के लोगों पर हँसा जाता है। कई व्यक्ति बिहारियों के हिंदी उच्चारण पर हँसते हैं। अंग्रेजी के देशज टोन की खिल्ली उड़ाई जाती है। गांधी का भी मखौल बनाने वाले लोग अब हैं। एक योजना से उनका नाम ही बिलकुल हटा दिया गया, इतनी परेशानी!
स्त्रियों की स्वतंत्रता और समानता की मांग पर हँसने वाले लोगों की आज बहुतायत है। अति-बुद्धिवादी बुद्धिजीवी हिंदुओं की आस्था तथा उनके पर्व-त्योहारों पर हँसते हैं। उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों को दिल्ली जैसे महानगर में ‘चीनी’ कहकर हँसा जाता है। इधर राजनीतिक विरोधियों को नकारा साबित करने के लिए उनपर तरह-तरह से हँसा जाता है। कहना न होगा कि आज की हँसी खुशी पैदा करने की जगह अपने एलीट वर्ग, पुरुष सत्ता, अपनी ऊंची जाति, अपने धर्म और अपनी भाषा के श्रेष्ठता-प्रदर्शन का औजार बन गई है। सोशल मीडिया पर तो ‘ट्रोल आर्मी’ है।
हमारे समाज में ऐसी हँसी छाई हुई है जो दूसरे के मतों, विचारों और अभिव्यक्तियों को बिलकुल शांत कर देना चाहती है। हँसी के वेश में होने के कारण ऐसे आक्रमण सामाजिक स्वीकृति पाते हैं, पर उनका लक्ष्य दमन है। हँसी वस्तुत: साझे का मामला है जबकि इन दिनों उसका उपयोग आघात पहुंचाने के लिए अधिक हो रहा है। वह तनाव से राहत देने के लिए होती है, पर अब उसका लक्ष्य तनाव पैदा करना है। वह प्रफुल्लता के लिए नहीं, बल्कि हिंसक तरीकों से अपनी सत्ता जताने के लिए है।
किनके पास है सच्ची हँसी
19वीं सदी के भारतेंदु युग से एक नया जीवनबोध लेकर हँसी का एक सृजनशील सिलसिला शुरू हुआ था। वह सिलसिला आगे चलकर केवल संकीर्ण और हास्यास्पद हास्य द्वारा ही अवरुद्ध नहीं हुआ, उसे अति-बुद्धिवादियों ने भी अपनी अग्निधर्मी बौद्धिकता से दबाया। उनकी दार्शनिक गंभीरता में एक अहंकार था जो उन्हें इस देश की मानवतावादी सांस्कृतिक विरासत के प्रति उच्छेदवादी बनाता था।
इस दौर में एक नागार्जुन थे जो हँसना जानते थे और अपनी महान सांस्कृतिक विरासत से लगाव भी रखते थे। वे गांधीवादियों पर हँसे, पर गांधी को सम्मान दिया। उनके मन में प्राचीन विरासत खासकर कालिदास के प्रति गहरा आदर भाव था, ‘कालिदास सच सच बतलाना’/ तुम रोये या अज रोया था’। जिनका मन सौंदर्य और करुणा से भरकर रो सकता है उन्हीं के पास सच्ची हँसी होती है।
यदि मनुष्य के जीवनबोध में बुद्धिपरकता और संवेदनशीलता है, उसकी हँसी कभी हिंसक नहीं होगी। इसलिए यदि किसी दौर की सभ्यता में हिंसक हँसी बढ़ी-चढ़ी हो, समझना चाहिए कि लोग हँसना भूल गए हैं।
एक काल में लोगों के पास ज्ञान था, पर ‘न जानने का नचिकेता-भाव’ भी था। वे किसी बड़े उद्देश्य के लिए अपने पहले के विचारों का खंडन करते थे और अपनी भूलों पर हँसते थे। इस जमाने में जिस ज्ञानी को देखो उसके पास नया जानने के लिए कुछ नहीं बचा है। वह जो जानता है वह ज्ञान का अंतिम छोर है!
यदि एआई मनुष्य की जगह ले ले फिर खुद मनुष्य कैसा होगा
हमें हँसना चाहिए। सर्वज्ञता से बाहर आकर, थोड़ा नि:स्वार्थ होकर और एक बड़ा जीवनबोध लेकर हमें हँसना चाहिए, यदि एक सृजनशील मनुष्य होना चाहते हैं। सच्चा सृजन वही कर सकता है जो जीवंत हो, एआई ऐसा सृजन नहीं कर सकता।
एआई दिखाता है कि वह सब जानकर बैठा हुआ है। वह इतना समझदार है कि हमारी गलतियां और भ्रांतियां भी उसके ज्ञान का हिस्सा हैं। यदि एआई कहे, ‘मैं आपकी मदद करने के लिए हूँ’, उसका इस्तेमाल करते हुए भी उसपर संदेह करने के लिए तैयार रहना चाहिए। एक व्यक्ति ने एआई से पूछा- जन्मकुंडली बना दोगे? एआई ने कहा- बना दूंगा! उसने पूछा, ‘पहले बताओ कि मेरी वाई-फाई कब ठीक होगी? यह सुनते ही एआई गोल घूमने लगा!
एआई हमारी-आपकी तरह किसी बात पर हँस नहीं सकता, पर वह एक दिन हमारी-आपकी हँसी की प्रोग्रामिंग जरूर कर देगा। हँसी होगी, खुशी नहीं होगी। एआई साहित्य की रचना भी कर ले, उसमें जान कहां से आएगी। उसकी निर्मित कला में जीवन कैसे धड़केगा! वह प्रेमचंद-निराला कहां से पैदा कर सकेगा! यदि एआई मनुष्य की जगह ले ले, फिर खुद मनुष्य कैसा होगा?
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हँसी से सम्बद्ध अनेक उदाहरणों से परिपूर्ण संपादकीय! प्रश्न विचारणीय है, “यदि एआई मनुष्य की जगह ले ले, फिर खुद मनुष्य कैसा होगा?”
सादर प्रणाम
बहुत ही सुंदर ढंग से अनेक सुंदर उदाहरणों के माध्यम से अपने समझाया कि इंसानों की हँसी ए आई नहीं हंस सकता। कृत्रिम बुद्धिमता से नकली बुद्धि ही मिल सकती है विवेक मिश्रित संवेदन शील भावनाएं नहीं मिल सकती।शिशु के जैसी कोमल,निश्चल मनमोहक मुस्कान ए आई में नहीं मिल सकता।
बहुत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण आलेख