वरिष्ठ कथाकार। पांच कहानी संग्रह और दो उपन्यास अब तक प्रकाशित।

‘यह विवाह हम पिता जी के हठ और खुशी के वास्ते कर रहे हैं, क्योंकि उनको कष्ट नहीं पहुंचा सकते। आशा है तुम मेरी विवशता समझोगी।’

– तुम्हारा मनोहर

किस्सा यों… 

वह, जो बच्ची की उम्र में लड़की और लड़की की उम्र में औरत बना दी गई थी। उस औरत ने अपने पति से नाता उसी दिन तोड़ लिया था जिस दिन उसने अलमारी में बिछे अखबार के नीचे मुड़ी-तुड़ी यह चिट्ठी पढ़ ली थी और जिस दिन यह घटना घटी वह उस औरत के विवाह का दूसरा दिन था। वह औरत मेरी मां थी।

उस ख़ूबसूरत औरत ने जिस पल यह चिट्ठी पढ़ी, अपनी कांपती चेतना पर संकल्प के छींटे दे, देह को पति के सुपुर्द कर दिया। यह निर्णय उसकी ज़िंदगी की सड़क का एक असोचा, अजाना दोराहा था, जहां उसे चुनना था अपना रास्ता और उसने एक कठिन मार्ग पकड़ लिया था। वैसे यह कोई अनोखी घटना भी नहीं थी। कई औरतें तो इसी नियति को औरत होना समझकर ज़िंदगी काट देती हैं। मां को उनके किसान पिता ने ब्याह के पहले गांव के सरकारी स्कूल में चिट्ठी और रामायण बांचने लायक पढ़ा-लिखा दिया था, इस दूरदर्शिता के मद्देनजर कि खुदा न खास्ता कभी ससुराल में दुखी हुई तो दो शब्द लिख तो भेजेगी। इसकी प्रेरणा उन्हें गांव की अन्य बेपढ़ लड़कियों की कानों-सुनी और आंखों-देखी दुर्दशा से मिली थी। चिट्ठी यह पहली ही थी जो पढ़ी थी मां ने और रामायण पढ़ने की न फुर्सत रही न सुविधा। बस …तब तक तो उनकी पढ़ाई-लिखाई की कुल जमा यही उपयोगिता रही थी, पर बचपन में मां को नानी ने फुर्सत के समय बगल में लिटाकर पौराणिक किस्से जरूर सुनाए होंगे, क्योंकि मां गाहे ब गाहे उन्हें बातचीत में उद्धरणों और सूक्तियों की तरह प्रस्तुत करती थीं।

मेरे बचपन की याद में….

मां या तो काम में जुटी रहतीं और जब काम से मुक्त होतीं तो कुछ सोचती रहतीं (यही सोचना उम्रदराज़ होने के बाद बड़बड़ाहट में तब्दील हो गया था)। मुझे मां से लिपट उनके मसालों तथा पसीने से गंधाते तथा मैली सिलवटों वाले आंचल में मुंह छिपाकर गुडीमुडी सोना अच्छा लगता था। तब मां मेरे सिर पर हाथ फेरती हुई एक गाना गातीं। उन्हें आते तो कई गाने थे और गाती भी बहुत सुरीला थीं, पर यह गीत मुझे समझ में न आते हुए भी उतना ही प्रिय था जितना उनकी बाहों के घेरे में ‘मां’ की उस खास गंध में लोटपोट होना। यह गाना मुझे रट गया था। कभी-कभी मैं भी मां के साथ उनके पल्लू से खेलता हुआ ऊँ ऊं ऊं ऊं गाता। गाना था….

जाया जिन केहू के दुआर मोरे बिरना।
बहिना के बियाह्बा मां बापू के कमाहिया
माई के हाथई के कंगना बिकइल
बिक गयो भौजी के हार मोरे बिरना…

इसके बाद वे थोड़ी देर रुक जातीं ..मैं उनके ‘रुकने’ के टूटने का इंतज़ार करता, उनकी ओर टुकुर-टुकुर ताका करता। फिर गुनगुनाना शुरू करतीं …दूसरा बंद…

तोहरे धरा मा रहिबे बैठी हम लुकाई
जोनों मिले रूखा सूखा तेने हम खाई
पहिनब फह्बा पुरान मोरे बिरना

वे आंखें मूंद लेतीं। मैं उनकी बंद आंखों के पीछे से उनके दुख में झांकने की कोशिश करता। मैं बेचैनी से घिरने लगता। उन्हें कंधे से पकड़कर हिलाने लगता … ‘और’…… मैं जिदिया जाता।

वे फिर रोती सी गातीं

एक दिन के दिहा हमरो बिदाई
हरे हरे बांसवा के डोलिया सजाई
डोए दिहा बन के कहार मोरे बिरना।…

बस अब सोये रहिबो …और वे करवट बदल लेतीं।

उसके बाद मां की करवट के पीछे से मैं मां के उलझे बालों में उंगलियां फिराता रहता। उनकी बेढंगी सी गुंथी उलझी चोटी को सहलाता जब तक मां की हल्की सिसकियों की आवाज नींद में डूब ना जाती। मुझे लगता मां गाने के बाद जिस किसी भी वजह से उदास हो जाती हों, लेकिन उनके बालों में उंगलियां फिराने से वे राहत महसूस करती थीं। उनके महसूस करने में मेरी राहत शामिल थी। कभी-कभी मैं मां से कहता ‘मां, तुम्हारी शक्ल तो बिलकुल नाना से मिलती है’, मां एकदम खुश हो जातीं। भावातिरेक में कहतीं, ‘हां, सब कहते हैं …और जानते हो मुन्नू बड़े लोग कहते हैं कि बेटी पिता पे और बेटा माँ पे किस्मत वाले होते हैं’…। अचानक जैसे बातचीत का तागा टूट जाता और वे फिर सोच के समंदर में डूब जातीं।

‘सच्ची’? मैं उनकी इस कहावत पर अचंभे से पूछता।

‘पता नहीं’ ….कहकर वे काम में लग जातीं।

मां के पास अपनीकहने को बहुत कम चीज़ें थीं। उसी कममें एक लोहे का बक्सा भी था, जिसके ढक्कन की नुकीली कटानों में से उसकी उम्र झांका करती। वह अम्मा के ब्याह का हमउम्र था और उनके साथ बतौर दहेज चला आया था। बक्से में उनकी ही तरह उदास इनेगिने कपड़े और कुछेक चांदी या गिलिट के जेवरात रखे रहते थे। उस बक्से को मां तभी खोलतीं जब कहीं बाहर विशेषतः शादी ब्याह या किसी मेले उत्सव में जाना होता, अन्यथा बस रोज धूल झाड़ दिया करतीं उसकी।

उसी पुराने बक्से में मां की दो-एक तस्वीर भी उतनी ही हिफाज़त और विस्मृत-सी रखी थी। उनमें मां दो चोटी लाल फीते के साथ गूंथे, चंपई रंग, गोल-मटोल चेहरा, मांसल जिस्म और बोलती-मुस्काती आंखें मुझे एक अनजान-सी लड़की लगतीं।

लाख कोशिश करने पर भी मैं माँ के इस रूप को स्वीकार नहीं पाता था। मैं अचंभित हो कभी निश्छल हँसी हँसती उस ‘बिंदास लड़की’ के ‘जड़’ चित्र को देखता, जिसके गुलाब जैसे चेहरे से खुशी और उल्लास झर-झर-झर रहा होता और कभी मां के उदास पीले चेहरे की असमय उगी बारीक झुर्रियों को, जिनकी सतह के नीचे नाड़ियों में गुनगुना रक्त धीमे-धीमे बह रहा होता। मैं सोचता, तस्वीरें शायद इसी ‘फर्क’ को देखने के लिए खिंचवाई जाती हैं। यूनान/ईजिप्ट के पिरामिड में हजारों वर्षों से सहेजकर रखी ममी की शक्ल में स्मृतियां मुझे मानव जाति की सबसे अप्राकृतिक और क्रूर कोशिशें लगी हैं।

हां, मैं बात कर रहा था माँ की। पड़ोस की रजनी दीदी, जिनकी मां को हम पूरे मुहल्ले के बच्चे बुआ कहते थे, के ब्याह के महिला संगीत में मैंने माथे तक पल्लू किए मां को एक लोक गीत पर नाचते हुए देखा था। सच कहता हूँ तेज़ाब की माधुरी, पुराने जमाने की हेलेन, हेमा मालिनी, इपाषा-बिपाशा सब पानी भरती थीं माँ की लोच और उनके आंचलिक सौंदर्य के आगे। मां की उस दिन वाली ताजगी और गुलाबी मुस्कराहट पर मै ‘वारी-वारी’ हो गया था। उस दिन चेहरे पर गुलाबी रंगत वाली मुझे मां उस फोटो वाली लड़की से काफी मिलती जुलती लगी थीं। आज तक उनकी उस बेफिक्र मुस्कराहट को मैंने अपनी यादों की गिरह में बांधकर रखा हुआ है।

कभी-कभी मां जमीन पर नज़रें गड़ाए कुछ सोचती रहतीं, फिर कहतीं ‘मुन्नू, हम कबहूँ-कबहूँ सोचत रहिबे के लखन ने अपने भैया राम जी और महतारी-सी सीता मैया को तो पूजे, उनकी चौदह बरस सेवा सुश्रुसा किए, रघुकुल के बचन निभाए, पर लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला की ना सोचे के इतने दिन बो अकेली कैसे रही आबेगी महल में? अरे भरतार के बिना तो महल भी बन ही होबे है…. है के नईं?’

मैं मुंह बाए उनकी ओर ताकता रहता, कुछ न समझने की मूर्खता ओढ़े। बाद की उम्र में मुझे लगा कि ये ‘बड़ी बातें’ मां भड़ास की तरह निकाला करती थीं, जिनकी जरूरत पहले मेरी उपस्थिति हुआ करती थी और बाद में दीवारें, देहरी, खिड़कियां, ज़मीन वगैरा कुछ भी। हां, वे यह भी कहतीं ….‘देखो ज़रा, भीष्म पितामह धरम निभाने भालों पे सोय रहे पर अंबा के साथ कित्ती नाइंसाफी करी बिन्ने? जे कैसी मर्यादा और धरम रहे पुरुस के भाई?’ कहते हुए वे बुझ सी जातीं। मैं उम्र के चालीस बसंत पार कर लेने के बाद आज भी मौन हूँ मां के इन प्रश्नों पर।

मां की सादगी में एक सौंदर्य था। मां शिक्षित थीं, पर पढ़ी-लिखी नहीं। सातवीं कक्षा के बाद उन्होंने विद्यालय का मुंह नहीं देखा था, पर वे विदुषी थीं। प्रेमचंद और शरतचंद्र उनके प्रिय लेखक थे। उस वक़्त तक मैंने हिंदी वर्णमाला और मात्राएं सीखी थीं और किताब के शीर्षक में अक्षरों को जोड़-जोड़कर पढ़ना मुझे अच्छा लगता था। माँ इतनी बड़ी किताब पढ़ लेती हैं मुझे यह अजूबा लगता था।

एक बार अपने विद्यालय के पुस्तकालय से पिता फणीश्वर नाथ रेणु का ‘मैला आँचल’ उपन्यास ले आए थे मां के लिए। मुझे अभी तक याद है कि उसे फुर्सत के मुताबिक़ ‘किश्तों में’ पढ़ते वक्त मां की बड़ी और ख़ूबसूरत आंखों के कोर और पल्लू के छोर भीज जाते थे। मैं जानता था यह बात। कर कुछ नहीं पाता था। बस तब मैं मां का पल्लू हथेलियों में कसकर भींच लेता और उनके बगल में बैठ जाता उनसे सट कर चुपचाप। उस वक्त मुझे महसूस होता कि मैं कोई जीवट वाला पुरुष होऊं और मां को निःशब्द सांत्वना दे रहा होऊं, उनकी उस अज्ञात पीड़ा के लिए जो मुझे अक्सर उद्वेलित किया करती थी। मुझे बेहद जिज्ञासा, बल्कि घुटन होती थी कि इस किताब में ऐसा क्या लिखा है जो मां को रुला देता है और यदि इसे पढ़कर रोना आता है तो मां बार-बार क्यों रोना चाहती हैं?

रामायण के बाल कांड और सुंदर कांड के दोहे चौपाइयां उन्हें मुखाग्र याद थे। उनकी स्मृतियों का स्त्रोत खोजें तो निश्चित ही बचपन और वयस्कावस्था का समय व्यतीत करना रहा होगा। हां, एक बात और, उन्हें लिखने का बड़ा शौक था। उस समय अंगरेजी की चार लाइनों की कॉपी आती थी। वे उसी में लिखा करती थीं चार लाइनों के बीच में खूब जमा-जमा कर। जब कॉपी भर जाती तो वे मुड़े-तुड़े पल्लू में से खोलकर कुछ चिल्लर मुझे देतीं जो हमेशा ही कॉपी की कीमत से ज्यादा होती। मैं बिना कुछ पूछे सरपट दौड़ा जाता मुहल्ले के उस ‘पवन किराना स्टोर’ की तरफ। दुकानदार चार लाइनों वाली कॉपी और दो गटागट की गोलियां बिना कहे मेरी छोटी-सी हथेली पर रख दिया करता। मैं खुशी से उछलता-कूदता गोली मुंह में दबाए आता, मां मेरी प्रतीक्षा कर रही होतीं। यह हम तीनों के बीच मौन समझौता था। बचे हुए पैसे मां नहीं लेती थीं। ‘अगली बार जब जाओ कॉपी लेने तब और ले आना गोली’ वे कहतीं। मैं खुश हो जाता पर अगली बार वे फिर उतने ही पैसे दे देतीं। मां शब्दों का इस्तेमाल बहुत कंजूसी से करती थीं।

घर के कामकाज से निपट फुर्सत के क्षणों में वे रात देर तक लट्टू की पीली रोशनी के नीचे झुकी खूब मनोयोग से कुछ लिखा करतीं, न जाने क्या। बाद में पता चला कि वे रामायण के दोहे और चौपाइयां लिखा करती थीं। उन्होंने एक बार यह भी बताया था कि उनके पिता जी उनसे रोज मुंह अंधेरे रामायण के दो पन्ने लिखवाया करते थे। लिखावट सुंदर होने के बावजूद मात्राओं में गलतियां अक्सर ही कर देतीं वे। बाद में जब मैं उन गलतियों के बारे में उन्हें बताता और उन्हें दुरुस्त करने की बात कहता तो वे कहतीं ‘अरे रहन दो मुन्नू, गलतियां सुधारी थोड़े ही जाती हैं। वे तो बस हो जाती हैं, जैसे बच्चा किसी भी घर पैदा हो जाता है!’ मां दार्शनिक भी थीं, अब सोचता हूँ।

मुझे लगता है कि मां ये शब्द कहकर उस सर्वज्ञात सर्वश्रेष्ठ ईश्वर को उलाहने भेजती थीं। लेकिन मेरी उम्र के उस कच्चेपन में उनकी यह दलील उन तमाम जवाबों में से एक होती, जिनके सामने मैं कभी भौंचक और अक्सर निरुत्तर रह जाता।

मुझे बादलों की गड़गड़ाहट से बहुत डर लगता था। जब वे जोरदार गरजते, मैं मां या पिता से चिपककर रोने लगता और कहता भीतर चलो (आंगन में से), अब बारिश आने वाली है

तब पिता जी मुस्कराते मुझे गोद में उठा लेते और कहते, ‘देखो मुन्नू, जिस चीज से हमें भय लगता है उसे बार-बार देखना और करना चाहिए, उससे भय चला जाता है। याद रखो, बारिश के भी कुछ नियम होते हैं।’ फिर एक कहावत जड़ देते-

‘कारी बदरी हिया डराए

भूरी बदरी जल बरसाए….।’

या

‘कलसा पानी को तचये, चिरैया नहाए धूर

चिरिया ले अंडा चले तो बरसे भरपूर।’

और मैं बारिश से सचमुच निश्चिंत हो जाता। मुझे लगता मां और बाबू जी अलग-अलग कितने अच्छे सहृदय और परिपक्व हैं। कभी एक-दूसरे से ऊंची आवाज में बोलते नहीं देखा उन्हें। एक दूसरे का दुनिया में सबसे ज्यादा ख़याल रखते हैं वे दोनों, लेकिन बाद में मुझे उनके इन गुणों से दहशत और घुटन-सी होने लगी। जब मैं उन्हें साथ में कल्पना करता तो उनके वे गुण मेरे यकीन की जमीन पर तिनकों की मानिंद बिखर जाते। पता नहीं क्यों?…

मेरे लिए पिता किसी ब्रह्मज्ञानी से कम नहीं थे। मैं उनपर अगाध विश्वास करता। मन ही मन गर्व भी करता। मेरे लिए उनकी बात पत्थर की लकीर हो जाती थी।

पिता जी संस्कृत के विद्वान, आदर्शवादी और धैर्यवान व्यक्ति थे। रात में खाने-वाने से निवृत्त हो मैं, मां और पिता जी आंगन में बैठ बातें करते। मां बातें तो क्या बस हां हूँ करतीं या पिता जी कोई प्रश्न पूछ लेते तो उसका जवाब दे देतीं। कई बार तारों भरी रात में पिता जी उस चौखूटे आंगन के बीच खाट पर लेटे होते और मैं खड़े होकर अपने छोटे-छोटे पंजों से उनके पैर दबा रहा होता तब पिता जी पौराणिक और रोचक जातक कथाएं सुनाते। मां वहीं कच्ची लिपी हुई जमीन में बैठी होतीं। मां के हाथ में ऐसे वक्त कोई बीनन-छानन की थाली होती या ऊन का लच्छा, जिसे वेे हथेलियों के बीच फंसा कर ऊन के गोले बनाया करती थीं। वे हमारे साथ होती हुई भी नहीं होती थीं।

एक दिन पिता जी बोले ‘विमला, वह ‘महारानी कुंती की शिक्षाएं’ पुस्तक लाए थे तुम्हारे लिए, पढ़े हो?’ पिता जी मां से बात करने के विषय खोजा करते और मां उनकी हर खोज पर कोई संक्षिप्त-सा जवाब दे पूर्णविराम लगा देतीं।

‘हां, पर ज्यादा नहीं पढ़े अभी?’ मां ने संक्षिप्त उत्तर दिया और पिता जी की ओर बिना देखे ऊन के गोले बनाती रहीं जैसा वे अक्सर किया करती थीं।

‘हम कल उलट-पुलट देखे थे उसे। स्त्रियों के पढ़ने योग्य पुस्तक है वह।’ पिता जी बोले, ‘एक दोहा अभी तक याद है-

नमस्ये पुरुषं त्वाध्यमीश्वरं प्रक्रतैयः परम। अर्थात ‘मैं उस पुरुष को नमस्कार करती हूँ जो इस भौतिक जगत से परे है। अर्थात ईश्वर परम पुरुष है’ समझे?’

‘हओ…’ अम्मा उंगलियों के इर्द-गिर्द ऊन को लपेटते हुए बोलीं।

मां दोपहर को काम से निवृत्त हो रसोई की देहरी का सिरहाना किए किताबें पढ़ती रहतीं। वहां खिड़की-दरवाजे से हवा आती है और आंगन से उजेला भी। मैंने कई बार पिता जी के देर रात घर आने की फ़िक्र और प्रतीक्षा को इन्हीं किताबों के सुपुर्द करते देखा था उन्हें। हालांकि मां ने पूरी ज़िंदगी पिता जी से उस चिट्ठी के बारे में कभी नहीं पूछा, लेकिन मां को मैंने खुलकर बोलते या हँसते कभी नहीं देखा। कुछ बातें थीं, जो घुन की तरह उनके मन को खोखला करती रहतीं, जैसे बेटी के ब्याह की जिम्मेदारी या मकान खरीदने जैसी कोई विवशता न होने पर भी पिता जी ने एक निश्चित अवधि के जीवन बीमा की पालिसी ले रखी थीं। वे नियमित उसकी किश्तें भरते। इससे गृहस्थी को अपने हाथ सिकोड़ने पड़ते।

कहते थे, कुछ सालों बाद पूरे पचीस हजार मिलेंगे। लेकिन उन पचीस हजार का क्या करेंगे इसका खुलासा उन्होंने कभी नहीं किया। मां को पिता जी का ये दोहरा व्यक्तित्व अक्सर परेशान करता कि ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के हिमायती पिता जी को अच्छी भली घर-गृहस्थी चलने के बावजूद धन जोड़ने की क्या आवश्यकता पड़ रही है? और शक की सुई फिर उस पीले से पुराने गुड़ी-मुड़ी कागज यानी उस ‘पौराणिक चिट्ठी’ के आसपास घूमने लगती।

पिता जी का फंड का पैसा उन्हें रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला था और पेंशन भी, यह मां जानती थी। पिता जी मां के लिए फिक्रमंद रहते, इसके बावजूद मां को हमेशा पिता जी की आंखों में किसी दूसरी औरत का चेहरा दिखता रहता। मां और पिता जी का कमरा एक ही था जिसके किवाड़ रात में बंद हो जाते थे। लेकिन मैंने सुबह मां को कभी स्फूर्ति और ताजगी से कमरे से निकलते हुए नहीं देखा, बल्कि इस वक्त भी उनके चेहरे पर एक तटस्थता चिपकी रहती, जैसे पूजागृह से पूजा करके या कोई घरेलू काम की निवृत्ति पर होती थी।

पिता जी जब शाम को जल्दी लौट आते तो मां को लगता कि वे उन्हें संशकित नहीं होने देने के लिए ऐसा कर रहे हैं और जब कभी उन्हें आने में देर हो जाती तो मां सोचतीं जरूर उस चिट्ठी वाली औरत से मिलने गए होंगे, पर कहतीं कभी कुछ नहीं, बस मुरझा जातीं। मां खाने में नमक डालना भूल जाएं तो पिता जी चुपचाप खाकर हाथ धो लेते। मां का माथा भी दुखे तो आयुर्वेदिक दवाइयों की किताब खोलकर बैठ जाएं और बाज़ार से दवाई लेकर मां को अपने हाथ से खिलाएं। मां उनकी इस अतिरिक्त फिक्र से और अधिक कुंठा में डूब जातीं। 

ऐसे मौकों पर छोटा-सा गुड़-मुड़ी किया वह पुर्जा फिर किसी अग्निपुंज की भांति उनकी स्मृतियों के आकाश पर तैरने लगता। उसकी कौंध से वे बेचैन हो जातीं।

‘अरे आज तो गट्टा सब्जी बहुत उम्दा बनाए हो भाई’, पिता जी मां के निहोरे से करते। मां बुझी सी हँस देतीं। मां को लगता, ‘वह तो पता नहीं क्या-क्या बना लेती होगी? कितनी पढ़ी-लिखी और सुंदर होगी? मास्टर जी (पति) भी तो घने दिखनौट हैं?’ लेकिन ऐसी रहस्यमयी शंकाओं के बाद भी मां को उस ‘दूसरी’ औरत से न कोई ईर्ष्या भाव था और न पिता से कोई शिकायत थी। क्रोध आता तो खुद पर कि ‘हमारे और संतान यानी मेरे लिए कितना बड़ा त्याग किए वे’?

कभी कभार जब मन अच्छा होता तो मां अपनी एक कहानी सुनातीं, अधूरी कहानी। मैं कुछ विकल्पों के साथ मन ही मन उसे पूरी कर लेता। पिता जी की बात करते उनके गोरे चेहरे पर ललाई-सी आ जाती।

‘लाला, हमारा जमाना अलग था। तब नाई जाकर रिश्ते तय करने का युग खत्म हो रहा था और जमाना बदल रहा था। अब रिश्तेदारों के साथ भावी वर-वधू को भी एक-दूसरे को दिखाया जाने लगा था, पर ‘देख लेने’ के बावजूद, विवाह का निर्णय घर प्रमुख का ही होता। तुम्हारे दादा जी तुम्हारे बाउ जी को लेकर हमारे घर आए थे, बस हमें देखने-दिखाने को। हम उन्हें पसंद आ गए थे। लौटते बखत तुम्हारे बाउ जी चुपचाप हमारी अम्मा से मांगकर हमारी तस्वीर ले गए थे।’ कहकर अम्मा मुंह में पल्लू देकर हँसने लगतीं, लेकिन हँसी उनके चेहरे पर ज्यादा देर नहीं टिकती, वे फिर उदास हो जातीं।

उस दिन मां की दाढ़ में दर्द था। मां और पिता जी दांतों के डॉक्टर के दवाखाने पर बैठे थे। भीड़ थी, सो वहीं बेंच पर बैठ गए दोनों। तभी एक अठारह-उन्नीस बरस की लड़की आई और उसने पिता जी के पैर छू लिए।

‘अरे फूलो बिटिया कैसी हो? क्या बताएं, आ नहीं पाए तुम्हारे बियाह में। ज़रा फंस गए थे काम में…’ पिता जी की आंखों में चमक थी।

‘कोई बात नहीं बाउ जी। आप का आसिरबाद तो हमेसा ही हे हमारे साथ! आपने मदद ना किए होते तो नहीं न होता हमारा ब्याह…’

‘अरे नहीं नहीं भाई …करने-धरने वाला तो सब वो ऊपर वाला है’, पिता जी ने आसमान की ओर देखते हुए कहा, ‘…हम तो बस ज़रिया हैं…। और सवित्री कैसी है?’

‘अम्मा ठीक है। बस थोड़ा मुतियाबिंद हो गया है आंखों में। दिखता कम है।’

‘हां, हां, बढ़ती उमर के रोग हैं। सब ठीक है बिटिया, खुश रहो।’

मां की चुप्पी की नदी में सैंकड़ों आशंकाओं की नौकाएं उतराने-डूबने लगीं।

अपना रक्त तो अपना ही होता है …उन्होंने ये भी सोचा। जैसे रहस्य का कोई छोर ढूंढ़ लिया था उन्होंने।

जब लड़की पिता जी के दुबारा पैर छूकर चली गई तो पिता ने बताया कि ये सावित्री की बिटिया फूलो है….। सावित्री गांव में हमारी लड़कपन की साथी थी। पास ही में रहती थी। संगे खेले-कूदे पढ़े और बड़े हुए। उसके और हमारे पिता घनिष्ठ मित्र थे। जल्दी विधवा हो गई सावित्री बिचारी। उसने अकेली ही पाली है इसे। अभी कुछ दिन पहले ही इसका ब्याह कर दिए हैं वे।’

मां को लगा किसी ने दिल पर रखी कोई विशाल चट्टान खिसका दी हो। उनके शक ने अपना रस्ता जो अभी कुछ पल पहले काफी लंबा दिख रहा था बदल लिया, पर मंजिल अब भी धुंधली, बल्कि अदृश्यमान ही थी। घर लौटकर मां अपना लोहे का बक्सा खोल कर बैठ गई थीं। उन्होंने उसमें से गुड़ी-मुड़ी-सी एक पोटली निकाली थी और उसमें से चांदी की एक हंसुली और चार चूड़ियां भी कि ये चीज़ें वे पिता जी के हाथ फूलो को भिजवाएंगी। (पता नहीं कि वे इन्हें भिजवा पाईं कि नहीं)।

एक दिन पिता जी नहीं रहे मां न रोईंन चीखीं, बस पिता की मृत देह को अपलक देखती रहीं शांत तटस्थ निर्भाव। हर रस्मो रिवाज को मां अब कर्तव्य की तरह निभाती थीं और यह रस्म उनके लिए पहली और आखिरी थी

बड़ी बुज़ुर्ग चिंतित हो उठीं कजरैया (रात) गहरात है मरद जाय ओर महरौ की आंखें सूखी कुइयां रहें भारी असगुन है भैया जे तो ….अरे कोई तो रुलाय या दुल्हिन कोपर मां न रोईं। औरतें पिता जी की यादें दिलादिला कर थक गईं। तभी एक अधेड़ औरत आई और पिता से लिपटकर बुरी तरह रो पड़ी।

‘गम खाओ सावित्री तनिक …, जो होनी है उसे कौन टाल सकत है?’ औरतें, पछाड़ मारती सावित्री को चुप करा रही थीं।

सावित्री? वही सावित्री जिसे लिखी चिट्ठी ने उनके और पिता जी के रिश्ते में ब्याह के पहले दिन ही विष घोल दिया था कि कभी सामान्य जीवन न जी पाए हम दोंनों …सौत? मां ने आंखें उठा कर एक पल देखा और नज़रें झुका लीं। पहली बार देखा था मां ने सावित्री को।

‘अरे सावित्री अपनी बह्नियाँ के रुलाओ तो सही के मट्टी अपने ठिकाने लगे’ औरतें सावित्री को उकसा रही थीं।

पर मां नहीं रोईं तो नहीं रोईं। मिट्टी भी कब तक रखी जाए। सो लोग बाग पिता जी की अर्थी को ले उठे। मां कहीं से भी सदमे में नहीं लग रही थीं, बल्कि उन्होंने बड़ी परिपक्वता और धीरज के साथ वह सब किया जो विधवा औरत करती है- जैसे चूड़ियाँ उतारकर पिता जी की देह पर रखीं। माथे का सिंदूर पोंछा। पिता जी के पैर छुए और पिता जी की अर्थी गली के नुक्कड़ तक देखती रहीं जाते हुए। उनके चेहरे पर वही शांति और भाव थे जो सुबह अपने कमरे से निकलते वक्त या किसी काम की पूर्णता के पश्चात होते थे।

सावित्री मां को पकड़कर घर के भीतर ले आई और माथे पर थोड़ा पल्लू खींच के बिठा दिया एक कोने में। मां औरतों से घिरी बैठी थीं चुपचाप। मां अब भी सोचने की मुद्रा में बैठी थीं, जैसे वे अक्सर अकेले में बैठा करती थीं। चेहरे पर अब भी वही शांति और जड़ता थी।

‘देवता थे मास्साब तो सई में …किस्मत वालों को ही ऐसे मरद मिलते हैं भाभी।’ सावित्री मां के पास बैठी पुरानी यादें बटोर रही थी, ‘हमारे बाउजी और तुम्हारे ससुर पड़ोसी और पक्के दोस्त थे। तुम्हें जब पसंद कर लिए मास्साब ने उसी बखत हमारी महतारी अचानक नहीं रही। तीन-तीन छोरियों का बोझ हमारे बाप पर आ गया। सो उन्होंने तुम्हारे ससुर तुम्हें ब्याहने की बात कही। तुम्हारे ससुर उनकी परेशानी देख तैयार हो गए और मास्साब के साथ तुम्हारा ब्याह पक्का हो गया। हमारा ब्याह हमारे मामा ने लगा दिये कहीं और कहे कि ‘लड़के की उमर ज्यादा है’। दो बरस के भीतर ही जब हमारी बिटिया फूलो छह महीने की थी हमारे पति चल बसे। तब तक तुम्हारे साथ मास्स्साब का ब्याह हो चुका था, पर हमें खुशी थी कि मास्साब को उनकी पसंद की पत्नी मिल गई। हमारे अपने तो सब छोड़कर चले गए, पर मास्साब ने ही हमारी बिटिया फूलो का ब्याह किया, उसके लिए दहेज के पूरे पचीस हजार दिए।’

अंतिम सत्य सावित्री ने जो बताया भूचाल आ गया माँ की दुनिया में जैसे। समूची पृथ्वी ही उलट-पुलट गई उनके देह-मन की। उन्होंने कहा ‘मास्साब तुम्हे जी जान से चाहते थे भाभी, पर हमारे परिवार का दुक्ख वह नहीं देख पाए। न ही अपने पिता की बात टाल पाए। इसलिए उन्होंने हमसे ब्याह करने की बेमन से हामी तो भर दी थी, पर तुम्हें न भूल पाए। तुम्हारे फोटू को खीसे में धरे घूमते थे पगलाए से। हमें भी दिखाए थे तुम्हारा फोटू। उन्होंने हमें बताया था कि तुम उन्हें बहुत पसंद थीं, लेकिन हमसे शादी पक्की होने के बाद उन्होंने तुम्हें माफी की चिट्ठी भी लिख भेजी थी, जो उन्होंने अपनी अम्मा को दे दी थी कि वे तुम तक पहुंचा दें। पता नहीं तुम्हें अम्मा ने वे चिट्ठी पहुंचाई के नहीं।’

सावित्री की आंखें फटी रह गई। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मां को अचानक यह क्या हो गया। मां बुरी तरह चीख रही थीं। दहाड़ें मार रो रही थीं। हाथ-पैर पटक रही थीं। किसी के वश में नहीं आ रही थीं। न जाने कहां से उनकी दुबली-पतली देह में इतनी ताकत आ गई थी कि इतनी जनी मानसों से भी नहीं संभल रही थीं, पर औरतें संतुष्ट थीं कि असगुन टल गया और मां सदमे से मुक्त हो गई। अभी तक लोगबाग लौटे नहीं थे पिता जी का अंतिम संस्कार करके।

संपर्क सूत्र : 3-एस, सोसायटी, वरासिया रिंग रोड, वडोदरागुजरात390006, मो.9928831511