बैंक कर्मी।एक पुस्तक किसी और देश में जोहांसबर्ग’, दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित।एक कहानी संग्रह सुर्ख़ लाल रंगशीघ्र प्रकाश्य।

कैशियर प्रवीण ने मोटरसाइकिल पहाड़ी के इस तरफ ही खड़ी कर दी, बमुश्किल एक कच्चा रास्ता वहां तक गया था, जिसपर बहुत संभलकर ही दो-पहिया वाहन चल सकते थे।मुख्य कस्बे से काफी दूर यह आदिवासी गांव कुछ इस तरह स्थित था कि सामान्यतया कोई अधिकारी वहां जा ही नहीं पाता था।सबसे बड़ी दिक्कत थी वहां पहुंचना।न तो मोटरसाइकिल वहां जाती थी और न ही कोई अन्य वाहन।बस पैदल ही जाना एक तरीका था और यही वजह थी कि कोई न कोई बहाना बनाकर लोग वहां जाने से कतराते थे।एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो फिर पैदल कौन चलना चाहता है, दो साल की नौकरी होते होते तो क्लर्क भी कार खरीदने के लिए सोचने लगता है, अफसर की तो बात ही दीगर है।

अगस्त महीने में बरसात लगभग समाप्त हो चुकी थी और चारों तरफ हरियाली नजर आ रही थी।बरसात खत्म होने से एक फायदा यह था कि रास्ते में कीचड़ नहीं था वरना वहां जाने का इरादा छोड़ना पड़ता।साल के तीन चार महीने तो उन गांवों में जाने का सोचा भी नहीं जा सकता था।पता नहीं किसी आपदा की स्थिति में ऐसे गांवों तक मदद कैसे पहुंचती होगी, यह सोचने की बात थी।सोयाबीन की फसल खेतों में लग चुकी थी और जगह जगह आम और जामुन के पेड़ भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे।कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था और ऐसे में उसे किसी पिकनिक स्थल पर जाने जैसी अनुभूति हो रही थी।उसे याद आया अपने कॉलेज के दिनों में जब उनका ग्रुप दूर दराज के गांवों में पिकनिक मनाने जाता था तो हरियाली को देखकर उनकी आंखों को कितना सुकून मिलता था।दरअसल कॉलेज के उसके ग्रुप में शायद ही कोई ऐसा था जो गांव से था और गांव की तकलीफ का अंदाजा भी लगा पाना उनके बस की बात नहीं थी।

जब बैंक में इंटरव्यू देने जाना था तब उसने कभी यह सोचा भी नहीं था कि उसे इतने पिछड़े इलाके में काम करने का मौका मिलेगा।वैसे ऐसी बात भी नहीं थी कि उसकी इच्छा ऐसी जगहों पर काम करने की नहीं थी।भले ही वह गांव में रहा नहीं था, लेकिन कहीं न कहीं उसकी संवेदना के तार गांव और गरीबों से जुड़े हुए थे।कोर्स की पढ़ाई के अलावा उसकी हिंदी कहानियों तथा उपन्यास पढ़ने में बहुत रुचि थी और ग्रामीण परिवेश पर लिखने वाले लेखक उसे बेहद पसंद थे।शायद वह खुद गांव में नहीं रहा था, इसलिए भी उसे वह परिवेश बहुत आकर्षित करता था।और बेशक इन्हीं सब वजहों से ही वह एक संवेदनशील इनसान भी बन पाया था।

नौकरी के शुरुआती दौर में वह छोटे कस्बों तथा छोटे शहरों में ही रहा था और इस वर्ष उसे पहली बार रूरल पोस्टिंग मिली थी।दरअसल बैंक के एक नियम के चलते उसको ग्रामीण क्षेत्र में कार्य करना जरूरी था वरना उसकी अगली पदोन्नति में दिक्कत आती।बैंक का उज्जैन अंचल ऐसा अंचल था, जिसमें अधिकतर शाखाएं या तो ग्रामीण क्षेत्रों में थीं या छोटी जगहों पर थीं।इसलिए यहां पर ग्रामीण पदस्थापना पूरा करने में कोई दिक्कत नहीं आनी थी।उसे पोस्टिंग मिली रतलाम से लगभग 45 किमी दूर एक ऐसी जगह पर जहां सिर्फ गांव थे, हरियाली थी, पहाड़ थे और प्राकृतिक खूबसूरती थी।इसके साथ-साथ एक और बात थी जो दरअसल परेशान करने वाली थी, और वह थी उस इलाके की गरीबी।लेकिन यहां पर आनेवाले अन्य लोग सबसे ज्यादा परेशान इसलिए रहते थे कि यहां बड़ी-बड़ी दुकानें या होटल नहीं थे।जब उसकी पोस्टिंग इस शाखा में हुई थी तो कई लोगों ने उसे नेक सलाह देने की कोशिश की, अरे साहब, लोगों से बात करके उज्जैन के आसपास की ग्रामीण शाखा में पोस्टिंग करवा लो।रूरल का रूरल भी हो जाएगा और उज्जैन से आना-जाना भी हो जाएगा।उसे भी पता था कि बहुत से लोग येन-केन प्रकारेण शहरों के आसपास ही अपनी नौकरी गुजार देते हैं।उसने उन प्रलोभनों को दरकिनार करके खुशी-खुशी अपनी नई शाखा में जाना स्वीकार कर लिया तो उन शुभचिंतकों को लगा कि कुछ ही दिनों में इसकी अकल ठिकाने लग जाएगी।

‘पागल मत बनो, कुछ भी नहीं है वहां।न कोई मार्केट, न होटल, पक जाओगे वहां।’

खैर, उसके लिए ये चीजें फिलहाल कोई मायने नहीं रखती थीं, वह तो कहीं न कहीं यही चाहता था।बल्कि उसे तो यह भी लगा कि इसी बहाने वह प्रकृति से और गांवों से और करीब से जुड़ जाएगा।

‘मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी, आखिर नौकरी ही तो करनी है’, उसने मुस्कराकर जवाब दिया तो बात खत्म हो गई।

उज्जैन से रतलाम और फिर रतलाम से उस गांव की शाखा में पहुंचते-पहुंचते शाम हो गई।जैसे ही वह शाखा में पहुंचा, वहां के वर्तमान प्रबंधक की सांस में सांस आ गई।दरअसल पिछले दो महीने में दो लोग, जिनकी पोस्टिंग उस शाखा में हुई थी, अपना तबादला रद्द करा चुके थे और वह वहां तीन साल से ज्यादा समय से पोस्टेड या यूं कहें कि फंसा हुआ था।

‘आइए शर्मा जी, ज्यादा दिक्कत तो नहीं हुई यहां आने में?’

कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका उत्तर पूछनेवाले को अमूमन पता होता है और उसने भी वही उत्तर दिया, ‘कोई खास दिक्कत नहीं हुई, बस रतलाम से यहां आने में समय लग गया।’

‘आप तो अपनी मोटरसाइकिल ले ही आएंगे, फिर दिक्कत नहीं होगी।वैसे शाखा में भी एक मोटरसाइकिल है और हम लोग रतलाम जाने के लिए उसका इस्तेमाल कर लेते हैं’, वर्तमान प्रबंधक ने मुस्कराते हुए कहा।उनकी मुस्कराहट इसलिए भी ज्यादा थी कि अब उनको अपनी मनचाही शहरी जगह पर नियुक्ति मिल जाएगी।

अगला दो दिन उसका स्टाफ से बात करने में और गांव के प्रधान और कुछ अन्य लोगों से मेल मुलाकात में बीत गया।तीसरे दिन पुराने प्रबंधक जब उस शाखा से अंततः विदा हुए तो उनके चेहरे पर जो राहत नजर आ रही थी, वह सबको दिखाई पड़ रही थी।

‘जैसे ही दो साल हो जाएगा, आप यहां से अपना तबादला करवा लीजिएगा।हमारी तरह तीन साल अगर यहां फँस गए तो बहुत तकलीफ होगी’, जाते-जाते पुराने प्रबंधक ने उनको चुपके से गुरुमंत्र भी दे दिया।

उसने हामी में सर हिलाया और उनको विदा करके अपनी सीट पर बैठ गया।अब उसने एक पूरी निगाह शाखा के अंदर डाली, फर्नीचर पुराना तो था ही, टूटा हुआ भी था।दीवाल पर लगा हुआ पेंट शायद दसियों साल पुराना था और बिजली के तार इतने बेतरतीबी से चारों तरफ फैले हुए थे कि उसे देखकर उलझन होने लगी।सबसे पहले शाखा का रखरखाव दुरुस्त करना होगा, पिछले कई प्रबंधकों ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया था।ग्राहकों के लिए रखी हुई कुर्सियां भी जाने किस जमाने की लग रही थीं और बाथरूम का तो बेहद बुरा हाल था।बस एक ही चीज बेहतर थी कि वहां कोई महिला कर्मचारी पदस्थ नहीं थी वरना उसके लिए यहां काम करना कितना कठिन होता।

उसने अपने जूनियर अधिकारी को बुलाया और बात करने लगा, ‘आप लोगों को खराब नहीं लगता है कि शाखा इस हाल में है।आखिर इसे साफ सुथरा रखने में क्या दिक्कत है?’

उस अधिकारी ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसे समझ में आ गया कि यहां किसी को इन चीजों में दिलचस्पी नहीं है।कुछ ही देर में उसको पता चल गया कि एक दफ्तरी और कैशियर को छोड़कर बाकी सभी स्टाफ रतलाम से आते-जाते हैं और उनका रोज का दो तीन घंटा सिर्फ इसी में लग जाता है।उसे यह भी पता चल गया कि पिछले तीन प्रबंधक अपनी पोस्टिंग को बस किसी तरह ढो रहे थे।उनको लगता था जैसे उन्हें सजा के तौर पर यह शाखा दी गई है।अब अगर सजा ही मान लिया है तो किसी को इसके विकास या रखरखाव से क्या फर्क पड़ने वाला था।

चूंकि यह शाखा आंचलिक कार्यालय से भी काफी दूर और काफी अंदर थी, तो वहां से भी साल दो साल में ही कोई आता था और फटाफट भाग लेता था।वैसे भी उनके आने का मुख्य कारण रतलाम आना होता था।रतलाम सोने के लिए बहुत मशहूर था और वहां सोना शुद्ध और सस्ता भी मिलता था।विभिन्न प्रदेशों से व्यापारी वहां सोना खरीदने आते थे और इसी क्रम में अन्य जगहों से भी अधिकारी आया करते थे।मशहूर तो रतलाम का सेव भी था, लेकिन सिर्फ सेव के लिए शायद ही वहां कोई आता।

उसने दफ्तरी को बुलाया और सबसे पहले शाखा के रखरखाव के बारे में बात करने लगा।चूंकि दफ्तरी वहीं रहता था, लोगों में उसकी अच्छी पहचान थी इसलिए उससे बेहतर कोई अन्य स्टाफ उसे इस कार्य के लिए नहीं लगा।थोड़ी देर की बातचीत में ही दफ्तरी के जवाब ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया, ‘साहब, किसी भी बड़े साहब ने शाखा के बारे में सोचा ही नहीं, उन्हें तो बस सुबह यहां आने और शाम होते ही यहां से भागने की जल्दी रहती थी।मैंने खुद आगे बढ़कर उनसे कहा कि अपनी शाखा को ठीक-ठाक करा लिया जाए तो किसी ने भी हां नहीं किया।’

उसके दिमाग में अपने एक सीनियर अफसर, जिनकी वह बहुत इज्जत करता था, की बात कौंध गई, ‘जब किसी को अपनी पोस्टिंग पनिशमेंट पोस्टिंग लगने लगती है तो सबसे ज्यादा नुकसान संस्था का होता है।’ उसे इस शाखा में यह चीज स्पष्ट रूप से नजर आ रही थी।अधिकतर स्टाफ आने-जाने में ही लगा रहता था और शाखा का व्यवसाय इतना ज्यादा भी नहीं था कि उससे बहुत फर्क पड़े।लेकिन उसे व्यवसाय में वृद्धि नहीं होने की एक साफ वजह तो पता चल ही गई थी।

‘आप तुरंत किसी कारीगर को बुलवा लीजिए जो यहां मरम्मत कर सकता हो और शाखा की पुताई के लिए भी किसी को खोजिए’, उसने दफ्तरी से कहा तो उसका चेहरा चमक उठा।

‘ठीक है साहब, मैं आज ही बुलवाता हूँ, मेरे पहचान के मिस्त्री हैं इस गांव में।’

‘एक और बात, मेरे रहने के लिए भी कोई ठीक-ठाक मकान ढूंढिए यहां, मेरे लिए रोज अप-डाउन करना ठीक नहीं रहेगा’, उसने दफ्तरी को कहा तो उसके आश्चर्य का पारावार ही नहीं रहा।

अगले दो हफ्ते शाखा की मरम्मत, रंगाई-पुताई और अपना घर खोजकर उसमें रहने की व्यवस्था में लग गया।इस बीच शाखा के बाकी स्टाफ को यह महसूस हो गया कि अब तो भागने से नहीं चलेगा, आखिर खुद मैनेजर गांव में रहने लगा है।इसका नतीजा यह निकला कि जो शाखा 5 बजे के बाद बंद होने लगती थी, अब ६ बजे के बाद भी खुली रहने लगी।गांव के लोगों में भी एक उत्साह जगा कि अब उनको बैंक से बेहतर सेवा मिलेगी और वे भी शाखा में ज्यादा संख्या में आने लगे।लगभग 15 दिन बाद ही शाखा का कायाकल्प हो चुका था और जो शाखा किसी सरकारी दफ्तर जैसी नजर आती थी वह अब एक बेहतर जगह नजर आने लगी।इसी बीच आंचलिक कार्यालय से बात करके उसने नया बोर्ड लगवा दिया और एकाध नया कंप्यूटर भी लग गया।

उस गांव और आस-पास के 30 किमी में वह इकलौती बैंक शाखा थी और जितनी भी सरकारी योजनाएं थीं, वह सब उसी के माध्यम से लागू होती थीं।हजारों की संख्या में पेंशन खाते, शून्य राशि के जनधन खाते, मनरेगा के मजदूरों के खाते, बच्चों की छात्रवृत्ति के खाते और तमाम किसानों के कृषि तथा अन्य छोटे-मोटे ऋण के खाते।मतलब खुदरा काम इतना रहता था कि दिन कैसे ग्राहकों के साथ बात करते और उनकी समस्या हल करते बीत जाता, पता ही नहीं चलता था।साथ ही साथ चूंकि गांव में इंटरनेट बहुत धीमा चलता था, इसलिए अकसर काम भी सुस्त चाल से ही होता था।

महीना बीतते-बीतते शाखा के व्यवसाय में भी वृद्धि नजर आने लगी और अब उसने अपना ध्यान शाखा के बजट को पूरा करने के लिए लगाया।पिछले कई सालों में न तो किसी मैनेजर ने व्यवसाय वृद्धि के लिए कोई खास प्रयास किया था और न ही आंचलिक कार्यालय ने इसके बारे में ज्यादा पूछताछ की थी।इसलिए उसे लग गया था कि वह बड़े आराम से अपनी शाखा को काफी आगे ले जा सकता है।

जैसे-जैसे आस-पास के गांव के लोग उस शाखा से जुड़ते गए, व्यवसाय बढ़ता गया।सरकार द्वारा लाई गई हर योजना चूंकि बैंक के माध्यम से ही लागू होनी थी, इसलिए काम करने का और लोगों की मदद करने का बहुत अच्छा मौका मिला था उसको।एक मैनेजर को एक साथ कितने मोर्चों पर जूझना पड़ता है, अब उसे महसूस हो रहा था।पहले तो सिर्फ अपना विभाग ही देखना पड़ता था, चाहे वह डिपॉजिट हो या अग्रिम।अब तो डिपॉजिट भी बढ़ाना था, ऋण भी बढ़ाना था, वसूली भी करनी थी तथा अन्य तमाम छोटी-छोटी चीजें भी उसी को देखनी थीं।स्टाफ को अबतक उसकी कार्यप्रणाली के बारे में पता चल गया था इसलिए अधिकांश लोग उसका साथ देने के लिए तैयार हो गए।दरअसल एक बात हर संस्थान में लागू होती है कि जैसा संस्थान का मुखिया होता है, अधिकांश लोग उसी तरह से बन जाते हैं।और एकाध अपवाद तो अपने खुद के भी परिवार में रहता है तो संस्थान उससे अछूता कैसे रह सकता है।

उसने शाखा को लेकर सबकी सहमति से कुछ नियम बनाए।हर हफ्ते सभी लोग आधे घंटे के लिए साथ बैठेंगे और शाखा के लिए क्या जरूरी है या किस चीज में और बेहतर करने की जरूरत है, इसपर खुली चर्चा करेंगे।हर स्टाफ को अपना मत रखने का पूरा अधिकार होगा और किसी का भी सुझाव, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसपर भी राय मशविरा किया जाएगा।पहले तो लोगों को लगा कि ये नियम सिर्फ कागज पर ही रहेंगे और एकाध महीने में इसे सबसे पहले बनाने वाला ही भूल जाएगा।उनका यह अनुभव पिछले कई सालों का था।जब भी कोई नया प्रबंधक आता, शुरुआत में इस तरह की बातें करता और कुछ दिन बाद सब भूल जाता।लेकिन दूसरा महीना बीतते-बीतते स्टाफ को एहसास हो गया कि इस बार बात अलग है तो हर स्टाफ अपनी तरफ से एक से बढ़कर एक सलाह रखने लगा।समय पर शाखा को खोलना भी इन्हीं में से एक नियम था और वह खुद रोज समय से पहले शाखा में मौजूद रहता था।अब रतलाम से आने वाले स्टाफ भी घर से थोड़ा पहले निकलने लगे ताकि वे समय पर बैंक पहुंच सकें।उसने कभी भी किसी को देर से आने के लिए कुछ कहा नहीं, लेकिन उसका तरीका ऐसा था कि लोग अपने आप ही इसका पालन करने लगे।एक बार उसने जो भी स्टाफ देर से आया, उसको अपनी तरफ से चॉकलेट दिया और दूसरी बार जो समय से आए थे उनको चॉकलेट।तीसरी बार उसे कुछ कहने या करने की जरूरत ही नहीं पड़ी और स्टाफ के लोग उसके सामने कटोरी में पड़ी चॉकलेट यूं ही लेकर खाने लगे।

उस शाखा से लगभग 30 गांव जुड़े हुए थे और आजतक कोई भी प्रबंधक उन सभी गांवों में नहीं गया था।वैसे तो स्टाफ भी शायद ही सभी गांवों में गया था, लेकिन कागज पर तो हर गांव में निरीक्षण दर्ज था।उसने अपने ऋण अधिकारी बंसल को एक दिन बुलाया और उससे इस पर चर्चा करने लगा।

‘आप तो पिछले दो साल से यहां हैं, आप सभी गांवों में गए हैं?’

थोड़ा सोचकर बंसल बोला, ‘सर, सभी गांवों में तो नहीं गया हूँ, लेकिन अधिकांश गांवों में गया हूँ।कुछ गांव ऐसे आदिवासी इलाकों में हैं कि वहां जाने का कोई साधन ही नहीं मिलता है, अपनी मोटरसाइकिल भी नहीं जाती है।’

‘तो फिर उन गांवों के लोगों को कैसे ऋण दिया जाता है, एक बार तो देखना ही पड़ता होगा?’ उसने सवाल पूछा।

‘सर, वहां का बैंक मित्र हमको रिपोर्ट दे देता है और हम लोग उसी को मानकर ऋण दे देते हैं।वैसे जो कैशियर प्रवीण हैं, उनको सब पता है’, बंसल ने अपना पक्ष रखा।

‘ठीक है, आप ऐसे गांवों की सूची मुझे दीजिए जहां आप नहीं गए हैं, मैं देखता हूँ’, उसने मुस्कराकर कहा।

अब उसकी पहली प्राथमिकता ऐसे गांव ही थे जहां कोई जाता नहीं था।अब वहां किसी जरूरतमंद को, जिसे वास्तव में ऋण की जरूरत है, मदद मिली है या नहीं, यह देखना भी उसके लिए उतना ही जरूरी हो गया था।शाम होते-होते उसे ऐसे पांच गांवों की सूची मिल गई जहां कोई जाता नहीं था।उसने कैशियर प्रवीण को अपने केबिन में बुलाया।

‘अच्छा प्रवीण, ये पांच गांव हैं जहां आपके सिवा कोई नहीं जाता है।ये गांव सचमुच ऐसी जगह हैं जहां जाना संभव नहीं है या कोई और वजह है’, उसने सूची प्रवीण के सामने रखते हुए पूछा।

प्रवीण ने सूची उठाई और देखते हुए बोला, ‘साहब, इन गांवों में सड़क नहीं जाती है, ये पहाड़ी के दूसरी तरफ के आदिवासी गांव हैं और बहुत गरीब हैं।इसीलिए मेरे अलावा कोई यहां नहीं जाता।अगर यहां जाना है तो बता दीजिए, मैं चला जाऊंगा।’

‘मैं भी चलना चाहता हूँ प्रवीण, तुम कार्यक्रम बना लो फिर निकल चलेंगे।एक दिन में एक गांव तो जा ही सकते हैं हम लोग, है कि नहीं?’

‘हां साहब, दो दिनों में तीनों गांव चल सकते हैं।लेकिन पैदल खूब चलना पड़ेगा और पहाड़ी भी चढ़नी पड़ेगी, आप चल लेंगे न!’

उसने ठहाका लगाया, ‘अरे मैं कोई बूढ़ा हूँ या मुझे कोई बीमारी है जो चल नहीं सकता।अगले हफ्ते चलेंगे हम लोग, ठीक है।’

उन गांवों में जाने से पहले वहां पर बैंक की किस योजना में कितने लोगों की मदद की गई है और वर्तमान में उन लोगों और उनके ऋण खातों की क्या स्थिति है, इसका आकलन करना उसे उचित लगा।उसने बंसल से उन गांवों के लोगों के ऋण खातों का ब्यौरा मंगवाया।छोटे-छोटे किसान क्रेडिट कार्ड, मुद्रा योजना के ऋण और सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में घर बनाने के लिए भी ऋण दिए गए थे।बहुत से शून्य बैलेंस वाले खाते भी खुले हुए थे और उन गांवों के दो चार स्वयं सहायता समूह के खाते भी थे।

उसने गिनती की तो उन पांच गांवों में घर बनाने के लिए लगभग 50 लोगों को ऋण दिया गया था और लगभग सभी खातों की स्थिति खराब थी।अन्य कृषि ऋणों तथा मुद्रा ऋणों में भी कमोबेश यही स्थिति थी।उसने बंसल को बुलाकर पूछा, ‘इन गांवों के अधिकांश ऋण खाते ठीक नहीं हैं, आपने कभी कारण जानने की कोशिश की?’

बंसल इस सवाल के लिए तैयार नहीं था।दरअसल ऋण विभाग में बैठने वाला हर अधिकारी सिर्फ बड़े ऋण खातों के बारे में ही जानकारी रखता था।उसके पीछे दो वजहें थीं, एक तो यह कि हर शाखा में इतने ज्यादा ऋण खाते थे कि सभी खातों के बारे में जानकारी रखना मुश्किल था।दूसरी वजह यह थी कि ऐसे छोटे ऋण खाते किसी भी शाखा के व्यवसाय पर बहुत असर नहीं डालते थे।

‘सर, इतना समय कहां होता है कि इन छोटे छोटे ऋण खातों के बारे में सोचें।वैसे भी स्थानीय नेता इन लोगों को बता देते हैं कि ये पैसा सरकार दे रही है और इसे लौटाने की जरूरत नहीं होती’, बंसल के जवाब में थोड़ी सचाई थी।

‘लेकिन अगर नेता इनको बरगलाते हैं तो हमारी भी तो जिम्मेदारी है कि उनको समझाएं।खैर, आगे से यह बात हम लोग सबको समझाएंगे कि यह पैसा लोगों का पैसा है, जिसे वापस लौटाना जरूरी है’, उसने बंसल को समझाया।

‘अच्छा एक बात बताओ, ये जो घर बनाने के लिए लोगों को ऋण दिए गए हैं, लोगों ने अपना घर बनवाया है या नहीं?’ दरअसल इसके पहले वह जिस प्रदेश में था, वहां ऐसी कोई योजना नहीं थी।

बंसल ने लंबी सांस ली और बताने लगा, ‘सर, अगर सच कहूं तो बहुत कम लोगों ने अपने घर बनाए हैं।आप को भी पता ही है कि सरकारी विभाग में कितना भ्रष्टाचार होता है, एक चौथाई पैसा तो विभाग और प्रधान मिलकर खा जाते हैं।उसके बाद जो मिलता है उसमें उनकी दीवाल भी खड़ी नहीं हो पाती है, मकान बनाना तो दूर की बात है।’

उसका दिमाग भी परेशान हो गया।योजनाएं तो कमोबेश ठीक ही बनती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन ठीक नहीं होता है।सरकार की गरीबी हटाओ योजना में कागज पर तो हर जगह गरीबों की मदद की गई है, लेकिन वास्तविकता में सिर्फ सरकारी कर्मचारी और राजनेता ही अमीर हुए हैं।गरीबी कम नहीं हुई है।खैर उसे अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करनी है कि जरूरतमंद को मदद मिले और उसका जीवनस्तर ऊपर उठ सके।

अगले तीन चार दिनों में उसने उन गांवों की पूरी जानकारी इकठ्ठा कर ली।वहां किस चीज की खेती होती है, वहाँ और क्या-क्या व्यवसाय होता है, आदिवासी समाज का रहन-सहन कैसा है।इसके पहले वह किसी आदिवासी गांव में नहीं गया था इसलिए वह थोड़ा उत्साहित भी था वहां जाने के लिए।नौकरी में आने के पहले तक तो उसे यही लगता था कि आदिवासी समाज आज भी अलग-थलग रहता है और उनके यहां विकास लगभग न के बराबर है।लेकिन नौकरी में आने के बाद उसकी धारणा बदल गई थी और अब वह इसे साक्षात देखने भी जा रहा था।

उसने पहला गांव ‘सोजेपुर’ चुना, जो सबसे नजदीक तो था ही, वहां ऋण के सबसे ज्यादा खाते भी थे।कई खाते घर बनाने के ऋण के भी थे और सबमें पैसा न के बराबर ही आ रहा था।बस सरकार द्वारा दिए जा रहे ब्याज के अनुदान से ही थोड़ी बहुत वसूली हो रही थी।कैशियर प्रवीण से उसने इस गांव में रविवार के दिन चलने के लिए कहा तो वह सहर्ष तैयार हो गया।

‘ठीक ही रहेगा साहब, रविवार को दोपहर में चलते हैं, मैं आपके घर आ जाऊंगा’, प्रवीण ने कहा तो उसे राहत मिली।दरअसल छुट्टी के दिन काम करना बहुत से लोगों को पसंद नहीं होता है और उसे उम्मीद नहीं थी कि प्रवीण भी तैयार होगा।उसके लिए तो यह अच्छा ही था कि रविवार का दिन भी मजे में बीत जाएगा।अकेले दिन काटना भी मुश्किल होता है।अकसर रविवार को वह या तो शाखा में ही चला जाता था।पेंडिंग काम निपट जाते थे, या कभी-कभी रतलाम निकल जाता था।वहां की शाखा के कुछ दोस्तों से इसी बहाने मुलाकात हो जाती थी।

रविवार को दोपहर में खाना खाकर वह प्रवीण के साथ सोजेपुर के लिए निकला।प्रवीण ने बता दिया था कि पहाड़ के उस तरफ लगभग छह किमी पैदल चलना पड़ेगा, तब वहां पहुँच पाएंगे।आखिरकार पहाड़ी के इस तरफ मोटरसाइकिल खड़ा करके जब दोनों पहाड़ी की तरफ बढ़े तो उसने पूछ लिया, ‘यहां से मोटरसाइकिल चोरी तो नहीं हो जाएगी, प्रवीण?’

‘नहीं साहब, हम लोग यहां अकसर खड़ा करके जाते हैं, कोई नहीं ले जाता।वैसे भी हैंडल लॉक लगा दिया है मैंने।’

अगले पंद्रह मिनट में दोनों पहाड़ी पार कर चुके थे और कुछ किमी दूर गाँव सोजेपुर नजर आ रहा था।दूर से तो पेड़ों के बीच में सिर्फ छप्पर के ही मकान दिखाई दे रहे थे।खेतों की पगडंडी से होते हुए वे जब गांव पहुंचे तो बाहर एक गुमटी मिली जिसमें गुटका, बीड़ी, कुछ नमकीन के पैकेट और बिस्किट इत्यादि नजर आ रहे थे।अब इतना तो उसे समझ में आ गया था कि विकास की हवा यहां थोड़ा बहुत तो पहुंच ही गई है।

सामने से एक व्यक्ति आता दिखाई दिया जिसने उनको नमस्कार किया।छोटे गांवों में यह खासियत होती है कि गांववाले सरकारी कर्मचारियों को पहचानते हैं।प्रवीण ने नमस्कार का जवाब दिया और दोनों आगे बढ़ गए।कहीं-कहीं उसे ईंट की दीवार वाले अधबने मकान दिखाई दे रहे थे और उसने अंदाजा लगा लिया कि इन्हीं लोगों ने घर बनाने के लिए ऋण लिए होंगे।इक्का दुक्का लोग मिलते गए, कुछ घरों के आगे गाय भी बंधी हुई नजर आई।वैसे अधिकांश घरों के सामने बकरियां जरूर नजर आ रही थीं और कहीं-कहीं साइकिल भी खड़ी थी।गांव के लगभग आखिर में वह घर था जहां उनको जाना था।जोखू का घर।जोखू ने भी घर बनवाने के लिए ऋण लिया था और उसकी किस्त समय से जमा नहीं कर रहा था।

जोखू के घर के सामने पहुंचते ही उसे छप्पर का घर दिखा और साथ ही दो ईंट की दीवारें भी।घर के सामने चार बकरियां बैठी थीं जो उनको देखते ही खड़ी हो गईं।दो छोटी-छोटी बच्चियां भी अधनंगे वहां खेल रही थीं और कुछ लकड़ियां भी एक किनारे रखी हुई थीं।प्रवीण ने आवाज लगाई, ‘जोखू भाई, कहां हो? बाहर आओ, साहब मिलने आए हैं।’

दो तीन आवाज लगाने के बाद झोपड़ी से एक महिला बाहर निकली।प्रवीण समझ गया कि वह जोखू की जोरू है।अब उसने भी उस औरत को ध्यान से देखा।बेहद कम उम्र थी उसकी और दो-तीन महीने का एक बच्चा भी गोद में था।एक साड़ी, जो बदरंग हो चुकी थी, उसके शरीर को ढकने की कोशिश कर रही थी।इतनी कम उम्र में तीन बच्चे, उसे सदमा-सा लगा।

‘अरे जोखू भाई कहां है, उसे भेजो’, प्रवीण ने फिर से कहा।

थोड़ी देर बाद उस महिला ने दर्द भरे स्वर में कहा, ‘आज तीसरा दिन है, अभी तक लौटा नहीं है।कुछ काम पर जाने के लिए बोल कर गया था।’

ओह, अब क्या किया जाए, उसे समझ में नहीं आया।खैर, उसने अपनी तरफ से समझाते हुए कहा, ‘अरे जोखू बैंक में पैसा नहीं भर रहा है, उसको पैसा भरने के लिए बोलना।’

आज पहली बार उसे लग रहा था कि उसे पैसे भरने के लिए नहीं कहना चाहिए था।लेकिन नौकरी भी तो करनी है।अगर जोखू आएगा तो उससे बात करके मदद करने का कोई न कोई रास्ता वह निकाल ही लेगा।

‘घर में खाने के लिए भी कुछ नहीं बचा है साहब’, जोखू की पत्नी की आवाज ने जैसे उसे हिलाकर रख दिया।उसने प्रवीण की तरफ देखा, प्रवीण भी खामोश था।आंखों ही आंखों में उसने प्रवीण को वापस चलने के लिए इशारा किया और धीरे से उसने पैंट की जेब में हाथ डालकर तीन-चार सौ रुपये निकाले।पहले तो उसने सोचा कि जोखू की पत्नी को वह सीधे ही रुपया पकड़ा दे लेकिन फिर उसका मन गंवारा नहीं किया।उसने धीरे से वह पैसे वहां गिरा दिए और आगे चल दिया।अब किसी और गांव वाले के घर उसकी जाने की इच्छा नहीं हुई।

‘प्रवीण, यहां सबकी हालत तो ऐसी ही लगती है।ऐसा करते हैं कि अगली बार इनको इकठ्ठा करके बात करते हैं और इनकी आमदनी बढ़ाने के लिए कुछ बेहतर काम करते हैं’, उसने वापस चलते हुए कहा।उसे अब यह महसूस हो रहा था कि उसका असली काम अब शुरू होने वाला है।जब तक ये गांव सही अर्थों में आगे नहीं बढ़ते, उसके लिए देश के विकास का कोई अर्थ नहीं होगा।

संपर्क :उप आंचलिक प्रबंधक, बैंक ऑफ़ इंडिया, उज्जैन आंचलिक कार्यालय, उज्जैन-456010 (मध्य प्रदेश) मो.9140521518