साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित संस्कृत कवि।गीत, गजल और कविताओं के कई संग्रह प्रकाशित।काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर।

दिन अनुदिन तपती यह धरती
नदी सरोवर जलस्रोतों में भरा मलिन जल
धूम-धूल से धुमैली सभी दिशाएं
विगत कांति
दुबले रोगी-सा चांद, रात में
निस्तेज लिए अस्त होने की लालिमा
भ्रांत—भंगिमा दिनकर, दिन में
चुभते हैं ये कांटे मेरे मन को
आज के अत्यंत कठिन काल में

शीतल मंद-सुगंध-भरा जो पवन ‘सदागति’
आज प्रदूषण का मारा, ठहरा, थर्राया
(फँसी सांस में फाँस, नियंत्रण काम न आया)
ढेर कचरे का जलाता,
(ध्वंस मचाता)
जिसको ‘पावक’ नाम मिला था
मानो हो चुका वह तो ठंडा, गंदा
अग्नि यज्ञभुक्
उलट-पुलट दी हों मानो बलपूर्वक किसी प्रेत ने
ऐसी ऋतुएं
एकदम बदली हुई, अस्त-व्यस्त, त्रस्त
इनके आने का अब उल्लास ही चुक गया
निष्फल
(सूखा-बाढ़, बर्फ-ओला झेलती)
गरीब किसान की सहमी हुई खेती
बिना समय के डरावने बादल
ये तड़पाते हैं – कहीं कहीं प्रलय मचाते हुए
मेरे मन को चुभते हैं ये कांटे
कैसा कठिन काल यह
‘नेता’ कहलाने वालों द्वारा व्यामोह में फाँस
छलना-ठगना जनता को
कभी न डिगना अनय-पथ से
करना हर बार चोट, वोट के लिए
बैठ झूठ की नांव
करना पार चुनाव का सागर
और मार महंगाई की
प्रबल लालसा भोगों की
लोगों की दुस्तर
मेरे मन चुभते ये काँटे
कैसा यह काल कठिन?
खरीद में, बेचान में
अपपदार्थों की मिलावट खुल्मखुल्ला
राक्षसी नग्नता कलाओं में
फैलाती जनता में विकृति
बहाना मनोरंजन का
सम्मान असम्मान्यों का
होना छिन्न और भिन्न जीवन की सरलता-लता का
चुभते कांटे ये मन मेरे
काल यह कैसा कठिन!

दंभी, रचे-पचे अधर्म में उनके कथा-कीर्तन
रखना ईश्वर को पीछे और पूजवाना अपने को
(चेला-चेली ठेलम ठेला मौज मनाना)
और महान ठगों का, सफेदपोशों का
ले व्रत समाजसेवा का चंदा बटोरना
‘अल्पश्रुत’-
नहीं लगा पाते एक पंक्ति भी जो शास्त्र की
ज्ञानी-विज्ञानी बन, विद्या-अभिमानी
देते चुनौती शास्त्रार्थ के लिए विद्वानों को
दंभी
(सबसे कहते- कम हैं नहीं किसी से हम भी)
चुभते ये सब कांटे मन को मेरे
अहो, कैसा विषम-युग है यह?

अनुवाद – स्वयं कवि द्वारा

संपर्क :‘आत्मदीप’, ३८७, काशीपूरम कॉलोनी, सीरगोवर्धनपुर, पो. डाफी – २२१०११