भाषा की सादगी में जीवन की विराटता

विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में थे, जिन्होंने शब्दों के शोर से नहीं, बल्कि मौन की गरिमा से पाठक के मन को छुआ। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जाना केवल एक लेखक का नहीं, बल्कि उस संवेदनशील दृष्टि का सम्मान था, जो जीवन की साधारण घटनाओं में भी असाधारण अर्थ खोज लेती है।

उनकी रचनाओं में भाषा किसी प्रदर्शन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की सहज अभिव्यक्ति बन जाती है। कविता हो या उपन्यास, उनका लेखन मनुष्य की भीतरी दुनिया, उसकी संकोचशीलता, करुणा और अनकहे दुखों को बेहद विनम्रता से सामने लाता है।

मुझे उनसे ’समालोचन’ के लिए साक्षात्कार करने का अवसर मिला। बातचीत के दौरान उनके शब्दों से अधिक उनकी चुप्पी बोलती थी। उनमें कोई लेखक-गौरव नहीं, केवल एक सजग, संवेदनशील मनुष्य की विनम्र उपस्थिति थी। मुझे लगा जैसे वे लिखते नहीं, बल्कि जीवन को बहुत ध्यान से देखते और सुनते हैं।

विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य हमें सिखाता है कि बड़ा होना ऊँची आवाज़ में नहीं, बल्कि गहरे अनुभव में होता है। वे शब्दों के नहीं, संवेदनाओं के लेखक थे। इसी कारण विनोद कुमार शुक्ल सदैव हम सबके बीच जीवित रहेंगे।

जीतेश्वरी

बरसों पहले विनोद कुमार शुक्ल ने एक कविता लिखी थी-

संसार में रहते हुए/मैं कभी घर लौट न सकूं/बस संसार में रहूं/जब संसार में न रहूं/ तब घर लौटूं/ और घर मुझसे ख़ाली रहे।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अब उनका घर सचमुच ख़ाली है। यह खालीपन मात्र अनुपस्थिति नहीं, बल्कि एक उपस्थिति के चले जाने का बोध है।

बरसों-बरस तक साधारण जीवन की सबसे असाधारण व्याख्याओं के साक्षी रहे इस घर में सन्नाटा पसरा हुआ है। अब इस घर में वह कभी लौट नहीं पाएंगे। रायपुर में उनके निधन के साथ ही हिंदी का एक अध्याय समाप्त हो गया।

आलोक पुतुल