कभी अपने विचारों से समझौता नहीं करते थे

धारा के विरुद्ध तैरकर भी आप अपने विचार व्यक्त करने में कभी हिचकिचाते नहीं थे। आप ऐसा स्वत:स्फूर्त करते थे। यह आपकी प्रवृति थी। बड़ा से बड़ा लेखक हो आप कभी अपने विचारों से समझौता नहीं करते थे।

मधु कांकरिया

आजकल मन डरा-डरा सा रहता है। जब भी बहुत खुश होती हूँ तो कोई ऐसी खबर आती है और सबकुछ नष्ट कर देती है।

हमारे समय के बड़े आलोचक वीरेंद्र यादव जी के न रहने की खबर ( मृत्यु नहीं लिखा जा रहा मुझसे) मिली और सन्नाटे से भर गई! ओह यकीन नहीं हो रहा।

मुझे उनका बहुत स्नेह मिला है। मुझ जैसी अज्ञातकुल लेखिका की कहानी पढ़कर कौन लंबी चिट्ठी लिखता है!

वह चिट्ठी मेरी अनमोल धरोहर है।

उनसे बहसें होती रही हैं। मंच पर भी हमने जवाब-तलब किए हैं। कभी उनका स्नेह कम न हुआ। एकाध मसले पर हमारी भिन्न राय थी, उन्होंने संयमित प्रतिक्रिया दी।

बहुत-सी बातें और मुलाकातें याद आ रही हैं। कुछ लिखा नहीं जा रहा। उन्हें नमन!

गीताश्री

 

वीरेंद्र यादव का जाना बहुत-बहुत अखर रहा है। यह आशंका भी कि पता नहीं कब किसकी कुंडी कोई अदृश्य खटखटा दे!

वे हमारी पीढ़ी के सबसे मूल्यवान उपन्यास समीक्षक थे। संभवतः सबसे बड़े। उनसे असहमत होना, बहस करना और जमकर बात करना हमेशा अच्छा लगता था, क्योंकि वे अंदर से लोकतांत्रिक थे।

आहत और दुखी मन से विदा मित्र!

कर्मेंदु शिशिर

अभी-अभी स्मृतिशेष वीरेंद्र यादव को विद्युत शवदाह गृह से अंतिम प्रणाम करके लौटा हूँ। शहर के साहित्यकारों, रंगकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर अंतिम विदाई दी है। मगर मन में एक प्रश्न उठता है कि किसी शहर की सरकारी साहित्यिक संस्थाएँ, जैसे हिंदी भवन या सांस्कृतिक विभागों में ऐसी संस्कृति का अभाव क्यों रहा है कि शहर के ही साहित्यकारों या कलाकारों की अंतिम विदाई में उनकी ओर से कोई संवेदना या कोई भूमिका नहीं दिखती! दुनियाभर में भी ऐसा ही होता है क्या? क्या यह सही नहीं है कि दुनिया भर में अपने साहित्यकारों/कलाकारों की स्मृतियां संजोकर रखी जाती हैं?

मैंने रूस से लेकर यूरोप के तमाम देशों में जाकर वहां के साहित्यकारों के घरों और कब्रों को देखा है। इस देश में हत्यारों, चोरों, सफेदपोश बलात्कारियों के दल विशेष के होने के कारण अंतिम विदाई में तामझाम दिखाई देता है। कभी-कभी बड़ा कुकर्मी भी गार्ड ऑफ़ ऑनर पा जाता है। मगर जनता के साथ जुड़े लेखकों की अंतिम विदाई में शहर की सरकारी साहित्यिक/ सांस्कृतिक संस्थाएं कोई भूमिका नहीं निभातीं! फिर ऐसी संस्थाओं के चौखट पर लेखकों का जाना कहां तक उचित है, यह प्रश्न मन में उठता है।

हम यहां के सामंती मनोवृति वाले समाज में द्वेष, नफरत और हिंसा के सिवा कुछ नहीं पाते। जातिवादी ऊंच-नीच की मानसिकता भी सम्मान और श्रद्धांजलि का निर्धारण करती है। हम दुनिया के सबसे असभ्य मानसिकता वाले समाज में रहते हैं और अगर आप वंचित तबके के हैं तो फिर आप जन्मजात भेदभाव के शिकार होते हैं।

सुभाषचंद्र कुशवाहा