
वरिष्ठ लेखक।मैथिली और हिंदी में कई कहानी संग्रह और व्यंग्य संग्रह प्रकाशित।अद्यतन हिंदी कहानी संग्रह ‘भूख’।साहित्य के साथ संगीत में भी अभिरुचि।

हमारे यहां तीन पहिया सवारी को ऑटो रिक्शा कम टेम्पो या टेम्पू कहकर ही ज्यादा पुकारते हैं।यह अलग बात है कि बड़े शहरों की आबोहवा खाकर लौटने वाला इसे कभी-कभी ऑटो रिक्शा भी बुला लेता है, मगर कुछ दिन गांव-कस्बे में रहने के बाद उसकी जबान पर टेम्पू नाम ऑटोमेटिक आ जाता है।क्योंकि टेम्पू कहने से जो जोश और बड़प्पन का एहसास होता है, वह ऑटो रिक्शा या तीन पहिया कहने में नहीं।
दरअसल, यहां के बाशिंदों की पुरानी फितरत है कि वे एक किराए पर अपना सारा बोरिया-बिस्तर गाड़ी में लाद लेते, चाहे वह ट्रेन हो या बस या साइकिल ही क्यों न हो।इतनी पुरानी आदत जाते-जाते ही जाएगी।वैसे हवाई जहाज के नजदीक शहर में आ जाने से असबाबों की संख्या अब नियंत्रित होने की उम्मीद की ही जा सकती है।इनसान के साथ उसका सामान भी ढोने के लिए सबसे बेहतर आज टेम्पू ही है न कि ऑटो रिक्शा, जिसमें बगैर झोला-झपटा के हाट-बाजार करना पड़ता है।लेकिन यह मुमकिन तो नहीं कि हाथ डोलाते बाजार गए और जेब में हाथ डाले लौट गए…!
इसलिए हाट के दिन मंटु को खाना क्या ढंग से नाश्ता भी नसीब नहीं हो पाता।वो तो मम्मी है कि बड़े जतन से उसे सत्तू का शरबत जबरदस्ती पिलाकर भेजती है।वरना वह तो दिन भर भूखा ही गुजार ले।मम्मी समझाती, बेटा घर से खाली पेट नहीं निकलना चाहिए, नहीं तो पूरा दिन बगैर अन्न-पानी के रहना पड़ता है, नतीजा यह होता है कि आदमी का हाजमा बिगड़ जाता और फिर काम में जी नहीं लगता…।’
‘अरे बहुत हुआ मम्मी! लाओ जल्दी से कुछ दे दो, मैं ढकोस लेता हूँ।कितनी बार कहूं कि मुझे इतना सवेरे बिलकुल भूख नहीं रहती…।देखो न अभी ठीक से छह भी नहीं बजे हैं।वो तो हाट के दिन चौक पर नंबर लगाने की वजह से जल्दी मची रहती है वरना और दिन तो आराम से खाकर ही न जाता हूँ।’ मंटु ने जल्दी-जल्दी शरबत पिया और टेम्पू लेकर चला चौक पर अपने नंबर पर खड़ी करने के वास्ते।
तकरीबन बीसेक टेम्पू लाइन में पहले से खड़ी थीं।टेम्पू लगाने के तुरंत बाद उसने अरमान से गुटका की एक पुड़िया ली, पहले उसे एक सिरे से फाड़ा और फिर सारा तम्बाकू ऊपर की ओर किए हुए अपने मुंह में डाल लिया।फिर गंदी पड़ी टेम्पू की साफ-सफाई करने में जुट गया, क्या पता, चमक पर रीझकर कोई रिजर्व ही कर ले, उसने सोचा।
हाट सवारों की आमद शुरू होने के साथ ही टेम्पू धड़ाधड़ भरती भी जा रही थीं।स्टैंड का दलाल जिसे इज्जत से अंग्रेजी में स्टैंड इंचार्ज भी कहते हैं, मुसलसल चिल्लाए जा रहा था, फलां गाड़ी में बैठिए, निकलने वाली है।एक पैसेंजर बाकी है।उसकी आवाज आती, अरे भइया मुंह क्या ताक रहे हैं, सीट पकड़िए न।सब आगे ही बैठिएगा तो गाड़ी कैसे खुलेगी।बीच-बीच में अलग-अलग जगह के बाजार, चौक और कस्बा का नाम लेकर वह पुकारता, फलां जगह के लिए इसमें बैठिए और फलां बाजार जाना है तो उसमें सीट लीजिए।
तब तक चौराहे पर पीक की निकलती अनवरत धार से इधर-उधर की जगह रंगीन टेढी-मेढ़ी लकीरों से पटी जा रही थी।ये क्या! उधर दो टेम्पू चालक ताब खाए आपस में बक-झक पर आमादा थे, किसी ने बगैर नंबर का पैसेंजर उठा लिया था।हालांकि ऐसी किच-किच यहां रोज देखने को मिलती है।और इस तरह के मामलात दलाल की दखलंदाजी से उसी वक्त ठंडे भी हो जाते हैं।कुछ देर गाली-गलौज के बाद सभी फिर से दोस्ताना हो जाते और सवारी के इंतजार में मोबाइल से अपना दिल बहलाते होते।
मंटु की बारी आते-आते उसकी सफाई भी खतम हो चुकी थी।बगल की दुकान से उसने अखबार लेकर पलटना शुरू किया।टेम्पू से जुड़ी खबरों में उसे ज्यादा दिलचस्पी थी कि तभी उसकी नजर एक खबर पर पड़ी, टेम्पू वाले ने महिला पैसेंजर के साथ की बदसलूकी, सवार ने किराए को लेकर टेम्पू ड्राइवर को पीटा और पैसे भी छीन लिए, एन एच पर सवारी से लदी एक टेम्पू राहगीर को बचाने के चक्कर में पलटी, तीन घायल हुए और दो को गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया, जबकि ड्राइवर को मामूली चोट आई।पिछली रात की राहजनी में टेम्पू वाले से दो हजार रुपए और मोबाइल छीने जाने का मामला प्रकाश में आया है तो वहीं रात के सन्नाटे में एक टेम्पू वाले ने सवार को लूटने के बाद उसे सुनसान में छोड़ा!
इन खबरों से मंटु को घीन हुई और उससे आगे का पन्ना पलटा न जा सका कि किसी ने टेम्पू भर जाने की आवाज लगाई पर ऐन मौके पर बस आकर रुकी और कंडक्टर हाट-हाट, बाजार चिल्लाते हुए दरवाजा पीटने लगा ताकि सवार सुनें।
चुनांचे, मंटु की टेम्पू से सारे पैसेंजर बस की ओर भागे, क्योंकि बस का किराया मामूली था।
उसने भद्दी सी गाली दी और कुढ़ते हुए मन-ही- मन कहा, साले को अभी आना था, दो मिनट पहले या बाद नहीं आ सकता था!
उसे अपनी मम्मी की कही बातें बेसाख्ता याद हो आईं, भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता।
कुछ पल बाद वह अपनी बेचैनी को भुला पाया और फिर से सवार की प्रतीक्षा करने लगा।एक और गुटका फाड़कर मुंह के हवाले किया कि उसी क्षण गांव से कोई आया और रिजर्व में एयरपोर्ट चलने की बात कही।किराया वगैरह तय करने के बाद उसने हाट का एक-दो ट्रिप लगाकर समय से पहुंच जाने का भरोसा दिया।
‘मम्मी! देखो मैं आ गया।एयरपोर्ट के लिए सवारी उठाने जा रहा था तो सोचा तुमसे मिलता जाऊं!’
‘बहुत अच्छा किया बेटा।’ मां ने तुलसी चौरा में जल डालते हुए जवाब दिया।
बेचारी विधवा को इस एकमात्र संतान के अलावा और है ही कौन।पति तो बहुत पहले ही साथ छोड़ गए पर जाने से पहले अपनी एक निशानी दे गए ताकि पत्नी इसके साथ बाकी जिंदगी खुशी-खुशी काट लेगी।
जिंदगी भले कट जाए पर पति के बगैर जिंदगी काटना कितना मुश्किल होता है, इसे एक बेवा ही महसूस कर सकती है।
अपने शौहर का अक्स अपने बच्चे में देखते हुए सविता ने बीस साल कैसे गुजार लिए, उसे कुछ भी याद नहीं।उसे बस इतना याद है कि वे एक बच्चा उसके लिए छोड़ गए थे जो उसकी विरासत को आगे बढ़ाएगा।
मंटु ने बीए करने के बाद बहुत हाथ-पांव चलाए मगर कहीं भी ढंग का काम नहीं मिला।फिर उसने ड्राइवरी सीखी, क्योंकि तब तक गांव की सड़कों पर इफरात में टेम्पू चलने लगी थीं।जोड़-तोड़कर उसने भी एक टेम्पू खरीदी और सड़क पर निकल पड़ा।कुछ दिन टेम्पू वालों की सोहबत में गुजारने के बाद इस धंधे का गुड़ उसने जाना और पैसे भी आने शुरू हो गए।ज्यादातर वह रिजर्व में ही जाता था जिसमें सिर-मगजन की जरूरत कम होती और कमाई भी ठीक-ठाक हो जाया करती थी।उसी से तो उसने दो कोठरी का पक्का घर भी बनवा लिया था।
उधर मां की खुशी उसकी खुशी में ही बसती थी और सबसे अहम बात यह भी थी कि बेटा उसकी आंखों के सामने और आंचल के साए में था।बस अब उसकी एक ही ख्वाहिश थी कि वह उसके लिए एक बहू ला दे!
एयरपोर्ट के लिए निकलने से पहले मम्मी ने खाना भी लगा दिया।उसने खा तो लिया फिर सोचा अब मम्मी क्या खाएगी, उसने तो सिर्फ अपने लिए बनाया होगा।उसका पछताना लाजिमी था पर अब क्या हो, उसने गौर फरमाया।झट चौक पर गया और वहां से लिट्टी और समोसा ले आया।लेकिन मां का कलेजा, थोड़ा खाया और बाकी मंटु के वास्ते रख छोड़ा, शाम को लौटेगा तो खाएगा।
जिनको उसने एयरपोर्ट पर छोड़ा, वे बहुत ही उदार और कोमल हृदय के थे, तयशुदा भाड़े से ज्यादा तो उन्होंने दिया ही, एक नई टी शर्ट भी उपहारस्वरूप दी।सज्जन उसके पिता से कभी उपकृत हुए थे, शायद इसलिए वे मंटु से इस तरह पेश आए।
मंटु खुशी-खुशी घर लौट रहा था कि रास्ते में उलटी दिशा से तेज रफ्तार में आ रही एक बड़ी गाड़ी से अचानक उसकी टेम्पू रगड़ा खा गई।बाल-बाल बचा, लेकिन टेम्पू को काफी नुकसान हुआ।घबराया हुआ मंटु कुछ देर के लिए चुप-चाप वहीं बैठा खुद को इस अनहोनी से छुटकारा दिलाने की कोशिश करता रहा।तब तक कुछ लोग जमा हो गए और अपने-अपने ढंग से उसे धीरज बंधाने लगे।वह मुस्कराकर रह गया और आगे की सोचने लगा कि कैसे कोई उधर की गाड़ी मिले जो उसके टेम्पू को टोचन करके गैराज तक छोड़ दे।
कइयों से उसने खुशामद भी की पर कोई राजी नहीं हुआ।अगर उसकी तरफ का कोई मिल जाए तो ही बात बने, उसने सोचा।अब इंतजार के सिवा कोई और चारा नहीं था या फिर नजदीक के गैराज वाले को बुलाकर ले आए, चाहे वह अनजान ही क्यों न हो।क्या करे क्या न करे की स्थिति बनी हुई थी।
तभी एक टेम्पू पर उसकी नजर पड़ी, थोड़ी आशा जागी।लेकिन मन में कहीं–न–कहीं निराशा भी थी कि अगर वह इनकार कर दे तो, क्योंकि वह टेम्पू चालक एक लड़की थी और सबके मुंह नहीं लगती वह।बहुत खुद्दार है और अपने काम से काम रखती है बाकी चीजों को हवा में उड़ा देती है, इसलिए मर्दों की टोली में एक अकेली लड़की टेम्पू उड़ाती है।बाप ने बीमारी की वजह से बिस्तर पकड़ा तो बेटी ने उन्हीं की टेम्पू को थामा ताकि परिवार का बोझ उठाया जा सके।
एक लड़की के द्वारा टेम्पू चलाने की खबर इस इलाके को हैरत में डाल दिया था पर लड़की को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं और क्या बकते हैं।न ही किसी के गंदे तंज और अवांछित टिप्पणी की उसने कभी परवाह की न ही मनचलों की फबतियों की।
मंटु ने नजदीक आने पर मालती से मदद मांगी।हालांकि, मालती के संग उसका कोई खास ताल्लुक नहीं था, फिर भी एक धंधे में रहने की वजह से वे एक-दूसरे को सिर्फ जानते थे।इशारे के बाद भी मायूसी उसके चेहरे पर चस्पां थी और वह बहुत आशावान भी नहीं था, पर मालती रुकी और फौरन से पेश्तर उसने पूछा, ‘कोई प्रोब्लेम?’
फिर टेम्पू की दुर्गति देखते ही वह बेसाख्ता बोल पड़ी, ‘अरे! कैसे हुआ ये सब, ये तो बहुत जबरदस्त क्रैश हुई है, तुम ठीक तो हो?’
‘हां-हां! मैं ठीक हूँ।बस इसे किसी तरह गैराज तक ले जाना है…कोई मदद को रुका ही नहीं!’
‘रुके क्यों, सबको तो अपनी पड़ी है।रस्सी या तार होगा, जिससे टोचन किया जा सके।’
हां कहकर मंटु ने तुरंत अपनी टेम्पू को मालती की टेम्पू के पीछे रस्सी से बांधकर उसे गैराज तक लाया, फिर उसी के संग वापस घर लौटा।
मालती के नेक और खुले व्यवहार से मंटु इतना प्रभावित हुआ कि उसके साथ दो घड़ी बतियाने और बिताने की उसकी चाहत ने उसे बेचैन कर दिया पर लोक-लाज के भय से उसने खुद को समेट लिया।लेकिन चाहत तो चाहत ही है, कब बनती है और कब बिगड़ती है, चाहने वाले को भी नहीं पता।
घर आकर उसने मम्मी की जानकारी में सारी बातें दीं और उधर मालती ने भी अपनी मम्मी को आज की घटना से वाकिफ कराया।वैसे मालती ने भी टेम्पू वाले के बारे में अपनी राय बदल डाली कि हर टेम्पू वाला एक जैसा नहीं होता।मंटु भी तो यही सोच रहा था कि जो ऊपर सख्त दिखे, कोई जरूरी नहीं कि भीतर से वह मुलायम न हो।
मंटु आजकल चौक पर नहीं दिखता, क्योंकि दिन भर गैराज में बैठकर अपनी नजर के सामने गाड़ी बनवाता रहता।पैसे को लेकर भी उसे फिक्र थी कि कहां से इतने रुपए आएंगे! कुल पच्चीस हजार का खर्चा आ रहा था जिसमें दस खुद का था और पांच गांव ही के एक मित्र से कर्जा लिया।बाकी दस की परेशानी थी उसे! गाड़ी छुड़ाने में केवल एक-दो रोज का वक्त रह गया था, और रुपये का जुगाड़ कहीं नहीं होने से उसका फिक्रमंद होना लाजिमी था।

गांव हो या शहर हर जगह यही सही है कि पैसे वाले को ही पैसा मिलता है।गाड़ी छोड़ पैसे के जोगाड़ में जहां-जहां वह गया, खाली हाथ लौटा।मम्मी ने हिम्म्त देते हुए कहा भी कि सूद पर कहीं से उठा ले और बाद में कमाकर दे दे।अब कोई विकल्प भी नहीं था, वरना गाड़ी बैठ जाएगी।एक मित्र जो बाहर से आज ही गांव आया था, ने तुरंत पांच हजार रुपए दिए जिसे लेकर उसने गैरज में जमा कर दिया।शेष पांच के लिए दिमागी कसरत उसका चल ही रहा था कि मालती की नजर मंटु पर पड़ी और वह रुक गई।बातचीत से उसे रुपये की किल्लत बाबत मालूम पड़ गया और शाम में वह पांच हजार लेकर उसके पास आई।बगैर किसी शर्त-इकरार के।
मंटु उसे अपलक देखता रह गया, कैसे उसका शुक्रिया अदा करे, अल्फाज नहीं थे उसकी जबान पर।लेकिन जहां शब्द की कमी हो, वहां आंखें सब इजहार कर देती हैं, फिर कुछ बताने की जरूरत नहीं रह जाती।
कुछ दिनों के बाद मम्मी ने एक दिन कहा, ‘बेटा अब उमर हो गई है तुम्हारी, शादी करके घर बसा ले और मुझे बहू ला दे।कोई भी चीज समय से ही ठीक होती है।’
‘मम्मी! तुम भी हद करती हो, मुझे कौन अपनी लड़की देगा, एक टेम्पू वाले को।उसकी औकात ही क्या होती है!’ मंटु ने पलटकर जवाब दिया।
‘ऐसा नहीं है बेटा, सबकी जोड़ी ऊपर वाले बनाते हैं और समय पर दोनों को सामने ला देते हैं।मैं कहती हूँ न, लड़की तो है ही कहीं, सिर्फ उसे ढूंढ़ना है।और लड़की वाले भी तुम्हें ढूंढ़ लेंगे।’
‘अच्छा मम्मी गाड़ी लेकर जा रहा हूँ, अभी बहुत मेहनत करनी है और कर्जा भी खतम करना है।शादी हो या कोई और काम, पैसा तो चाहिए ही।’
उधर, मालती के बीमार बाप की चिंता है कि उनके रहते बेटी के हाथ पीले हो जाएं जिससे वे चैन से मर सकें।मां का भी तो यही मनोरथ है।लड़की जात है कब तक बगैर मर्द के रहेगी।पर उसे यह भी चिंता सताती है कि खर्चे कहां से पूरे होंगे।बगैर दहेज के कौन अपने लड़को को ब्याहने भेजेगा!मालती जो अभी–अभी घर लौटी ही थी, यह सब जानकर भड़क गई
मां पर बरसती हुई बोली, ‘क्या मां, हर वक्त शादी-शादी की रट लगाए रहती हो, इसके अलावा जैसे घर में कोई दूसरा काम ही नहीं रह गया है।सबको शादी करनी जरूरी है क्या!
‘बेटा हम मां हैं न, संतान की चिंता तो लगी ही रहती है।’
चिंता से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है, जो होगा देखा जाएगा।कहते हुए मालती तमककर अपने कमरे में चली गई।
इनसान कितना भी कड़क क्यों न हो ले, लेकिन उसके पास दिल नाम की एक चीज भी होती है जो उसे जज्बाती बनाती है और वह कई मामलों में दिमाग से ज्यादा अपने दिल की ही सुनता है।काफी देर बाद जब घर वाले अमूमन सो गए, मालती ने मंटु की खैरियत जानने के लिए फोन मिलाया।
नंबर देखते ही मंटु का कलेजा धक से कर उठा।उसने खुद को बमुश्किल संभाला और फिर बातचीत के लिए हकलाया, ‘हेलोऽऽऽ!’ आवाज में कंपन थी।
मालती भी कहां सहज थी, धीमी आवाज में उसने पूछा, ‘कैसे हो, गाड़ी ठीक-ठाक चल रही है न? ये मत सोचना कि मैंने पैसे के लिए फोन किया है।इधर कुछ दिनों से दिखे नहीं, इसलिए…।’
‘बहुत अच्छा किया… गाड़ी ठीक चल रही है… और तुम कैसी हो ये तो बताओ और पापा-मम्मी, सब ठीक हैं न!’
‘हां! ठीक हैं।देखो न, ऑटो में कुछ प्रॉब्लम है, सोचती हूँ उसी मेकैनिक से दिखाऊं, जिससे तुमने काम करवाया था।और पापा की मंथली दवा के लिए मम्मी कब से कह रही है, सोचती हूँ ऑटो गैराज में लगाकर उधर से दवा भी लेती आऊं।हार्ट के मरीज हैं न, एक दिन भी मेडिसिन बंद नहीं की जा सकती!’
‘चलो, कल ही चलते हैं।’ मंटु ने हुलसते हुए कहा।
इधर कुछ दिनों से चौक पर अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ था।एन एच की जमीन पर पुलिस दुकान उजाड़ने के साथ टेम्पू वालों को भी वहां लगाने से रोक रही थी।दोनों तरफ से खदेड़ा-खदेड़ी की स्थिति पैदा हो गई और जब पुलिस ने बल प्रयोग किया तो अतिक्रमण करने वालों की एक न चली।नतीजतन चौक का धंधा चौपट हुआ और टेम्पू वालों की कमाई जाती रही।लोगों को भी काफी दिक्कतों से दो-चार होना पड़ा।कुछ दिन बाद इधर-उधर टेम्पू लगने लगी और फिर दुकानें भी खुलीं।
मगर इस उथल-पुथल का मालती और मंटु के रोजाना के काम पर कोई ज्यादा असर नहीं पड़ा, क्योंकि वे अक्सर रिजर्व में ही जाते थे, जो घर से भी मुमकिन था।फिर भी कमाई तो कम ही गई थी।दूसरी ओर कर्ज खतम न हो पाने की वजह से मंटु अंदर-ही-अंदर बेचैनी महसूस कर रहा था।तगादा करने से पहले कर्ज अदा करने का अलग ही मजा है, उसे खयाल आया।
टेम्पू गैराज में लगाने के बाद मालती ने दवाएं खरीदीं और पैसा देने को हुई तो मंटु ने झट से अपना पर्स निकालते हुए पैसे बढ़ाए तो मालती ने उसी रफ्तार से मंटु का हाथ पकड़कर मना कर दिया और कहा कि वह अभी रहने दे।जरूरत आने पर मांग लेगी।लेकिन मंटु ने भी उसके बढ़े हुए हाथ को रोकना चाहा, मगर ऐसा करने से बाज आया।
आज पहली बार मालती का स्पर्श हुआ था, वह घबरा गया और उधर मालती भी लजा गई, हाय! मैंने ऐसा क्यूं कर दिया! फिर मंटु ने यह कहते हुए आखिर में भुगतान कर ही दिया कि मालती को कल टेम्पू के लिए चार-पांच हजार रुपये भी चाहिए होगा…।
मालती आंखें झुकाकर अपनी रजामंदी दे दी और फिर दोनों ने राजी खुशी पास के होटल में चाय पी और ढेर सारी गप्पें कीं।
बस इतना काफी था टेम्पू वालों के दरमियान बातें गढ़ने के लिए।किसी ने कहा, ‘एकदम खतम है लड़की, किसी के साथ बाजार चली जाती है।ले जाने वाला चाहिए।’ तो दूसरे ने सही किया, ‘अरे इसका तो शुरुए से लछन खराप है।कहती है पढ़ी- लिखी है, कम्पुटर भी जानती है… साला मंटुआ को भी अब सिखा देगी।’ सभी भभाकर हँस दिए।अब राम की बारी थी।वही राम जिस पर पंचायत ने दस हजार रुपया बतौर जुर्माना ठोंका था और उसे अदा करना पड़ा था।
क्योंकि एक बार देर रात पास की नामी-गिरामी इंस्टिट्यूट की एक छात्रा ने चौक पर बस से उतरने के बाद राम का टेम्पू लिया और फिर होस्टल के अपने साथियों को खबर कर दी।उन्होंने कहा भी कि वे लेने आ जाते हैं तो उसने साफ मना कर दिया।वैसे इस चौक पर रात के पैसेंजरों का आना-जाना लगा ही रहता है।सुनसान जगह में राम ने लड़की साथ कुछ अनर्गल बातें कीं, पर लड़की ने कोई प्रतिक्रिया किए बिना साथियों को हालात की सही-सही जानकारी व्हाट्सएप्प मैसेज के द्वारा भेजती रही।इंस्टीट्यूट पहुंचते ही चौकीदार के साथ लड़कों ने उसे धर लिया और पुख्ता मरम्मत करने के बाद कमरे में बंद कर दिया।फिर पंचायत हुई और उसे जुर्माना भरना पड़ा।
गुटका फांकते हुए उसने कहा, ‘भाई, तुम लोग जो कहो, है लेकिन माल टंच, साला मंटुआ भोग रहा है।’ सभी ताली देते हुए उछल पड़े और एक ने हँसकर बोला, ‘इस पगलेट का थेथरई अभियो नहीं गया है।साला! कभी नहीं सुधरेगा।’
एन एच एरिया में वे टेम्पू लगाकर महफिल जमाए बैठे थे।ऐन मौके पर पुलिस की गाड़ी आई और लगी लाठी भांजने।राम का बदन कड़कड़ा उठा, भागा वह खेत की ओर।बाकी तितर–बितर हो गए।दरअसल, कानून तोड़कर टेम्पू चलाना इनका पुराना शगल था।कुछ टेम्पू वाले ऐसे भी थे जो इनसे इत्तिफाक नहीं रखते हुए अपने धंधे में मशगूल रहते और इनकी घटिया बातों में कभी शामिल नहीं होते।
अब तक गांव-कस्बे वाले जान गए थे कि मंटु और मालती के बीच कुछ पक रहा है तो भला उनके घर वाले कब तक इससे नावाकिफ रह पाते।यह खबर आखिर में उन तक पहुंच ही गई।दोनों परिवार अपने-अपने बच्चों पर आश्रित थे।दूसरा चारा ही क्या था सिवाय इसके कि वे अपनी रजामंदी देकर उनकी खुशी में चार चांद लगा दें।पर सामाजिक बंधन और रिवाजों को भी उन्हें कायम रखना था।इसलिए वे थोड़ी दुविधा में थे।
वैसे भी न तो लड़की के लिए कोई लड़का मिल रहा था न ही लड़के के वास्ते कोई लड़की।मालती की मां कब से ढूंढ रही थी, पर कहीं लड़का काबिल नहीं तो कहीं दहेज की मोटी रकम का टोटा।उधर मंटु को भी कोई लड़की वाला कहां भाव दे रहा था।सोचकर दोनों परिवार वाले दुखी थे!
एक शाम अचानक यह खबर आंधी की तरह आई कि मालती और मंटु ने मंदिर में शादी कर ली।शादी का बीड़ा उठाया मंटु के परिवार का खानदानी मित्र परिवार, जिसने ऑटो की मरम्मती के समय पांच हजार रुपए का कर्ज दिया था।हालांकि मंटु वापस करने गया भी था मगर यह कहते हुए उन्होंने लेने से मना कर दिया कि पहले वह घर बसा ले फिर लौटा देगा।दरसअल, किसी समय मंटु के दादा ने उस परिवार की गुरबत में काफी मदद की थी।
कम लोग होते हैं जो किसी का कुछ किया हुआ याद रखते हैं और फिर उसे लौटाने का प्रयास करते हैं।ऐसे मामलों में ज्यादातर लोग अपना पल्ला छुड़ा लेते हैं।यह पहले भी होता था और आज भी।लेकिन कुछ इसके उलट, उपकार का बदला चुकाने के बाद ही चैन की सांस लेते हैं।
गांव वालों ने जो देखा इसके पहले किसी ने न देखा था न सुना था।दूल्हा-दुल्हन एक सुसज्जित टेम्पू में आगे और पीछे तकरीबन पचासों टेम्पू का काफिला।दुल्हन को मंदिर से पहले उसके घर लाया गया और फिर वहां से दूल्हे के यहां।खबर मिलते ही सारे टेम्पू चालकों ने मिलकर अपनी-अपनी जेब से दिन भर तैयारी की और रात में थोड़े रस्मों-रिवाजों की अदायगी के बाद बराती-सराती को छक कर खिलाया गया।
जिसने सुना, दौड़ा आया इस अनकही-अनसुनी शादी का चश्मदीद गवाह बनने।आखिर दो टेम्पू चालकों की शादी थी न!
संपर्क :ग्राम: समया, पत्रालय: मेंहथ–८४७४०४, वाया: झंझारपुर, जिला: मधुबनी (बिहार)मो.७९०३४२५२६२
