कवि, समीक्षक और संस्कृति कर्मी।विद्यासागर विश्वविद्यालय, मेदिनीपुर में सहायक प्रोफेसर।

आज दुनिया के लगभग 150 विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिंदी में पठन-पाठन एवं शोध के कार्य हो रहे हैं।विदेशों से कई हिंदी पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है।हाल में अबू धाबी के न्यायालयों में हिंदी को तीसरी भाषा का दर्जा दिया गया है।2008 के न्यूयार्क में हुए विश्व हिंदी सम्मलेन में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के तौर पर शामिल करने की मांग की गई थी।फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने हाल में एक फैसला लेकर हिंदी में रेडियो और समाचार बुलेटिन का प्रसारण शुरू किया है।2016 में विश्व आर्थिक मंच ने दुनिया की दस सर्वाधिक बोली जाने वाली और महत्वपूर्ण भाषाओं की सूची में हिंदी को शामिल किया है।

वैश्वीकरण के इस चुनौतीपूर्ण समय में हिंदी का प्रयोग और प्रभाव वैश्विक पटल पर बना हुआ है।इंटरनेट पर हिंदी के सैकड़ों कंटेंट डेवेलप हुए हैं।हिंदी के उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या से समझ सकते हैं कि हिंदी का संजाल फैल रहा है।एक बड़ा सवाल यह है कि दुनिया के देशों में हिंदी का प्रयोग और शिक्षा में स्थान कितना बढ़ा है, क्योंकि एक तथ्य यह है कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय जैसी कुछ जगहों पर दशकों से चल रहा हिंदी का पाठ्यक्रम स्थगित कर दिया गया है।विदेशों के भारतीय युवक-युवतियों में हिंदी सीखने की प्रवृत्ति कम हो रही है।

इस परिचर्चा में विदेश में रहने वाले विद्वानों के विचार हैं।यहां हम उनके देश में हिंदी की स्थिति और उपस्थिति के बारे में जान सकते हैं।

सवाल : भूमंडलीकरण के बाद पहले से बहुत अधिक अंग्रेजीमय हो चुके विश्व में हिंदी की क्या स्थिति है? भारतीय परिवारों में हिंदी की क्या स्थिति है? हिंदी शिक्षण के स्तर और स्थिति पर थोड़ा प्रकाश डालें।आप इधर क्या लिख रहे हैं?

फ्रेंचेस्का ऑर्सीनी

लंदन यूनिवर्सिटी की भूतपूर्व प्रो़फेसर और हिंदी की सुप्रसिद्ध विदुषी।चर्चित पुस्तकें :हिंदी का लोकवृत्त, ‘बफ़ॉर दे डिवाइडऔर  हाल में हिंग्लिश लाइव’ (रविकांत के साथ)

यू.के. में विद्यार्थी हिंदी खोज लेते हैं

यू.के. में भारत से आनेवाले परिवार ज़्यादातर पंजाब या गुजरात से आए थे, या तो सीधे हिंदुस्तान से या पूर्वी अफ्रीका में बसकर उखड़ने के बाद।इसलिए उनकी मातृभाषा पंजाबी या गुजराती थी।फिर भी उनके बच्चों ने अंग्रेज़ी और घरेलू पंजाबी और गुजराती के साथ साथ हिंदी को भी किसी तरह, ख़ासकर फ़िल्मों के ज़रिए या फिर कम्यूनिटी सेंटर्स के मा़र्फत, अपनाया।कुछ लोग हिंदी प्रदेश से भी यहां आए, सो उनके घर में हिंदी बोली जाती थी।इसलिए, यूं देखा जाए तो यू.के. में हिंदी में लिखने और पढ़नेवालों की तादाद कम नहीं है, जिसकी गवाही ‘पुरवाई जैसी पत्रिका और ‘कथा यू.के.’ जैसी संस्था देती हैं, भले उनके सदस्य ज्यादातर बुजुर्ग होते हों।लंदन में जब जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल के हिंदी से संबंधित प्रोग्राम होते हैं, तो यू.के. का हिंदी समुदाय आकर इकट्ठा हो जाता है।

मैंने तीन दशक तक यू.के. के विश्वविद्यालयों में हिंदी और विशेषकर हिंदी साहित्य को पढ़ाया।इस सिलसिले में दुनिया भर के विद्यार्थियों को देखा।उनमें यू.के. के प्रवासी भारतीयों के बच्चे भी थे और भारत और पाकिस्तान से आए विद्यार्थी भी।दोनों को मौखिक हिंदी में रवानगी थी, मगर हिंदी में लिखाई-पढ़ाई का वास्ता काफ़ी सीमित था।साहित्य की रुचि, उन्होंने अंग्रेज़ी किताबों से ही पाई थी।रश्दी और अरुंधती रॉय को सबने पढ़ा था, निराला या रेणु या गीतांजलि श्री का नाम भी किसी ने नहीं सुना था, और सुनते भी कैसे? यू.के. के बच्चों को ख़ैर हिंदी साहित्य की कोई जानकारी थी ही नहीं, मगर भारत से आए बच्चों ने भी स्कूली दिनों के बाद हिंदी साहित्य से रिश्ता तोड़ा था।इसके प्रति उदासीन या निराश-से  हो गए थे।

मेरा काम यह था कि उनको जताऊं कि हिंदी साहित्य में बहुत सारे अच्छे और दिलचस्प लेखक और किताबें मौजूद हैं।कभी किसी मुद्दे के बहाने तो कभी भाषा की बारीकियों को सिखाने के वास्ते उनको मन्नू भंडारी की कहानियां, फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ और ‘परती परिकथा’, कृष्णा सोबती का ‘दिलोदानिश’, और गीतांजलि श्री के ‘माई’ और ‘हमारा शहर उस बरस’ को पढ़ाती।जिनकी किसी एक साहित्यिक विधा में रुचि थी, उनको उसके हिंदी नमूने दिखाती।जब उनको दूसरे विषयों के लिए भी पर्चे लिखने होते तो उनको हिंदी के मजेदार पाठ सुझाती, ताकि उनको लगे कि दुनिया में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में भी लोग सोचते हैं, और उनको पढ़ने से दिमाग़ खुल जाता है।इसी तरह ये विद्यार्थी यू. के. में आकर हिंदी की पुनः खोज करते रहे।

भाषा को लेकर लोगों के दिमाग में कई अवधारणाएं हैं जो परस्पर-विरोधी हैं और अकसर कष्ट पैदा करती हैं।जैसे अगर आप अंग्रेजी को तरजीह देते हैं तो हिंदी को नाकाफी या तुच्छ समझकर।आप हिंदी राष्ट्रभाषा पर गर्व करेंगे तो आपको लगेगा कि उसके लिए उर्दू  नकारना जरूरी है।साथ ही आप हिंदी की कोई एक किताब को हाथ नहीं लगाएंगे और अपने बच्चों से कहेंगे कि अंग्रेजी पर खास ध्यान दो।भाषा को लेकर इतनी उलझी हुई सोच रखना हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में उस फैले गहरे यथार्थ से मुंह मोड़ना है, जिसके तहत हमारे परिवारों में, हमारे माहौल में और हमारे इतिहास में लोग एक से अधिक भाषा सीखते, बोलते और पढ़ते आए हैं।

क्या एक से अधिक भाषा पर गर्व करना नामुमकिन या मना है? क्या अंग्रेजी को सीखने के लिए यह जरूरी है कि मैं अपनी हिंदी, पंजाबी, भोजपुरी या इतालवी को भूल जाऊं, या उनको ठुकराऊं? कतई नहीं।हमारे पूर्वजों ने ऐसा नहीं किया था, और षड्भाषी होना विशेष गुण समझते थे।भूमंडलीकरण के इस दौर में अंग्रेजी काम और संपर्क की भाषा ज़रूर हो गई है, मगर उनके ज्यादातर बोलनेवाले मूल अंग्रेजी भाषी नहीं होते और यही उसकी सांस्कृतिक समृद्धि और पहचान है।

ईमेलfo@soas.ac.uk

तोमिओ मिजोकामी

ओसाका विश्वविद्यालय, जापान में प्रोफेसर एसोसिएट।

हिंदी संयुक्त राष्ट्र की 7वीं अधिकृत भाषा बने

मेरा हिंदी के साथ जुड़ाव हाइस्कूल के दिनों को मिलाकर साठ साल से अधिक पुराना है।हिंदी मेरे लिए पत्नी से भी पुरानी मेरी दूसरी जीवन साथिनी है, जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है! लेकिन मेरी पत्नी अपनी ‘सौतन’ को बहुत प्यार करती है! …मज़ाक के लिए क्षमा करें।

मुझे अपने (60 के दशक के) छात्र-जीवन में हिंदी शिक्षण में उचित शब्दकोश, पाठ्यपुस्तकों और योग्य भारतीय अध्यापक के अभाव के कारण बहुत परेशानी उठानी पड़ी।बहुत मेहनत करनी पड़ी।मेरे साथ के ज्यादातर छात्रों में हिंदी सीखने का उत्साह बिलकुल नहीं था।यह अवश्य रोजगार की समस्या से भी जुड़ा था।पर थोड़े से उत्साही छात्र नौकरी की चिंता किए बिना स्वांत:सुखाय की भावना से आते थे जिनमें एक मैं भी था।

उन दिनों आम जापानियों में भारत की छवि बहुत सकारात्मक नहीं थी।उनके मन में गरीबी और प्राकृतिक आपदाओं की छवि अधिक थी, यद्यपि महात्मा गांधी का देश, दार्शनिक देश और रहस्यात्मक देश की कुछ सकारात्मक छवियां भी थीं।जापान में हिंदी की तुलना में संस्कृत, भारतीय दर्शन तथा बौद्धिक अध्ययन की परंपरा ज्यादा पुरानी है और स्तर भी ऊंचा है।प्रायः इन क्षेत्रों के विद्वानों की आधुनिक भारत तथा भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि नहीं है।

शीत युद्ध के दौरान, जापान पश्चिमी देशों के गुट में था (अभी भी), पर भारत के सोवियत संघ के पक्ष में होने के कारण दोनों देशों में बहुत नैकट्य नहीं था।अवश्य मित्र देश तो था, लेकिन घनिष्ठ संबंध नहीं था, जितना आजकल है।

दोनों देशों का घनिष्ठ संबंध 1991 के सोवियत संघ के विघटन और भारत की अर्थ-व्यवस्था के उदारीकरण के बाद आरंभ हुआ और अब जापान भारत का सबसे बड़ा, घनिष्ठ और विश्वसनीय देश बन गया।आम जापानियों में भारत की छवि भी अब बहुत सकारात्मक है।सभी जापानी जानते हैं कि भारत सबसे तेजी से आर्थिक विकास करने वाला देश है और सूचना तकनीक के क्षेत्र में  अमरीका के बाद विकसित देश है।कहते हैं कि 2030  तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद जापान को पीछे हराकर दुनिया में नंबर तीन हो जाएगा (तब तक मैं जीना चाहता हूँ -लगभग नब्बे साल की आयु का हो जाऊंगा!)

इतने दिनों तक जापान में हिंदी भाषा सीखने का माहौल बहुत अनुकूल रहा है -अच्छे शब्दकोशों की उपलब्धता, भारत जाने की सुगमता-विशेष करके भारत के विश्वविद्यालयों, केंद्रीय हिंदी संस्थान में उच्चतर शिक्षा पाने का मौका मिल सकना और इनटरनेट या हिंदी फिल्मों को हर समय देख सकने की सुविधाएं आदि।छात्रों की संख्या में बहुत अधिक बढ़ोतरी तो नहीं हुई है, पर बहुत मेधावी विद्यार्थी प्रवेश करने लगे।दूसरी भाषाओं की तरह चार दशकों से हिंदी विभाग में लड़कियों का ही बोलबाला है।

जहां तक भारत के युवाओं की अंग्रेजियत और हिंग्लिश की बात है, थोड़े मोरे आधुनिक उपकरण या संकल्पनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करने में कोई आपत्ति नहीं है।जापानी भाषा में भी कंप्यूटर के पारिभाषिक शब्द प्राय: अंग्रेजी में होते हैं, अन्यथा जरूरत या औचित्य  से ज्यादा अंग्रेजी शब्दों को मिला-मिला कर बोलना (तथाकथित हिंग्लिश शैली) हिंदी के सौंदर्य को बिगाड़ देता है।मैं इसके पक्ष में नहीं हूँ।यह केवल युवाओं में नहीं, पढ़े-लिखे बुजुर्गों में भी दिखाई देती है।मेरे ख्याल में इसका सबसे बड़ा कारण है रोजगार की समस्या।लोगों के मन के अवचेतन में बसी अंग्रेजी के सामने अपनी हीनभावना भी कारण है।मेरे ख्याल में यह अंग्रेजियत अंग्रेजी की देन नहीं है, बल्कि भारतीयों ने स्वयं मोल लिया है!

‘हिंदी मीडियम’ नामक हिंदी फिल्म हिंदी प्रेमियों को ठेस पहुंचानेवाली फिल्म थी।इसमें मध्यम वर्ग के मियां-बीवी एकलौती बेटी को अच्छे निजी स्कूल (निश्चय ही अंग्रेजी माध्यम वाली) में दाखिला दिलाने के लिए न जाने कितनी जी-तोड़ मेहनत करते हैं! इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि अंग्रेजी न जाननेवाले नागरिक दोयम दर्जे के नागरिक हैं।लेकिन यह सोचिए कि भारत जैसे बड़े देश के प्रधान मंत्री सर्वत्र सर्वदा हिंदी में बोलते हैं तो हिंदी बोलनेवाले लोग कैसे दूसरी श्रेणी के नागरिक हो सकते हैं! यह खुशी की बात है कि आम तौर पर सरकार के राजनेता अच्छी हिंदी बोलते हैं, पर सरकार के नौकरशाह अभी भी अंग्रेजी के भक्त हैं।उन लोगों की सोच को बदलना पड़ेगा।

यद्यपि जापान में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है, पर इस जमीनी हकीकत को मानना पड़ेगा कि जापान में हिंदी अभी मेजर भाषा की कोटि में न होकर माइनर भाषा की कोटि में है, क्योंकि मेजर या माइनर का विभाजन  उस भाषा के बोलनेवालों की संख्या से न होकर उस भाषा को पढ़नेवालों की संख्या पर निर्भर होता है।जापान में मेजर भाषाओं में अंग्रेजी, जर्मन, फ्रांसीसी, रूसी, स्पेनी, चीनी और कोरिया आदि आती हैं, शेष सभी विदेशी भाषाएं माइनर भाषाओं में गिनी जाएंगी।उदाहरण के लिए चीनी को लीजिए।चीनी भाषा को पढ़नेवाले लोगों की कुल संख्या हिंदी सीखनेवाले लोगों की संख्या से हजारों गुना ज्यादा है! प्रकाशित पाठ्य पुस्तकों और अनुवादों की संख्या भी हजारों गुना ज्यादा है! माइनर भाषा से मेजर भाषा में पदोन्नति करने में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन भारत में होना चाहिए।

हाल ही में श्रीमती गीतांजलि श्री के हिंदी उपन्यास  ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है, यह बहुत प्रसन्नता की बात है।हिंदी के लिए गौरव की बात है।

अब हिंदी साहित्य को नोबेल साहित्य पुरस्कार को जन्म देना होगा।हम चाहते हैं कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सप्तम प्राधिकृत भाषा बनाया जाए।यह इतना कठिन नहीं होगा, जितना भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाना।

ई मेल – indictomio@gmail.com

हंसा दीप

हिंदी कथाकार। टोरेंटो यूनिवर्सिटी, कनाडा में प्रोफेसर। कई उपन्यास प्रकाशित। अद्यतन, ‘कांच का घर

रोमनीकरण के दौर में हिंदी

मुझे गर्व है कि आज की तकनीकी उन्नति के साथ हिंदी कदम से कदम मिलाकर चल रही है।यह अपने दिल को बड़ा करके हर ग्लोबल शब्द को जगह दे रही है।इसके बावजूद, हकीकत यह है कि आम भारतीय हिंदी बोलना चाहता है, लिखना-पढ़ना नहीं चाहता।हिंदी वस्तुतः पत्रिकाओं और पुस्तकों में सिमट कर रह गई है।इसके अलावा हिंदी को रोमन में लिखने की परंपरा बढ़ रही है।यहां तक कि हिंदी फिल्मों से करोड़ों की धनराशि कमाने वाले अभिनेताओं के लिए भी पटकथा रोमन लिपि में तैयार होती है।

भारत में ये सारी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं तो विदेशों में हिंदी पढ़-पढ़ा रहे छात्रों-शिक्षकों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होगा, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।यहां भी हिंदी का प्रचार-प्रसार समर्पित स्वयंसेवी कर रहे हैं।हिंदी फिल्मों-टीवी का बोलबाला है।लोग हिंदी बोलना चाहते हैं, लेकिन हिंदी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा नहीं मिल पा रहा है।एक चुभता सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ी में, भारत हो या विदेश, हिंदी लिखने-पढ़ने के प्रति उदासीनता क्यों बढ़ती जा रही है! किसी भी देश से, अच्छी तरह हिंदी जानने वाले लोग सोशल मीडिया पर नमस्ते को Namaste से शुरू करते हैं।ज्ञशीश हे से लेकर हर सवाल-जवाब को रोमन लिपि में लिखकर संदेश का ऐसा हाल करते हैं कि समझने में दिमाग का अच्छा-खासा व्यायाम हो जाता है।क्यों हिंदी जानने वाले भी हिंदी लिखना नहीं चाहते? क्यों हिंदी लेखन की गलतियों से सभी डरते हैं? हम अपनी कट्टर विचारधारा से परे सोचें, कारण समझना चाहें, तो स्वयं को कटघरे में खड़ा पाएंगे।

पहली वजह हमारी कट्टरपंथी सोच है।हमने अन्य भाषा के बहुप्रचलित शब्दों का दिल खोल कर स्वागत करने के लिए अपनी लिपि का लगातार संशोधन किया है।स्वर और व्यंजन के मूल 44 अक्षरों में मात्राएं जोड़कर, आधे-पूरे अक्षर मिलाकर, कई संयुक्त अक्षर बनाए हैं।साथ ही बिंदुओं की भरमार है।शिरोरेखा के ऊपर, अक्षर के नीचे, अनुस्वार-अनुनासिकता के साथ।यानी बिंदु, चंद्र बिंदु के साथ, चंद्र, विसर्ग,  हलंत हैं ही, अब अक्षर के दाएं-बाएं भी बिंदु हैं।अंग्रेजी शब्दों के लिए ऑ है और उर्दू, अरबी, फारसी शब्दों के लिए क ख ग ज फ में नुक्ता लगाना जरूरी है।हिंदी के इतने अनुस्वार, मात्रा, नुक्ते, संयुक्त व्यंजन के साथ हिंदी सीखना बहुत कठिन है।

भाषाओं का सम्मिश्रण कतई बुरा नहीं है, मगर वह एक-दूसरे के विस्तार के लिए हो।अंग्रेजी न जाने कितनी भाषाओं के प्रचलित शब्दों को साधिकार लेती है, लेकिन अपने छब्बीस अक्षरों में कोई बदलाव नहीं करती।हर भाषा के अस्तित्व को चुनौती देती अंग्रेजी भाषा, रोमन लिपि पूरी दुनिया पर राज कर रही है।

भारत के कई नगरों-महानगरों में जहां काफी मात्रा में हिंदी भाषी लोग रहते हैं, गली-मोहल्लों में साइनबोर्ड पर हिंदी तो है पर रोमन में लिखी हुई।ये हमें ग्लोबल वार्मिंग की तरह चेतावनी नहीं देते पर हां, संभल जाने का आह्वान जरूर करते हैं।जीवन की भागमभाग में भाषा का सरलीकरण होना चाहिए।इस क्लिष्टता के चलते हिंदी के लिए वही डर है जो संस्कृत और लैटिन जैसी अपने जमाने की समृद्ध भाषाओं के साथ हो चुका है।

यद्यपि इस तर्क को नकारा नहीं जा सकता कि जितनी भाषाओं के शब्दों को हम अपनी भाषा में स्थान देंगे, उतना ही हम अपनी भाषा को उदार बनाएंगे।बहरहाल, मुद्दा यह है कि हमने अपनी लिपि में बहुत कुछ जोड़ा है।विदेशों में अहिंदी भाषी छात्रों के लिए हिंदी की वर्णमाला सीखना सबसे कठिन एवं दुष्कर कार्य हो गया है।

आज का युवा हर जानकारी के लिए इंटरनेट पर निर्भर करता है।यहां भी उसे हिंदी के भिन्न-भिन्न स्वरूपों का सामना करना पड़ता है।प्रौद्योगिकी की दौड़ में हिंदी के हर फॉण्ट के अपने अलग-अलग नियम हैं।यूनिकोड मंगल फांट में संयुक्त अक्षर आधे अक्षर के साथ लिखे जाते हैं, एरियल यूनिकोड में ये नया आकार लेते हैं जो हस्त लेखन से मिलता है।इसके अलावा कई और फॉण्ट हैं जो ऐसी भाषायी विसंगतियों को हमारे सामने लाकर खड़ा करते हैं।कई संपादकगण चंद्रबिंदु का विलय बिंदु में कर चुके हैं, नुक्ता हटा दिया गया है, यह एक सराहनीय कदम है।संयुक्त अक्षरों का भी एक मानक रूप हो।हलंत और विसर्ग पर विचार करके हम क्लिष्टताओं को कम से कम करके मानकता प्रदान कर सकते हैं ताकि छात्रों को देवनागरी लिपि सीखने-लिखने-पढ़ने में कठिनाई न हो।नि:संदेह, यह सरलीकरण भाषा के रोमनीकरण से बेहतर होगा।

22 फैरेल एवेन्यू, न्यू यॉर्क, टोरेंटा, ओएन-एम२आर1 सी8, कनाडा, 001+647 213 1817ईमेल – hansadeep8@gmail.com

पैट्रिशिया बर्क वुड

यॉर्क यूनिवर्सिटी, कनाडा में भूगोल की प्रोफेसर।

एक गैरभारतीय के लिए हिंदी

मैं कैनेडा में रहती हूँ और हिंदी भाषा सीख रही हूँ।मैं भारत कभी नहीं गई, लेकिन मुझे भारत से लगाव है।मैं अपने शोध कार्य के लिए भारत जाना चाहती हूँ इसीलिए हिंदी भाषा बोलना और लिखना चाहती हूँ।

भूमंडलीकरण के कारण हिंदी पढ़ना मेरे लिए संभव हुआ है।नेट पर अंग्रेजी के साथ हिंदी के सबक सीखना आसान है।नेटफ्लिक्स और अमेज़ॉन पर कई हिंदी फिल्में हैं जो हिंदी सीखने में मदद करती हैं।मेरी हिंदी शिक्षक भी डायस्पोरा का एक हिस्सा हैं, जिसकी वजह से वे कैनेडा आईं।भूमंडलीकरण से दुनिया बहुत छोटी हो गई है।हिंदी लेखक होने के बावजूद मेरी हिंदी शिक्षक की कहानियों के पाठक सारी दुनिया में हैं।प्रवासियों के कारण टोरंटो में रेडियो पर कई हिंदी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं।मैं भी इसका फायदा उठाती हूँ, एक छोटी-सी मछली की तरह जो धार के विरुद्ध बहने की कोशिश में है।

भूमंडलीकरण से नुकसान भी हुए हैं।अंग्रेजी कई देशों की भाषाओं को विस्थापित कर रही है।कई समूहों में लोग अंग्रेजी भाषा में ही बात करते हैं।भारत में यह स्थिति और जटिल है, क्योंकि हिंदी का एक समृद्ध इतिहास होने के बावजूद दक्षिण भारत में हिंदी बहुत कम बोली जाती है।

खैर, मेरे लिए यह भाषायी राजनीति कोई मायने नहीं रखती, पर मैं इससे बच भी नहीं सकती।हिंदी बोलना मुझे भारत से बहुत कुछ सीखने का मौका देता है।हालांकि मैं जानती हूँ कि इतना काफी नहीं है।फिलहाल यह मेरे लिए अच्छी शुरुआत है।भूमंडलीकरण के युग में एक बेहतर मेहमान और अनुभवी प्रोफेसर के रूप में भारत जाना मुझे बहुत खुशी देगा।

ई मेल – pwood@yorku.ca

संपर्क प्रस्तुतिकर्ता :​ 1, राम कमल रोड, पोस्टगरिफा, पिन743166, उत्तर 24 परगना (.बं.) मो.9331075884