राना जुरमाती
अफगानी महिला कथाकार। अनटोल्ड राइट अफगानिस्तान प्रोजेक्ट के लिए लेखन। प्रस्तुत कहानी अफगानी महिला कथाकारों की कहानियों के अंग्रेजी अनुवाद संग्रह ‘माई पेन इज द विंगऑफ ए बर्ड’ से ली गई है, जो अंग्रेजी में ‘हस्काज डिसीसन’ शीर्षक से प्रकाशित है।सुरक्षा कारणों से राना जुरमाती का फोटो व परिचय उपलब्ध नहीं हैं।

 

सूर्योदय होने वाला था। हस्का एक पात्र में आटा गूंथकर तंदूर के पास बैठी थी। थोड़ा आटा लेकर अपनी हथेलियों में घुमाकर उसने गोल लोई बनाई। उसने अपनी उंगलियों को पानी के कटोरे में डुबोया और लोई को चपटा करते हुए गोल आकार की रोटी बनाई। इसे सेंकने के लिए उसने इसे तंदूर के भीतर चिपकाया।

व्रंगा अपनी उनींदी आखों को एक हाथ से मलते हुए अंदर आई, उसके सुनहरे बालों की कुछ लटें उसके चेहरे पर आ गई थीं।

उसने अपनी मां से कहा, ‘मूर जान! क्या बाबा मेरे लिए बिस्किट ले आए?’

‘नहीं बिटिया! तुम्हारे पापा की आज नाइट शिफ्ट है, वे अभी तक घर नहीं आए हैं। तुम अपने बिस्तर पर वापस जाओ। वे जब आएंगे तो मैं तुम्हें बता दूंगी।’

‘नहीं, मैं तुम्हारे पास बैठना चाहती हूँ।’

‘ठीक है, बैठो। लेकिन हल्ला मत करना, बाकी सब सोए हुए हैं।’

हस्का ने उसे अपने बगल वाली जगह में बैठने का इशारा किया। व्रंगा अपने बालों से खेलती हुई उसने अपना सिर अपनी मां की पिंडली पर टिका दिया। हस्का सोच रही थी कि जब उसका पति थका हुआ और भूखा घर आएगा तो घर में कितना कम खाना होगा। बस यही रोटी और चाय, वह भी गाय दुहने के बाद। लेकिन उसे आज फार्मेसी से वेतन मिलेगा और वह हफ्ते भर का किराने का सामान अपने साथ लेता आएगा।

नन्ही व्रंगा मां के पैरों पर सोई हुई बड़ी शांत लग रही थी। जैसे ही वह अपनी बिटिया को निहार रही थी, तभी पास में ही चली एक गोली की आवाज से हस्का दहल गई। फिर दूसरी गोली भी चली। व्रंगा उछलकर हस्का की बाहों में आ गई। उन्होंने पक्षियों के उड़ने की आवाज सुनी। हस्का ने व्रंगा को कसकर पकड़ लिया।

‘हे खुदा, रहम करना!’ इस बार उन्होंने किसको गोली मार दी?

उसके पति के परिवार की महिलाएं और पुरुष शोर सुनकर अपने-अपने कमरों से बाहर निकल आए। हस्का की सास दूर तक नहीं जा सकती थी- उसके पैर उसे अहाते से आगे नहीं ले जा सकते थे। उसने अपने पोते से एक गिलास ठंडा पानी लाने को कहा, फिर अपने पति से कहा, ‘जाइए और पता कीजिए कि उन्होंने गांव में किसे मार दिया है।’ उसने अपने बड़े बेटे को इशारा किया कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को घर पर छोड़कर अपने पिता के साथ जाए।

हस्का के ससुर ने कलोश पहना और वे घर से बाहर निकले। व्रंगा हस्का को नहीं छोड़ रही थी। बच्ची को वह कमरे में ले आई और दीवार पर लगी घड़ी को देखा। उसने खुद से कहा, ‘सात बज गए हैं, वे अभी तक घर क्यों नहीं आए।’ जमाल अपनी दादी के लिए पानी लेकर आया। इससे पहले कि वह पूरा पानी पी पातीं, कुछ पुरुष एक शव को अहाते में लेकर आए।

पानी पीती हुई हस्का की सास के मुंह से पानी बाहर उछला। घबराई हुई आवाज में उसने कहा, ‘यह कौन है? इसे तुम हमारे घर क्यों ला रहे हो?’

हस्का के ससुर ने शव को रखने के लिए अपनी शाल को जमीन पर बिछाया। मृतक के नीले कपड़े खून से सने हुए थे और उसकी जेबें फटी हुई थीं।

हस्का की सास चीखने लगी। हस्का अपनी जगह पर स्थिर खड़ी रही। लेकिन व्रंगा दौड़कर शव के पास पहुंची। उसने अपने नन्हे हाथों को बाबा की छाती पर रखकर उन्हें हिलाने की कोशिश की। उसने अपनी मां की ओर देखा और कहा, ‘वे बिस्किट लेकर नहीं आए। उन्होंने मुझसे झूठ बोला।’ उनकी छाती पर हाथ फेरते हुए वह कहती रही, ‘बाबा, बाबा!’

कुछ ही देर में ग्रामवासी जमा हो गए। हस्का की मां भी पहुंच गई। उसने हस्का को कसकर गले लगाया और उसके गाल थपथपाए कि वह कुछ बोले। किंतु हस्का ने कुछ नहीं कहा। वह बुद्ध की तरह शांत और सीधी खड़ी रही। फिर उसकी मां ने उसकी बांह पकड़ी और उसे गुल खान के शव तक ले गई।

हस्का घुटनों के बल झुक गई। गुल खान की आंखें बंद थीं और शरीर लहूलुहान था। उसके दिल के पास गोली लगी थी। हस्का ने अपना हाथ उसपर रखा और अपना सिर उसकी छाती पर रख दिया। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसने उसके चेहरे को छुआ, उसके माथे को चूमा और अपने दुपट्टे से खून के धब्बे पोंछे। उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा गई थीं। अचानक वह चीखी और अपने ही चेहरे पर थप्पड़ मारने लगी।

अहाते में औरतों ने अपने हाथों से अपना मुंह ढक लिया, फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे से कहने लगीं: ‘ओह, वह कितनी निर्लज्ज, कितनी बेशर्म है। वह सबके सामने अपने पति के लिए रो रही है।’

‘हां, रे! यह कितनी बुरी बात है!’

‘हमने आज तक अपने गांव में ऐसी औरत नहीं देखी।’

हस्का की सास ने हस्का की मां को आंखों से इशारा करते हुए कहा, हस्का को उसके कमरे में ले जाओ। हस्का की मां ने अपनी बेटी को बांह पकड़कर उठाना चाहा, लेकिन वह जरा भी नहीं हिली। उसने गुल खान का हाथ कसकर पकड़ लिया और कहने लगी, ‘मुझे उनसे अलग मत कीजिए। मुझे अकेला छोड़ दीजिए।’ उसकी मां उसे उठा नहीं पा रही थी, इसलिए कुछ अन्य औरतों ने हस्का को घेर लिया और उसे उठाकर पैरों पर खड़ा किया। वे उसे उसके कमरे में ले गए। वहां उसकी मां ने उसे पकड़े रखा और उससे बात करने की कोशिश की।

‘बिटिया! मैं महसूस कर सकती हूँ कि तेरे दिल में क्या है। पर इन सब लोगों के सामने हमें शर्मिंदा न होने दे। वे सब तेरी ही बात करेंगे। अपने आपको घर-घर की कहानी मत बना।’

हस्का ने अपनी मां की ओर देखते हुए कहा, ‘बेबो, मैंने अपना सबकुछ खो दिया है। मेरे उजले दिन पर अंधेरी रात छा गई है और आप कह रही हैं कि घर-घर में मेरी चर्चा न हो।’

उसने अपना सिर दीवार से टिका लिया और छत की ओर देखने लगी। वह धीरे-धीरे बोल रही थी, ‘अब क्या होगा मेरी व्रंगा और जमाल का।’ वह अपने बच्चों को देखने वहां से चल पड़ी।

हस्का ने देखा कि उसकी सास बच्चों को उनके पिता के शव के पास लेकर आ गई थी। वह अपने पोते–पोतियों से कहती रही, ‘तेरे बाबा मर चुके हैं। उसे देख लो। यह तुम्हारे लिए आखिरी मौका है, फिर तुम उसे दोबारा नहीं देख पाओगे।’ हस्का बच्चों की ओर दौड़कर पहुंची और उन्हें कसकर पकड़ लिया। नन्ही व्रंगा ने अपने नन्हे हाथों से हस्का के आंसू पोंछते हुए कहा, ‘बाबा से कहो कि उठे और मेरे लिए एक बिस्किट लेकर आए।’

कुछ लोग कफन और ताबूत लेकर आए। गुल खान एक शहीद था और उसे नहलाने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने उसके पहने हुए कपड़ों में ही उसे लपेटा और ताबूत में रख दिया। चार लोगों ने ताबूत को अपने कंधों पर उठा लिया। हस्का और उसके बच्चे उसके पीछे दौड़े, तभी औरतें कहने लगीं, ‘ओह! कितना शर्मनाक है यह! बहुत ही ओछी बात!’ लेकिन इन बातों का हस्का पर कोई असर नहीं पड़ा। आखिर यह किसी और की नहीं, बल्कि उसकी दुनिया थी जो उजड़ गई थी।

सबकुछ समाप्त हो गया। गुल खान को दफना दिया गया और हस्का विधवा हो गई।

एक पखवाड़े के भीतर ही पास और दूर के पुरुष हस्का का हाथ मांगने के लिए उतावले हो पड़े। लोगों को हस्का की नीली आंखें और सुनहरे बाल बहुत पसंद थे। उसने पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन गुल खान उसकी समझदारी और उसके विनम्र स्वभाव के कारण उससे प्यार करता था। वे एकसाथ कठिन समय से गुजरे थे। हस्का जानती थी कि लोग उसके शोक खत्म होने की अवधि का इंतजार कर रहे थे। हस्का को वे लोग जंगली जानवरों की तरह लगते थे, जो अपने शिकार पर झपट्टा मारने को तैयार थे।

जब भी हस्का के पास समय होता, वह अपने कमरे में जाती और दीवार पर लगी तस्वीर को देखती। कभी-कभी वह उसके साथ बातें करते हुए खो जाती और हँसने लगती। उसकी आवाज कमरे के बाहर तक सुनाई देती। परिवार को लगता कि वह अपना मानसिक संतुलन खो रही है। लेकिन हस्का गुल खान से बेहद प्यार करती थी और वह उससे तब तक बातें करती रहती जब तक कि कोई उसे बाहर बुला न ले।

तस्वीर से बातें करते हुई हस्का ने उसे अपने शुरुआत की याद दिलाई: सात साल पहले का वह दिन जब उसकी मां ने उसकी बहन को मेरी एक सहेली के घर से मुझे लाने के लिए भेजा था। ‘हस्का! बाबा तुम्हारी शादी गुल खान से कराने के लिए राजी हो गए हैं, बाबा ने तुझे घर बुलाया है।’ उस समय उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह खुश हो या दुखी। उसकी सहेलियों ने उसे चिढ़ाना शुरू कर दिया, इसलिए वह वहां से निकलकर घर की ओर भागी।

उसकी बहन रेशमीना ने कहा, ‘यदि तुम खिड़की से देखो, तो वह तुम्हें दिख जाएगा। वह खिड़की के ठीक सामने बैठा है।’ उसने हस्का के पीछे खड़ी होकर पूछा: ‘क्या ख्याल है तेरा? तुझे पसंद आया न वह?’

हस्का अब गुल खान की तस्वीर देखकर मुस्कुराती है। वह कहती है, ‘आप सफेद कमीज और काले वेस्ट-कोट में बहुत ही खूबसूरत लग रहे थे।’

जब वे खिड़की से देख रहे थे, उसकी मां उनके पीछे चुपचाप आकर खड़ी हो गई। उसने उन्हें वहां से जाने को कहा, ‘बहुत शरारती और बेशर्म हो तुम, अपने कमरे में जाओ, कोई तुम्हें यहां देख न ले!’

जब हस्का गुल खान के चित्र के साथ अपनी यादें ताजा कर रही थी, तभी व्रंगा अंदर आई: ‘मूर जानी! मूर जानी! मेरे चाचा बिस्कुट लाए हैं, लेकिन उन्होंने मुझे एक भी नहीं दिया।’

‘क्यों नहीं बिटिया!’

उन्होंने कहा, ‘मैं यह अपने बच्चों के लिए लाया हूँ। तुम जाओ और अपनी विधवा मां से कुछ मांग लो। मूर जानी, विधवा क्या होती है?’

हस्का कांप उठी। ‘जब तुम बड़ी हो जाओगी और स्कूल जाओगी, तुम्हें पता चल जाएगा।’

‘क्या मेरे दादाजी मुझे स्कूल जाने की अनुमति देंगे?’

‘क्यों नहीं? तुम्हारे बाबा चाहते थे कि तुम स्कूल जाओ। जब तुम छह साल की हो जाओगी, तो मैं तुम्हारी इच्छा पूरी कर दूंगी।’

हस्का वहां से उठी ताकि व्रंगा के प्रश्नों से वह बच सके। वह रसोई की ओर आगे बढ़ी तभी उसके जेठ ने उसे आंगन में बुलाया।

‘हस्का, कहां जा रही हो तुम? इधर आओ, जो मैं कह रहा हूँ वह सुनो।’

हस्का ने दुपट्टा खींचकर अपना आधा चेहरा ढक लिया और वह आंगन में एकत्र परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बैठ गई। उसे यह देखकर राहत मिली कि उसकी मां भी वहां आ गई थी। उसके जेठ ने बोलना शुरू किया।

‘सभी लोग कृपया मेरी बात को ध्यान से सुनें। यदि हस्का मुझसे शादी नहीं करेगी तो मैं उसके बच्चों का खर्च नहीं दूंगा।’

हस्का स्तब्ध रह गई। ‘लल्ला! किसने कहा कि मैं शादी कर रही हूँ? अभी जमाल के बाबा का निधन हुए चार महीने भी नहीं हुए हैं और तुम जानते हो कि इद्दत भी खत्म नहीं हुई है।’

‘बस! बस! मुझे पता है कि तुम दुबारा शादी करना चाहती हो। गांव के सभी पुरुष इंतजार कर रहे हैं कि तुम किससे शादी करोगी। यदि तुम शादी नहीं करना चाहती हो तो हर आदमी को इतनी फिक्र क्यों है कि तुम किससे शादी करोगी। आज तुम यह साफ-साफ सुन लो कि तुम केवल मुझसे ही शादी करोगी। मैं इतना बेकार नहीं कि मेरे रहते हुए तुम किसी और से शादी कर लो।’

बात खत्म करने के लिए उसकी मां ने कहा, ‘बेशक, बेटे! यह हमारी संस्कृति है- एक विधवा को उसके पति के भाई से ही शादी करनी चाहिए। हस्का अभी युवा है और उसके पास उसे और उसके बच्चों को खिलाने के लिए कोई नहीं है। वह शेष जीवन अकेले नहीं जी सकती। जब सही समय आएगा और इद्दत भी खत्म हो जाएगी, हम निकाह कर देंगे।’

हस्का ने अपना दुपट्टा अपने चेहरे पर रखे हुए जोर से कहा, ‘बेबो, ये तुम क्या कह रही हो? लल्ला, ये तुम कैसी बातें कर रहे हो? मैं दुबारा शादी नहीं करने वाली।’

उसके जेठ ने गुस्से से भरी आंखों से उसे देखा और फिर आंगन से बाहर चला गया।

हस्का के सास-ससुर भी किसी चिंता में सिर हिलाते हुए चले गए। उसकी मां ने धीमी आवाज में उससे कहा, ‘बिटिया, अपनी जिंदगी के साथ मत खेलो, यह तो हमारा रिवाज है। तुम अपनी पड़ोसन को ही देखो, अपने पति की मृत्यु के बाद उसने उसके भाई से शादी कर ली। अब वह खुश है।

हस्का तेजी से अपने कमरे में गई। उसने गुल खान की तस्वीर नीचे उतारी और उसे सीने से लगा लिया। फिर उसने इसे गद्दे पर टिकाकर रख दिया। जमाल हस्का के पीछे-पीछे कमरे में आ गया। ‘मूर जानी, चाचा ने जो कहा वह मैंने सुना। यदि आप उनसे शादी नहीं करोगी तो कौन हमें खाने को देगा?’

‘आओ और मेरे पास बैठो। खुदा हमारा ख्याल रखेंगे। हमारी किस्मत में जो है, वह अल्लाह हमें देंगे।’

दरवाजे के पास खड़ी व्रंगा ने पूछा, ‘क्या अब बिस्किट नहीं मिलेंगे?’

हस्का ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘खुदा ने चाहा तो हम बिस्किट जरूर खाएंगे। लेकिन आज नहीं, किसी और दिन।’ हस्का ने अपनी बेटी के झुके हुए सिर को देखा और कहा, ‘मैं जल्द ही तुम्हारे लिए कुछ बिस्किट बना दूंगी।’

थोड़ी देर बाद जब हस्का रसोई की ओर जा रही थी, तभी उसे कुछ ऐसा सुनाई दिया कि उसने आंगन की ओर देखा। व्रंगा मैले कपड़ों का ढेर लिए एक बड़े बेसिन के पास बैठी थी। वह अपने नन्हे हाथों से कपड़े धोने की कोशिश कर रही थी। हस्का दौड़ कर उसके पास गई।

‘बिटिया, ओ बिटिया, यह तुम क्या कर रही हो? ये कपड़े कहां से आए?’

‘जैनब चाची ने कहा है कि यदि मैं ये कपड़े धो दूंगी तो वे मुझे और जमाल को खाने के लिए एक-एक अंडा देंगी।’

हस्का ने बिटिया की बांह पकड़ी और उसे अपनी ओर खींच लिया। जब वह व्रंगा के दोनों हाथों को पोंछ रही थी, उसने देखा कि गर्म पानी से वे लाल हो गए थे। हस्का ने व्रंगा से अपने आंसू छिपाने का प्रयास करते हुए कहा, ‘यहां से जाओ, अपने कपड़े बदलो और खेलो। मैं तुम्हारे खाने के लिए कुछ तैयार कर देती हूँ।’

हस्का ने देखा कि उसकी जेठानी जैनब रसोई में अपने बच्चों को खाना खिला रही है। बिना कुछ कहे, हस्का अलमारी के पास गई और वहां से दो अंडे उठाने लगी।

तभी एक हाथ आगे बढ़ा और उसे रोकते हुए कहा, ‘क्या तुमने ये अंडे लेने के लिए अनुमति ली? मेरे पति ने इन पर खर्च किया है और तुम ये नहीं ले जा सकती।’

जेठानी जी, मेरे बच्चों ने सुबह से कुछ नहीं खाया है और अब शाम हो रही है। मैं ये अंडे खुद खाने के लिए नहीं ले रही हूँ, मैं ये पकाकर बच्चों को दूंगी। व्रंगा तो इसके लिए कपड़े भी धो रही थी, उसके नन्हे हाथ झुलस भी गए। आप उसे ऐसा करने के लिए कैसे कह सकती हैं?’

‘मैंने ठीक किया। उसे घर के काम सीखने दो। एक दिन उसकी शादी होगी और दूसरे घर चली जाएगी। उसे वहां हमें शर्मिंदा नहीं करना चाहिए।’

‘खुदा न करे! वह बहुत छोटी है और समय रहते सब सीख जाएगी। उसकी शादी में तो बहुत समय है।’

‘यहां से जाओ। खुदा जानता है कि वह तुमसे क्या चाहता है। तुम अपने पति के लिए दुर्भाग्य का कारण रही हो और अब तुम खुद को मेरे परिवार पर थोपना चाहती हो।’

शोरगुल सुनकर परिवार की बुजुर्ग महिलाएं रसोई में आ गईं। हस्का ने अपनी आवाज ऊंची की, ‘मैं तुम्हारे पति से शादी नहीं करूंगी, यह बात तुम्हें कितनी बार बतानी होगी?

‘इससे उसका मन नहीं बदलेगा। तुम एक विधवा की तरह व्यवहार नहीं करती हो। तुममें भरपूर आकर्षण है और तुम हँसती रहती हो। तुम एक अकेली लड़की की तरह घूमती रहती हो। कोई आश्चर्य नहीं कि पुरुष तुममें रुचि न लें। तुम्हें अपना व्यवहार देखना चाहिए। हर दिन हम तुमको हंसते हुए सुनते हैं।’

‘जैनब जान, मैं अपने बच्चों के साथ हँसती हूँ।’

‘तुम जिस किसी के साथ हँसो, तुमने मेरे पति को मोहित कर लिया है।’

हस्का ने आगे कुछ नहीं कहा। वह आंगन में कुएं की ओर बढ़ी। उसकी मां और सास ने पीछे से उसे आवाज दी, ‘रुको! रुको!’

हस्का ने अपना सिर कुएं की ओर झुकाया। उसकी माँ तुरंत उसके पास आ गई और उसकी बांह पकड़कर खींचा।

‘लड़की, तुम क्या कर रही हो?’

हस्का ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने कुएं से पानी भरी बाल्टी निकाली और अपने चेहरे पर ठंडा पानी डाला। उसके बाद वह दो गिलास लेकर आई और उन्हें कुएं के पानी से भर दिया। उसने जमाल और व्रंगा को बुलाया और जमाल से कहा कि वह पड़ोसी के यहां जाकर रोटी मांग लाए।

जमाल पड़ोसी के यहां से एक रोटी ले आया। हस्का अपने दोनों बच्चों को कमरे में ले गई और रोटी के दो टुकड़े किए। उसने एक टुकड़ा जमाल को दिया और दूसरा व्रंगा को और उनके सामने पानी के गिलास रख दिए। जमाल ने कुछ नहीं कहा, लेकिन व्रंगा ने शिकायत करते हुए कहा, ‘मूर जानी, आपने अंडा नहीं पकाया।’

हस्का थोड़ी परेशान हुई। ‘चुप रहो और जो भी है वह खाओ, नहीं तो सो जाओ।’ उसने रोटी का एक टुकड़ा खाया और पानी का एक घूंट पिया और दीवार से टिककर सो गई। जमाल ने रोटी निगलने की कोशिश की।

धीरे से उसके कमरे का दरवाजा खुला। हस्का ने देखा कि उसकी मां है, जो उसके पास आकर जमीन पर बैठ गई। उसने हस्का का हाथ अपने हाथ में लिया और शांतिपूर्वक उससे बात की।

‘बिटिया, तुम इस तरह व्यवहार क्यों कर रही हो? तुम अपना जीवन दुख में क्यों बिताना चाहती हो, क्यों तुम लोगों को अपने बारे में बातें करने दे रही हो? तुम्हारी जेठानी तुम्हारे बारे में बहुत बुरा बोल रही हैं और तुम्हारे जेठ भी तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार कर रहे हैं। लेकिन तुम्हारे जेठ सही हैं। उनसे शादी कर लो। तुम्हारे बच्चों को एक पिता मिल जाएगा और लोग भी तुम्हारे बारे में अनाप-शनाप नहीं बोलेंगे।’

जमाल ने कंबल लिया और लेट गया। उसने अपना चेहरा कंबल से ढक लिया, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। वह बड़े ध्यान से बातें सुन रहा था।

हस्का ने समझाने की कोशिश की। ‘मैं अपने बच्चों के लिए सौतेला पिता नहीं चाहती। मैं जमाल के पिता से बेवफाई नहीं कर सकती। मुझे विधवा कहलाने में खुशी है, पर मैं किसी और की पत्नी नहीं हो सकती।’

‘क्या तुम अपना शेष जीवन अकेले बिताना चाहती हो?’

‘मैं अकेली नहीं हूँ। मेरे पास मेरे बच्चे हैं।’ हस्का ने अपने सोते हुए बच्चों को देखा और एक आह भरी। ‘मैं कोई काम करूंगी।’

‘तुम अनपढ़ हो, तुम कैसे काम कर सकती हो?’

‘मुझे नहीं पता, किंतु मैं कोई काम खोज लूंगी- कोई भी काम और पैसा कमाऊंगी।’

‘हस्का, हमारे परिवार में किसी भी महिला ने काम नहीं किया है। तुम्हारे ससुराल वाले नहीं मानेंगे। आखिर, तुम करोगी क्या?’

उसे भारी सिरदर्द था, इसलिए उसने एक स्कार्फ लिया और अपने सिर के चारों ओर लपेट लिया। अचानक उसकी नजर स्कार्फ के एक सिरे पर लगी गांठ पर पड़ी। यह छोटी गांठ थोड़ा वजनी भी थी। उसने गांठ खोली और उसके अंदर उसे वह पैसे मिले जो वह रखकर भूल गई थी- ये पैसे गुल खान ने फार्मेसी की शिफ्ट से लौटते तक संभाल कर रखने के लिए उसे दिया था। हस्का ने गुल खान की तस्वीर को एक कृतज्ञता भरी दृष्टि से देखा और पैसे गिनने लगी। यह महीने के खर्च जितना था, लेकिन उसने इन पैसों से कुछ बेहतर करने की सोची।

सुबह होने से पहले हस्का ने अपनी मां को जगाया, उसे पैसे दिखाए और बिस्किट बेचने की बात बताई। ‘बिस्किट तैयार होने के बाद आप उन्हें पड़ोस में नादर चाचा की दुकान पर ले जाकर दे देना, देखते हैं कि क्या वह उन्हें बेच सकते हैं?’

‘लेकिन जो बिस्किट तुम घर पर तैयार करोगी, उन्हें खरीदेगा कौन?’

‘बेबो, मैं इसके अलावा कुछ और नहीं सोच सकती। क्या तुम मेरी मदद करोगी? मुझे अल्लाह पर भरोसा है, एक बार कोशिश करके देखते हैं।’

उसकी मां ने उसके निश्चय को देखते हुए हस्का के पास से पैसे ले लिए।

‘ठीक है, पर मुझे बिस्किट के लिए सामग्री कहां से मिलेगी?’

‘जब सब सो रहे हों, तो पड़ोसियों से पूछ लेना।’

चार बजे सुबह, उसकी माँ अपने पड़ोसी के यहां गई। पड़ोसी ने दरवाजा खोला और जैसा वह चाहती थी, उसे आटा, तेल, अंडे और इलायची दी। हस्का की माँ ने इन चीजों के लिए पैसे अदा किए और फिर हस्का के पास लौट आई।

हस्का ने पहले से ही भट्ठी जला कर रखी थी। उसने सुबह की नमाज से पहले ही बिस्किट तैयार कर लिए और उन्हें अपनी मां को देते हुए कहा, ‘नादर चाचा से कहना कि जितने भी बिस्किट बिकेंगे, मैं मुनाफा आधा-आधा बांट दूंगी।’

जब वह दुकान पर गई तो हस्का की माँ ने उसे अपनी बेटी की परेशानियों के बारे में बताया और कहा, ‘उसे पैसों की सख्त जरूरत है। क्या आप बिस्किट को अपने काउंटर पर रखकर देख सकते हैं कि कोई उन्हें खरीदता है या नहीं?’

दूकानदार ने नम्र रुख अपनाते हुए कहा, ‘जरूर, उन्हें यहीं छोड़ दो और शाम को वापस आना। हम तब बात करेंगे।’

घर लौटते ही उसने देखा कि हस्का का जेठ उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहा था।

‘तो तुम कब तक भूखी रहोगी? तुम कैसे जिओगी? यदि तुम्हें खुद पर दया नहीं आती तो अपने बच्चों के बारे में सोचो, वे भी भूखे हैं।’ उसने व्रंगा से कहा, ‘यदि तुम्हारी मां मेरी बात मान लेती है तो मैं तुम्हें तुरंत नाश्ता दे दूंगा।’

हस्का की सास ने कहा, ‘बेटे, ऐसा मत करो। वे छोटे हैं, उन्हें तकलीफ होगी।’

पूरे दिन हस्का चिंतित थी। वह अपने दोनों हाथों को मलते हुए आंगन के एक छोर से दूसरे छोर तक आती-जाती रही। उसे मालूम था कि उसकी मां उस शाम लौटते समय नादर चाचा की दुकान पर रुकेंगी। हस्का एक घबराहट के साथ इंतजार कर रही थी, और फिर उसे अपनी मां के आने की आहट सुनाई दी। वह दौड़कर मां के पास गई।

हस्का की मां ने अपनी बेटी का चिंतित चेहरा देखा और मुस्कुराई। ‘चिंता न कर बिटिया। नादर चाचा ने सारे बिस्किट बेच दिए। ये रहे तुम्हारे पैसे।’

‘बहुत हैं! पूरे एक हजार अफगानी।’

उन्होंने कहा है कि वे मुनाफे का हिस्सा अगली बार से लेना शुरू करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि तुम्हें बिस्किट बनाते रहना चाहिए- सभी को घर पर बने बिस्किट बहुत पसंद आए।

हस्का की सास ने पूछा, ‘इतनी खुशी किस बात की है?’

‘जी, मुझे अपने बच्चों का खर्च उठाने का तरीका मिल गया है, इसलिए मुझे लल्ला से शादी नहीं करनी पड़ेगी।’ उसने परिवार के मुखिया को सबकुछ समझाया। उसका जेठ वहीं खड़ा सब सुन रहा था। जब उसे एहसास हुआ कि वह क्या कह रही है, तो उसने गुस्से में कहा, ‘हमारी प्रतिष्ठा ही एकमात्र ऐसी चीज थी जो हमारे पास थी अब तुमने उसे भी बर्बाद कर दिया। यदि तुम दुकानदारों से जाकर बात करोगी, तो तुम हमें शर्मसार करोगी। अम्मी, जरा इसे समझाओ।’

उसकी मां ने बड़ी अधीरता से कहा, ‘यदि वह तुमसे शादी नहीं करना चाहती है, तो तुम उस पर दबाव क्यों डाल रहे हो? ऐसी शादी से कोई खुश नहीं रह पाएगा। यदि वह घर में बिस्किट बनाए और जमाल उन्हें दुकान तक पहुंचा दे, तो इससे तुम्हारी प्रतिष्ठा को कोई ठेस नहीं पहुंचेगी।’

हस्का का जेठ अपनी मां के फैसले से स्तब्ध रह गया और भड़क उठा, ‘मेरा अब उससे कोई लेना-देना नहीं रहेगा। मेरे लिए वह मर चुकी है। एक बार जब कोई औरत घर से बाहर काम करना शुरू कर देती है, तो उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।’

हस्का मुस्कुराती रही।

(पश्तो भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद : शकीबा हबीब)

 

 

हिंदी प्रस्तुति : बालकृष्ण काबरा ‘एतेश’
कवि और अनुवादक। अद्यतन कविता संग्रह, ‘छिपेगा कुछ नहीं यहां।’ विश्व साहित्य के अनुवादों के संग्रह: ‘स्वतंत्रता जैसे शब्द’, ‘जब उतरेगी सांझ शांतिमय,’ ‘ये झरोखे उजालों के’ और ‘आंसुओं के नमक से’।

 

संपर्क : 11, सूर्या अपार्टमेंट, रिंग रोड, राणाप्रताप नगर, नागपुर (महाराष्ट्र)- 440022मो.9422811671