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महमूद फलाकी (जन्म: 22 मई 1951, ईरान) लेखक, कवि और समीक्षक। लगभग 30 पुस्तकें विभिन्न भाषाओं (फारसी और जर्मन) में प्रकाशित। ईरान में अपने राजनीतिक और साहित्यिक विचारों के कारण जेल की सजा भी भुगती। 1983 में जर्मनी आकर बस गए और यहां उन्होंने लेखन और शोध यात्रा जारी रखी। |
श्रुति जैन लेखिका और अनुवादक। जर्मन भाषा की शिक्षक के रूप में कार्य। सेंटर फॉर फॉरेन लैंग्वेजेज, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत, हरियाणा में एसोसिएट प्रोफेसर। |

मैं इस बात का आदी हो चुका हूँ कि जर्मन, खासकर वृद्ध महिलाएं और पुरुष हर जगह मुझसे पूछते हैं कि मैं कहां से हूँ। शुरू-शुरू में यह बात मुझे खलती थी। क्यों ये हमेशा मुझसे मेरी राष्ट्रीयता के बारे में पूछते रहते हैं? क्या इनके पास बात करने के लिए इससे रोचक कोई और विषय नहीं है? लेकिन फिर मैंने भी धीरे-धीरे इस असहजता का आनंद उठाने का रास्ता निकाल लिया। स्थिति समान इसलिए नहीं थी, क्योंकि मुझे पूछने का अवसर नहीं मिलता था कि वे कहां से हैं।
कुछ समय तक मैं बस या मेट्रो में सफर करते हुए किसी भी वृद्ध पुरुष या महिला के सामने या साथ वाली जगह पर बैठने लगा। मैं हर बार उनके प्रश्नों का कोई अलग ही उत्तर देने लगा। कभी मैं तुर्कीवासी, कभी अरब, कभी पुर्तगाली तो कभी फ्रांसीसी बन जाता था। एक बार तो बेवेरियावासी भी बन गया था। कभी-कभी मैं अपनी असल राष्ट्रीयता का खुलासा भी कर देता था। बस इसी प्रकार मैं अपने इस राष्ट्रीयता-खेल का मन ही मन लुत्फ उठाने लगा। मैं इस बात का शुक्रगुजार हूँ कि मेरी अजनबीयत के कारण लोग मुझसे बात करते थे। और इसी तरह मैं कहीं सफर करते हुए या किसी लाइन में खड़े हुए कभी ऊबता नहीं था।
एक बार मेट्रो से यात्रा करते हुए अपनी मात्र उपस्थिति से उकसाने के लिए मैं फिर से वृद्ध लोगों को ढूंढ़ने लगा, ताकि वे मुझसे फिर से मेरी राष्ट्रीयता पूछें। मैं एक लगभग 80 वर्षीय महिला के पास जाकर बैठ गया। उनसे बातचीत के दौरान, जिसका मैं यहां वर्णन कर रहा हूँ, मैंने सारे सवालों के उत्तर सचाई से और सही-सही दिए। इस गुफ्तगू के बाद मैंने फिर कभी इस प्रकार के संपर्क नहीं ढूंढ़े-
‘आप कौन-से देश से हैं?’
‘मैं फारस से हूँ।’
‘ब्राजील? लेकिन आप आदिवासी जैसे तो नहीं दिखते!’
‘नहीं, ईरान।’
‘ओह, ईरान! तो मुसलमान हैं?’
‘नहीं!’
‘नहीं? तुर्की में ईसाई भी होते हैं क्या?’
‘पर मैं तुर्की से नहीं हूँ।’
‘ओह, तो कहां से हैं आप?’
‘जैसे मैंने पहले भी बताया- फारस से, ईरान से!’
‘मेरा मतलब है, क्या ईरान में भी ईसाई रहते हैं?’
‘जी हां, रहते हैं।’
‘क्या आपको ईसाई होने के कारण अपने देश में उत्पीड़ित किया गया?’
‘लेकिन मैं ईसाई नहीं हूँ।’
‘अच्छा नहीं हो? तो क्या हो? यहूदी हो?’
‘नहीं!’
‘क्या मतलब?’
‘ऐसा भी हो सकता है।’
‘अच्छा, शायद आप किसी संप्रदाय से हैं, जो अरब देशों में वर्जित है और जिसके अनुयायी उत्पीड़ित किए जाते हैं। क्या नाम था उसका? मैं भूल गई हूँ। उसके बारे में मैंने कहीं पढ़ा था।’
‘पर ईरान कोई अरब देश नहीं है।’
‘नहीं? पर आप तो सभी मुसलमान होते हैं न!’
‘ठीक वैसे ही जैसे यूरोपियन भिन्न-भिन्न देशों से होने के बावजूद सब ईसाई होते हैं, है न?’
‘कोई पक्का संप्रदाय है?’
‘शायद आपने बहाई संप्रदाय के बारे में पढ़ा होगा!’
‘शायद, मुझे लगता है वही होगा!’
‘नहीं, मैं बहाई भी नहीं हूँ।’
‘क्या हैं? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा।’
‘मुझे भी समझ में नहीं आ रहा।’
‘आपका धर्म क्या है?’
‘अब मेरी बारी है।
कौन-सी बारी?’
‘सवाल पूछने की।
‘कौन-सा सवाल?’
‘क्या यह जरूरी है कि हर कोई किसी धर्म को माने?’
‘ओह, तो आप कम्युनिस्ट हैं!’
संपर्क : सी-74, जिंदल ग्लोबल सिटी, सेक्टर-35, सोनीपत, हरियाणा-131001 मो.9910433089



A very interesting conversation indeed . One that reflects common perceptions about people who look different and do not follow the faith of the majority. . But this is not limited to Germans . It is universal . The light humour is a welcome change to most such narratives . Brilliantly translated .
किसी से भी बात करना शुरू करने से पहले ही हम `धारणा ‘ बनना चाहते हैं ।धर्म का ।