
अना मारिया मातुते
(1925-2014) प्रसिद्ध स्पेनी उपन्यासकार। बच्चों और युवाओं के लिए कई रचनाएँ लिखीं और उनकी रचनाओं में अक्सर बच्चों की दृष्टि से समाज की कठोर वास्तविकताओं को दिखाया गया है। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में ‘मासूम बच्चे’, ‘पहली स्मृति’, ‘भूला हुआ राजा गुदू’ , ‘मृत बच्चे’, ‘एबेल परिवार’ और ‘सैनिक रात में रोते हैं शामिल हैं।
शरद ऋतु के दौरान मैंने गांव में कुमारी लिओकाडिया के स्कूल में पढ़ाई की, क्योंकि मेरी सेहत ठीक नहीं थी और दादाजी ने मेरी शहर वापसी में देरी कर दी थी। ठंड के कारण मौसम सर्द था और जमीन कीचड़ से भरी हुई थी। कहीं आदमियों का कोई अता-पता नहीं था। मैं घर के भीतर ऊब गया, इसलिए मैंने दादाजी से स्कूल जाने की अनुमति मांगी। दादाजी ने सहमति दे दी। मैं गांव के बाहर स्थित उस लंबी, छोटी-सी सफेद चूने की इमारत की ओर गया, जिसकी छत पुआल की थी और जो धूप और बर्फ से झुलसी हुई थी।
कुमारी लिओकाडिया लंबी और मोटी थीं। उनका स्वभाव काफी कठोर था और उनके पैरों में बड़े-बड़े गोखरू थे, जो उन्हें इस तरह चलने पर मजबूर करते थे मानो कोई जंजीरें घसीट रहा हो। स्कूल की कक्षाओं में छत और खिड़कियों पर टपकती बारिश के साथ, तूफान की चिपचिपी मक्खियां बल्ब के चारों ओर एक-दूसरे का पीछा करती हुई अपना एक अलग ही आकर्षण पैदा कर रही थी। मुझे विशेष रूप से लगभग दस वर्ष का एक लड़का याद है, जो एक बेहद गरीब बटाईदार का बेटा था और जिसका नाम इवो था। वह नीली आंखों वाला एक दुबला-पतला लड़का था, जो बोलते समय हल्का-सा भेंगा दिखता था। स्कूल के सभी लड़के-लड़कियां इवो की प्रशंसा करते थे और उससे थोड़ी ईर्ष्या भी करते थे, क्योंकि उसमें हर समय सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेने का एक अनोखा गुण था। ऐसा नहीं था कि वह बहुत बुद्धिमान या मजाकिया था, फिर भी उसमें कुछ ऐसा था, शायद उसकी आवाज में, शायद उसकी बातों में, जो सुनने वाले को मोह लेता था। कुमारी लिओकाडिया भी उस चांदी के जाल में फंस जाती थीं, जो इवो अपनी घुमावदार बातों से अपने श्रोताओं के लिए बिछा देता था। मुझे लगता है कि कई बार अपनी इच्छा के विरुद्ध- वह इवो को ऐसे काम या विशेष सम्मान सौंप देती थीं, जिनके अधिक हकदार मेहनती और अध्ययनशील छात्र होते थे।
शायद इवो से सबसे अधिक ईर्ष्या जिस बात से की जाती थी, वह थी छोटी मीनार की बहुप्रतीक्षित चाबी का उसके पास होना। यह वास्तव में स्कूल के एक कोने में स्थित एक छोटी-सी मीनार थी, जिसके भीतर पढ़ने की किताबें रखी जाती थीं। इवो ही वहां जाकर उन्हें निकालता था और कक्षा समाप्त होने पर उन्हें फिर से वहीं रख आता था। कुमारी लिओकाडिया ने यह जिम्मेदारी उसी को सौंपी थी, वास्तव में कोई नहीं जानता कि क्यों।
इवो को इस विशेष सम्मान पर बहुत गर्व था, और वह दुनिया में किसी भी कीमत पर इसे छोड़ने को तैयार नहीं था। एक दिन स्कूल के सबसे मेहनती और अध्ययनशील छात्र, माटेओ हेरेडिया, ने इस काम की जिम्मेदारी लेने का अनुरोध किया। हम सभी छोटे टॉवर के उस रहस्यमय भीतरी हिस्से से बहुत रोमांचित थे, जहां हम कभी प्रवेश नहीं करते थे और कुमारी लिओकाडिया मानो सहमत होती हुई दिखाई दीं। लेकिन इवो उठ खड़ा हुआ और शिक्षिका के पास जाकर, अपनी आदत के अनुसार, धीमी आवाज में बात करने लगा, आंखों को हल्का-सा टेढ़ा करते हुए और हाथों को बहुत हिलाते हुए। शिक्षिका कुछ क्षणों तक दुविधा में रहीं और अंत में बोलीं:
-सबकुछ पहले जैसा ही रहने दो। इवो ही छोटे टॉवर की देखभाल करता रहे।
स्कूल से निकलते समय मैंने उससे पूछा-
-तुमने शिक्षिका से क्या कहा?
-इवो ने मुझे तिरछी नजर से देखा, और मैंने उसकी नीली आंखों में चमक देखी।
-मैंने उसे सुनहरे पेड़ के बारे में बताया। मुझे बड़ी जिज्ञासा हुई।
-कौन-सा पेड़?
ठंड थी और रास्ता नम था; बड़े-बड़े गड्ढे दोपहर की फीकी धूप में चमक रहे थे। इवो रहस्यमय मुस्कान के साथ उनमें छपछपाने लगा।
-अगर तुम यह किसी को न बताओ
-मैं कसम खाता हूँ, किसी को नहीं बताऊंगा।
तब इवो ने मुझे समझाया।
-मैं एक सुनहरा पेड़ देखता हूँ। पूरी तरह सोने का पेड़- शाखाएं, तना, पत्तियां जानते हो? उसकी पत्तियां कभी नहीं गिरतीं। गर्मियों में भी, सर्दियों में भी- हमेशा। वह इतना चमकता है कि मुझे आंखें बंद करनी पड़ती हैं, नहीं तो दर्द होने लगता है।
-तुम कितने झूठे हो! -मैंने कहा, हालांकि कुछ बेचैनी के साथ। इवो ने मुझे हिकारत से देखा।
-इसे मत मानो! -उसने कहा। तुम भरोसा करो या न करो, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कोई भी कभी भी छोटे टॉवर में प्रवेश नहीं करेगा। मैं किसी को भी अपना सुनहरा पेड़ देखने नहीं दूंगा! यह मेरा है! कुमारी लिओकाडिया यह जानती है। वह माटेओ हेरेडिया या किसी को भी चाबी देने की हिम्मत नहीं करती जब तक मैं जीवित हूँ, कोई भी वहां प्रवेश नहीं कर पाएगा और मेरे पेड़ को नहीं देख पाएगा।
उसने इसे इस तरह कहा कि मैं उससे पूछे बिना नहीं रह सका।
-और तुम इसे कैसे देखते हो?
-आह, यह आसान नहीं है, उसने रहस्यमय भाव से कहा। साधारण कोई इसे नहीं देख पाएगा। मैं ठीक-ठीक दरार जानता हूँ।
-दरार?
-हां, दीवार में एक दरार है। दाईं ओर वाली दराज के साथ-साथ चलती हुई। मैं झुक जाता हूँ और घंटों वहीं रहता हूँ। पेड़ कितना चमकता है! कितना चमकता है! देखो, अगर कोई पक्षी उस पर आकर बैठ जाए, तो वह भी सोना बन जाता है। मैं अपने-आप से यही कहता हूँ: अगर मैं किसी शाखा पर चढ़ जाऊं, तो क्या मैं भी सोना बन जाऊंगा? मुझे नहीं पता था कि उससे क्या कहूं, लेकिन उसी क्षण से उस पेड़ को देखने की मेरी इच्छा इस कदर बढ़ गई कि वह मुझे बेचैन करने लगी। हर दिन, पढ़ने की कक्षा समाप्त होने पर, ईवो अध्यापिका की दराज के पास जाता, चाबी निकालता और छोटी मीनार की ओर चला जाता। जब वह लौटता, तो मैं उससे पूछता:
-क्या तुमने उसे देखा?
-हाँ, वह जवाब देता। और कभी-कभी कोई नई बात भी जोड़ देता:
-कुछ अजीब फूल निकल आए हैं। देखो, इतने बड़े, कम से कम मेरे हाथ जितने और लंबी पंखुड़ियों वाले। मुझे लगता है यह फूल अरजादु जैसा है।
-ठंड का फूल! -मैंने आश्चर्य से कहा, लेकिन अरजादु तो लाल होता है!
-बहुत ठीक, उसने धैर्य भरे भाव से सिर हिलाया लेकिन मेरे पेड़ में वह शुद्ध सोना है।
और फिर, अरजादु तो सड़कों के किनारे उगता है और वह कोई पेड़ नहीं है।
उससे बहस करना असंभव था। वह हमेशा सही होता था या कम से कम ऐसा ही लगता था।
फिर कुछ ऐसा हुआ जिसे मैं भीतर ही भीतर चाहता था; इसे महसूस करने में मुझे शर्म आती थी, लेकिन सच यही था: ईवो बीमार पड़ गया, और मिस लिओकादिया ने छोटी मीनार की चाबी किसी और को सौंप दी। सबसे पहले वह माटेओ हेरेदिया के हाथ लगी। पहले ही दिन मैंने उसकी वापसी पर नजर रखी और उससे पूछा:
-क्या तुमने कोई सुनहरा पेड़ देखा है?
-क्या बकवास चिल्ला रहे हो? -उसने बदतमीजी से जवाब दिया। वह अच्छा लड़का नहीं था और खासकर मेरे लिए तो बिलकुल नहीं। मैं उसे समझाना चाहता था, लेकिन उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।
कुछ दिनों बाद उसने मुझसे कहा:
-अगर बदले में मुझे कुछ दोगे, तो मैं थोड़ी देर के लिए तुम्हें चाबी दे सकता हूँ। तुम अवकाश के समय जा सकते हो। कोई तुम्हें नहीं देखेगा
मैंने अपनी गुल्लक खाली कर दी और आखिरकार वह लालायित चाबी मेरे हाथ में आ गई। जब मैं मीनार के छोटे से कमरे में दाखिल हुआ, तो उत्तेजना से मेरे हाथ कांप रहे थे। वहां दराज थी। मैंने उसे एक ओर सरकाया और अंधेरे में दरार को चमकते देखा। मैं झुका और भीतर झांका।
जब रोशनी की चकाचौंध बंद हुई, तो मेरी दाहिनी आंख को केवल एक ही चीज दिखाई दी- मैदान की सूखी धरती, जो आकाश की ओर फैलती चली जा रही थी। और कुछ नहीं। वही दृश्य, जो ऊंची खिड़कियों से दिखाई देता था। नंगी, बंजर जमीन और जमीन के अलावा कुछ भी नहीं।
मुझे गहरी निराशा हुई और यह दृढ़ विश्वास हो गया कि मेरे साथ धोखा हुआ है। मुझे नहीं पता था कैसे या किस तरह, लेकिन मुझे ठगा गया था।
मैं चाबी और सुनहरे पेड़ दोनों को भूल गया। बर्फ पड़ने से पहले मैं शहर लौट आया।
दो गर्मियों के बाद मैं फिर पहाड़ों में लौटा।
एक दिन, कब्रिस्तान से गुजरते हुए शाम हो चुकी थी और आकाश में रात के आने के संकेत थे: सूरज, एक लाल गेंद की तरह, दूर मैदान की उस भयानक और शांत दौड़ की ओर डूब रहा था, मैंने कुछ अजीब देखा। चिकनी और पथरीली धरती से, गिरी हुई क्रॉसों के बीच, एक बड़ा और सुंदर पेड़ उग आया था, जिसकी चौड़ी पत्तियां सोने की थीं, पूरा का पूरा दमकता हुआ, चमकदार, आंखों को चौंधिया देने वाला।
मुझे कुछ याद आया, किसी सपने की तरह और मैंने सोचा:
यह एक सुनहरा पेड़ है।
मैंने पेड़ के नीचे खोजा, और ज्यादा देर नहीं लगी जब मुझे बारिश से जंग लगा हुआ, काले लोहे का एक छोटा सा क्रॉस मिल गया। जैसे ही मैंने उसे सीधा किया, उस पर लिखा पढ़ा:
ईवो मार्केज, दस वर्ष का।
और मुझे कोई दुख नहीं हुआ बल्कि शायद एक अजीब-सी, बहुत गहरी खुशी महसूस हुई।
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अनुवादक शाइस्ता प्रवीण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी। लैटिन अमेरिकी साहित्य में शैली अध्ययन, लिंग अध्ययन, स्मृति और पहचान इनके क्षेत्र हैं। मैक्सिकन ऑटोफिक्शन लेखन पर शोध। |
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