चोई-इन-हो  (1945-2013)
दक्षिण कोरिया के प्रसिद्ध उपन्यासकार और पटकथा लेखक। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में कोरियाई साहित्य और सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान। उनके लेखन में आधुनिकता, आध्यात्मिकता, और मानव संघर्ष जैसे विषय प्रमुखता से उभरते हैं। कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ : ‘होमलैंड ऑफ द स्टार्स’, ‘द पाथ विदाउट ए पाथ’,  ‘द विंडमिल ऑफ माइ हर्ट’, (उपन्यास), ‘डीप ब्लू नाइट’, ‘स्ट्रेंज  पिपुल’, ‘ए स्ट्रेंजर्स रूम’ (कहानी संग्रह)। प्रस्तुत कहानी ‘चिनार का पेड़’ (द पापलर ट्री) उनके कहानी संग्रह  ‘स्ट्रेंज पीपुल’ की तीन संबद्ध कहानियों में से एक है। यह एक दंतकथा है जिसमें जादुई यथार्थवाद के तत्व निहित हैं।

वह एक गैर मामूली आदमी था। किसी समय वह ऊंची कूद का खिलाड़ी था। जब वह अपने उत्कर्ष पर था, तब नियमित रूप से 2.3 मीटर ऊंचा कूद लेता था। गांव का कोई भी आदमी उसका मुकाबला नहीं कर पाता था। उसका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2.4 मीटर था। कोई कितना भी लंबा क्यों न हो, वह उसके ऊपर से कूद सकता था। वह तो अपनी शर्ट की आस्तीन को बिना समेटे और अपने शरीर को झटका दिए बिना ही किसी दीवार को आसानी से लांघ जाता था। वह शानदार व्यक्ति था। ऐसे लोग बहुत ही कम देखने को मिलते हैं।

एक समय तो हर किसी को लगने लगा था कि वह नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित करेगा। लेकिन वह पेशेवर एथलीट नहीं था। वह एक लोहार था और हंसिया, खुरपी, हथौड़ी, कुल्हाड़ी जैसे रोजमर्रा के काम में आनेवाले तरह-तरह के लोहे के औजार बनाया करता था।

गांव के लोग उसकी ऊंची कूद देखना पसंद करते थे। हम अक्सर उससे कूदने के लिए कहते थे। लेकिन चूंकि वह कोई पेशेवर खिलाड़ी नहीं था, इसलिए हमने उसके लिए वह ऊंची कूद की बार नहीं बनाई थी, जो छूने पर गिर जाती है, और न ही उनके उतरने के लिए भुरभुरी मिट्टी का गड्ढा तैयार किया था।

इसके बजाय हम उसे एक ऊंची झाड़ी की बाड़ को फांदने के लिए कहते, या हम में से कोई सबसे लंबा लड़का खड़ा हो जाता और हम उसे उसके ऊपर से कूदने की चुनौती देते।

लेकिन वह बात-बात पर अक्सर कूदने के लिए तैयार नहीं होता था। साथ ही, वह यह नहीं चाहता था कि लोग सोचें कि ऊंची कूदने की प्रतिभा ने उसे अहंकारी बना दिया है। लेकिन उसे कूदने के लिए तैयार करने का एक नायाब तरीका हमने भी खोज लिया था। हम किसी ऊंची चीज को दिखाकर कहते कि इसे फांद कर दिखाओ। और तब वह आनन-फानन में हमारी चुनौती स्वीकार कर लेता और कूदने को तैयार हो जाता।  वह अपनी कमीज उतारता, कूदने वाली वस्तु के सामने झुकता, और फिर तेज रफ्तार से दौड़ते हुए सन्न से पागल भंवर की तरह उड़ते हुए, हवा पर सवार होकर उस वस्तु के ऊपर से एकदम साफ कूद जाता। अपनी ऊंची छलांग में वह एक बार भी असफल नहीं हुआ। सचमुच, वह एक अद्भुत व्यक्ति था।

और चूंकि हम उसे अद्भुत व्यक्ति मानते थे, इसलिए हमने खुद को यह विश्वास दिला लिया था कि एक दिन वह स्कूल के खेल मैदान के झंडे के खंभे को भी पार कर लेगा।

जहां तक मेरी बात है, मैं तो यह विश्वास करने लगा था कि एक दिन वह एक ही छलांग में ऊंचे पहाड़ को भी लांघ लेगा। एक ही छलांग में वह आकाश में तैरते बादलों को पार कर जाएगा, आकाश में चमकने वाले सितारों को तोड़ लाएगा और उन्हें हमारे कदमों में बिछा देगा। और यदि वह चाहे तो, एक ही छलांग में न केवल पहाड़ की दूर वाली चोटी पर रेंगती गोधूलि की लाल-स्याह छटा के ऊपर से होते हुए छलांग लगा लेगा, अपितु बारिश के बाद पश्चिमी आकाश में प्रकट होने वाले किसी लड़की के सैकतोंग जैकेट (खासकर बच्चों के लिए बनाया जानेवाला रंगीन धारियों वाला पारंपरिक कोरियाई जैकेट) की धारियों जैसे चमकदार इंद्रधनुष को भी लांघ लेगा।

‘अंकल, क्या आप उस इंद्रधनुष के ऊपर से कूद सकते हैं?’ हम उससे पूछते।

‘बिलकुल कूद सकता हूँ, अगर यहां बहुत दूर क्षितिज तक फैला हुआ एक रनवे हो, तो अवश्य कूद सकता हूँ।’ वह आत्मविश्वास से जवाब देता।

लेकिन वह 2.4 मीटर से ऊंचा नहीं कूद सकता था। अब तक वह बस उतना ऊंचा ही कूद पाया था। यह हमारे स्कूल के खेल मैदान में सबसे ऊंचे चिन-अप बार की ऊंचाई भी थी। हममें से कोई भी जमीन से छलांग लगाकर उस बार को छू तक नहीं सकता था।

भला आदमी होने के बावजूद उसकी खुशियों पर जैसे ग्रहण लग गया। एक गर्मी में, उसके तीनों लड़के नदी में खेलते समय एक साथ डूब गए। पहले सबसे छोटा डूबा और फिर उसे बचाने की कोशिश में बड़े बच्चे भी डूब गए। इस खबर ने उसकी पत्नी को पागल कर दिया, और अंततः वह लापता हो गई। फिर औरतों का सामान बेचने वाले एक फेरीवाले ने, जो महीने में एक बार गांव आता था, बताया कि उसने उसे देखा था-एक बार समुद्र तट पर, एक बार किसी कब्र के पास और कभी-कभार नदी के किनारे। और उसने हमें यह भी बताया कि उस औरत के पूरे शरीर पर खुरदुरे शल्क उभर आए थे-लेकिन हमने उसकी बात पर तनिक भी विश्वास नहीं किया।

अपने बच्चों और पत्नी को खोने के बाद, वह व्यक्ति थोड़ा अजीब हो गया। वह अब भी घोड़े की नाल, हंसिया, और हथौड़ी बनाता था, लेकिन उसकी हंसिया घास नहीं काट पाती और उसकी हथौड़ी कील नहीं ठोक सकती थी। उसने ऊंची कूद भी बंद कर दी। लोग उसका मजाक उड़ाने लगे। अब तो वह छोटे नाले को भी पार नहीं कर सकता था, जिसे हम बच्चे आसानी से कूदकर पार कर लेते थे।

हालत यह हो गई कि वह अपनी दुकान में पूरा दिन धौंकनी चलाने में बिता देता, लेकिन कुछ भी नहीं बना पाता, यहां तक कि घोड़े की एक नाल भी नहीं।

वह पागल हो गया है, सभी गांव वाले उसका मजाक उड़ाते थे। लेकिन हम हमेशा उसके हमदर्द रहे-वह हमारा सच्चा हीरो जो था।

मैं अब भी विश्वास करता था कि अगर वह चाहे तो झंडे के खंभे के ऊपर से कूद सकता है, और एक दिन वह इंद्रधनुष के खूबसूरत रंगों को बिना छुए पार कर जाएगा। जब भी मौका मिलता, हम उससे कहते कि वह हमारे लिए सबसे ऊंचे चिन-अप बार के ऊपर से कूदे। लेकिन अब वह सिर हिला कर इंकार कर देता और कहता, ‘मेरे बच्चो, अब मैं ऊंचा कूद नहीं सकता-मेरे पैरों में जंग लग गया है।’

लेकिन हम उसके कहे पर विश्वास नहीं करते। वह हमारी आशा का केंद्रबिंदु जो था।

‘अरे अंकल, आप कूद सकते हैं। ऊंची कूद के मामले में आपसे किसी और की कोई तुलना हो ही नहीं सकती।’

वह हमें निराश नहीं करना चाहता था, इसलिए अंतत: वह कूदने के लिए राजी हो ही गया। हमारे साथ खेल के मैदान में जाकर उसने एक तेज दौड़ लगाई, और वह हवा में उड़ गया। लेकिन उसकी छलांग बेहद छोटी थी। उसकी टांग बार से टकरा गई, और वह चीखते हुए जमीन पर गिर पड़ा, जिससे उसकी टांग टूट गई।

उसकी टांग ठीक होकर भी फिर पहले जैसी नहीं हो पाई। वह चलते समय लंगड़ाने लगा था। अब वह 30 सेंटीमीटर ऊंची छलांग भी नहीं लगा सकता था। अब तो एक मेढक भी उससे ऊंची छलांग लगा सकता था। उसकी हालत इतनी दयनीय हो गई कि वह एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर छलांग लगाकर नाले को भी पार नहीं कर पाता था।

एक दिन उसने अपने आंगन में चिनार का एक बिरवा रोपा। इस काम में मैंने उसकी मदद की। लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। उसने पहले वहां टमाटर, बैंगन, मिर्च और लौकी के पौधे लगाए थे और अपनी रसोई में इन्हीं सब्जियों का उपयोग कर किसी तरह अपना पेट भर रहा था। ऐसे में फल न देनेवाले चिनार का पौधा लगाने का विचार उसे कैसे आया, यह मेरी समझ से परे था।

आखिरकार, मैंने उससे पूछ ही लिया, ‘अंकल, चिनार का पेड़ बाकी सभी पेड़ों से ज्यादा तेजी से बढ़ता तो है और काफी ऊंचा भी होता है, लेकिन चिनार का पेड़ तो फल नहीं देता। इसकी जगह आप सेब या आड़ू का पेड़ क्यों नहीं लगाते?’

‘नहीं छोटे, अब मैं भूखा नहीं रहता। जरूरत के मुताबिक टमाटर और आलू मेरे पास हैं।’ उसने मुस्कुराते हुए कहा।

‘फिर भी, चिनार क्यों लगा रहे हैं?’

‘ताकि मैं ऊंची छलांग लगा सकूं।’

इतना कहकर वह उस नए लगाए हुए पौधे के पास लंगड़ाते हुए गया और उस नन्हे पौधे के ऊपर से छलांग लगाई।

‘देखो, मैंने उस पेड़ के ऊपर से छलांग लगा दी – मैंने छलांग लगा ली।’

‘लेकिन अंकल, उसके ऊपर से मैं भी छलांग लगा सकता हूँ।’ इतना कहते हुए मैंने गर्व से यह काम कर दिखाया।

‘लेकिन हर दिन यह पेड़ थोड़ा और ऊंचा होगा। एक साल में यह तुम्हारे जितना ऊंचा हो जाएगा। दो साल में यह उस चिन-अप बार के जितना ऊंचा होगा, तीन साल में झंडे के खंभे जितना, चार साल में बिजली के खंभे जितना और पांच साल में यह आसमान तक पहुंच जाएगा। हर दिन मैं इस पेड़ पर छलांग लगाने वाला हूँ। अगर मैं ऐसा करता रहा, तो एक दिन मैं आसमान जितनी ऊंची छलांग लगा सकूंगा।’

वह प्रतिदिन उस पौधे को सींचता था और उसे शीघ्र बड़ा होने की दिली ख्वाहिश करता था। उसकी प्रत्याशा के अनुसार पौधा निरंतर बढ़ा भी, लेकिन खिलने पर रातोंरात बढ़ती हुई लगनेवाली मॉर्निंग ग्लोरी की तरह उसकी बाढ़ महसूस नहीं होती थी। इसकी वृद्धि दिखती नहीं थी-ठीक उसी तरह जैसे घड़ी की घंटे वाली सुई चलती हुई प्रतीत नहीं होती और हर दिन वह पेड़ के ऊपर से कूदता था, लंगड़ाहट के बावजूद।

एक साल बाद, चिनार का पेड़ मेरे जितना लंबा हो गया था। इसकी हरी-भरी पत्तियां हवा में ऐसे कांपतीं, जैसे खेल के मैदान में स्कूल के बच्चे फर्न जैसी अपनी हथेलियां हिलाकर उत्साह से तालियां बजा रहे हों।

‘देखो’, उसने गर्व से कहा, ‘मैं पेड़ के ऊपर से कूद रहा हूँ।’

और मेरी आंखों के सामने ही वह आधा दौड़ा, आधा लंगड़ाया, और फिर चिनार के ऊपर से छलांग लगा दी।

हम भी बड़े हो रहे थे इसका पता भी हमें नहीं चल पाया। हममें से कुछ लोग पहले ही गेहूं के खेतों में छिपकर सिगरेट पीने लगे थे और अब उसकी ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। हम धीरे-धीरे नई खुशियों का स्वाद चख रहे थे, ज्यादा दिलचस्प चीजें खोज रहे थे। उन सुखों के प्रति हमारी जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही थी, जिनका हमने कभी अनुभव नहीं किया था- मसलन शराब, तंबाकू, लड़कियां वगैरह। हमारे गुप्तांगों के आसपास उग रहे घने काले बाल यह मुनादी करने लगे थे कि हम भी जवान हो रहे हैं।

एक मैं ही था, जो उससे मिलने जाता रहा, और सिर्फ मेरे लिए ही वह आधा लंगड़ाते हुए, आधा दौड़ते हुए चिनार के पेड़ तक जाता और उसे फलांग जाता।

दो साल बाद चिनार मुझसे भी लंबा हो गया था और अब वह लोअर चिन-अप बार जितना ऊंचा हो गया था। उन्हीं दिनों मैं एक लड़की से प्रेम करने लगा था। उसकी खूबसूरती मुझे आकर्षित करती थी। गाहे-बगाहे मैं उससे प्रेम की याचना किया करता था। लेकिन एक दिन धान के खेतों के बीच मेड़ों पर चलते हुए उसने मेरे कानों में फुसफुसाकर कहा, ‘मैं तुमसे प्यार नहीं करती, और मैं तुम्हें पसंद भी नहीं करती। मुझे उसके अलावा कोई पसंद नहीं।’ यह कहकर उसने सुनहरे धान के खेत बीच खड़े एक बिजूके की ओर इशारा किया। ‘मैं उससे शादी करने वाली हूँ। मैं उसके बच्चे की मां बनूंगी।’

शरद ऋतु में धान के खेतों में अनगिनत बिजूके खड़े थे। लकड़ी पर पुआल लपेट कर बने उनके धड़ के ऊपर हंडीवाला सिर और सिर पर किसान की फटी-पुरानी टोपी हुआ करती थी। लेकिन चिड़ियों के झुंड उनसे जरा भी नहीं डरते थे। मेरी समझ में यह नहीं आया कि उस लड़की ने यह क्यों कहा कि वह एक बिजूके से प्यार करती है।

कई दिनों तक मैं अकेला धान के खेतों में गया और अपने हाथ फैलाकर एक बिजूके की तरह खड़ा रहा। और उन्हीं दिनों में से एक दिन मैंने देखा कि बिजूका बने एक आदमी ने लड़की को अपने आलिंगन में ले लिया। फिर उन्होंने अपने कपड़े उतारे और धान के घने खेत में एक-दूसरे में लिपटकर सहवास में लिप्त हो गए। बाद में वह लड़की उस आदमी के बच्चे की मां बनी, बिजूके की नहीं।

लड़की मुझसे झूठ बोली थी।

अपना दुख भुलाने के बाद मैं फिर लोहार से मिलने गया।

‘अब बस देखते जाओ, मैं इस पेड़ को लांघने वाला हूँ’, उसने कहा। ‘मैं इसके ऊपर से होकर कूद सकता हूँ।’

वह लंगड़ाते हुए पेड़ के पास गया और उसके ऊपर से होकर कूद गया।

‘कहा था न मैंने? मैं इस पेड़ के जितना ऊंचा भी कूद सकता हूँ। हां, कूद सकता हूँ।’

लेकिन अब वह बूढ़ा हो चला था, झुक गया था। पूरी तरह बुढ़ा गया था। और यही उसकी सीमा थी। उसके केवल दो दांत बचे थे। उसके तीनों बच्चे बहुत पहले मर चुके थे, और उसकी पत्नी अब तक वापस नहीं आई थी।

‘मैंने उसकी पत्नी को देखा है।’ महिलाओं की चीजें बेचने वाले फेरीवाले ने बताया।

‘वह समुद्र के किनारे रेत से, चावल से बनाए जानेवाले केक जैसे केक बनाती है और उन्हें बाजार में बेचती है। मैंने एक केक चखा भी-उसका स्वाद लाजवाब था! तुम्हारा पति तुम्हारी राह देख रहा है।’ मैंने उससे कहा था, ‘मेरे साथ वापस क्यों नहीं चलती?’ और मेरी बात पर उसने कहा-

‘तुम उससे कह देना कि वह मेरी प्रतीक्षा करे। वह तब तक प्रतीक्षा करे, जब तक मैं सारी रेत से चावल जैसे केक बनाकर उन्हें बेच न लूं।’

तीन साल बाद, चिनार का पेड़ झंडे के खंभे जितना ऊंचा हो चुका था। देखने में बहुत सुंदर लगता था। उसकी जड़ें मजबूती से जमीन की गहराई तक गई हुई थीं, और उसकी हरी-भरी टहनियां दूर-दूर तक फैली हुई थीं। उसकी पत्तियां किसी हृष्ट-पुष्ट आदमी के चौड़े सीने पर उगे घने बालों के समान घनी थीं।

उसके बरक्स लोहार अब बहुत बूढ़ा आदमी हो चुका था। अब वह मृत्यु के द्वार तक पहुंच चुका था। अब उसके मुंह में बस एक ही दांत बचा था।

‘अच्छा लगा तुम्हें देखकर, छोटे। ध्यान से देखो, मैं इस पेड़ के ऊपर से कूदने वाला हूँ।’

वह अब भी मुझे ‘छोटे’ कहकर बुलाता था। अफसोस, मैं अब छोटा नहीं था- मैं अब एक जवान आदमी था।

उसने धीमी रफ्तार में लड़खड़ाते हुए दौड़ना शुरू किया। फिर पेड़ के पास आकर अचानक हवा में ऊपर उठा, जैसे कोई पक्षी उड़ान भर रहा हो-हल्की हवा को चीरता हुआ, जैसे चांदी के फर का कोई नुकीला तिनका हो। वह चिनार के ऊपर से चला गया।

‘देखा! तुमने देखा न? मैंने कूद कर पार कर लिया!’

चार साल बाद, चिनार आसमान तक ऊंचा हो गया था। काश, आपने उसे देखा होता-उसकी फुनगी अब दिखाई ही नहीं देती थी। उसकी शाखाओं में पक्षियों ने तिनकों और घास-फूस से घोंसले बना लिए थे और वहां अंडे दे रखे थे।

नीचे फैले बादल उसके बीचों-बीच लिपटे रहते थे। गर्मियों में पूरा गांव उसके नीचे आकर झपकी लेता था; उसकी छाया इतनी घनी और दूर-दूर तक फैली रहती कि बैठने की जगह के लिए किसी को झगड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी।

‘मैंने लोहार की पत्नी को बादलों के ऊपर देखा। वह सबसे ऊंची शाखाओं पर बनी एक झोपड़ी में रहती है। उसके तीन बच्चे भी हैं, सच में। अगर यकीन नहीं होता, तो खुद चढ़कर देख लो!’ गांव का एक शरारती लड़का कह रहा था। वह पेड़ पर चढ़कर उससे लिपटे बादलों को पार कर बिलकुल ऊपर तक पहुंच गया था।

लेकिन अब मैं छोटा बच्चा नहीं था। मेरा शरीर अब उतना हल्का नहीं रहा था कि मैं पेड़ पर चढ़कर देख पाता कि बादलों के ऊपर की दुनिया सच में वैसी ही थी, जैसी उस लड़के ने बताई थी।

जब मैंने अगली बार लोहार को देखा, तो वह पूरी तरह बूढ़ा हो चुका था। उसका आखिरी बचा हुआ दांत भी गिर गया था।

‘अच्छा-अच्छा, छोटे’, मुझे देखते ही उसने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा। ‘जब तुम छोटे थे, तब तुम मुझसे पूछते थे कि क्या मैं बादलों के ऊपर कूद सकता हूँ-याद है न?’

‘हां, दादा जी, मुझे अच्छी तरह याद है’, मैंने कहा।

‘तो बस, अब तुम्हारे पास मौका है देखने का। मैं इस पेड़ के ऊपर से कूदने वाला हूँ।’

वह धीरे-धीरे लड़खड़ाते हुए बहुत दूर से दौड़ता हुआ आया और फिर अचानक हवा में ऊपर उठ गया। ऐसा लगा जैसे आसमान ने उसे अपनी ओर खींच लिया हो।

मैं श्रद्धा से उस पेड़ की फुनगी की ओर देखता रहा, जिसे वह पार कर गया था। लेकिन वह कहीं नजर नहीं आया। मैंने बहुत देर तक उसके जमीन पर आने की प्रतीक्षा की। लेकिन वह कभी नीचे नहीं आया।

शुरुआत में, मुझे लगा कि चिनार इतना ऊंचा था कि उसकी फुनगी तक देख पाना मुमकिन नहीं था। इसलिए मैं सूर्यास्त तक उसके लौटने की प्रतीक्षा करता रहा। लेकिन वह फिर भी नहीं लौटा।

फिर, बहुत देर बाद, ‘धप्’ की आवाज के साथ कोई वस्तु जमीन पर आ गिरी। मैंने उसे उठाया-वह एक घिसा-पिटा जूता था।

हाल ही में, मैं फिर अपने गांव गया था। अपने साथ अपनी पत्नी और दो बच्चों को भी लेते आया था।

गांव बदल चुका था, लेकिन चिनार का पेड़ अब भी वहीं खड़ा था। अजीब बात यह थी कि अब वह मुझे बहुत छोटा लग रहा था-जैसे उसकी बढ़त रुक गई हो। उसकी पत्तियां मुरझा चुकी थीं, उसकी टहनियां टूटी हुई थीं। वह डूबने से पहले तड़पने वाले दर्द में ऐंठे हुए व्यक्ति की तरह दिख रहा था।

वह फिर कब जमीन पर उतरते हुए हमारी आंखों के सामने प्रकट होगा, नहीं जानता। वह असाधारण आदमी क्या कभी धरती पर फिर लौटेगा, जिसने सबसे ऊंची छलांग लगाई थी, कौन जाने!

आज सुबह, मैं अपने आंगन में एक सेब का पेड़ लगाने जा रहा हूँ-एक ऐसा पेड़, जो बहुत, बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है। हर सुबह, मैं उस पेड़ के ऊपर कूदूंगा। और एक दिन, मैं भी बादलों के ऊपर छलांग लगाऊंगा और आखिरकार उससे उस दूसरी दुनिया में जाकर मिलूंगा-उस अनोखी जगह पर, जहां वह गायब हो गया था।

आखिरकार मैंने इस अंतिम रहस्य को पहचान लिया है। समझ लिया है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं, वह असल में एक पड़ाव है। यह एक ऐसी जगह है जहां हम उस दूरस्थ स्थान से छलांग लगाकर आए हैं, जहां हम पहले रहते थे, मैंने इस सत्य को समझ लिया है कि हम एक ऐसी धरती की ओर बढ़ेंगे, जो हमारी थकी हुई आत्माओं को हमेशा के लिए शरण देगी। हां, हम, हम सब संतुलित होकर लटके हुए हैं। हम सभी औंधे मुंह लटके हुए इस विश्वब्रह्मांड का चक्कर लगा रहे हैं।

विजय कुमार यादव
लेखक और अनुवादक। बांग्ला और असमिया से अनूदित एक-एक उपन्यास। असमिया से अनूदित एक कथा संग्रह का हिंदी अनुवाद तथा बच्चों की 4 पुस्तकों का हिंदी से बांग्ला अनुवाद प्रकाशित।

विजय कुमार यादव, सुरभि अपार्टमेंट, फ्लैट-3डी, 4/2, बनर्जीपाड़ा रोड, पो. तालपुकुर, बैरकपुर, उत्तर 24 परगना,  कोलकाता-700123