विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। भारतीय रेलवे सेवा में। 

हवा के ताल पे झूमता वृक्ष
सृष्टि का सबसे प्राचीन एवं निपुण नर्तक है
हर वृक्ष का अलग नृत्य
हर शाख की अलग भंगिमा
हर पात की अलग मुद्रा
पर सबकुछ एक लय में
एक क्रम में
एक बृहत्तर चित्र को पूरा करता हुआ
हवा का स्पर्श
वृक्ष के पोर-पोर में गुदगुदी लगा देती है
गुदगुदी उसके अंग-अंग में
थिरकन ला देती है
और वृक्ष नाचने लगता है
नृत्यरत वृक्ष
हवा के ताल से संगत बिठाने में कभी-कभी
इतना बेसुध नाच है
कि उखड़ जाते हैं जमीन से
उनके पांव तक
बांहों का टूटकर गिरना साधारण सी बात है।

संपर्क: प्रोफेसर कॉलोनी, बिलासी टाउन, बी-देवघर, झारखंड-814112; मो.9852821415