वरिष्ठ रचनाकार।अब तक दस कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक संपादित पुस्तक।नवीनतम कहानी संग्रहएक नदी थी यहां।एसोसिएट प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त।

दोनों को वयोवृद्ध कहा जाना चाहिए।पति की आयु अस्सी वर्ष हो गई है तो पत्नी भी पचहत्तर में चल रही है।एक तरह से दोनों ही अब जिंदगी को घिसट रहे थे।रिटायरमेंट से कुछ साल पहले ही दोनों ने तय कर लिया था कि पहाड़ के अपने गांव वापस नहीं जाएंगे।गांव में अब कुछ रखा-धरा भी नहीं था।सो इसी कस्बे में, जहां से वे बाद में रिटायर हुए थे, उन्होंने एक साफ-सुथरी-सी कॉलोनी में जमीन लेकर मकान डाल लिया था।मकान भी खूब चाव से बनवाया था, उसमें हर सुख-सुविधा का ध्यान रखा गया।जमीन इतनी ले ली थी कि आगे से अच्छा खासा लॉन भी निकल आया था।लॉन और लॉन में एक अदद झूला, उनका और पत्नी का मनोरम सपना रहा था।बच्चे तब पढ़ रहे थे।बेटा पंतनगर में था और वहां से इंजीनियरिंग कर रहा था।बेटी इंटर में थी और पास में ही रहकर पढ़ रही थी।

वह वक्त और था।प्रौढ़ता में भी युवा जैसा जोश था, ताकत थी।पर अब? समय ने जैसे फर्राटा मारा हो।बेटा इंजीनियरिंग कर विदेश चला गया।बेटी भी विदेश निकल गई।और उम्र ने उन्हें, उन दोनों को लगभग एक साथ विवश करना शुरू कर दिया था…।इस विवशता में दोनों के बीच जो रिश्ता उभरा था, वह पहले जैसा नहीं रह गया था, पहले से एकदम अलग था, भिन्न था।एक दूसरे की चिंता का था।

सुबह आज भी चार बजे के आसपास ही उठना होता है।वह जब रिटायर हुए थे, उन्होंने ही इस अभ्यास की शुरुआत की थी।बोले थे, ‘सुन सुनंदा, अब सुबह जल्दी उठकर टहलने जाया करेंगे, फिर थोड़ा-बहुत व्यायाम-प्राणायाम करेंगे।यह सब जरूरी है अब, ताकि आगे की बढ़ती उम्र में फिट रह सकें।क्यों?’

सुनंदा हँस दी थी।जल्दी उठने के नाम पर महा आलसी यह क्या सुबह उठा करेंगे।पत्नी ने सोचा था, पर आश्चर्य, पति अलार्म के साथ ही उठने लगे थे।शायद ही कभी कोताही हुई हो।

अब तो इस क्रम को सालों हो गए हैं।आदत बन गई है।अब अलार्म की जरूरत नहीं होती।अलार्म मानो भीतर दिमाग में बैठ गया हो।

सामान्यत: पत्नी की ही नींद पहले खुलती है।वह टॉर्च लगाकर घड़ी की ओर देखेंगी।चार बजने ही वाले हैं।बहुत आहिस्ता से, कुछ समय लेकर बिस्तर छोड़ेंगी, धीरे-धीरे।कोशिश होगी कि पति को किंचित भी उनके उठने की आहट न हो।वैसे भी, वह तुरंत उठ नहीं सकतीं।दोनों घुटने दुखते हैं।बिस्तर से उठते समय तो जैसे जकड़े हुए रहते हैं।कमर अलग से अकड़ी होती है।सो अपना पूरा समय लेकर उठेंगी, यथासंभव बिना किसी आहट के।आहिस्ता आहिस्ता दूसरे कमरे में स्थित टॉयलेट में जाएंगी ताकि कोई भी ऐसी आहट न हो कि पति की नींद खुले।बिजली की केतली में रात से ही पानी भरा रहता है, बस प्लग जोड़कर स्विच दबा देंगी।पानी जब तक गर्म होता है, स्टूल पर बैठकर दोनों हथेलियों से घुटनों को सहलाएंगी।जैसे उन्हें पुचकार रही हों।

पानी गर्म होते ही एक जग और दो गिलास के साथ डाइनिंग टेबल की ओर मुड़ेंगी।जब तक सोचेंगी कि पति महाशय को अब जगा दूं, वह टॉयलेट से निकलते हुए सामने नमूदार हो जाएंगे।

डाइनिंग चेयर पर बैठकर दोनों ही गर्म पानी का सेवन करते हैं।जाड़ों में तो गर्म पानी पीते ही थे, पर अब गर्मियों में भी गर्म पानी ही पीना पड़ रहा है।इस कोरोना ने तो जीवन की सारी क्रियाएं ही बदल कर रख दी हैं।

कई बार सोचते हैं, बल्कि अकसर ही, कभी उन्हें भी तो पहले उठने का मौका मिले, पर ऐसा बहुत कम हो पाता है।और कभी जब ऐसा होता है तो एक हाथ से पूरी मजबूती से पलंग का किनारा थामे बहुत आहिस्ते से उठते हैं।धीरे-धीरे।कुछ पल पलंग पर बैठे रहेंगे, बाद में अपने दोनों पांवों को जमीन पर रखेंगे।खड़े होते हुए ध्यान रखते हैं कि कहीं एकदम से लड़खड़ा न जाएं।एक बार ऐसा हादसा हो चुका है।सुबह पलंग छोड़ते समय लड़खड़ाकर जमीन पर गिर पड़े थे।गनीमत थी कि हड्डी नहीं टूटी थी।डॉक्टर ने सचेत किया था, ‘अब तपाक से उठकर खड़े होने की उम्र नहीं रही है आपकी।गनीमत है कि हड्डी बच गई है।लेकिन दस दिन तक आपको पूरा बेड रेस्ट करना होगा।और आगे के लिए ध्यान रखना होगा कि धीरे-धीरे उठें, आराम से।वरना परेशानी में पड़ सकते हैं।’

 

डॉक्टर की यह चेतावनी रोज सुबह याद आ जाती है।उस वक्त भी याद आई थी, सो पूरे सजग बने रहे थे।किसी तरह की आहट न हो, इसका भी ध्यान रखना था, वरना पत्नी जाग जाएगी।नींद में डूबे उसके चेहरे को लाड़ से देखते रहे।लगता है, नींद में कोई प्यारा सा सपना देख रही है।लाड़ और गहराया था।ज्यों ज्यों उम्र बढ़ रही है, पता नहीं यह लाड़ भी क्यों बढ़ता जा रहा है।

टॉयलेट से होकर जब तक रसोई में आए तो देखा पत्नी पानी का जग लेकर डाइनिंग चेयर पर बैठी है।अजब सी खिसियाहट हुई।सोचा था पत्नी को खुद जाकर जगाएंगे, लेकिन पत्नी है कि…।बोले कुछ नहीं।पत्नी ही बोली, ‘तुम्हारी नींद पहले खुलती है तो मुझे तुरंत जगा दिया करो।अपने आप मत उठा करो।तुम्हें सावधानी रखनी चाहिए।’

‘सावधानी रखकर ही तो उठता हूँ।अब एक बार उठते हुए गिर पड़ा हूँ तो बार-बार वैसा ही होगा, यह जरूरी है।’ वह थोड़ा नाराज होते हुए कहते हैं।पत्नी मुस्कराकर कहेंगी, ‘क्या कहा है डॉक्टर ने, याद नहीं है।सुनो, अब अस्सी साल के बूढ़े हो, जवान नहीं हो कोई।’

‘तुम कौन सी जवान हो? जो बात मुझ पर लागू होती है, वही तुम पर भी लागू होती है…’ जग से गिलास में पानी ढालते हुए वह बोले हैं।पत्नी ने भी अपना गिलास भर लिया है।चिढ़ाते हुए बोली है, ‘तुमसे पांच साल छोटी हूँ, सो तुम्हारी तुलना में तो जवान ही हूँ।’

वह गरदन हिलाते मुस्करा दिए थे।रात को कम से कम दो बार पेशाब के लिए उठना पड़ता है।जब भी पेशाब के लिए उठते हैं, पत्नी जैसे नींद में कुनमुनाती है…आराम से उठना।वह चकित रह जाते हैं।

पानी का कार्यक्रम समाप्त होता है।शौचादि से निवृत्त होकर बाहर लॉन में निकल आए।पहले सदा की तरह हाथ में डंडा थामे दोनों बाहर निकल जाते थे।अपनी सामान्य चाल में एक दूसरे का सहारा बने हुए लगभग दो कि.मी. की घुमाई कर लेते थे।हालांकि पत्नी घुटनों की वजह से तेज नहीं चल पाती।सुबह उठते वक्त तो लगता है कि बिलकुल ही नहीं चल पाएगी, पर धीरे-धीरे जकड़न कम होती है तो चल लेती है।डॉक्टर भी कहता है, हल्की गति में वॉक जरूरी है।कुछ व्यायाम भी बताए हुए हैं।दवाइयां तो खैर हुई ही।अब तो राशन-पानी में कम, दवाइयों पर पैसा ज्यादा खर्च होता है।

लेकिन अब बाहर निकलना, घूमना बंद हो गया है।कोरोना के तेज होते प्रकोप से शहर एकदम ठहराव पर आ गया है।सो अब अपने लॉन पर ही सुबह की चहलकदमी करते हैं।थक जाएंगे तो लॉन पर रखी कुर्सियों पर बैठ जाएंगे।अब झूले पर बैठने में भी डर लगने लगा है, सो उधर की ओर झांकते भी नहीं।कुछ देर बैठे रहेंगे चुपचाप।फिर धीरे-धीरे डॉक्टर द्वारा सुझाए गए व्यायाम करेंगे, कुछ बैठकर, कुछ खड़े होकर।हल्का-हल्का उजाला फैलने लगता है।पत्नी खड़ी होते हुए बोलेगी, ‘मैं चाय बना लाती हूँ।’ वह उसे रोकेंगे, ‘तू बैठी रह, मैं बना लाता हूँ।’ पत्नी झट से उनका हाथ पकड़कर वापस बैठाती हुई बोलेगी, ‘मैं बना लाती हूँ, दो मिनट की तो बात है।…’ वह चुपचाप बैठ जाते हैं।बैठे बैठे नम: शिवाय का जाप शुरू हो जाता है।कुछ क्षण पश्चात लॉन से उठकर बरामदे की कुरसी पर चले आएंगे।पत्नी चाय बना लाई है।दोनों बैठकर चाय सुड़कने लगते हैं।बेआवाज।कोई कुछ नहीं कहता।लगता है जैसे कुछ कहने-सुनने को है ही नहीं।सामने वाली सड़क पर अभी एकदम सन्नाटा है।एक गहरी स्तब्धता।सामान्य दिनों में इस सड़क पर प्रात:भ्रमण करने वालों का तांता लगा रहता है।पर आजकल कदाचित ही कोई दिखता हो।पुलिस की भी खासी सख्ती है।पता नहीं यह कैसी महामारी आ गई है कि जीवन दूभर हो उठा है।

चाय कब खत्म हुई, पता भी नहीं चला।खाली गिलास मेज पर रखते हुए पत्नी की ओर देखा।वह भी चाय खत्म कर चुकी थी।लगा, जैसे किसी सोच में डूबी है।स्वर में बहुत मिठास घोलते हुए बोले थे, ‘क्या सोच रही है?’ पत्नी ने आंखें उठाकर उनकी ओर देखा।बोली कुछ नहीं, सिर्फ अनमने अंदाज में गर्दन नकार में हिला दी।उन्होंने हँसकर कुछ कहना चाहा कि हवा में उछलता हुआ अखबार लॉन की दूब में आकर गिरा।

दोनों ही अपनी जगह बैठे रहे।उदास से।अकसर ही अब लगता है कि जिंदगी में उदासी बहुत घिर आई है।हालांकि दोनों ही कोशिश करते हैं कि उनमें से कोई भी उदास न हो।पत्नी उन्हें टोकेगी, ‘ये क्या सूरत बना रखी है? खुश रहो, मस्त रहो।वह मुस्करा देंगे, ‘हां, खुश रहा कर, मस्त रहा कर, यही तो मैं भी तुमसे कहता हूँ।’ उसके सफेद बालों में हल्के से उंगलियां चला देंगे।थोड़ी देर के लिए माहौल बदल जाता है।पर देर तक टिक नहीं पाता।बाहर सड़क पर अभी भी सन्नाटा है।शहर आजकल सुबह सात बजे से दिन के ग्यारह बजे तक ही खुलता है।बाकी पूरे समय लॉक डाउन बना रहता है।एकदम सन्नाटा।कभी-कभी सायरन बजाती पुलिस की गाड़ी गुजरती है।

अचानक लगा, बैठे-बैठे देर हो गई है।अभी तो सारे काम निपटाने हैं।मन में घबराहट-सी व्यापने लगती  है।

अब खलने लगा है यह बड़ा मकान।दोनों में से किसी में इतना दम नहीं है कि झाड़ू-बुहारी करें-कमरों की, बरामदे की, पोर्च की।पहले महरी लगी हुई थी, सब काम संभाल लेती थी।झाड़ू-पोछा, डस्टिंग सब कर लेती थी।रात के बरतन भी साफ कर जाती।रसोई का भी आधा काम कर जाती थी।बस सिर्फ दो लोगों के लिए फुलके निकालने होते थे, उतना वह जैसे-जैसे कर लेती थीं।पर अब तो हाल-बेहाल है।लॅाकडाउन क्या लगा, जिंदगी जैसे ठहर गई है, जीना मानो मुश्किल हो उठा है।क्या करें, कैसे जिएं? दोनों के चहेरे पर एकदम घना अवसाद आकर ठहर जाता है।महरी का आना भी बंद हो गया है।इस लॉकडाउन में वह भी कैसे आ सकती है।बेटा हो या बेटी दोनों की सख्त हिदायत बनी रहती है, इन दिनों घर में किसी को भी प्रवेश मत कराना।बूढ़ों को इस महामारी से ज्यादा खतरा है।

पहले वे कुरसी छोड़कर उठ खड़े होते हैं।लॉन पर उतरकर बिना हाथ लगाए वाइपर से अखबार उठाकर झूले पर रख दिया है।दोपहर तक ऐसा ही पड़ा रहेगा अखबार।हालांकि अखबारवाले लिखते हैं कि अखबार में वायरस नहीं होता, पर उन दोनों का मन इस बात की तसदीक नहीं करता।सो दोपहर तक अखबार धूप में ही पड़ा रहता है।दोपहर बाद अखबार उठाकर बस सरसरी-सी निगाह डालेंगे।पत्नी को भी मुख्य खबरें सुनाकर अखबार को बाहर पोर्च में ही एक कोने पर इस तरह रख देंगे, मानो वह त्याज्य हो।भीतर ले जाने लायक नहीं हो।फिर देर तक साबुन पानी से हाथ धोएंगे।

पत्नी भी कुरसी का पूरा सहारा लेकर उठ खड़ी होती है।वह उसे टोकते हुए कहेंगे, ‘तू नहा ले।झाड़ू मैं कर लूंगा…।’ पत्नी उनकी बात को कोई तवज्जो नहीं देती।चुप रहती है।

हालांकि आजकल उन्होंने तय किया हुआ है, बरामदा और पोर्च के अलावा एक दिन में सिर्फ एक कमरे में ही झाड़ू लगेगा।चारों कमरे और बैठक में एक साथ झाड़ू लगाना उन दोनों की सामर्थ्य की बात नहीं है।बरामदा और पोर्च में रोज ही लगाना पड़ता है।हालांकि कभीकभी इसे भी वे नजरअंदाज कर जाते हैं।पोछा तो जब से महरी का आना बंद हुआ है, पूरी तरह छूट गया है।

‘अच्छा तू नहीं मानेगी…।’ वह हँसी बिखेरने की कोशिश करते हुए कहते हैं। ‘अच्छा, तू कमरे में लगा दे, मैं पोर्च और बरामदे को निपटाता हूँ…।’

अब यह रोज का नियम हो गया है।हालांकि यह निपटाना भी आसान नहीं होता।क्या-क्या निपटाएं? कितनी बार जिद करती है पत्नी, ‘कभी-कभी एकाध कमरे में पोछा भी लग जाए तो ठीक रहता।इस कोरोना में भीतर भी साफ-सुथरा रहना चाहिए।’ वह किंचित झल्लाने का नाटक करेंगे, ‘हां, हां ऐसा कर, पूरे मकान में रोज झाड़ू पोछा कर, बाहर लॉन की कितनी दुर्दशा हो गई है।लॉन का भी काम सम्हाल…।’ पिछले एक महीने से माली भी नहीं आ रहा है।लॉन जैसे जंगल में तब्दील हो गया है।पर करें भी तो क्या करें।सिवा विवश भाव से देखने के और कुछ नहीं कर सकते।

पोर्च व बरामदे का झाड़ू लग चुका तो भीतर झांकने गए।पत्नी एक कमरे का झाड़ू खत्म कर रसोई में चली गई है।सुबह की चाय व रात के जूठे बरतन सिंक में अपने मले जाने के इंतजार में हैं।वह पत्नी को रोकते हैं, ‘तू रहने दे, ये मैं कर लूंगा।जा कर नहा और अपने मंदिर में दीया बाती कर।’

‘नहीं, येऽ तुम क्यों करोगे।येऽ मेरा काम है…’ पत्नी रुआब के साथ कहती है।वह उसे चिढ़ाएंगे, ‘हां तुम्हारा काम है।पांव ज्यादा देर खड़े होने से मना करते हैं।घुटनों में बल नहीं रहा…है तुम्हारा काम।’

‘तुम अपने को बहुत ताकतवर समझ रहे हो।मुझे करने दिया करो।’ पत्नी आंखें तरेरती है तो वह हँस पड़ते हैं। ‘आज भी आंखें जवानी के दिनों की तरह तरेरती हो…।’

‘तो क्या? अभी तो जवान ही हूँ मैं…।’

अंतत: दोनों मिलकर बरतन निपटाते हैं।एक मलता है तो दूसरा नल की धार में बरतनों को धो लेता है।

घड़ी ने सुबह के सात बजा दिए हैं।

‘अच्छा, मैं दूध ले आता हूँ जाकर।’ वह पत्नी की ओर देखते हुए कहेंगे।पत्नी घड़ी की ओर देखती है।हां, दुकान तो खुल गई होगी।चेहरे पर शिकन उभरती है। ‘चिंटू से क्यों नहीं कहा कि दूध के पैकेट आजकल घर पर दे जाया करे।इस वक्त में इतना नहीं कर सकता क्या?’ पत्नी के स्वर में झल्लाहट है।वह सहज भाव से कहते हैं, ‘कहा तो था, पर आजकल कौन सुनता है।बड़े-बूढ़ों की किसे चिंता है?’ वह चलने के लिए तैयार होते हैं तो पत्नी कहती है, ‘आज मैं जाती हूँ।मैं कहूंगी उससे…।’

वह हँसेंगे। ‘अब रहने भी दो।चार कदम ही तो जाना है।…।’ वह गेट से बाहर निकलने वाली चप्पलें पांवों में धारण करेंगे।बाहर निकलने वाली चप्पलें अब पोर्च के एक कोने में पड़ी रहती हैं।उन्हें भीतर लाना आजकल वर्जित है।उनमें ही कहीं वायरस चिपककर न आ जाएं।मेन गेट खोलने से पहले चेहरे को भलीभांति मास्क से ढक लेंगे।कई बार भूल भी जाते हैं।बाहर निकलकर लोगों को मास्क पहने देखते ही उसी पांव वापस लौटेंगे।आवाज लगाएंगे पत्नी को।पत्नी समझ जाएगी।हँसते हुए कहेगी, ‘यह मास्क भी आफत की जान है।…’

पंद्रह-बीस कदम पर ही जो दुकान है, दूध वहीं से लेते हैं।दूध लेकर पचास का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया है।एक मुश्किल काम इन दिनों पैसे वापस लेने की हो गई है।घर पर हर बार तो टूटे पैसे रहते नहीं।दो दूध के पैकेट और चौदह रुपए वापस लेकर तुरंत वापस लौटते हैं।गेट खोलकर बाहर वाले वाशबेसिन में दूघ के दोनों पैकेट को साबुन-पानी से रगड़ कर धोएंगे।धोना लाजमी है।पत्नी तब तक सेनेटाइजर की बोतल लेकर हाजिर होती है।लौटे हुए पैसों को खूब अच्छी तरह सेनेटाइज कर वहीं छोड़ देंगे।उसके बाद गेट का ऊपरी हिस्सा सेनेटाइज करेंगे।चप्पल बाहर उतारकर भीतर प्रवेश करने वाली चप्पल धारण करेंगे।थोड़ी देर के लिए बैठ जाएंगे बरामदे में।फिर अलसाते हुए उठेंगे।नहाने का उपक्रम करने लगेंगे।

जब तक नहाकर निकलते हैं, देखते हैं पत्नी ने दूध उबाल लिया है।गिलोय-डंठल के छोटे छोटे टुकड़े रात से ही भिगोए हुए थे।उन्हें मिक्सर में घुमाकर उबालने के लिए रखा है।इन दिनों सुबह गिलोय का काढ़ा लेना अनिवार्य हो गया है।दिन भर में फिर तीन-चार तरह का काढ़ा और चलता है।पानी भी गरम ही पीना है।रात को गरारा और भाप लेना भी जैसे जीवन का अनिवार्य हिस्सा हो उठा है।बड़ा अजब-सा हाल है।वह और पत्नी तो इसी सब में थक जाते हैं।

‘अच्छा अब तू नहा ले…।’ वह पत्नी से कहते हैं।अब आजकल एक ही बाथरूम इस्तेमाल में आता है।इस एक बाथरूम में उन्होंने अपनी और पत्नी की उम्र और जरूरत के हिसाब से कुछ परिवर्तन करवाया है।अब यह अपेक्षाकृत सुरक्षित लगता है।

पत्नी जब तक नहाकर बाहर आती है, वे मंदिर के कमरे में पहुंचकर दीया बाती करते हैं।मंदिर के कमरे में दो कुर्सियां लगी हैं।एक पर बैठकर वह पत्नी का इंतजार करते हैं।पत्नी दो कप में गिलोय का काढ़ा लेकर आती है।दूसरी कुरसी पर बैठते हुए एक कप उन्हें पकड़ाएगी और दूसरा कप अपने पास रखेगी।नाक-भौं सिकोड़ते हुए दोनों ही गिलोय को खाली करेंगे।बड़बड़ाते हुए कहेंगे, ‘सुबह से शाम तक कितनी तरह का काढ़ा पिला देती हो, यार।मन ऊब गया है।’ पत्नी फिस्स से हँस देगी, ‘तुम्हें तो सदा ही स्वाद वाली चीजें चाहिए।गुलाब जामुन खाओगे?’ पत्नी के साथ वह भी हँस देंगे।

जिंदगी में अब हँसी रह ही कहां गई है।हर पल अजबसी मुर्दनी है।तनाव और झल्लाहट है।पूजा और नाश्ते के बाद बाहर बरामदे में बैठते हैं तो पत्नी लंबी उसास लेती हुई कहेगी, ‘भीतर कुछ भी नहीं है।सब्जी दो दिन हुए खत्म हो गई है।सिर्फ दो दाने आलू और दो दाने प्याज का बचा है।चावल, दाल, आटा, मसाले सब कुछ तो खत्म होने वाला है।कैसे आएगा सब?’ पत्नी के चेहरे पर विवशता है।

विवशता के साथ दयनीयता का भाव भी चेहरे पर आकर फैलता है।लोग कहते हैं कि चीजों की होम डिलीवरी भी हो रही है।पर वह कैसे किया जाए, इसका कुछ भी ज्ञान उन्हें नहीं है।अब तो पैसे भी खत्म हो रहे हैं।बैंक तक जाना और पैसे लाना भी बहुत दुष्कर काम है।हालांकि कहा तो यह जा रहा है कि बैंक वरिष्ठ जनों को घर पर पैसा दे जाएगा, पर सब कहने की बात है।कल उन्होंने बैंक को फोन किया तो वहां से कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिला।जो उत्तर था वह टालमटोल वाला था।किसी को चेक देकर भी नहीं मंगवा सकते।कोई ऐसा है भी नहीं।एटीएम से पैसा निकालना उन्हें नहीं भाता।डर लगा रहता है।फिर उसके लिए भी तो घर से बाहर ही निकलना पड़ता।

हल्ला बहुत है कि बड़े बुजुर्गों को इस दौर में कतई बाहर नहीं निकलना है।पर नहीं निकलें तो गुजारा कैसे हो।आस-पड़ोस में भी कोई ऐसा नहीं है जिससे कहें।सब अपने-अपने में मगन हैं।बड़े-बूढ़ों को कौन पूछ रहा है भला।अमेरिका में बैठा हुआ बेटा भी नए-नए ज्ञान देता है, सावधानियां बताता है, पर वह हाथ तो नहीं बंटा सकता।बेटी भी नई-नई हिदायतें देती रहती है।एक दिन उसकी हिदायत पर झल्लाकर बोले थे, ‘खाना-पीना सब छोड़ दें क्या? बाहर नहीं जाएंगे तो क्या जादू से सब चीजें आ जाएंगी।’ बेटी कुछ पल चुप रही थी, फिर बोली, ‘मैं अपनी एक सहेली को फोन करती हूँ।उसका भाई आएगा, बाजार का सारा काम कर देगा।दवाइयां भी उससे मंगवा लें, बैंक का काम भी कर जाएगा।उसका नंबर ले लीजिएगा।जब भी कोई जरूरत हो तो उसे फोन से बता दें।’ पर कोई नहीं आया।दो दिन उम्मीद में इंतजार करते रहे।

बाहर सब्जी का ठेला आवाज लगाता हुआ गुजर रहा है।एकदम उस ओर लपकते हैं।उसे आवाज देकर रोका है।पीछ से लंगड़ाकर चलती हुई पत्नी उनका मास्क लेकर आई है।गेट खोलकर बाहर निकलते हैं।कोई विशेष सब्जी नहीं है।सब्जीवाला बताता है कि अब तक सब बिक गई है।बड़ी मारामारी है साहब।बची खुची सब्जी में से ही कुछ छांट लेते हैं।बाहर नल के पास सब्जी रखते हुए विवश स्वर में कहते हैं, ‘क्या करूं, बस यही सब है।’ पत्नी का लगभग दिलासा देता स्वर है, ‘अब जैसा भी है ठीक है।तुम मास्क निकालकर हाथ धो लो।मैं सब्जी धोने के लिए पानी गर्म करती हूँ।’ वह जब तक गर्म पानी कर बाहर आती है, वह वैसे ही खड़े रहते हैं।कहते हैं, ‘ला मुझे दे।मैं धोता हूँ।’ पत्नी मना करेगी।कहेगी, ‘तुम हाथ धो लो।मास्क उतारकर बैठ जाओ।सब्जी है ही कितनी, दो पल में धुल जाएगी।’ पत्नी का कहा मानकर अंतत: वहीं पर बैठ जाते हैं।पत्नी को तेज गर्म पानी में सब्जी डुबो डुबोकर धोते हुए देखते रहते हैं।वायरस से मुक्त तो करना ही है।

अब?..वह पत्नी की ओर देखते हैं।कितना बजा है अभी।शायद साढ़े नौ बजने वाले हैं।पत्नी की ओर देखते हुए बोले हैं, ‘मैं बाजार हो ही आता हूँ।राशन-पानी, फल-सब्जी और जरूरी दवाइयां ले आता हूँ।बैंक भी हो आऊंगा…कैसा?’ वह कुर्सी से उठने का उपक्रम करते हैं।पत्नी के चेहरे पर घबराहट सरीखी कोई चीज उभरती है।कहती है, ‘ऐसे में इतना सबकुछ कैसे कर पाओगे तुम।दुकानें भी ग्यारह बजे बंद हो जाएंगी।अभी दो एक रोज ऐसे ही गुजर कर लेंगे।बाद में देखेंगे…’ पत्नी टालना चाहती है।वह हँसते हैं, ‘दो एक दिन बाद फिर क्या होगा, जाना तो पड़ेगा ही।दवाइयां भी खत्म हैं, वह तो लानी ही पड़ेंगी।’

‘तो मैं भी चलती हूँ तुम्हारे साथ।’ पत्नी सजग उठ खड़ी होती है।वह मना करते हैं। ‘तुम रहने दो।घुटनों से परेशान हो वैसे ही।कोई रिक्शा मिलता है तो हो आता हूँ फटाफट…।’ पत्नी नहीं मानती। ‘अकेले बहुत हो जाएगा।कोई पहलवान थोड़े ही हो तुम।’ वह चुप हो जाते हैं।जानते हैं पत्नी कहती तो ठीक ही है, पर उसे परेशान करना अच्छा भी नही लगता है।रिक्शे पर वह चढ़ नहीं पाती।अब कोई ऑटो तलाशना होगा।

दो सौ रुपए में एक ऑटो तय करते हैं।इस दौर में सब लूटने में लगे हैं।क्या करें, मजबूरी है।पहले बैंक का काम निपटाएंगे।गनीमत थी बैंक में भीड़ नहीं थी।वापसी में राशन-पानी समेत जितनी जरूरी चीजें हैं, फटाफट ऑटो में लादते हैं।हर दुकान में सामान लेने की मारामरी देखकर एकबारगी तो हताश हो गए थे।लेकिन सामान तो लेना ही था।पत्नी ने तेजी दिखाई।ऑटोवाले ने भी दोनों को बुजुर्ग देख मदद की।आखिर में दवाइयां लेकर ठीक साढ़े ग्यारह के करीब घर पहुंचे थे।दोनों ही पसीने से नहा उठे थे।मास्क के भीतर जैसे सांस घुट रही थी।

अब और बड़ा काम सामने था।पहले बैंक से मिले नोटों को सेनेटाइज करना था।फिर बाजार से लाए हुए सामान को भी एक-एक कर सेनेटाइज करना होगा।वह पत्नी से मना करते हैं, ‘तुम रहने दो, बैठ जाओ।’ पत्नी कहां माननेवाली है।वह कहेगी, ‘तुम बैठ जाओ।अपने चेहरे को तो देखो कितने थके हुए लग रहे हो।मैं कर लूंगी।’ अंतत: दोनों ही लगते हैं।खासा वक्त निकल जाता है।अब कपड़े उतारकर उन्हें मशीन में डालना है।फिर नहाना होगा।इस वायरस का कोई भरोसा नहीं, कहां चिपककर आ गया हो।अच्छी तरह नहा-धोकर बाहर बरामदे की कुर्सी पर थके हुए लद जाते हैं।एकदम पस्त।दिन का ठीक एक बज गया है।

अब? लंच का यक्षप्रश्न सामने खड़ा था।कैसे होगा।पत्नी भी थक गई है।वह तो थके हैं ही।कुछ पल विश्राम के बाद पत्नी उठने का उपक्रम करती है तो वह हाथ पकड़कर वापस बिठा देते हैं। ‘नहीं, अब कुछ नहीं।रहने दो।बस चाय के साथ दो एक बिस्कुट ले लेते हैं।चाहो तो दो एक सेव काट लेते हैं।’

पत्नी मुस्कराकर उनकी ओर देखती है।चेहरे पर मुस्कराहट भी है और निरीहता भी।कहती है, ‘मुझे गाली दोगे।पर सच में थक तो गई ही हूँ।’ आवाज में गीलापन भी है।

‘अच्छा तू बैठ।आराम कर।चाय मैं बना लाता हूँ।’ पत्नी के रोकने से पहले ही वह रसोई की ओर चल देते हैं।हालांकि जानते हैं, पत्नी पीछे-पीछे आ ही जाएगी।उसका मन है कि मानता ही नहीं।

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