
युवा कवि।मर्चेंट नेवी में कार्यरत।
शीतयुद्ध
लपटों के बाद
जल कर राख हो गई
ठंडी चीजों की भस्म
बैठ जाती है नागरिकों के हृदय में
बारूद की गंध
ठंडी होकर जम जाती है स्मृतियों में
ग्रीष्म, शरद, वसंत
एक-एक कर बीत जाती हैं ॠतुएं
बस स्मृति नहीं बीतती
बीत गए युद्ध की चीखों की।
नदी पार
चाहा और सोचा हुआ
सब है
नदी के उस पार
हमारे पास नाव नहीं है
नदी पर भी नहीं बंधा कोई पुल
अपनी नस्ल की शुरुआत से ही
हम मानव
खाली कर रहे हैं नदी को
अपने अपने पात्रों में भरकर।
नदी की चिंता मत करो
नदी की चिंता मत करो
नदी को मारा नहीं जा सकता
बना लो कितने भी बांध
उसे सदा के लिए बांधा नहीं जा सकता
जहां कभी निर्बाध नदी थी
अब वहां सिर्फ नमी है
इसे नदी की मृत्यु मत समझना
नदी के लिए मत बहाना आंसू
नदी सदियों तक जीवित रह सकती है
रोक कर अपनी सांस
सदियों बाद ही सही
नदी में लौट आएगा प्रवाह
नदी की चिंता मत करो
चिंता करो अपनी
कि नदी के सांस रोक लेने के
कितने साल बाद तक
चलती रह सकती है
मनुष्य की सांस!
संपर्क : म.न. 12, बालाजी ज्वैलर्स के पीछे, 80 फीट कर्रही रोड, जरौली फेज़ 1, कानपुर– 208027 मो. 9336889840

