उदय राज सिंह:‘वागर्थ’ के अप्रैल अंक में मल्टीमीडिया एक उत्तम प्रयास है! उपयोगी और लाभदायक! आभार पूरी टीम के प्रति !

अंकेश मद्धेशिया: ऐसे और भी वीडियो बनाइए, कथनों का चयन बहुत अच्छा है. बहुत सामयिक!

समर सिंह: अप्रैल अंक की मल्टीमीडिया प्रस्तुति को कई बार पूरा सुना. बेहतरीन प्रस्तुति, गज़ब का ध्वनि संयोजन, स्क्रिप्ट और दृश्यांकन!

जगदीश पाल सिंह राज, अयोध्या: अप्रैल २०२२ अंक में पीयूष तिवारी की कविताएं अच्छी लगीं।उत्तम रचना और वह भी कम उम्र में, साधुवाद।यशश्वी एवं चिरंजीवी भव!

अपर्णा विश्वनाथ: अप्रैल २०२२ अंक में दक्षिण भारतीय आदिवासी कविताएं (अनुवाद : अरिंदम) बहुत ही उम्दा ज़मीन से जुड़ी कविताएं हैं।सचमुच भारत में ऐसी कितनी ही भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं।भाषाओं को संरक्षण प्रदान करना न केवल सरकार का, बल्कि क्षेत्रीय लोगों की भी जिम्मेदारी है।

अरुण माहेश्वरी, कोलकाता:‘वागर्थ’ के अप्रैल अंक में मृत्युंजय का ‘आदिवासियों की भाषा ही अब उनका तीर है’ अच्छा आलेख है।अपनी मंशा में साफ़, आदिवासी समाजों के प्रति संवेदनशील, भाषायी वैविध्य के प्रति विवेकपूर्ण, सामाजिक संबंधों के मामले में सहिष्णु और दृष्टिकोण में कुल मिला कर एक शोधपूर्ण प्रगतिशील लेख।इसके लिए मृत्युंजय जी को साधुवाद।

नेटिव अमरीकी कविता- एन. स्कॉट मोमादे की कविताओं का बेहद सजग अनुवाद।संपादन और सृजन कल्पना के ठोस परिणाम से बना है यह अंक।संपादकीय टीम और लेखन खोजी टीम को धन्यवाद।

रंजना शर्मा: बहुत सारी जानकारियों से भरा मई २०२२ का ‘वागर्थ’।आज जब समूचा विश्व एक नए प्रकार के बौद्धिक उत्पीड़न और शोषण का शिकार बन रहा है, ऐसे में भारत जैसे विशाल और विकासशील देश के समक्ष हालात से समझौता के सिवाय कोई और रास्ता नहीं बचा है।ऐसे में चुने हुए लोग जिन्हें लोग सुनते हैं क्या उनकी एक बड़ी जिम्मेदारी यह नहीं बन जाती है कि वे दधीचि बन कर सामने आएं।कहना न होगा मुट्ठी भर खाए- पिए-अघाए लोगों के अतिरिक्त अन्य कोई न सुखी है और न सुरक्षित, तथापि देश भर में अंध-राजनीति का अंधकार अपने तमाम वहशी चेहरों के संग हावी होता जा रहा है।चिंता से कुछ भी नहीं छूटा है।

धीरेंद्र :‘वागर्थ’ मई अंक में लोक की जितनी छवियां हो सकती हैं, उन पर बहुत सारगर्भित और रोचक पढ़ने को मिला।

चंदन कुमार, दिल्ली:‘वागर्थ’ का मई 2022 अंक मिला।किंशुक गुप्ता की कहानी ‘मिसेज रायजादा की डायरी’ ने काफी प्रभावित किया।कमाल की भाषाई बुनावट है।इम्तियाज गदर की कहानी ‘दातुन वाली बुढ़िया’ मन में एक गहरी टीस पैदा करती है।अकेले बुजुर्ग दंपती के हालात आज वाकई नाजुक है।

संजय गौतम : ‘साहित्यकारों पर एकाग्र-पत्रिकाओं का हस्तक्षेप’ बहुत अच्छा आलेख है, काफी जानकारियां मिलीं, इधर ‘लमही ‘ पत्रिका ने अमृत राय, सारा राय और प्रबोध कुमार पर महत्वपूर्ण अंक नाटनल पर प्रकाशित किए। इनसे भी हिंदी संसार को परिचित कराते तो अच्छा होता। अच्छे आलेख के लिए हार्दिक बधाई।

केशव शरण : सम्पादकीय विमर्श को बहुत दूर तक ले जाते हैं।इस क्रम में तमाम संदर्भ और प्रसंग नई और पुरानी जानकारियों के साथ आते हुए एक दृष्टिसंपन्न बौद्धिकता जगाते हैं। सरल, सहज शैली में एक अद्भुत पठनीयता है। भावमयी भाषा को सरल बनाकर गूढ़ और गहन की सशक्त व्याख्या और अभिव्यक्ति आस्वादपरक रूप से चिंतन- मनन का अवसर देती है। एलिट मन और लोक को अच्छी तरह समझ सका। बहुत-बहुत बधाई और आभार!