
वरिष्ठ लेखक। साहित्य की विभिन्न विधाओं में कई पुस्तकें प्रकाशित। ‘धरती’ अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका का संपादन। संप्रति स्वतंत्र पत्रकारिता।

लघु पत्रिका आंदोलन हिंदी साहित्य की वह सजीव धड़कन रहा है जिसने न केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति को नया आयाम दिया बल्कि सत्ता, संस्थान और बाजार के दबावों के बीच रचनात्मक स्वतंत्रता को लगातार बचाए रखा। यह आंदोलन साहित्य के भीतर उस असहज प्रश्नवाचक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है जो किसी भी स्थापित सच को अंतिम मानने से इंकार करती है। लघु पत्रिकाएं कभी भी केवल साहित्यिक विधाओं के प्रकाशन का माध्यम नहीं रहीं; वे वैचारिक हस्तक्षेप, सांस्कृतिक प्रतिरोध और सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रयोगशालाएं रही हैं। इसी ऐतिहासिक परंपरा में 1960 के दशक में ‘लहर’ पत्रिका का उदय एक साधारण घटना नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक वक्तव्य है।
‘लहर’ को समझना वस्तुतः लघु पत्रिका आंदोलन के उस नैतिक और वैचारिक आग्रह को समझना है जो साहित्य को सुविधा, स्वीकृति और प्रतिष्ठा के बजाय जोखिम, असहमति और संघर्ष के पथ पर ले जाता है। यह पत्रिका किसी बड़े प्रकाशन समूह, अकादमिक संस्था या सत्ता-संरक्षित मंच की उपज नहीं रही। इसका जन्म और विकास एक प्रतिबद्ध साहित्यिक चेतना के गर्भ से हुआ-और उस चेतना का नाम है प्रकाश जैन। ‘लहर’ का संपादन किसी तकनीकी दक्षता या प्रबंधकीय कौशल का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरी वैचारिक बेचैनी और सांस्कृतिक जिम्मेदारी की परिणति है।
लघु पत्रिका आंदोलन का मूल स्वभाव प्रतिरोधात्मक रहा है, लेकिन यह प्रतिरोध कभी भी केवल प्रतिवाद या नकार की मुद्रा में सीमित नहीं था। यह प्रतिरोध वैचारिक पुनर्संरचना का प्रयास रहा है। ‘लहर’ इसी अर्थ में प्रतिरोध की पत्रिका थी। यहां प्रतिरोध किसी तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रिया या भावनात्मक उत्तेजना से नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक संघर्ष से उपजता है। यह संघर्ष उन संरचनाओं के विरुद्ध है जो साहित्य को या तो सत्ता का अनुचर बनाना चाहती हैं या बाजार का उपभोक्ता-उत्पाद।
‘लहर’ सत्ता के हर रूप से प्रश्न करती है-चाहे वह राजनीतिक सत्ता हो, सामाजिक वर्चस्व हो, सांस्कृतिक प्रभुत्व हो या साहित्यिक सत्ता। यहां प्रतिरोध का अर्थ केवल विरोध दर्ज करना नहीं, बल्कि उन वैचारिक आधारों को उघाड़ना है जिन पर अन्याय, असमानता, दमन और बहिष्कार की संरचनाएं खड़ी हैं। ‘लहर’ की रचनाएं समय के साथ बहने की बजाय समय के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखती हैं। वे तत्कालीन लोकप्रिय प्रवृत्तियों के आगे नतमस्तक नहीं होतीं, बल्कि उनसे टकराने का जोखिम उठाती हैं। यही जोखिम ‘लहर’ को सामान्य साहित्यिक पत्रिकाओं से अलग करता है।
इस साहस के मूल में प्रकाश जैन की संपादकीय दृष्टि निहित है। प्रकाश जैन उन संपादकों में नहीं रहे जिन्होंने पत्रिका को आत्मप्रचार, नेटवर्किंग या प्रतिष्ठा-निर्माण का औजार बनाया हो। उनका संपादन व्यक्तित्व-केंद्रित नहीं, बल्कि विचार-केंद्रित रहा है। ‘लहर’ में संपादक का अहं नहीं, बल्कि संपादकीय विवेक बोलता है। यहां संपादक स्वयं को निर्णायक सत्ता के रूप में स्थापित नहीं करता, बल्कि रचनात्मक संवाद का माध्यम बनता है।
‘लहर’ में प्रकाशित रचनाएं अक्सर असुविधाजनक प्रश्न उठाती हैं- ऐसे प्रश्न जो सत्ता को, समाज को और कभी-कभी स्वयं साहित्य को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। प्रकाश जैन ने कभी यह नहीं चाहा कि पत्रिका लोकप्रियता, बिक्री या चर्चा की कसौटी पर खरी उतरे। उनका आग्रह हमेशा यह रहा कि पत्रिका वैचारिक ईमानदारी, सामाजिक प्रतिबद्धता और रचनात्मक गुणवत्ता की कसौटी पर खरी उतरे। यह आग्रह आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब साहित्यिक मूल्यांकन भी अक्सर बाजार और प्रचार द्वारा संचालित होने लगा है।
‘लहर’ की एक प्रमुख विशेषता उसका लोकतांत्रिक चरित्र है। यह पत्रिका स्थापित और नवोदित रचनाकारों के बीच कोई कृत्रिम दीवार नहीं खड़ी करती। यहां नाम, पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि रचना का आत्मिक बल निर्णायक होता है। प्रकाश जैन की संपादकीय नीति ने अनेक नए, हाशिए पर खड़े और उपेक्षित रचनाकारों को पहली बार गंभीर पाठक-वर्ग तक पहुंचाया। यह कोई संयोग नहीं है कि ‘लहर’ में छपे कई लेखक बाद में हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाते हैं। लेकिन यह पहचान ‘लहर’ की कृपा से नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास से उपजी है जो एक ईमानदार संपादक किसी रचनाकार को देता है- यह विश्वास कि उसकी आवाज सुनी जा रही है और उसे गंभीरता से लिया जा रहा है।
प्रकाश जैन की भूमिका केवल एक संपादक की नहीं, बल्कि एक सजग साहित्यिक कार्यकर्ता की रही है। वे साहित्य को समाज से काटकर देखने के पक्षधर नहीं रहे। उनके लिए साहित्य एक जीवित हस्तक्षेप है- एक ऐसी प्रक्रिया जो सामाजिक यथार्थ से टकराती है, उसे समझती है और बदलने की आकांक्षा रखती है। यही कारण है कि ‘लहर’ में कविता और कहानी के साथ-साथ आलोचना, वैचारिक लेख, सांस्कृतिक टिप्पणियां और समकालीन राजनीतिक-सामाजिक प्रश्नों पर गहन विचार मिलता है। यह बहुविधता पत्रिका को एकांगी होने से बचाती है और उसे एक समग्र सांस्कृतिक मंच का स्वरूप देती है।
‘लहर’ का संपादन किसी सुविधाजनक समय में नहीं हुआ। यह वह दौर रहा है जब हिंदी साहित्य में भी बाजार का दबाव, पुरस्कारों और संस्थानों की राजनीति तथा गुटबंदी का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा था। साहित्यिक पत्रिकाएं या तो संस्थागत संरक्षण की ओर झुक रही थीं या फिर लोकप्रियता के दबाव में अपने वैचारिक तेवर खो रही थीं। ऐसे समय में प्रकाश जैन ने समझौते की राह नहीं चुनी। सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों और उपेक्षा के बावजूद उन्होंने पत्रिका की वैचारिक स्वायत्तता को बनाए रखा। यह स्वायत्तता ही ‘लहर’ की आत्मा है।
प्रकाश जैन भली-भांति जानते थे कि लघु पत्रिका का वास्तविक मूल्य उसकी संख्या, चमकदार कागज, आकर्षक आवरण या विज्ञापनों में नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक दृढ़ता में निहित होता है। ‘लहर’ ने इस दृढ़ता को कभी दांव पर नहीं लगाया। यही कारण है कि यह पत्रिका कभी मुख्यधारा की सुविधा का हिस्सा नहीं बनी, लेकिन उसने अपनी विश्वसनीयता कभी नहीं खोई।
‘लहर’ की सामग्री में सामाजिक यथार्थ का तीखापन स्पष्ट दिखाई देता है। यहां वर्ग-संघर्ष, जाति-वर्चस्व, स्त्री-प्रश्न, सांप्रदायिकता, राज्य-हिंसा, पूंजीवादी लूट और सांस्कृतिक क्षरण जैसे मुद्दे किसी हिचक के बिना सामने आते हैं। प्रकाश जैन ने कभी इन विषयों को ‘असाहित्यिक’, ‘अप्रिय’ या ‘विवादास्पद’ मानकर किनारे नहीं किया। उनके लिए साहित्य का मूल्यांकन उसकी शालीनता या सौंदर्यबोध से नहीं, बल्कि उसकी सच्चाई और सामाजिक प्रासंगिकता से होता है। यही दृष्टि ‘लहर’ को एक साहसी और जरूरी पत्रिका बनाती है।
प्रकाश जैन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है आलोचना के प्रति उनका स्वस्थ और रचनात्मक दृष्टिकोण। ‘लहर’ में आलोचना को किसी व्यक्ति, समूह या कृति को ध्वस्त करने के औजार के रूप में नहीं, बल्कि साहित्यिक विवेक को विकसित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया। यहां आलोचना में तल्खी हो सकती है, असहमति हो सकती है, लेकिन दुर्भावना नहीं। यह आलोचनात्मक संस्कृति हिंदी साहित्य में लगातार दुर्लभ होती जा रही है, और ‘लहर’ इस कमी को भरने का ईमानदार प्रयास करती है।
लघु पत्रिका आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका को समझते हुए ‘लहर’ ने स्वयं को कभी किसी मुख्यधारा का विकल्प घोषित नहीं किया। उसने स्वयं को एक वैकल्पिक चेतना के रूप में स्थापित किया-एक ऐसी चेतना जो सत्ता के केंद्र में नहीं, बल्कि समाज के हाशिए पर खड़ी होकर बोलती है। प्रकाश जैन इस तथ्य से परिचित थे कि लघु पत्रिकाएं कभी भी संसाधन-संपन्न या सत्ता-संरक्षित नहीं रहीं, लेकिन उनकी वास्तविक शक्ति हमेशा वैचारिक निर्भीकता में रही है। ‘लहर’ इसी निर्भीकता की विरासत को आगे बढ़ाती है।
यह पत्रिका परंपरा का अंधानुकरण नहीं करती, बल्कि परंपरा से संवाद करते हुए उसे समकालीन संदर्भों में पुनर्परिभाषित करती है। यहां अतीत को स्मृति-पूजा के रूप में नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक के साथ देखा जाता है। यही दृष्टि ‘लहर’ को जड़ता से बचाती है और उसे जीवंत बनाए रखती है।
‘लहर’ और प्रकाश जैन का संबंध केवल संपादक और पत्रिका का नहीं, बल्कि विचार और माध्यम का संबंध है। पत्रिका में जो स्वर सुनाई देता है, वह किसी एक व्यक्ति की निजी आवाज नहीं, बल्कि उस सामूहिक विवेक की अभिव्यक्ति है जिसे प्रकाश जैन ने लगातार प्रोत्साहित किया। यह विवेक प्रश्न पूछता है, असहज करता है और पाठक को निष्क्रिय उपभोक्ता बनने से रोकता है।
आज, जब हिंदी साहित्य में पत्रिकाओं का संकट गहराता जा रहा है- जब डिजिटल शोर, त्वरित उपभोग और वैचारिक सतहीपन साहित्यिक संवाद को कमजोर कर रहे हैं- ‘लहर’ का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पत्रिका हमें याद दिलाती है कि साहित्य केवल मनोरंजन या अकादमिक अभ्यास नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का एक सशक्त माध्यम भी है। प्रकाश जैन का संपादन इस विश्वास का प्रमाण है कि एक अकेला, प्रतिबद्ध और ईमानदार व्यक्ति भी साहित्यिक परिदृश्य में सार्थक हस्तक्षेप कर सकता है।
अंततः ‘लहर’ को केवल एक साहित्यिक पत्रिका के रूप में देखना उसके महत्व को कम करके आंकना होगा। यह एक सांस्कृतिक दस्तावेज है- अपने समय का, अपने संघर्षों का और अपने सवालों का दस्तावेज। यह उस दौर का साक्ष्य है जब साहित्य ने समझौतों से इंकार किया और सच के पक्ष में खड़ा होने का जोखिम उठाया। इस जोखिम के केंद्र में प्रकाश जैन हैं- एक ऐसे संपादक के रूप में जिन्होंने सत्ता की नहीं, बल्कि साहित्य की सुनी; लोकप्रियता की नहीं, बल्कि प्रतिबद्धता की चिंता की। इसी कारण ‘लहर’ हिंदी लघु पत्रिका आंदोलन में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज होती है-एक ऐसी लहर, जो शांत नहीं, बल्कि चेतना को झकझोरने वाली है।
34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर – 302033 मो. 7838897877
