वरिष्ठ कथाकार और ‘जनपथ’ पत्रिका के संपादक।

घंटों, दिनों, महीनों ही नहीं, वर्षों से जकड़ा तनाव बिलकुल सामान्य हो गया। यह तो सच है कि किसी का लड़का अगर नौकरी पाकर अपने घर की समस्याओं से पाला झाड़कर विदेश, महानगर या फिर घर से दूर बस गया है तब भी पीड़ा और अगर नौकरी की तलाश में असफल है और बेरोजगार है, तब भी पीड़ा। बेरोजगार रहने पर उस लड़के से ज्यादा परेशानी और चिंता माँ-बाप की हो जाती है। चैबीसों घंटे का तनाव रहता है। आनंद सिंह एवं उनकी पत्नी वीणा सिंह पिछले पाँच वर्षों से अनुराग की बेरोजगारी का दंश झेल रहे थे। ऐसा नहीं कि अनुराग इसके लिए प्रयास नहीं कर रहा था, वह तो उसके लिए पूरी तरह तत्पर था। दर्जनों लिखित, मौखिक परीक्षाओं में वह शामिल हुआ था, लेकिन असफल हो जा रहा था। कहीं जाति, वर्ग तो कहीं धर्म आड़े आ जाता तो कभी रुपया। और कहीं जब ये चीजें गौण रहतीं तो अपार भीड़ और टैलेंट की कमी उसे असफल कर दे रही थी। वैसे अनुराग की योग्यता और क्षमता बहुत कम नहीं थी, लेकिन प्रतियोगिता में वह पीछे पड़ जा रहा था।

इन असफलताओं से वह निराश होने लगा था। जाहिर न करने वाले आनंद सिंह उससे ज्यादा चिंतित रहने लगे थे। छिपाने के बावजूद उनकी उदासी को देखा-समझा जा सकता था। उनकी जिंदादिली, सामाजिकता अब बाधित होने लगी थी। वैसे तो उनके मित्रों-परिचितों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन शौकत आलम उनके परम मित्र हैं। शौकत आलम उनकी उदासी, चिंता और उसके मूल कारण से बहुत परेशान थे और अपने स्तर से निदान ढूंढने के लिए मन ही मन तत्पर रहते थे। अभी एक माह पहले उन्होंने अनुराग से उसका डिटेल लिया था। उस समय एक ऐफलिएटेड कॉलेज में साक्षात्कार होने वाला था। उस कॉलेज के अंगीभूत होने की पूरी संभावना थी। संयोग से उस कॉलेज के प्राचार्य शौकत आलम के समधी मुशर्रफ आलम साहब थे। मुशर्रफ आलम साहब का कॉलेज कार्यकारणी के लगभग सभी सदस्यों से अच्छा संबंध था। उसी बूते उन्होंने अनुराग का डिटेल लेकर उन्हें दिया था। उसी समय शौकत आलम को समधी से आश्वासन मिल गया था। उन्होंने आनंद को संकेत में बताया था और अभी दो दिन पहले उन्होंने फोन किया था कि दो दिन बाद परिणाम घोषित होगा। वैसे अनुराग का उसमें बहाल होना तय है।

-ऐसा सुनते ही आनंद सिंह खिल उठे थे, वीणा खुशी से पागल हो रही थी और अनुराग भविष्य की मीठी कल्पनाओं में खो-सा गया था। शाम को उन सबों की पसंद का सुस्वादु भोजन बना। जहाँ खाने के समय एक चुप्पी छाई रहती थी, आज सभी लोगों में उमंग थी। हर कोई अपनी खुशी अपने ढंग से प्रकट कर रहा था।

रात का खाना खत्म होने पर वीणा ने कहा- बड़ी गलती हो गई। आज शौकत भाई को खाने पर बुला लेना चाहिए था।

सही कहते हैं लोग, औरतों की बुद्धि देर से जगती है। अब खाने के बाद कह रही हो… ‘खैर। कल हो जाएगा। वैसे कल उनके पास जाऊंगा। उसी समय रात का निमंत्रण दे दूंगा।’ आनंद सिंह ने कहा।

सूचना मिलने से अब तक अपने सभी रिश्तेदारों को यह खुशखबरी फोन से दी जा चुकी थी। घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। आसपड़ोस के लोग एकाएक इस बदलाव से अचंभे में थे। वैसे उन लोगों ने अपने गांव में इसकी सूचना नहीं दी थी, लेकिन देखनेवाले उनकी खुशी से अनुमान लगा रहे थे कि जरूर कोई बहुत अच्छी खबर है।

सुबह चाय-नाश्ते के बाद आनंद सिंह शौकत आलम के घर पहुँच गए।

‘नमस्कार अंकल। …आइए…आइए…बैठिए’ देखते ही शौकत भाई का लड़का सगीर आदर के साथ उन्हें बैठकखाने में ले गया।

‘शौकत भाई कहीं गए हैं क्या?’ आनंद सिंह ने आते ही पूछा।

‘हाँ अंकल, लेकिन काफी देर हो गई। उनका फोन भी ऑफ है। …अब आते ही होंगे। मम्मी को बुलाता हूँ मैं’ सगीर ने कहा।

‘आनंद अंकल आए हैं अम्मी’ सगीर ने कहा और तुरंत वे आ गईं।

लेकिन यह क्या? हँसता-मुस्कराता तव्वसुम भाभी का चेहरा एकदम उदास लग रहा था। लग रहा था वे गहरी पीड़ा झेल रही हों। मुस्कराकर आदाब करने की कोशिश जरूर की उन्होंने, लेकिन वह बात नहीं हुई, जो उनकी विशेषता है। अंदर से बाहर तक उनका स्वभाव एक आदर्श है। लेकिन आज?

‘क्या बात है भाभी? आज काफी उदास लग रही हैं?’ आनंद ने पूछा।

‘नहीं… ऐसे ही… आपके दोस्त ने आपको कुछ बताया नहीं?’ तव्वसुम भाभी ने पूछा।

‘हाँ बताया है। बहुत बड़ी खुशखबरी सुनाई है। मेरे परिवार का तनाव खत्म कर दिया है मेरे यार ने।’ सुनकर मौन हो कुछ सोचने लगी तव्वसुम भाभी। …लगता है उसके बाद वाली खबर से अपरिचित हैं भाई जान।

‘इस खुशी के मौके पर आप इतना चिंतित क्यों है भाभी?’ आनंद ने पूछ लिया।

‘खुशी से तो बौरा गए थे हमलोग, लेकिन कल शाम को बात कुछ दूसरी हो गई भाई जान। उसके बाद से उन्होंने कुछ नहीं खाया, चाय भी नहीं पी। मुझसे भी खाना नहीं खाया गया। तव्वसुम भाभी ने बताया।

‘आखिर क्या बात हो गई भाभी जी?’ आनंद सिंह ने बेचैनी से पूछा।

भाभी कुछ कहना चाह रही थी, ओठ फड़फड़ा रहे थे, लेकिन आवाज निकल नहीं रही थी। अंततः वह रूँआसा हो गई।

‘भाभी… भाभी। क्या बात है भाभी? आनंद अकबका कर पूछ रहे थे। वह समझ नहीं पा रहे थे आखिर बात क्या है?

‘अंकल जी! दोपहर की खबर से हम सभी लोग बहुत खुश थे – खुशी मना रहे थे। इतने में शाम को मेरे ससुर जी ने ऐसी बात बताई कि हमलोग…’

‘क्या कहा मुशर्रफ आलम साहब ने?’

‘अंकल दरअसल अनुराग भाई को नियुक्त करने के लिए उन्होंने सोच लिया था। अब्बा, अम्मी, रेहाना और मैं – सभी ने उनसे आग्रह किया था। वे तैयार भी थे, लेकिन इसी बीच उनके रिश्तेदार के रिश्तेदार ने अपने बेटे को उस जगह पर नियुक्त करने का आग्रह कर दिया। उनके रिश्तेदार का बेटा भी साक्षात्कार में शामिल हुआ था। वह लड़का ससुर जी के रिश्तेदार का रिश्तेदार है। ससुर जी काफी असमंजस में हैं। एक तरफ उनका रिश्तेदार दूसरी तरफ समधी के दोस्त का लड़का। लेकिन असमंजस जैसी स्थिति नहीं थी। अनुराग के लिए पहले से कहा गया था और दूसरी बात यह कि वह सीधे रिश्तेदार भी नहीं।’

‘बेटा सगीर! सुनो एक बात बताती हूँ, जिसे न तुम्हें कहा था और न रेहाना को। तुम्हारे अब्बा को भी नहीं कहती, लेकिन फोन पर बात होते उन्होंने सुन लिया था। …मेरे भाई शहंशाह के लड़के ने फोन किया था। वह भी इंटरव्यू में शामिल हुआ था। मैंने उसे मना कर दिया। साफ कह दिया कि पहले ही उन्हें अनुराग के लिए कहा जा चुका है, माफ करना। आगे देखा जाएगा।’ तव्वसुम ने खुलासा किया।

‘अम्मी ऐसा! आपने बताया भी नहीं’, सगीर ने कहा।

वहीं बैठे शून्य में ताकते आनंद सिंह सबकुछ सुनते हुए चिंता में लीन थे। अब…अब तो मामला उलट गया। अब कैसे पत्नी और अनुराग को इसकी सूचना देंगे। घर में लोग इंतजार कर रहे होंगे कि वे शौकत जी के साथ आने वाले हैं। …यह क्या हो गया?

वह खुद और घर के लोग तो शौकत भाई, तव्वसुम भाभी जी की निश्छलता और उनका प्रेम जानते हैं। ये लोग अनुराग की बेहतरी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। समधी के इनकार के बाद भी उन्होंने प्रयास किया होगा, लेकिन सबकुछ तो वे भली-भांति समझ रहे हैं, उनकी पत्नी और बेटा अनुराग भी समझेगा, लेकिन आसपास और जानने वालों को व्यंग्य करने का मौका मिलेगा। अनेक लोगों को शौकत भाई से उसकी अति निकटता अखरती थी। वे लोग तो कई तरह से साबित करने की कोशिश करेंगे कि शौकत चाहते तो यह काम आसान था। ऊपर से कह दिया, लेकिन प्रयास नहीं किया – नहीं हुआ। खिल्ली उड़ाने-व्यंग्य करने का मौका मिल गया है लोगों को। और अनुराग? कैसा लगेगा उसे एकाएक यह सुनकर। अनुराग से कहना पार नहीं लगेगा – उफ! मेरा बेटा अनुराग बेरोजगार का बेरोजगार ही रह गया।

लेकिन शौकत भाई इस बुरी खबर को सुनकर आखिर कहाँ चले गए? घर के लोगों को भी पता नहीं। उनका मोबाइल भी ऑफ है। घर से गए भी लगभग पांच घंटे बीत गए। शौकत भाई और तव्वसुम भाभी ने खबर सुनने के बाद से कुछ खाया-पिया नहीं। आखिर क्या बात है?

‘अंकल जी, नाश्ता कीजिए, चाय बन रही है’, सगीर ने आग्रह किया।

‘नहीं बेटा, नहीं। इच्छा नहीं है कुछ भी खाने-पीने की। अब मैं चल रहा हूँ घर। लोग इंतजार कर रहे होंगे। भाई जी पता नहीं क्यों अब तक नहीं आए। …अब मैं जा रहा हूँ भाभी’ कहते हुए सोफे से उठने लगे आनंद सिंह।

‘अजीब हाल है भाई। मैं अभी आ ही रहा हूँ और आप जाने की बात कर रहे हैं’ शौकत आलम कहते हुए अंदर आ गए। उन्होंने गौर से आनंद सिंह के चेहरे की तरफ देखा। आनंद सिंह गहरी उदासी के बावजूद उनके आने पर मुस्कराहट लाने की असफल कोशिश कर रहे थे।

‘आप कहाँ थे? और मोबाइल का स्वीच भी ऑफ?’ आनंद सिंह ने पूछा

‘पहले आप इत्मीनान से बैठिए। तब तफसील से बातें होंगी।’ शौकत आलम ने उत्साह से कहा। वह समझ रहे थे कि आनंद भाई क्यों उदास हैं। उस संबंध में उन्होंने कुछ चर्चा ही नहीं की, मानो वे कुछ भी समझ नहीं रहे हों।

‘आनंद भाई ने कुछ खाया पिया?’

‘बहुत पहले चाय ली थी, लेकिन अब चाय नाश्ता कुछ भी लेने से मना कर दिया है।’ तव्वसुम ने बताया।

‘ठीक है… तब मैं भी कुछ नहीं लूंगा।’

‘अरे ऐसा भी क्या शौकत भाई। कल शाम से आपने कुछ खाया नहीं। पता नहीं कहाँ से आ रहे हैं आप। जल्दी कुछ लीजिए। मैं भी आपके साथ…’

इसी बीच आनंद सिंह के मोबाइल की घंटी बजने लगी। उन्होंने देखा, अनुराग का कॉल था।

‘पापा! आप लोग कब आ रहे हैं। मैं रात के खाने के लिए मटन वगैरह लाने जा रहा हूँ।’

बेटे की बात सुनकर हकलाने लगे आनंद सिंह। शौकत आलम ने ठहाका लगाया। तब वे गौर से शौकत भाई को देखने लगे।

‘अनुराग से कह दीजिए न, जल्दी जाए मटन लाने… हाँ साथ में कलेजी लाने को भी कह दीजिए, तलकर खाया जाएगा। कहिए…कहिए…मैंने उसकी बात सुन ली है’ शौकत भाई ने मजाक के लहजे में कहा।

‘ठीक है अनुराग, ले आओ और कलेजी भी ले लेना अलग से। हमलोग आ रहे हैं’ आनंद सिंह ने कहा और मन ही मन सोचने लगे- सबकुछ जानकर क्या सोचेगी पत्नी और फिर बेटा। गम का जश्न कैसे मनाएंगे हम?

खैर नाश्ता आया। शौकत भाई का मन रखने के लिए आनंद सिंह ने भी हाथ बढ़ाया।

‘परसो अनुराग को अपने कागजात के साथ मुशर्रफ आलम साहब के पास भेज दीजिए’ काफी देर बाद शौकत आलम ने कहा।

सुनकर चिहुंक से गए आनंद सिंह। एकटक शौकत आलम का मुंह ताकने लगे। बड़ी मुश्किल से उनके मुंह से आवाज आई- ‘अब जाने से क्या होगा भाई जान? उन्होंने तो साफ मना कर दिया है आपसे। यहाँ आकर मैं सबकुछ जान गया हूँ। हाँ यह सच है कि अभी तक अनुराग और वीणा नहीं जान रहे हैं’, आनंद सिंह ने कहा।

‘वह बात पुरानी हो गई भाई साहब। नई बात यह है कि मैंने नकारात्मक बात सुनते ही गाड़ी ली और आज सुबह सीधे मुशर्रफ आलम साहब के यहाँ चला गया। मैंने भीटो लगाते हुए कह दिया कि अनुराग को किसी भी हालत में नियुक्त करना है। मैंने यह भी कहा कि नियमानुसार भी उसे होना चाहिए था। साक्षात्कार में सदस्यों ने उसे अच्छा अंक दिया है

कैरियर साक्षात्कार को मिलाकर 85 नंबर होता है उसका और आपके रिश्तेदार के लड़के के 82। अब आपको अपनी तरह से नंबर देकर नियुक्ति पत्र निकालना था। अनुराग का होना बेईमानी नहीं, लेकिन उस लड़के का नियुक्त होना बेईमानी हो जाएगी।

जब मैंने ऐसा कहा तो मुशर्रफ साहब बिलकुल मौन हो गए। एक घंटे के बाद उन्होंने मौन तोड़ा।

‘क्या कहा उन्होंने?’ आनंद सिंह ने उत्सुकता से पूछा।

‘उन्होंने कहा – अनुराग को कागजात के साथ परसो भेज दीजिए – समधी साहब की इस बात के बाद ही मैंने उनके यहाँ का अन्न-जल ग्रहण किया।’ शौकत आलम ने कहा और आनंद सिंह फिर उनका मुंह ताकने लगे।

शौकत आलम के घर का गमगीन माहौल एकाएक परिवर्तित हो गया। सभी के चेहरे पर खुशी दौड़ने लगी।

‘क्या मटन अकेले ही खाने की इच्छा है?’ काफी देर बाद तव्वसुम भाभी ने कहा।

‘अरे नहीं… चला जाए- भाभी आप भी, सगीर भी – सभी लोग।’

‘आब्जेक्सन! मैं कैसे जा सकती हूँ। आप अपने मित्र को आमंत्रित करने आए थे। हमलोगों से चलने का जिक्र तक नहीं किया। यह भी नहीं बताया कि अपने मित्र को लेने आए हैं आप…सारी चीजें गुप्त रखीं।’

‘मैंने ऐसा कुछ सोचकर नहीं किया। अगर आपको वैसा महसूस हुआ तो माफी चाहता हूँ।’ आनंद सिंह ने कहा।

‘ठीक है, माफ किया।’ हँसती हुई कहा तव्वसुम भाभी ने।

‘तो चलिए अब।’

‘आज तो नहीं जाऊंगी लेकिन इस बात के दंड स्वरूप चार संडे को हम सभी के लिए व्यवस्था करनी होगी’ भाभी की बात पर सभी ने ठहाका लगाया।

‘वह ठीक है, मुझे स्वीकार है। लेकिन आज के लिए भी मैं अनुरोध कर रहा हूँ।’

काफी देर तक मीठी बहस के बाद सारे लोग जाने के लिए घर से बाहर होने लगे।

 

संपर्क सूत्र : द्वारा, जितेंद्र कुमार, मदन जी का हाता, आरा, जिलाभोजपुर 802301 मो. 9431847568 ईमेल: janpathpatrika@gmail.com