रेलवे में कार्यरत। प्रकाशित पुस्तक : ‘आधी रात की बारिश में जंगल’।

 अवसाद

अंधेरे से निकलकर
उजाले में आता है एक आदमी
मन मगर अंधेरे में ही रह जाता है
धंसा हुआ

खुुद को डूबते हुए देखता रहता है
किनारे पर बैठ कर
बहुत ज्यादा करता है तो
मुंह उल्टी दिशा में करके बैठ जाता है

लड़ने की क्षमता नहीं
जीतने की चाह चली जाती है
पराजय का प्रतिकार बेमानी लगने लगता है

बीच सड़क
आती-जाती सवारियों के सामने हो जाता है
पार जाने की चाह पहले मरती है
दुर्घटना की चोट बाद में मारती है

सुख को जीते हुए भी
दुख की स्मृति दुख का बोध
दुख की आशंका
नहीं मिटती मन से पूरी तरह।

संपर्क :रेलकर्मी, जसीडीह, प्रो़फेसर कॉलोनी, बिलासी टाउन, देवघर, झारखंड-814113 मो. 9304231509