सेवानिवृत आई.पी.एस. एवं आदिवासी साहित्यकार। अब तक तीन कविता संकलन, एक प्रबंध काव्य, तीन यात्रा वृत्तांत, आदिवासी विमर्श की तीन पुस्तकें, संस्मरणों की एक पुस्तक और तीन उपन्यास प्रकाशित।

 

 

रामायण में वर्णित रामकथा को भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न समुदायों द्वारा रूपांतरित किया और पुनः सुनाया गया है। आदिवासी समुदायों ने अपनी अनूठी मौखिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं के साथ इस महाकाव्य में अपनी व्याख्याएं और प्रसंग जोड़े हैं। वे इन रूपांतरणों में किस तरह अपने सांस्कृतिक मूल्यों, स्थानीय देवताओं और परंपराओं को शामिल करते हैं, यह देखना चाहिए। इन संस्करणों में रामकथा के पात्रों, संदेशों आदि के आदिवासीकरण की अनूठी विशेषता मिलती है।

भीली रामकथा

राजस्थान तथा गुजरात के भीलांचल में ‘राम-सीतामानी वारता’ के नाम से रामकथा की वाचिक परंपरा रही है। ‘भीलों के भारथ’ की ही तरह से इस कथा का संकलन भगवानदास पटेल ने किया है। इसमें कुल तीस सर्ग हैं। भीलों की इस कथा में सीता कृषि की अधिष्ठात्री देवी हैं। विवाह के मौके पर वह पिता से दहेज स्वरूप सिर्फ फूल-पौधों के बीज मांगती है। वह बीज बोकर वन को हरा बनाती है। अहल्या के प्रसंग में बताया है कि ब्रह्मा ने दूसरे प्राणियों से सर्वश्रेष्ठ अंग लेकर एक ऐसी नारी का निर्माण किया जिसमें कुरूपता का संपूर्ण अभाव था। उसका नाम हलियादे रोणीं है। इंद्र ने जब अहल्या के संग छेड़खानी की तो ऋषि गौतम ने अगनपसेरी (अग्नि की चादर) उसके ऊपर रख दी। इंद्र जल कर काला हो गया। यहां राम द्वारा अहल्या के उद्धार का जिक्र नहीं है। इस क्षेत्र की रामकथा में राम को विष्णु का अवतार नहीं, बल्कि सांसारिक पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है। यहां शूर्पणखा का प्रसंग नहीं है।

सीता की खोज करते समय राम को एक गिलहरी ने सीता हरण करने वाले रावण का पता दिया। राम ने उसकी पीठ पर आशीर्वाद के रूप में उंगलियों से सोने जैसी रेखाएं खींच दीं। यह प्रसंग बिरहोर व संथाल आदिम समुदायों में भी प्रचलित है। हनुमान समुद्र के मध्य राम द्वारा चलाए गये बाण पर विश्राम करके लंका पहुंचते हैं। ‘राम-सीतामानी वारता’ में रावण के प्राण सूर्य के रथ में स्थित भ्रमर में है। लक्ष्मण भ्रमर को मारकर कर रावण का वध करते हैं। यहां राम रावण का वध नहीं करते। लक्ष्मण का यह कथन गौर करने लायक है- ‘राम तो ऋषि जैसे हैं, उनसे कुछ नहीं होगा। यह कार्य भी मुझे ही करना होगा।’

आदिवासी रामकथा में अयोध्या वापसी पर सीता की कोई अग्निपरीक्षा नहीं होती, बल्कि वह जनसमुदाय के बीच पूरे सम्मान के साथ गृह प्रवेश करती है। लंका विजय के बाद वापस अयोध्या आने पर सीता के चरित्र पर कोई अंगुली नहीं उठाता, ना जनता की तरफ से कोई धोबी किस्म का आदमी और ना ही स्वयं राम। उसके चरित्र पर उंगली उठाने का काम कौशल्या करती है, जो संयुक्त परिवार की मालिक है। यहां परिवार की मुखिया स्त्री को बताया गया है। भीली राम कथा में सीता का त्याग अयोध्या में आने के बाद माता कौशल्या और सीता के बीच सास-बहू के झगड़े के कारण होता है। उसी वजह से सीता को वनवास दिया जाता है।

वन में सीता को बाघ अपनी धर्म-बहन बनाता है और अपनी पीठ पर बिठाकर उसे ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में छोड़ता है। वहीं सीता के दो पुत्र लव व कुश का जन्म होता है। यहां मनुष्य और वन्यजीवों के सहअस्तित्व का संकेत हमें मिलता है। स्त्री-पुरुष के संबंधों की दृष्टि से देखा जाए तो रामकथा का आदिवासी लोक में जो प्रचलन है वहां सीता पुरुष के द्वारा बार-बार सताई नहीं जाती, और न उसकी अग्नि परीक्षा होती है। वह पुरुष के बराबर मेहनत करती है और पुरुष को जवाब देती है। आदिवासी समाज में स्त्री और पुरुष के जैसे बराबर के संबंध हैं, वे ही रामकथा की परंपरा में हमें दिखाई देते हैं।

भीलों की रामकथा पढ़-सुनकर यह संदेश मिलता है कि पारलौकिक, अलौकिक, अमूर्त ईश्वर जैसा कुछ नहीं है। जो कुछ है, इसी संसार में लौकिक रूप में है। अवतारवाद का यहाँ एक तरह से खंडन है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्री का स्थान ऊंचा है।

मुंडारी रामायण

पूर्वी भारत के मुंडा आदिवासियों में रामकथा का एक अनूठा रूपभेद प्रचलन में है। यह मुंडारी साहित्य की मौखिक-वाचिक परंपरा को समृद्ध करता है।

उसके कथानक में अयोध्या नाम का एक गांव है। सीता एक आदिवासी किशोरी है, जो अकाल के वक्त पैदा हुई। सीता का पिता जनक राजा नहीं होकर एक साधारण किसान है। सीता जब बकरियां चराने जंगल में जाती है तब रावण उसका अपहरण करता है। ‘सिता’ ऋग्वेद का एक कृषि संबंधी देवता है और मुंडा लोक में वह मातृदेवी है। ऐसी ही मान्यता शबर लोगों की है। मुंडा लोगों का विश्वास है कि लंबी पूंछ वाले वानर वस्तुत: जंगलों में वास करने वाले आदिम समुदाय ही थे, जिनकी कोई पूंछ नहीं होती थी। असल में वे लोग अपनी धोती इस प्रकार बांधते थे कि उसका एक भाग पूंछ की तरह पीछे लटकता था। आज भी धोती पहनने का यही तरीका मुंडाओं और शबर समुदायों में प्रचलित है, विशेषकर तब जब वे लोग नृत्य करते हों।

कार्बी रामायण

कार्बी समुदाय के लोग असम, अरुणाचल, मेघालय, मिजोरम एवं नागालैंड के कुछ हिसों में रहते हैं। इन लोगों की खास बात यह है कि इनके यहां मूर्तियां, मंदिर या तीर्थस्थल नहीं हैं। ये पुरखों एवं आत्माओं की पूजा करते हैं। कालांतर में वैष्णव प्रभाव स्वरूप इनकी मौखिक परंपरा में रामकथा का प्रवेश हुआ। कार्बी रामायण में लंका के राज्य में बारह सिर वाला ‘रावन’ तथा उसके तीन भाई ‘विभीखन’, ‘महीराबन’ और ‘मेकनात’ (मेघनाथ) रहते थे। रावण शक्तिशाली राजा था। उसके द्वारा देवता ईश्वर से रावण से छुटकारा दिलाने की प्रार्थना करते हैं। ईश्वर ने पृथ्वी पर राम और लक्ष्मण के रूप में जन्म लेने की बात कही। वे यह भी बोले कि लक्ष्मी देवी कनकपो के घर सीता के रूप में जन्म लेंगी। कार्बी कथा में राजा दशरथ को अयोध्या का राजा ‘बनोपमो’ कहा गया है।

राम-सीता विवाह की कथा वाल्मीकि रामायण जैसी ही है। इस कथा में राम-रावण युद्ध से पहले राम एक विशेष पूजा करता है, जिसमें पुरोहित के रूप में रावण को आमंत्रित किया जाता है। एक प्रसंग वाल्मीकि रामायण से अलग यूं है कि जब पुरोहित रावण के सामने राम झुककर उन्हें नमन करते हैं तो लक्ष्मण को गुस्सा आता है। उसके मन में यह प्रश्न है कि दुश्मन के सामने झुकने की क्या आवश्यकता है? राम लक्ष्मण को समझाते हैं- ‘इस घड़ी में रावण पुरोहित के रूप में हमारी सहायता के लिए पधारे हैं। इसलिए उनका स्वागत-सत्कार करना आवश्यक है।’ पूजा समाप्ति के बाद रावण ने राम को विजय का आशीर्वाद दिया। यह राम-कथा कार्बी आदिम समुदाय की विशुद्ध रूप से मौखिक स्वरूप में है और पीढ़ी दर पीढ़ी गाई और कही-सुनी जाती है।

बिरहोर रामायण

बिरहोर रामायण के अनुसार राजा जनक के राज्य में भीषण अकाल पड़ा। पंचों ने राजा से कहा कि वर्षा के लिए आप स्वयं अपने हाथों से खेत को जोतिए। जैसे ही राजा ने जोतना प्रारंभ किया, उसके हल से बनी हड़ाई (नाली) में एक सुंदर मानव शिशु दिखाई दिया। हल चलाते वक्त (सीतान) सीता मिली, इसलिए उसका नाम सीता रख दिया गया। राजा जनक उसे अपने घर ले गए तथा अपनी पुत्री के रूप में उसका लालन-पालन किया। राजा जनक के आंगन में एक बड़ा और वजनदार धनुष था, जिसे कोई हिला तक न सकता था। घर की सफाई के दौरान सीता ने उसे नियत स्थान से हटा कर दूर रख दिया और उस स्थल की भी सफाई-लिपाई कर दी। बाद में यही धनुष राम व सीता के विवाह का निमित्त बना। राम, सीता व लक्ष्मण के वन गमन की घटना वाल्मीकि रामायण जैसी ही है। सीता द्वारा वन में स्वर्ण मृग को देखना और राम द्वारा उस मृग का पीछा करना वाल्मीकि व तुलसी कृत राम कथा के अनुसार ही है। कुटिया पर आकर सीता के अपहरण और राम-रावण युद्ध के प्रसंग भी वैसे ही हैं। यहां रामकथा में तनिक अंतर यह आता है कि रावण के प्राण उसकी नाभि में नहीं होकर सोने की दीवारों से बने एक खास कक्ष में हैं।

गोंड समुदाय में रामकथा

भारत के आदिवासियों में भीलों के बाद सर्वाधिक संख्या गोंडो की है, जो मुख्यत: छत्तीसगढ़ एवं महाराष्ट्र में पाये जाते हैं। इस समुदाय में प्रचलित राम कथा में राम की तुलना में सीता को महत्व दिया गया है और उसके बाद लक्ष्मण को। गोंड समुदाय अपनी पौराणिक परंपरा को ‘नावेदा’ और ‘लावेदा’ कहते हैं। नावेदा से तात्पर्य जो वेदों में नहीं है और लावेदा से जो वेदों से बाहर है।

गोंडी रामकथा में एक प्रसंग आता है। राम और सीता लक्ष्मण की शादी के लिए पाताल लोक के नाग राजा वासुकी से उसकी पुत्री बिजुलदई के विवाह की बात चलाते हैं। वासुकी की शर्त के अनुसार लक्ष्मण उनके यहां तिल्ली की खेती और लकड़ी की चिराई का काम करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जो पौराणिक-मिथकीय कथा जिस अंचल अथवा समुदाय में प्रचलित होती है, उसका रूपांतरण वहां की जीवन शैली के अनुरूप हो जाता है।

गोंडों का विश्वास है कि रावण उनका पूर्वज है। कई जगह रावण की पूजा की जाती है। यहां राम के आशीर्वाद से रावण के जन्म की बात समझ से बाहर है। राम रावण से युद्ध के लिए आगे बढ़े और विजयी हुए। सीता सहित लंका से वापस आते समय राम कुछ गोंडो को अपने साथ लाए। ये सूर्यवंशी गोंड कहलाए। सामान्यत: कुछ लोग अपने नाम के साथ राम का नाम जोड़ते हैं, मगर नागपुर, अमरावती, यवतमाल जैसे कुछ जिलों में गोंड जनजाति की नई पीढ़ी आजकल अपने नाम के साथ राम की जगह रावण का नाम लिख रही है। दरअसल, रावण का मातृ पक्ष अनार्य था, इसलिए आदिवासी समुदाय उसे अपना देवता मानते हैं। इन क्षेत्रों में दशहरे के दिन रावण की पूजा की जाती है।

बंजारा (लंबाणी) रामायण

बंजारा रामायण में वाल्मीकि और तुलसी कृति राम-कथाओं का एक तरह से ‘आदिवासीकरण’ हो गया है। बंजारा रामकथा में सीता वरमाला की जगह पगड़ी का प्रयोग करती है। बंजारा समाज में पगड़ी की महिमा है। जनकपुरी में राम की बारात को छप्पन भोग नहीं परोसे जाते बल्कि ‘चूरमा और लापसी’ की दावत दी जाती है, जो बंजारा समाज में प्रचलित है। रावण द्वारा जब सीता का हरण किया जाता है और राम विलाप करते हुए उन्हें खोजते हैं तब रास्ते, मानवेतर प्राणी और प्रकृति तत्व स्वयं सीता की रक्षा के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन करते हैं।

आदिवासी समाज की वैचारिकी और व्यवहार दोनों में मनुष्य से इतर प्राणियों और प्रकृति तत्वों के बीच बहतरीन तालमेल दिखाई देता है। जब राम के कहने पर लक्ष्मण सीता को वन में निस्सहाय छोड़ आते हैं, तब सबसे पहले चार हरिण बेहोश सीता को घेर कर उसकी सुरक्षा में बैठ जाते हैं। इसके बाद कौवा कांव-कांव की आवाज निकालता हुआ कबूतर, बगुला, गिद्ध सहित दूसरे पक्षियों को वहां बुला लेता है। सभी को धरती पर पड़ी सीता की चिंता है। कबूतर अपने पंखों से सीता के मुख पर हवा करता है। बगुला अपनी चोंच में झील से जल भरकर लाता है। गिद्ध जैसा हिंसक पक्षी भी गूलर के फल तोड़कर लाता है। हरिण सीता के मुख को प्यार से चाटता है। सीता को होश आता है। उसे जल पिलाया जाता है। खाने को फल दिए जाते हैं। कौवा कहता है-‘माता, हम सब मिलकर आपकी सहायता करने आए हैं।’ सीता इन्हें आशीर्वाद देती है। बियाबान वन में ये पशु-पक्षी सीता का साथ देते हैं।

गोमली बाई सीता का प्रसव कराती है। जब वाल्मीकि वहां आते हैं तो सीता उनसे कहती है- ‘आदिवासी बहन की मदद से प्रसव पूर्ण हुआ है जिसके कारण हम दोनों जच्चा-बच्चा ठीक हैं। मुझे कोई कष्ट नहीं हुआ।’

देखने वाली बात यह है कि रामकथा का सबसे त्रासद चरित्र सीता है। बंजारा कथा के अनुसार सीता स्वयंवर के दौरान लक्ष्मण द्वारा धनुष तोड़ने के पश्चात भी उसे राम को वर के रूप में चुनने को विवश किया गया। यह वही राम हैं, जिन्होंने निर्दोष सीता को वनवास दिया। सीता को किसी सवर्ण राजर्षि अथवा ब्रह्मर्षि या देवर्षि के आश्रम में आश्रय नहीं मिलकर एक ‘अवर्ण’ वाल्मीकि ऋषि की कुटिया में शरण मिली।

कोल रामकथा

कोल समुदाय में प्रचलित रामकथा में राम और शबरी प्रसंग में संदेश बदला हुआ है। राम ने शबरी के बेर खा लिए, पर लक्ष्मण ने खाने से इनकार कर दिया। यकायक कहीं से एक बाण आया, जिसने लक्ष्मण को घायल कर दिया। जब वे पीड़ा से कराह रहे थे तभी उन्होंने महसूस किया कि भूल हो गई है। इस हृदय परिवर्तन के कारण लक्ष्मण को बेर खाने पड़े। ‘वागर्थ’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक शंभुनाथ ने इसके अप्रेल 2022 अंक में ‘आदिवासियों पर बाज’ शीर्षक से लिखे अपने संपादकीय में इस प्रसंग को लेकर रेखांकित किया है कि ‘यह सामाजिक भेदभाव के नजरिए का आदिवासियों द्वारा आक्रामक प्रतिवाद है।’

कुछ अन्य आदिवासी समुदाय

आदिवासी समाज में रामकथा के विविध रूपांतरणों के अलावा कुछ फुटकर संदर्भ मिलते हैं। भुईया आदिम समुदाय में कुंभकर्ण को खलनायक की जगह तपस्वी ऋषि माना जाता है। बैगा लोगों की मान्यता है कि लंका नाम का एक गांव था जहां एक बैगा दंपति ने अग्नि को जन्म दिया था। बैगा समुदाय के अनुसार राम तथा लखन अपनी ‘अरजनी’ नाम की बहन के साथ ‘बंडागारी’ नामक स्थान पर रहते थे।

कमार समुदाय का ताल्लुक मूलत: बस्तर से है। यहीं से इनका पलायन ओडिशा तक हुआ, यह बताया गया है। इस समुदाय की एक किंवदंती है कि जब हनुमानजी ने लंका को जला डाला तब रावण ने शाप दिया- ‘संसार की सारी आग बुझ जाए।’ आग के अभाव में लोग परेशान हो गए। हनुमान समुद्र के पास दौड़ते गए और निरंकार स्वामी को बताया की यदि संसार में कहीं आग न रही तो राम की स्थिति लज्जाजनक हो जाएगी। निरंकार ने सलाह दी- ‘तुम अपने मस्तक को रगड़ो, उसमें से अग्नि उत्पन्न होगी। ऐसी आग को रावण का बाप भी बुझा नहीं सकेगा।’ हनुमानजी ने अपना मस्तक रगड़ा, उससे उत्पन्न अग्नि आज भी संसार में है।

दक्षिण भारत के आदिम समुदायों में प्रचलित रामकथा की बात करें तो कोया समुदाय में राम से मिलते-जुलते स्थानीय नायक बीमा कोया की कहानी है। यहां सीता को जंगल की बेटी माना जाता है। चेंचू मानते हैं कि सीता एक चेंचू महिला थी और वे उनका वंशज होने का दावा करते हैं। कुछ कहानियों में, सीता अयोध्या लौटने से इनकार कर देती हैं और अपने लोगों के साथ जंगल में रहना चुनती हैं। कुरुबा और सोलिगा आदिवासी राम और हनुमान को वन देवता के रूप में पूजते हैं, लेकिन उनकी कहानियां कर्नाटक की पहाड़ियों और जंगलों से हनुमान के संबंध पर जोर देती हैं। कुछ इरुला संस्करणों में, रावण पूरी तरह से दुष्ट नहीं है, बल्कि एक गलत समझा गया राजा है। राम को एक घुमक्कड़ के रूप में दर्शाया गया है जो आदिवासी बुजुर्गों से ज्ञान सीखता है। टोडा लोगों की कथा में सीता एक नश्वर महिला के बजाए धरती देवी हैं।

आदिम समुदायों में प्रचलित रामकथा के संबंध में फादर कामिल बुल्के की राय है, ‘जनजातियों का साहित्य सुरक्षित नहीं रह सका, केवल उनकी कुछ दंतकथाएं मिलती हैं। उन कथाओं में रामकथा का मूलरूप ढूंढना एक असाध्य कार्य है।’

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