वरिष्ठ कवि।अब तक दो कविता संकलन प्रकाशित।संप्रति अध्यापन।

मैंने चाहा ही ऐसा

मैंने चाहा ही ऐसा
जो मेरी सामर्थ्य से अधिक था

मैंने चाहा
धूप की सेज पर तारों को बिछाना
और चांदनी को ओढ़ लेना

मैंने चाहा
अस्ताचल की धूप से
सुलगकर लाल हुई बर्फ को
हुक्के में भरकर गुड़गुड़ाना

मैंने चाहा
पहाड़ की चोटी से
लुकते-छिपते निकलते
पूर्णिमा के चांद के साथ
ज्वारभाटे में होली खेलना

मैंने चाहा
तुमसे वही प्यार
जो मेरे दिल में उठता है
तुम्हारे लिए ज्वारभाटे-सा
उसका तुम्हें आभास हो
कम से कम एक सुनामी
तो आए तुम्हारे भीतर
जो तुम्हें सायास ले आए मुझ तक
जिस दिन यह हो गया

उस दिन फिर कुछ नहीं रहेगा
मेरी सामर्थ्य से बाहर
उस दिन उल्लास में भरकर खेलूंगा
पूर्णिमा के चांद के साथ
ज्वारभाटे में होली
चांद के माथे पर लगाऊंगा
तुम्हारे काजल से टीका
धूप में अंगारों-सी सुलगती बर्फ को
हुक्के में भरकर गुड़गुड़ाऊंगा
अपनी ललियाई आंखों से

तुम्हारी निरभ्र मुस्कान को पीता हुआ
धूप की सेज पर
तारों को बिछाऊंगा
मोगरे के फूलों-सी
तुम्हारी सांसों की महक को
अपनी सांसों में भर
मादकता में झूमता
चांदनी ओढ़कर सो जाऊंगा।

संपर्क : गांव–लंघू, डाकघर–गांधीग्राम, तह–बैजनाथ, जिला–काँगड़ा, हि.प्र.-१७६१२५मो.९४१८१९३०२४