व्यवसाय के साथ निरंतर साहित्यि लेखन। पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।

 

सर्द सुबह में प्रेम

धूप आज भी
कोहरे से जूझ रही है
हवा में ठंडक है
मगर वह चुभती नहीं
बस धीरे से त्वचा पर उतरकर
मन को छू जाती है

मैं चाय की चुस्की लेता हूँ
और सोचता हूँ
शायद यही होता है प्रेम
धीरे-धीरे भीतर उतरती
एक अनकही गरमाहट

धूप की पतली रेखा
मेरे हाथों पर गिरती है
जैसे किसी की हथेली
अनजाने ठहर गई हो

किसी का नाम हवा में घुला है आज
और अचानक सर्दी में
एक कोमल उजास जग उठी है

अब प्रेम कोई आग नहीं रहा
वह धुंध में लिपटा एक प्रकाश है
जो ठंड को भी सुंदर बना देता है

मैं इस क्षण को जी रहा हूँ
जहां ताप स्नेह से आता है
और सर्दी
प्रेम का दूसरा नाम लगती है।