वरिष्ठ कवयित्री। काव्य संग्रह- ‘बस कह देना कि आऊंगा’, ‘मनरंगना’।

 

मुस्कराना

जब उन्होंने कहा
‘लड़की होकर इतना बोलती हो?’
मैंने होंठों पर रख ली
आधी मुस्कान
जिसमें पूरा इतिहास था
सती सावित्री और सीता का

जब मेरी रोटियां
थोड़ी मोटी बन आईं
मैंने आंच में नहीं,
अपने मन में सेंक लिया अपराधबोध
फिर भी मुस्कुराई
जैसे रोटी नहीं मैं खुद पकी होऊं

जब दहेज के नाम पर
मेरे पिता की आंखें झुक गईं
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा
‘कोई बात नहीं, बाबा’
मैं तब भी मुस्कुराई

मुस्कुराना मेरा हथियार नहीं
मेरी देह की भाषा है
जो हर दर्द को
साफ-सुथरे रूप में
छुपा लेना जानती है

क्योंकि रोना
अब तक किसी को नहीं बदल सका
पर मुस्कुराना
कई बार मुझे
खुद से भेंट करा गया।

दहेज

उन्होंने कहा था
‘कुछ लेकर आना बेटी,
खाली हाथ मत आना’

वे नहीं जानते थे कि
मैंने अपने बचपन की हँसी
मां की नींदें
और पिता का भरोसा
पहले ही बांध लिया था पोटली में

सात फेरे के बाद
जब उन्होंने कहा
‘अब ये घर तुम्हारा है’
तो लगा जैसे किसी ने
मेरे नाम से गिरवी रख दी हो
मेरी ही परछाई

हर नई साड़ी के भीतर
एक पुराना धब्बा था
हर जेवर में
एक ठंडी धड़कन छिपी थी
जो कहती थी,
‘तुम कीमत देकर आई हो यहां’

मैंने कई रातें
अपनी हथेलियों पर जलते दीये रखे
ताकि खुद को याद दिला सकूं
कि मैं अब भी जिंदा हूँ

अब जब अपनी बेटी के बाल संवारती हूँ
तो कहती हूँ
‘कुछ लेकर जाना जरूर मगर दहेज नहीं
अपना आत्मसम्मान अपनी जमीन
अपनी पूरी आवाज लेकर जाना
जो किसी को उधार न लगे…’।

संपर्क : ए. के. पांडेय, फ्लैट नंबर 2बी, सूरज अपार्टमेंट हरिहर सिंह रोड मोरहाबादी, रांची-834008 ’झारखंड’ मो.7903507471