
प्रकाशित पुस्तकें : ‘जंगल में पागल हाथी और ढोल’, ‘पीठ पर रोशनी’ (काव्य संकलन), ‘ढुकनी एवं अन्य कहानियां’ (कहानी संग्रह)।

संभावनाओं के संपूर्ण वितान में भी ऐसी किसी संभावना की कल्पना, कुमार मनीष ने आज तक नहीं की थी। उनके लिए अब दुनिया बिलकुल अपसाइड डाउन हो गई थी। एक झटके में सब कुछ बदल गया था। जीवन रंगों का विन्यास बिखर कर ऐसे गडमड हो गया था कि रंगों की पहचान ही खत्म हो गई थी। दुख ने अपने नुकीले पंजे उनकी गर्दन में गाड़ दिए थे। लहूलुहान से वे किसी तरह खुद को संभालते हुए घर पहुंचे थे। दो-तीन लोग, जो उनके साथ अब तक थे, अपने-अपने घर जा चुके थे।
अब वहां उनके साथ स्मृतियों के सघन झोंकों के, जिसमें उनका अस्तित्व उड़ा जा रहा था, कुछ और न था। हालांकि घर वही था, वही दर-ओ-दीवारें। जहां तक उनकी नजर जा रही थी, सब कुछ वैसे के वैसे ही थे, लेकिन घूम फिर कर वापस जब खुद पर नजर जाती तो पाते थे कि वे स्वयं अब वही नहीं हैं, जिंदगी पहली सी नहीं रही। बचपन से लेकर विभा की मृत्यु और उसके अंतिम संस्कार तक की स्मृतियां झूला झूल रही थीं। कई सारे वैसे दृश्य भी उनकी आंखों के सामने कौंध गए, जो युवावस्था में कभी गुजरे थे और महत्वहीन से थे।
उन्होंने कहीं पढ़ा था कि जब मृत्यु आसन्न होती है तो पुरानी स्मृतियां चलचित्र की तरह आंखों के सामने चलने लगती हैं। उन्हें समझ नहीं आया कि स्मृतियों की यह रेल अचानक क्यों चलने लगी थी? क्या वे मरने वाले हैं, क्या उनकी मृत्यु आसन्न है? इस बात से उन्हें डर लगा। डर मृत्यु से नहीं लगा। मृत्यु के बाद से लगा। मृत्यु तो उन्होंने अभी-अभी देखी थी; अपनी जीवन संगिनी विभा की मृत्यु। मृत्यु तो मुक्ति है। लेकिन मृत्यु के बाद इस देह का क्या होगा?
उन्होंने डर को भगाने के लिए ध्यान इधर-उधर करने की कोशिश की। अब आगे का जीवन कैसे होगा, अकेले कैसे जी पाएंगे? इसपर विचार करने लगे। लेकिन डर उनके साथ खेलने लगा था। उन्हें बार-बार लगता वे मर चुके हैं। उनकी देह किसी कोने में पड़ी सड़ रही है। जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ कर उसे खाने से पहले खेलती है। डर भी इंसान को खाने से पहले उससे खेलता है। वे जितना मन को मजबूत करते, डर अनेक रूप बदल कर आता और उनसे खेलने लगता। वे अपना मन भूल जाते, मन को मजबूत रखना भूल जाते।
अचानक उन्हें लगा कि उनके सीने में बाईं तरफ कुछ गड़ रहा है। रह-रह कर कोई उनके सीने को दबा रहा है। लगता है हार्ट-अटैक आने वाला है। उन्हें तेज घबराहट हुई। घर में वे अकेले हैं। अगर हार्ट-अटैक आ गया तो? कोई उन्हें अस्पताल ले जाने वाला भी नहीं। हाथ स्वतः मोबाइल फोन की ओर गया। ‘बेटे को फोन लगाता हूँ।’ फिर उन्हें याद आया, बेटा कैसे आ सकता है। बेटा तो अमेरिका में है। बेटे का ध्यान आते ही बेटे से जुड़ी कई स्मृतियां भी हवा के तेज झोंके की तरह आ गईं। वे कितने खुश हुए थे, जब बेटे के लिए अमेरिका का वीजा फाइनल हो गया था। अपने सभी जानने वालों को, जिससे पहले कभी बात नहीं होती थी, उसे भी बताया था कि अभिनव अमेरिका जा रहा है।
स्मृतियों की चादर में कुमार मनीष का दर्द छुप गया। उन्हें याद आया कि सुबह से उन्होंने कुछ खाया नहीं है। हो सकता है गैस चढ़ जाने के कारण छाती में दर्द हो रहा हो। उन्हें ऐसा पहले भी होता रहा है। भूखे पेट रहने से गैस छाती में चढ़ जाती है। भूख से उन्हें अपना बचपन याद आया। बचपन का गांव याद आया। गांव होता तो आस-पड़ोस के घरों से कुछ खाने का सामान आ जाता। कहीं से रोटी आती, कहीं से सांत्वना और प्रेम के बोल आते। लेकिन शहर में कहीं से रोटी नहीं आएगी। सांत्वना भी कहीं से नहीं आएगी।
वे उठे, उठकर फ्रिज टटोला। विभा हमेशा फ्रीज़ में कुछ फल रखा करती थी। लेकिन आज फ्रीज़ लगभग खाली था। कई दिनों पुराना ब्रेड का आधा खुला हुआ एक पैकेट पड़ा था। किसी तरह पानी के साथ ब्रेड को गले के नीचे उतारा। तभी चाय की तीव्र इच्छा हुई।
उन्होंने तलाशा तो चीनी तो मिली पर चाय पत्ती नहीं मिली। पता नहीं विभा ने कहां रखी होगी? विभा के होते उन्होंने कभी इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया था। रसोई में वे सामान्य तौर पर आते नहीं थे। जब जिस चीज की जरूरत हुई, विभा से मांग लिया। विभा ने भी कभी इस बात से शिकायत नहीं की थी। उसको भी एक तरह से ऐसा करके खुशी ही होती थी।
विभा पानी देना! विभा चाय देना! विभा नाश्ता बन गया क्या? और पानी, चाय नाश्ता लेकर विभा हाजिर।
चाय की तेज तलब लिए वे वापस आकर सो़फे पर बैठ गए। धीरे–धीरे उन्हें फिर डर घेरने लगा था। उन्हें लगा कि कमरे में अंधेरा भर गया है और उस अंधेरे में वे गुम हो रहे हैं। उनका अस्तित्व धुआं की तरह अंधेरे में घुल रहा है। वे हल्के हो रहे हैं। उन्होंने जोर से सो़फे के हत्थे को पकड़ लिया।
थोड़ी देर बाद मन स्थिर हुआ। सामने सेंट्रल टेबल पर रिमोट रखा था। अपने आप ही रिमोट पर हाथ चला गया। बेमतलब ही टीवी चला दिया। टीवी पर एक बाबा जी जीवन की नश्वरता पर प्रवचन दे रहे थे।
बाबा जी कह रहे हैं, जो आया है, उसे जाना है। कौन कैसे जाएगा यह महत्वपूर्ण नहीं है। जब वह जाएगा तो उसके साथ कितने लोग उसकी अंतिम यात्रा में जाएंगे, यह महत्वपूर्ण है। कुमार मनीष सोचने लगे उनके साथ कौन जाएगा? शाम घिर आई थी, उठकर बत्ती जलाने की इच्छा नहीं हुई। वैसे ही अंधेरे में पड़े रहे, कब नींद आ गई कुछ पता नहीं चला।
कुमार मनीष के लिए जीवन का रास्ता आगे अवरुद्ध दिख रहा था। अब आगे क्या और कैसे? इसका कोई जवाब उनके पास नहीं था। यद्यपि वे जिंदगी के हिसाब-किताब में बड़े निपुण थे। अपने विद्यार्थी जीवन से आज तक एक-एक कदम योजनाबद्ध तरीके से उठाया था। लेकिन जीवन में इस दिन के लिए तो उन्होंने कोई तैयारी ही नहीं की थी। यह दिन ऐसे आ गया था मानो वे किसी रास्ते पर जा रहे हों और रास्ता अचानक खत्म हो गया हो। सामने कोई रास्ता न दिखता हो।
विद्यार्थी जीवन से आज तक उन्होंने अपने आपको परिवार और रिश्ते के संबंधों से बिलकुल दूर कर लिया था। जीवन में सफल हो जाओ तो हजार रिश्ते निकल आते हैं, असफल व्यक्ति को कोई नहीं पूछता। उनका ऐसा स्पष्ट मानना था।
सफलता उन्हें मिली भी। सबसे बड़ी सफलता तो इस बात को मानते थे कि बेटा अभिनव पढ़ लिखकर यू एस में रह रहा था। अभिनव आजतक एक आज्ञाकारी बेटा रहा था। जब उन्होंने जैसा कहा, उसने वैसा ही किया। लेकिन इस बार जो हुआ, उसके लिए वे बिलकुल तैयार नहीं थे।
जब विभा की मृत्यु हुई, उन्होंने अभिनव को फोन किया और पूछा : ‘तुमलोग कितनी देर में पहुंचोगे। उसी हिसाब से बॉडी को मोचूअरी में रखवा देते हैं।’
लेकिन अभिनव ने आने में अपनी असमर्थता जताई। वह छुट्टी नहीं ले सकता था। कुमार मनीष के लिए पत्नी के जाने से बड़ा पहाड़ इस बात से टूटा था कि अभिनव मां के दाह संस्कार के लिए नहीं आ रहा था। सब कुछ जैसे भरभरा कर गिर गया हो।
हाय रे! यह क्या कह दिया?
‘पापा हमारा आना तो संभव नहीं है। यहां स्थितियां बहुत प्रतिकूल हैं…’ उसने आगे कई बातें बताने की कोशिश की, जिसे वे सुन नहीं पाए …उनके कान पत्थर के हो गए।
कुमार मनीष सन्न रह गए थे। क्या ऐसा भी संभव है कि मां मरे और बेटा नहीं आए? एक ही तो बेटा है। अंतिम संस्कार की जिम्मेवारी कौन निभाएगा? दूसरा कोई बच्चा होता तो वह यह सब कर लेता। विभा कितना जिद करती थी कि कम से कम एक बच्चा और कर लिया जाए, लेकिन उन्होंने ठान लिया था कि नहीं एक ही बच्चे को पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाएंगे। काबिल तो उन्होंने बनाया भी था। और ऐसा भी नहीं कि अभिनव एक खराब बेटा था। उसने अपनी वाजिब मजबूरी बताई थी। यू एस में तब वीजा की बड़ी दिक्कत चल रही थी। वहां की सरकार के द्वारा एक निर्णय के तहत भारतीयों को दिए जाने वाले वीजा की संख्या कम की जा रही थी। मंदी के कारण नौकरियों में छंटनी की जा रही थी। अभी हाल ही में बहुत ही लंबे संघर्ष के बाद अभिनव ग्रीन कार्ड के लिए योग्य हो पाया था। ऐसे समय में छुट्टी पर इंडिया जाने पर उसे भय था कि कहीं कंपनी उसे नौकरी से निकाल न दे और उसकी ग्रीन कार्ड मिलने की संभावना खत्म न हो जाए। इतने लंबे संघर्ष और परिश्रम के पश्चात उसने यू एस में यह स्थिति पाई थी। उसे एकबारगी ही खत्म होने का उसे भय था।
लेकिन कुमार मनीष को यह सब कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने आज अपने आपको बहुत ही लाचार, बीमार और असफल पाया।
‘तुम नहीं आओगे तो मां का संस्कार कैसे होगा?’ कुमार मनीष ने टनों बर्फ की सिल्ली अपनी छाती से हटाते हुए कहा था।
अभिनव की तरफ से चुप्पी रही। एक लंबी चुप्पी।
इस चुप्पी में कुमार मनीष डूबने लगे। उन्हें लगा कि उनकी देह ठंडी हो गई। लगा, विभा के साथ वे भी मर गए। उनके जीवन में कुछ झड़ने लगा। उनका अस्तित्व रेशा–रेशा बिखरने लगा। जैसे पुरानी सीलन भरी दीवार से रंग झड़ता है उनका रंग झड़ने लगा। क्या उनके परवरिश और संस्कार देने में कोई कमी रह गई? वे सोच में डूब गए।
अभिनव की तरफ से कोई जवाब नहीं। एक लंबी खामोशी।
अंततः कुमार मनीष ने फोन रख दिया। उन्होंने यह तय किया कि वे अकेले ही अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार कर देंगे। लेकिन अकेले संस्कार कैसे होगा?
अर्थी को कंधा देने के लिए चार लोगों की आवश्यकता होती है। वे चार आदमी कहां से लाएं। वे किसको इस काम के लिए कहें, उन्हें समझ नहीं आ रहा था। उनके दिमाग का सिस्टम फ्रीज़ हो गया। दाह संस्कार के बाद भी पचास तरह के काम होते हैं। तेरह दिनों का कार्यक्रम होता है। वे कैसे यह सब कर पाएंगे? काश कि कोई आदमी होता जो अभी आकर उनके साथ खड़ा हो जाता।
अस्पताल से बॉडी को एंबुलेंस से वे घर ले आए थे। एंबुलेंस वाला अपार्टमेंट के नीचे बॉडी उतारकर चला गया था। उनका मन रो रहा था, लेकिन बाहर से वे पत्थर बने बैठे थे। लोग आ रहे थे। वे कुछ मिनट वहां खड़े रहते। अफसोस की मुद्रा बनाते और कोई न कोई बहाना करके चले जा रहे थे। कोई लाश को हाथ तक नहीं लगा रहा था, न ही कोई दाह संस्कार में लगने वाले उपक्रमों का प्रबंध कर रहा था।
वे सामाजिक व्यक्ति नहीं थे। लोगों से ज्यादा घुलते-मिलते नहीं थे। लेकिन यह तो उनका स्वभाव था। पर आखिरकार थे तो वे भी समाज का हिस्सा। समाज में हर व्यक्ति क्या सामाजिक होगा, लोगों से मिलेगा-जुलेगा तभी समाज उसके साथ खड़ा होगा? क्या समाज का कोई कर्तव्य नहीं? यह कैसा समाज है? यह कैसा धर्म है?
उन्होंने अपने ऑफिस के व्हाट्सएप ग्रुप में अपनी पत्नी की मृत्यु की सूचना डाल दी थी। वे बार-बार व्हाट्सएप चेक कर रहे थे। वहां शोक संदेशों की भरमार थी। लोग सांत्वना भरे संदेश लगातार डाल रहे थे। लेकिन कोई भी दाह संस्कार आदि के बारे में जानकारी नहीं ले रहा था, न ही कोई वहां आने में दिलचस्पी दिखा रहा था। कुमार मनीष को समझते देर नहीं लगी कि ऑफिस से कोई आने वाला नहीं है।
फेसबुक पर भी उन्होंने इस संबंध में एक पोस्ट डाली थी। वहां उनके हजारों मित्र थे। कई सौ मित्र तो उनके अपने शहर में ही थे। कई ऐसे मित्र थे, जिनसे इनबॉक्स में घंटों की चैटिंग थी। फेसबुक पर भी शोक संदेशों की भरमार थी। लेकिन उससे आगे कुछ नहीं।
यह आभासी संसार था, जहां सबकुछ हवा में तैर रहा था, अगर उसे पकड़ने की कोशिश करो तो हवा ही में बिला जाता। यहां कुछ भी वास्तविक नहीं, कुछ भी भरोसे के लायक नहीं।
अंततः उन्होंने अपार्टमेंट के गार्ड से मदद मांगी। गार्ड ने अन्य गार्ड्स से सलाह मशविरा किया। गार्ड्स गांव से आए हुए लोग थे, उन्होंने गांव में देखा था कि किसी के मरने पर कैसे सारा गांव जुटता था। लेकिन यहां वे गेट की ड्यूटी छोड़ कर कैसे जाएं? मिनट-मिनट में साहबों की गाड़ियां आती हैं तो गेट खोलना पड़ता है। एक सेकंड की भी देरी हो जाए तो मेम साहब लोग गाली-गलौज करने लगती है। इसी बीच किसी ने कुमार मनीष को मारवाड़ी समाज द्वारा चलाए जा रहे अंतिम संस्कार के लिए ले जाने वाली गाड़ी के बारे में जानकारी दी और उसे मंगवा लेने की सलाह दी। उसके लिए फोन कर दिया। थोड़ी देर बाद ही गाड़ी आ भी गई।
एक दो करीबियों और कुछ गार्ड्स की मदद से वे श्मशान घाट पहुँचे थे। मृत देह अपने पीछे स्मृतियों का एक अथाह समंदर छोड़कर अग्नि को समर्पित होकर खाक हो चुकी थी। कुमार मनीष बार-बार अपनी मुट्ठियों को खोलते और बंद करते। फिर उन्होंने देर तक अपनी हथेलियों की ओर देखा और जाकर अंतिम बार अग्नि में एक लकड़ी उठा कर डाल दिया और हाथ जोड़ लिया।
अभी तक उन्होंने बड़े सब्र से काम लिया था, लेकिन अब सब्र का बांध अपने किनारों की सीमा को मानने को तैयार नहीं था। वे फफक-फफक के रोने लगे थे। विभा होती तो आकर उनका सर थाम लेती। उनके कंधे पर हाथ धरती। पर विभा ही तो नहीं थी। विभा उनका संसार थी। विभा के अलावे कोई नहीं है। अब वे नितांत अकेले हैं। विभा मुक्त हो गई थी। मृत्यु मुक्ति है। विभा संसार के दुखों से मुक्त हो गई थी। विभा कष्ट मुक्त हो गई थी। लेकिन अब उनका क्या होगा? उन्हें जीवन बिलकुल निःसार लगने लगा।
डर वापस से उन्हें घेरने लगा था। वे सोचने लगे कि उनकी मृत्यु हो गई है और उनकी मृत देह घर में पड़ी सड़ रही है। उन्हें लगा, वे मृत देह को देख रहे हैं। मृत देह का धीरे–धीरे क्षय हो रहा है। किसी को कोई खबर नहीं है। घंटे दिन में बदल गए। अखबार वाला बाल्कनी में अखबार फेंक कर जा रहा है। सड़क पर गाड़ियां तेजी से भाग रही हैं। बाजार में चिल–पों है। पर किसी को उनके बारे में कोई खबर ही नहीं। उनके नहीं होने का कोई नोटिस नहीं ले रहा है। वे घबरा रहे हैं, बेचैन हैं। वापस देह में जाना चाहते हैं। लेकिन जा नहीं पा रहे।
उनका शरीर कांपने लगा। उन्हें जोर की ठंड लगी। उफ़ …कैसा भयानक ख्याल था। उन्होंने अपने शरीर को जोर से झटका और वापस सामान्य होने की कोशिश करने लगे।
टीवी पर खाना बनाने का कार्यक्रम चल रहा था। उन्हें रात के भोजन की चिंता हुई। वे खाना कैसे खाएंगे। खुद से क्या वे नियमित भोजन का प्रबंध कर पाएंगे। उन्हें तो यह भी पता नहीं कि घर में क्या है, क्या नहीं। वे उठकर रसोई में सभी डब्बों को खोलने लगे। आखिर उन्हें चीनी का डिब्बा मिल गया।
पहले चाय पी लूं। वे बैठकर चाय पी रहे हैं। टीवी पर विश्वव्यापी मंदी की खबरें चल रही हैं। नौकरियों में छटनी की जा रही है। अमेरिका में एक बड़ी कंपनी ने अपने कर्मचारियों की छटनी की है। वे ध्यान से टीवी देखने लगते हैं। कहीं इन कंपनियों में अभिनव की कंपनी भी तो नहीं। उन्हें अभिनव की चिंता घेर लेती है। नहीं, इसमें अभिनव की कंपनी नहीं है। उन्हें आश्वस्ति होती है।
शाम घिर आई है। अभिनव का कोई फोन नहीं आया है। लेकिन अभी तो वहां सुबह नहीं हुई होगी। वे स्वयं को समझाते हैं। इसी बीच एक दो फोन परिवार के सदस्यों के, मित्रों के आते हैं। वे अफसोस व्यक्त करते हैं और नहीं आ पाने की अपनी असमर्थता के लिए क्षमा मांगते हैं। फोन आने से उनका मन अच्छा लगता है। वे चाहते हैं कि फोन आए वे बात करें।
उनकी चिंता बढ़ती जा रही है। वे मर जाएंगे तो उन्हें कंधा कौन देगा? उनका संस्कार कौन करेगा? उनकी मुक्ति के लिए पिंडदान कौन करेगा? उनके शरीर में यूं ही कीड़े पड़ जाएंगे। लाल-सफेद कीड़े, अजीब-अजीब रंग के कीड़े। उनका चेहरा विकृत हो जाएगा। शरीर से सड़ांध उठेगी। मुहल्ले वाले के लिए जब बदबू बर्दाश्त से बाहर हो जाएगी तो वे पुलिस को बुलाएंगे, नगर निगम वाले को बुलाएंगे। उन्हें उबकाई आने लगीं वे भागकर बाथरूम में गए।
जीवन का क्या है, जब तक जीवन है जीना ही पड़ेगा। जीवन तो मृत्यु की दया पर है। जब तक मृत्यु नहीं आती, जीवन जीना पड़ेगा। लेकिन कुमार मनीष अब जीवन से घबरा नहीं रहे, मृत्यु से डर नहीं रहे। वे मृत्यु के बाद का सोच कर डर रहे हैं।
रात में कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। नींद सबसे बड़ा रोगहर है। नींद शांति देने वाली है। मृत्यु भी तो नींद है, एक गहरी नींद, एक गहरी विश्रांति। कभी नहीं टूटने वाली नींद। दिन चढ़ चुका है। जाकर देखा तो बाल्कनी में पेपर फेंका हुआ था।
वे बैठकर पेपर पढ़ने लगे। देश में एक बड़े आदमी की मृत्यु हुई है। उसके अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए हैं। उन्हें फिर से डर घेरने लगा है। उनकी मृत्यु के बाद क्या होगा? उनके अंतिम संस्कार में कौन आएगा? उन्हें सफेद-लाल कीड़े दिखने लगे। वे उठे और बाथरूम में जाकर देह को मल-मल कर साफ किया। नहाने से मन अच्छा लगा। भय कुछ घटा।
अभी तक अभिनव का फोन नहीं आया। वहां अब फिर से रात हो गई होगी। उसने एक बार भी हाल नहीं लिया कि जीता हूँ या कि मर गया। उनका मन गहरे क्षोभ से भर गया। पहले भूख लगी थी, अब खाने की इच्छा मर गई। लेकिन अभिनव भी क्या करे? परदेश में जीना और अपने लिए स्थान बनाना सरल भी तो नहीं। ऐसा सोचकर उन्हें अभिनव पर दया आई।
दीवार पर उनकी जवानी की एक तस्वीर लगी है। वे उसे गौर से देखने लगे। सलीके से बने बाल, दमकता चेहरा, चौड़ी छाती। अपनी देह का वे कितना ख्याल रखते थे। हमेशा वर्जिश करके स्वस्थ रखते थे। अब उसी देह में कीड़े पड़ेंगे। उफ्फ़… मन बेचैन हो उठा।
एक काला साया उनकी ओर बढ़ा चला आ रहा है। वे भागने की कोशिश करते हैं। अचानक से उन्हें लगता है कि उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है। उनकी देह सागर की गहराइयों में डूबती जा रही है। सांसें घटती जा रही हैं। वे अकबका रहे हैं। थोड़ी देर यही स्थिति रहती है।
काला साया जा चुका है। वे जोर लगाकर पानी से बाहर आते हैं। बाहर आकर जोर-जोर से सांसें लेते हैं। उनकी सांसें अभी भी तेज चल रही हैं। वे भय और देह के बंधन को तोड़ देना चाहते हैं। अब यह भय बर्दाश्त नहीं होता। इससे मुक्ति चाहिए। देह से मुक्ति से पूर्व भय से मुक्ति चाहिए। भय से मुक्त होते ही देह स्वयं ही मुक्त हो जाएगा। भय ही देह को माया से बांधता है।
वे एक निर्णय लेते हैं। उनकी मृत देह इस मृत समाज के भरोसे नहीं रहेगी। वे कंप्यूटर खोलकर बैठ जाते हैं। एक कंपनी का नंबर निकालते हैं और फोन लगा देते हैं।
इस कंपनी के बारे में उन्हें हाल ही में पता चला था। यह कंपनी मृत्यु के पश्चात दाह संस्कार का जिम्मा लेती थी। मरने वाले की इच्छा के अनुसार दाह संस्कार से लेकर पूजा पाठ, पिंडदान, ब्राह्मण भोज आदि सारी व्यवस्था कंपनी के लोग करते हैं। वे एक आदमी को जानते हैं, जिसने इस कंपनी में रेजिस्ट्रेशन करवाया है। यद्यपि खर्च बहुत ज्यादा है, लेकिन पैसे का उन्हें क्या करना है? पैसे किसके लिए बचाकर रखना है? कम से कम जब तक जिएंगे चैन से जिएंगे और चैन से मर तो पाएंगे। उनके शरीर पर कीड़े तो नहीं पड़ेंगे। उनकी आत्मा इधर-उधर बेचैनी में तो नहीं भटकेगी। जब समाज अपनी जिम्मेवारी से भागेगा तो बाजार वहां आएगा ही। पैसे के लिए ही सही, कोई तो होगा जो उनकी मृत देह का संस्कार करेगा। उनकी मृत देह को सम्मान देगा।
कल कंपनी के लोग आएंगे। कागज पर दस्तखत करवाने और पैसे लेने। अब उनके चेहरे पर संतोष के भाव हैं, गहरी आश्वस्ति है कि वे भय से जीतेंगे। बेचैनी खत्म हो गई है। अब वे अभिनव के भरोसे नहीं, समाज के भरोसे नहीं हैं। अब किसी की प्रतीक्षा नहीं। मृत्यु का भय नहीं हैं। अब वे निश्चिंत होकर मर सकते हैं।
वे रसोई में जाकर भोजन का प्रबंध करते हैं। खाने के बाद थोड़ी देर के लिए सो जाते हैं।
सोकर उठने के बाद उन्होंने मोबाइल उठाया, सोचा, अभिनव को फोन करके अपने इस निर्णय के बारे में बता दें। लेकिन फिर फोन वापस रख दिया।
संपर्क सूत्र :आशीर्वाद, बुद्ध विहार, अरगोड़ा बाय पास, पोस्ट – डोरंडा, राँची– 834002, झारखंडमो.8797777598


संभावनाओं के विपुल भंडार समेटे कथाकार नीरज नीर की कहानी, समाधान, के मुख्य पात्र मनीष बाबू आज समाज के बहुसंख्यकों के मन-मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करती नजर आ रही है।
आज जिस तरह समाज व परिवार न्यूक्लियर, महात्वाकांक्षी, संवेदनहीन ,सतत विकास विरोधी स्वरूप धारण करते जा रहा है उसकी भयावह परिणति की भविष्यवाणी यूं तो एलन टाफलर ने आज से लगभग छः दशक पूर्व ही अपनी पुस्तक, फ्यूचर शॉक में कर डाली थी फिर भी यह कहानी समकालीन मानव के मनोविज्ञान के यथार्थ को उद्घाटित करने में पूरी सफल रही है कि कैसे एक आदमी झंझावातों के बीच वक्त गुजारते हुए भी मानसिक रूप से स्वयं को मजबूत रखते हुए वर्तमान व भविष्य में पैदा होनेवाले व्यवधानों का स्वमेव समाधान करता चला जाता है।
कथाकार को बहुत बधाई। अपेक्षा है इनकी अन्य कहानियां भी वागर्थ जैसी बेबाक पत्रिका में हमें पढ़ने मिलेगी।