वरिष्ठ कवि और चिंतक| अद्यतन कविता संग्रह ‘कौन देखता है कौन दिखता’|
रात
दिन दिन में है, रात में रात होती है
दरमियान की घड़ी गुमनाम होती है
लफ्ज़ मानीखेज़ हो न हों
बात निकली किसी के नाम होती है
खिड़की-दर-खिड़की खड़ा सोचता हूँ
चुप-सी रात क्यों बदनाम होती है
बेनूर कह गई कल मुझसे यह रात
किसी बेचैन को इनाम होती है
रात का कोई वाकिफ नहीं है
रात मुसलसल बेनाम होती है|
वैसे तो
बस हूँ क्या कहूँ जो आपने पूछा कैसे हो
अरसा हुआ भूल गए हँसना-रोना वैसे तो
मेरे और मेरे दरमियान कोई चीखता है
नफस-नफस खोया कुछ अपना जैसे तो
खुदी से गुफ्तगू और अक्स के संग रक्स है
धुंआ-धुंआ पल-पल का जलते जाना जैसे तो
जन्नत कह कर जिसको दोज़ख़ दिखला दिया
अब भी बेज़हन है पीटता सीना कैसे तो
पूछो और पूछो कि पूछते रहना चाहिए
देखेंगे देखेंगे कोई अलग सा सपना कैसे तो|
चुप्पी
कितने दिनों तक कुछ नहीं लिखा
कौन परेशान है
मैं, मेरे कमरे की दीवारें
या बाहर मुहल्ले के लोग
पंछी-पेड़ या आस्मां
चट्टानें वैसे ही चुप हैं
अपनी चुप्पी में लगातार लिखते हुए|
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