
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित रचनाकार।कविता, कहानी, गीत, संस्मरण, नाटक आदि कई विधाओं की पुस्तकें प्रकाशित।संप्रति रिजर्व बैंक, मुंबई में अधिकारी।

अरसे बाद जा रहे थे गांव साथ-साथ।इसलिए नहीं कि बाबू जी को देखने की इच्छा बलवती थी।संगिनी तो गांव जाना ही नहीं चाहती कभी।फिर भी जा रहे थे कि हो जाए आ गए।कि फिर देखने न आना पड़े आने वाले समय में।और निश्चिंत हो जाएं अगले कुछ दिनों के लिए! देखा तो वैसे ही दिखे बाबू जी।जैसा कहा जाता, प्राय: संवेदनशील स्थानों के बारे में।कि स्थिति तनावपूर्ण है मगर नियंत्रण में! पके फल जैसी अब तब वाली हालत थी कब से।मां की देखभाल से जीवन उनका चल रहा था।बुढ़ापा अपने आपमें एक बीमारी है।गांव देहात में लोग अकसर इसी रोग से गुजरा करते हैं।ज्यादा जांच पड़ताल तो कोई कराता नहीं।भीतर भीतर बड़ी बीमारी भी हो तो पता चलता नहीं शहरों महानगरों की तरह झट से।
इधर परंपरा थी कि आने पर अमूमन स्त्रियां स्त्रियों के साथ और आदमी आदमियों के संग रहा करते।लेकिन मां की ममता! या फिर इसलिए कि हम शहर से आए थे वह भी इतने दिनों पर, इसका लिहाज कर मां ने साफ सूफ कर एक अलग कोठरी में हमारा बिछौना लगा दिया रात के लिए।यह अच्छा है! इस सोंधी मिट्टी में जादू है! कहा पत्नी के कानों में – ‘चलो, यहां प्रयास करते हैं।क्या पता, कुछ हो जाए… चमत्कार!
‘क्या बात करते हो! इस किवाड़ में किल्ली भी नहीं।’ मुंह बनाते वह बोली।
‘देखने कौन आ रहा?’
‘हर हलचल पर चूं चर्र करती यह खाट…।’
‘तो सुन कौन रहा…!’
‘नहीं।ऑड लग रहा।मूड नहीं एकदम।’ अंतिम रूप से सभी संभावनाओं को निरस्त करते कहा उसने।इसी मूड ने सब गड़बड़, गुड़ गोबर कर रखा था।किसी भी तरह उसके फैसले के खिलाफ नहीं जाया जा सकता था।जाने से माहौल और जायका और बिगड़ने के सिवा कुछ होना जाना न था, मन जानता था।
दूसरे दिन जाने को तत्पर हुए तो टोका मां ने – ‘अरे! आए और जाने लगे इतनी जल्दी बेटा? अभी तो ठीक से देखा भी नहीं…!’
‘मां बड़ी व्यस्तताओं के बीच कठिनाई से किसी तरह समय निकाल कर आए हैं।और जाते व्यस्तताएं और बढ़ने वाली हैं।इसलिए सोचा, उससे पहले चल के मिल आएं एक बार…!’
‘आए सो तो अच्छा किया!’ आंचल के कोर से आंखें पोछते कहा मां ने। ‘शहर एक बार पकड़ लेता है जिसे, छोड़ता नहीं…।’ देर तक देखती रही दरवाजे से बाहर निकल कर हमें जाते।
दो रोज में मिलकर लौटना इसलिए जरूरी था कि डील फाइनल करनी थी।खबर हवा में थी कि संस्थान से प्रत्येक दो बरस में एक बार मिलने वाली अवकाश यात्रा रियायत की सहूलियत विदेश भ्रमण के लिए भी उपलब्ध कराने का जो प्रावधान कुछ साल पहले किया गया था उसे निरस्त किया जा रहा है।नई सुविधा का लाभ लेकर कई सहकर्मी सपरिवार परदेस प्रवास कर आए थे।हम ही रह गए थे अब तक।पत्नी को जैसे ही पता चला, उसने चेता दिया- ‘अगर तुम्हारी कोताही के चलते कहीं जा नहीं सके बाहर और यह सुविधा वापस ले ली गई तो समझ लेना…।’
होशियार को इशारा काफी।फौरन योजना को अमली जामा पहनाने की कोशिश शुरू हुई।अगले दिन तक कार्यक्रम पक्का कर लेने पर प्रति व्यक्ति पच्चीस हजार की छूट थी मरुत यात्रा वालों के यहां।अच्छा अवसर था! बस यह कि उसके बाद यात्रा रद्द करने पर पैसे पूरे नहीं लौटने वाले थे।यात्रा तिथि के जितने पास कैंसिलेशन होगा, कटौती उसी अनुपात में बढ़ती जाने वाली थी।यानी जल्दी बुकिंग का जितना फायदा था, खुदा न खास्ते उसे रद्द करने की सूरत में खासा नुकसान भी।लगभग आखिर में पलटने पर तो प्राय: पूरा का पूरा पैसा चला जाने वाला था।इसलिए इस बुकिंग से पहले एक बार जायजा ले आना जरूरी था गांव जाकर।कि कहीं ऐसा न हो इधर बाहर घूमने के लिए टिकट कटवाएं उधर कब से दम साधे हुए बाबू जी…।
सही समय लौट आए थे गांव से।डील हो गई सील! स्वप्न साकार होने की सुखद संभावना से सहधर्मिणी की सांस में सांस आई जैसे।मन भी बन गया।वहां गांव की मिट्टी में इनकार था जो शहर की जमीन पर आकर स्वीकार में बदल गया।बस अपनी ही धुकधुकी लगी हुई थी।जी में हुटकुट…।
यह ठीक था कि फिलहाल बाबू जी की सेहत के मामले में भी देश की तरह ही यथास्थिति बनी हुई थी।पर क्या पता हमारे बाहर जाने की तारीख आते न आते वे न डोल जाएं…! ऐसे में अगर न जा पाए तो अच्छी चपत लगने वाली थी।कुछ महीनों के वेतन के बराबर पैसे पानी में चले जाएंगे…।
सफर सर पर सवार हो गया था।सवार्र्ंगिनी की सर्वांगीण तैयारियां उरूज पर थीं।और उसी तरह अपने दिल के वलवले।मन बन चुका था।सामान भी।धन साधन की आहुति दी जा चुकी थी।अब किसी भी तरह टलती यात्रा तो बड़ा अनर्थ होता।सैर सपाटे वाली कंपनियां पहले रियायत या छूट देती ही हैं ललचाते हुए कि लोग आकर उनकी शर्तों में बंध जाएं।और फिर आगे चलकर कोई छूटना, अलग होना चाहे भी तो उसे मंहगा पड़े।इतना कि सोचे सौ बार ! अगर सोच की उम्र होती तो वह कबका कर चुका था सौ पार…! इस एक महीने से कम समय में…।
डर था कहीं कोई खबर न आ जाए! ठीक आखिरी समय पर गांव से…।कोई खबर न होना अच्छी खबर थी।तीन चार जरिए थे गांव से समाचार पहुंचने के।एक तो पलटुआ।पता नहीं कौन सा कारोबार करता इधर।जब तब आता जाता रहता।और आता तो मिलता जरूर।दतर धमक कर।किसी वजह से जगह पर न होने पर बैठा करता इंतजार।मिलने पर छोड़ता नहीं।एक एक की सुनाता।गांव के पीपल से शुरू कर काठपुल और भैंसिया से लेकर कुतिया तक का हाल समाचार।फिर जाने से पहले हर बार की तरह कहता धीरे से- सिगरेट होगी एक भैया? उसके लिए ही एक पैकेट रखता दराज में।अच्छी वाली।एक बार सस्ती लेकर रखी थी तो हाथ में आते बोल पड़ा – अब क्या आजकल यह शुरू कर दी है भैया? आवाज में कुछ ऐसा जादू था कि आसपास सब पलट कर देखने लगते।इसलिए अच्छी सिगरेट का खोखा रखा करता याद से।खुद शौक न रखने के बावजूद – कि कहीं सबके सामने किसी दिन इस तरह पत न उतार कर रख दे पलटुआ – पीना छोड़ दिया क्या एक ब एक आपने…?
गांव से होकर आने के बाद से हमारे पास आया नहीं था वह।जैसी उसकी फितरत थी, कभी धमक सकता था।इतने दिन न आया तो ये थोड़े दिन और न आए तो बेहतर! मन मनाता।मगर न चाहने से किसी के कोई आमद या अनहोनी अगर रुक सकती तो मौत ही न टल जाती! तेरह दिन रहते टपक पड़ा।सब कह सुना कर आप ही टोक दिया- ‘बाउजी के बारे में पूछा नहीं भैया!’
‘अरे हां! कैसे हैं बाउजी? बता ना!’ न पूछने पर भी बताता।तो पूछ ही लेने में खैर थी।
‘वइसे ही रहे! खाट पर लेटे थे… चदरी ओढ़े।जब हम दुअरा आपके गए रहे आने से पहले।सो और कुछ बोल बतिया तो न सके।बीच-बीच में कराह रहे थे।मतलब कि थे।जइसे चल रहे हैं आजकल…।अम्मा जरूर कह रही थीं कि कुछ जरूरी बात करनी है आपसे।समाद दे दें आपको।सो दे दिया।इसीलिए आए कि न भैया से आज मिलिये के जाएंगे! तनिक बतिया लीजियेगा मुखिया जी वाले फोनवा पर इयाद से।बाकी एक सिगरेट तो होगा…?’ स्वर रहस्यमय ढंग से खरज पर लाकर बोला।ऐसे जैसे पहली बार निहोरा कर रहा।जबकि हर बार ऐसे ही कहता था।
मगर अबकी डाल गया था खटका।क्या जरूरी बात करना चाह रही थी मां? कहीं ऐसा तो नहीं कि तबीयत और बिगड़ गई थी बाबू जी की? कोई बूढ़ा बीमार बाहर वालों को तो वैसा ही लगता है! जब तक खाट उठने का दिन न आ जाए।मां ही जानती है।उसे ही पता होगी असलियत।कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे आभास हो गया हो अब चल नहीं पाएंगे बाबू जी ज्यादा? या कहीं गांव के बैद जी ने हाथ खड़े कर दिए हों।कहा हो शहर ले जाकर दिखाने या भरती कराने के लिए…।
शहर का मतलब यह नहीं।यह तो दूर देस जैसा था।गांव से लगा हुआ था एक कस्बा।वक्त जरूरत पड़ने पर मिलजुल कर खाट उठाए हुए या बैलगाड़ी ट्रैक्टर पर लाद फांद कर ले आते मर-मरीज को लोग बाग।यह सब अगर करना था तो बड़े भैया थे कराने के लिए।पर खरचा बरचा चाहिए था इसके लिए।और ध्यान…।
ध्यान भैया को था।मगर और ही! दीन दुनिया ही दूसरी थी उनकी।कभी इस संत का आगमन कभी वहां समागम।इसी धुन की धूनी रमाए रहते।दफ्तर वाला फोन नंबर था उनके पास।बीच-बीच में खड़का देते।पर संदेस हमेशा एक-सा रहता।अगला आयोजन कहां हो रहा है और उसके लिए कुछ सहयोग…।जब तब कुछ भेज भी देता।चार पांच बार याद दिलाने के बाद एक बार।अभी पिछले हफ्ते आया था उनका फोन।थोड़ी हड़बड़ी में थे।अगला अनुष्ठान क्या है और कहां, यह नहीं कहा।बस बताया कि कुछ रुपयों की जरूरत होगी जल्दी ही।तैयार रखना! बाकी बताएंगे बाद में…।
कहीं भैया ने जो फोन पर कहा और पलटुआ ने मिलकर दिया मां का जो संवाद – दोनों के बीच में एक वही कड़ी तो नहीं थी? बाबू जी की बीमारी बढ़ने, उनकी हालत बिगड़ने की…? मन घबराया, मगर अपने मन से मन को मनाया।ईश्वर ऐसा अनर्थ नहीं करेंगे! पहली-पहली बार तो कहीं बाहर जा रहें हम।उसमें खलल नहीं डालेंगे।वह भी जो सबसे अधिक अपने, उनके चलते तो ऐसा बिलकुल नहीं होगा।अपनों का आशीष तो सदा हर शुभ कार्य में साथ रहता।ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाया मंदिर में और एक हजार ग्यारह रुपये मनीऑर्डर कर दिए भैया के नाम से।सहधर्मिणी से कुछ नहीं कहा इन दोनों बातों के बारे में।जाने से पहले उसका मूड बिगाड़ना बहुत बड़ा खतरा था।अपनी औकात नहीं थी उस खतरे को मोल लेने की।मोबाइल नया नया आया था जो उसके पास, जो उसके भाई ने भिजवाया था।उसी पर चहक-चहक कर बतिया रही थी… उछाह और उत्तेजना से भरी… उस यात्रा के रोमांच को अभी से जीती…।उसकी इस नई संचार सुविधा के बारे में भी घर पर किसी को हवा नहीं लगने दी थी।एक बार मन हुआ, इसी से गांव में मुखिया जी वाला नंबर लगा, बुला कर बतिया ले तनिक अम्मा से।मगर पत्नी के आगे ऐसा दुस्साहस न कर सका।
अपने दफ्तर में भी फोन के कुछ नए सेट आए थे।इनमें आने जाने वाले फोन का नंबर नजर आता।बगल वाले कक्ष में लग गया था वैसा सेट।अपना तो ओहदा भी बढ़ा था अभी।विभाग वाले से बात की।दो दिन में उन्होंने बदलवा दिया सेट पुराना।
जो कर सकता था कर दिया था।मनीऑर्डर भेज दिया था गांव।अब बस यही अरज थी ऊपरवाले से कि भीतर जो डर था सही न साबित हो।अब जब कुछ ही रोज रह गए थे रवाना होने में कहीं कोई खबर न आ जाए गांव से।यहां तक आकर जो ऐसा हुआ तो कहीं के नहीं रहेंगे।अब इसे संयोग कहें या क्या कि आफिस में टेलीफोन का सेट बदलवाया जिस दिन, उसी शाम कक्ष से निकलने से ठीक पहले घंटी बजी।यह पहला फोन था नए फोन सेट पर।डिस्पले में जो नंबर था दिमाग में बिजली की तरह कौंध गया।एसटीडी कोड उधर का ही था।गांव से पक्की सड़क पर आकर जो बाजार था वहीं का नंबर था अमूमन जिससे बड़े भैया फोन किया करते थे।इतनी जल्दी मनीऑर्डर मिला नहीं होगा।उसी का तकादा करने के लिए कर रहे होंगे शायद।एक बार और याद दिला देने के लिए।सो भेज ही दिया है।कल परसों तक मिल जाना चाहिए।उसके बाद कुछ और जरूरत होगी तो कहेंगे फिर…।हाथ फोन के चोगे तक जाकर रुक गया।घंटी बजती रही।जब लगा कि अब बजनी बंद हो जाएगी तो हुआ अंदर से कि उठा लें।जान लें क्या कहना चाह रहे बड़े भैया।पर तब तक बाहर घनघनाहट रुक गई थी।और उतर गई थी भीतर।क्या कहना चाह रहे थे भैया? कहीं कोई और बात तो नहीं…! इधर से दुबारा लगा कर पूछ सकता था।दफ्तर में शून्य लगा एसटीडी कॉल करने की मुफ्त सहूलियत भी थी।पर साहस न जुटा पाया।देर तक हिलोरता झकझोरता रहा यही ऊहापोह।जरा देर जरूर लगी मगर फिर संभाल लिया अपने आप को।कुछ ऐसा होगा तो भैया फिर फोन करेंगे…।
संवाद की पहली दस्तक थी वह नए उपकरण पर।सुनकर जिसे अनसुना कर दिया था।तीन दिन और गुजर गए।कोई फोन आया नहीं बड़े भैया का।क्या फिर से उनके फोन आने की प्रतीक्षा थी? या न आने की मन्नत? कुछ तो था जो अधीर किए हुए था और बेचैन! ऐसे कब तक और कैसे चलने वाला था? संगिनी ने भी टोक दिया था उलझा खोया सा भांप कर- क्यों खुशी नहीं है क्या तुम्हें? पहली पहली बार तो बाहर कहीं जाने का मौका आया है।और लोग कबके हो आए, एक बार क्या, दुबारा तिबारा…।
अब बस दो दिन रह गए थे रवानगी में।खबर कोई आई नहीं थी।मन को मजबूत कर तय कर लिया कि अब जो होगा आगे देखा जाएगा! लौट कर आने के बाद।अच्छी जगह जा रहे थे अच्छी तरह जाएं! इतना खर्च बर्च कर चले हैं तो पूरा लुत्फ लें यात्रा का।भगवान का दिया सुअवसर था।बार-बार और हर एक को कहां मिलता? मिला है तो पूरा आनंद उठाएं उसका…।
निश्चय से दुविधा जाती रहती है।ऐसा ही लगा।कि अब जाते जाते पक्के इरादे ने मिटा दी हर दुविधा।फिर तो आगे सफर आसान हो जाएगा।राह हो न हो।वह तो निकलती ही है मजबूत इरादों से! कल के बाद निकल चलना था।अभी किसी अंतर्द्वंद्व या असमंजस के लिए नहीं थी कोई जगह।सामान कसे जा चुके थे लगभग।कमर भी कस ली।
उसी दोपहर दफ्तर में दफ्तरी हाथ में रख गया एक लिफाफा।उसे देख दिल ने यही दुआ की कि कोई पहचानी इबारत न निकले।हो कोई कारोबारी खत किताबत।मगर हर बार चाहा हुआ होता कहां! भेजने वाले की जगह बाबू जी का नाम था, मगर जानता था, अम्मा ने भिजवाई होगी चिट्ठी।बाबू जी क्या लिख सकेंगे इस हालत में! अम्मा लिखना भर जानती थी।बचपन में हाथ पकड़ कर अक्षरज्ञान उसी ने कराया था।उसकी लिखावट के स्वर-व्यंजनों में भी उसके पकाए व्यंजनों-सा अपनापा होता।पर अब कलम वह भी कहां लेती थी हाथ में! किसी को बोल कर लिखवाया होगा।लेकिन लिखा क्या होगा पाती में…?
अंदेशा फिर से सिर उठाने लगा।खत खोलने पर अंदर न जाने क्या बात निकले…? लगा, जी को जो सख्त किया था, फिर से कमजोर पड़ जाएगा।मगर अब क्या कदम खींचे जा सकते थे पीछे? सैर कराने वाले जाने से पहले पूरे पैसे ले लेते हैं और अब रह जाने से सबकुछ उधर ही रह जाने वाला था।उन्हीं के पास।हाथ आने वाला न था कुछ भी।भावनाएं कई जगह कमजोर करती हैं और व्यावहारिक सोच संभालती है ऐसे में।दुनियादारी देती है ताकत।दूसरा रास्ता था, कहीं कोई संशय न पालना।दिल को पहाड़-सा बड़ा न भी कर पाए तो कम से कम कंक्रीट की तरह कड़ा कर लेना।ज्यादा से ज्यादा क्या होगा चिट्ठी में? यही कि बाबू जी कि तबीयत और बिगड़ गई है…।दस दिन की तो बात है।वापस आकर देख लेंगे!
अम्मा कहा करती थी- बड़े बेटे पर बाप का हक होता है और छोटा मां का।वही देता है, उसे आग।भगवान न करे बीच में अगर ऐसा वैसा कुछ हो जाए बाबू जी को तो बड़े भैया तो थे पीछे…।हद से हद ज्यादा से ज्यादा बुरा से बुरा यही तो हो सकता।तब भी दसवें तक तो पहुंच ही जाने वाले थे वापस…।सो कुल मिलकर खत खोलने और पढ़ने का कोई फायदा न था फिलहाल।लिफाफे को एक बार गौर से देखा हाथों से सहलाया और सरका दिया दफ्तर के दराज में।बिन खोले बिन बांचे।कि लौट कर पढ़ लेंगे।बुरा से बुरा सोच लिया था।अब जो होगा भला…।
फोन कार्यालय वाला ही बताया था गांव में और पत्र भी वहीं के पते से आते थे।जाने से पहले आखिरी दिन सोचा, जाया ही न जाए उधर।न डर न कोई अंदेशा।सुकून से गुजरे समय तैयारी का जायजा लेते हुए डेरे पर।पर ऐसा करने से शनिवार, रविवार भी जुड़ जाते ली गई छुट्टियों में।इसलिए जाना जरूरी था दफ्तर।भले जाकर निकल चला जाए थोड़ा जल्दी।
जितनी देर रहा दफ्तर में, ध्यान दराज में पड़े लिफाफे पर ही लगा रहा।बार-बार हाथ जाता उस ओर।मन ही मन कितनी ही बार खोल कर बांच चुका था उसके कितने प्रारूप।इस मोह से मुक्त होना जरूरी था।और उससे बाहर निकलने के लिए निकलना दफ्तर से।लिहाजा थोड़ा जल्दी ही चल पड़ा।उपस्थिति दर्ज हो ही चुकी थी।यों भी सबको पता था कि बाहर जाने की तैयारी है।
कक्ष से पांव बाहर रखते फोन कुनमुनाता गनगनाता जान पड़ा।कहीं बड़े भैया फोन न कर रहे हों! कोई कह रहा था लंच के लिए लाउंज जाने के बाद भी पीछे घंटी बजी थी एक बार।वैसे भी अब तो जा रहा था।कोई मदद करने की स्थिति में था नहीं, अभी बड़े भैया का फोन हुआ तब भी।थोड़ी देर ठिठका रहा, जब तक गनगनाहट शांत नहीं हुई।फिर उतर गया सीढ़ियां।कार्यालय का मुख्य द्वार पार करते हुए लगा कि तार वाला हाथ में तार लिए दरबान से किसी का नाम पूछ रहा है।नाम के हिज्जे अपने नाम से मिलते लगे।क्या पता…! कहीं दरबान देख न ले और पहचान कर पुकार न ले पीठ पीछे से! ठिठके कदम आगे बढ़ गए।रास्ते फिर भी जैसे उलझ रहे थे पैरों से।
तन के साथ मन के तार भी जुड़ जाते हैं कहीं।पत्नी भांप गई दुविधा को।जैसे चुंबन में कोई सुन ले होंठों की अनकही।पढ़ ले लबों की लर्जिश। ‘चलना है तो पूरा चलो साथ।आधा नहीं…।’ पासपोर्ट पतलून की जेब में रखते हुए बोली। ‘और अपना असमंजस लोकल रेल और बस के पास की तरह रख दो यहीं…!’ कह कर मुस्कराई मोहिनी मुस्कान।वैसे भी उस कल्पनातीत यात्रा को लेकर बहुत खुश थी वह।उसकी उस खुशी के चांद को कहीं से कम करना या काटना ठीक न था।वह भी अपनी जगह थी सही।कभी-कभी तो मिलता है मौका ऐसा! और कभी-कभी हिस्से आती ऐसी खुशी।
सफर सचमुच सुहाना था।खूबसूरत समा।सैर करते तनिक भी थकान का भान नहीं होता।दिन भर बाहर की वादियों में घूमते, रात अंतरंग की।साथ अकेले तो शहर में भी थे, पर इधर एक अलग सुकून था।एक खास पुरखुलूस सुकून।सात दिन सात रातों का रूमानी साथ।हम हर जगह जी भर कर घूमेंगे और जी भर कर करेंगे प्यार! उछाह से आलोड़ित होकर कहा संगिनी ने।शायद यहां कुछ हो जाए…!
यह भीतर भीतर बहती एक अलग अंतर्धारा थी जो अपने सुकून का मुकाम खोज रही थी।बारहवां बरस था ब्याह का।ऐसा नहीं था कि प्यार नहीं था।बराबरी न हो बीच फिर भी प्यार होता है।शुरू से स्वीकार कर लिया था कि संगिनी ही इस साहचर्य की सर्वाधिकार प्राप्त साझीदार है।अर्धांगिनी नहीं श्रेयांगिनी सर्वांगिनी! जहाँ स्वीकार हो, संघर्ष नहीं होता।दांपत्य ऐसा तराजू है जिसमें कोई बाट न हो तब भी एक पलड़ा थोड़ा झुका रहता।फिर भी ऐसा नहीं कि उस पर तुलता नहीं प्यार! इधर भी था तो प्यार।पर अब तक हो न सका था साकार।उसका कोई प्रतिफल सामने नहीं आया था इतने बरसों में…।
पहले कुछ साल तक सावधानी बरतते रहे।कि आनंद लें पूरा उस सहवास का।लुत्फ ले लें भरसक साथ का।इतनी जल्दी तीसरा किसे चाहिए! अब मुड़ कर पीछे देखने पर लगता, कितनी बड़ी बेवकूफी थी।बाद में बस व्यग्रता, बेबसी, बदहवासी और बौखलाहट की बारी थी।शरीर के चारागारों से बात न बनी तो मनोचिकित्सक के पास गए।शायद वह सच्ची ललक नहीं भरी भीतर! उसने संकेत किया। …बल्कि डर है कहीं कि बच्चे की आमद आजादी छीन लेगी और जिम्मेदारियाँ बढ़ा देगी।अपने दिल को टटोल कर देखें।क्या आप सचमुच बच्चों को बेताबी से चाहती हैं? या अंदर ही अंदर कहीं चिढ़ती, घबराती, बरजती, परहेज करती हैं उनसे…? कुछ सीधे-सीधे सवाल रखे उसने संगिनी के सामने।यह काम मनोचिकित्सक ही कर सकता था। …मैं तो रास्ता यही बताऊंगा कि अपने आसपास हर बच्चे को दिल से चाहना शुरू करें।चाहे वह किसी पशु का हो या पक्षी का।शायद इससे वह अनुकूल वातावरण बने अंतरतम में, जिसमें सृजन के बीज अंकुरित हो सकें।फूल फल सकें।प्रकृति की लीला अबूझ है…।
उस परदेस में रात होटल के कमरे में छोटे परदे पर आने वाले चलचित्र भी अलग ढंग के थे।एक द़ृश्य में पत्नी पति से कह रही थी कि वह उसके दोनों पैरों को मोड़ कर ऊपर की ओर उठाये रखे कुछ देर – मैं तुम्हें संजोना चाहती हूँ अपने भीतर…! संगिनी गौर से देख रही थी।उसे लगा शायद चूक यहीं रह गई हो।इस बार यह नया सलीका आजमा कर देखना चाहा।क्या पता इस तरह बात बन जाए…!
वापसी की उड़ान में आते मन वापस अपनी जमीन पर आ गया।पर उसका मन लौटने को नहीं कर रहा था।वह अब भी परवाज भर रहा था।बीच उड़ान में उसे मितली-सी महसूस हुई।बस उड़ान की असहजता के चलते या…।पता नहीं खुशखबरी थी या खुशफहमी! वैसे आते हुए भी उड़ान में मन वैसा हुआ था उसका।वमन पाउच सामने वाली सीट की पीठ में था।पर वह उठ कर स्वच्छता कक्ष में चली गई।अपना मन तो पहले ही उतर कर गांव पहुंच चुका था।
गांव से पहले लेकिन दफ्तर पहुंचना था।अवकाश उपरांत उपस्थित होने के लिए।पहुंच कर सबसे पहले वह चिट्ठी खोली।देखकर धन्यवाद किया ऊपर वाले का कि खैर खबर थी।वरना कुछ ऐसा वैसा हो गया होता तो शायद कभी अपने आपको माफ नहीं कर पाता! पढ़कर यही लगा कि कितना सोचती है मां! बिलकुल बच्चों की तरह।कितनी माया ममता है भरी उसमें! बड़े भैया के सौजन्य से कोई पहुंचे हुए योगी पधारे थे जो जल्दी कहीं आते जाते नहीं।अम्मा ने हमारे बारे में बात की थी उनसे।उन्होंने बताया था कि इस पूर्णिमा को बहुत दुर्लभ नक्षत्र योग है। ‘बहू को लेकर आ जाना जरूर! पंडित जी ने कहा है कि स्नान ध्यान के साथ विधि विधान से पूजा पाठ करा देंगे।फिर प्र्रभु कृपा से जरूर घर-आंगन बच्चे से गुलजार हो जाएगा! तुम्हारे बाबू जी को भी पोते का मुंह देखने को मिल जाएगा मरने से पहले…।’
जिस बात से डर रहा था, वह थी चिट्ठी में मगर इस तरह से! जिस सुयोग के दिन की बात की थी अम्मा ने वही दिन था जब बाहर जाने की उड़ान भरी थी।जा तो नहीं पाए थे इस पूजा में।मगर इतनी शिद्दत से चाहा था अम्मा ने, इतने मन से मन्नत मानी थी, कहीं उसी की दुआ से संगिनी का सुखाभास सच साबित हो! मन मातृमोह से भर उठा।गांव जाकर मिलने की तीव्र इच्छा करवटें लेने लगी।
संगिनी लेकिन साथ चलने के लिए तैयार नहीं हुई।मूड ठीक नहीं था।खुशफहमी खाली खुशफहमी निकली थी।किसी तरह उसे समझा बुझा कर अपना गांव जाने का टिकट कटाया।रेलगाड़ी का टिकट तो मिल नहीं सकता था इतनी जल्दी, इसलिए बस से।पलटुआ ने बताया था वह बस से ही आता जाता है अधिकतर।कुछ कष्ट तो होता ज्यादा, पर जब चाहे जा सकते हैं।
पलटुआ का ध्यान आया और वह दिख गया बस की खिड़की से।भैया…! उसने भी देख लिया और हाथ लहराया – कहां?
‘गांव!’ खिड़की से झांकते हुए कहा मैंने।
‘जाओ भैया!’ उसने कहा। ‘मैं गया था बीच में बड़े भैया के बोलने पर आपकी तरफ।पर भेट न हो सकी।आप कहीं बाहर निकल गए थे…।’ बस के पीछे-पीछे उसकी आवाज आती रही कुछ दूर।फिर बस बढ़ गई आगे।
गांव से कुछ कोस दूर उच्चपथ पर, जहां बस उतारती थी, वहीं वह बाजार था जिसके बूथ से बड़े भैया फोन किया करते थे।सोचा एक बार देख लिया जाए।शायद इधर हों।पर दिखे नहीं।बूथ वाले से पूछा।
‘अब उतरी पहनी है तो इधर बाजार कैसे आएंगे।तीन दिन बाद श्राद्ध है।उसके बाद ही…।’
‘उतरी पहनी है?’ मेरे होंठों से फूटा।
‘हां।’ सिर हिलाया बूथ वाले ने।
‘तीन दिन बाद श्राद्ध…?’
‘हूँ!’ मुंह में गुटका भरा था इसलिए ज्यादा खोलना और बोलना नहीं चाह रहा था।उसने सिर उठा कर ऊपर से नीचे तक ताड़ा। ‘आप कौन…?’
हां, मैं कौन! तीर की तरह छूटा आर मेड़ और पगडंडियों से होता भागा चला जा रहा था गांव के रास्ते।पैरों में ठेस लग रही थी।आंखों में पड़ रही थी उड़ती धूल।पेड़ चक्कर खा रहे थे।भरे दिन में धुंधलाता-सा…।बहियार में ही दिख गए बड़े भैया।पीपल वट में टंगे मिट्टी के घट में तिल जल डालते।देखते रो पड़े, गले लगा। ‘कहां था रे तू बचवा? कितनी कोशिश की खबर करने की।फोन किया, पर उठाया नहीं किसी ने।तार दिया, वह भी वापस लौट आया।बाद में पलटुआ को भी भेजा था।पर तुमसे भेंट हुई नहीं।पता चला छुट्टी पर गए हो हफ्ते दस रोज के लिए।दफ्तर से घर का पता मिला, पर ताला झूल रहा था।कहीं बहू के साथ उसके घर गए होगे, यह सोच कर ससुराल भी कार्ड डाला।लेकिन…।चलो अच्छा हुआ कि अब तो आ गए।’
‘सोचा नहीं था, अबकी आऊंगा तो इस भेस में देखूंगा आपको…।’ विगलित होते हुए निकला मुंह से।
‘क्या करता? उतरी तो लेनी ही थी।अब आग तो दिला दिया किसी तरह हाथ पकड़ कर बाबू जी से।पर बाकी विधि विधान कैसे कर पाते वे इस अवस्था में…।’
मूक पड़ गया मानो।वज्र गिरा जैसे कलेजे पर! यह क्या सुन रहा?
मगर जो सुना, वह सही था।
चिट्ठी भेजने और बड़े भैया से फोन कराने की कोशिश के बावजूद शुभ पूर्णिमा तक जब हम नहीं आ सके तो अम्मा ने निहोरा किया, कोई उपाय करने के लिए पहुंचे हुए पंडित जी से।तब उन्होंने सुझाया कि वधू के बदले यदि वही पूरे मनोयोग से गंगा स्नान ध्यान कर संकल्प पूजा कर ले तो मनोरथ सिद्धि हो सकती है।पुत्र के कुलवंश मोह में अपनी कमजोर काया लिए पूजा से पहले पावन ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करने गई वह और वहीं पैर फिसल गया।बह गई धार में।कुछ मछेरे कूद कर ले तो आए किनारे, लेकिन बूढ़े फेफड़ों में भर गया था अधिक पानी।बच नहीं पाई।
‘जाना था किसे, कौन चला गया! शायद थक गई थी मेरे लिए आस करते-करते।मैंने क्या किया? आग देने के सिवा…?’ खाट पर लेटे शून्य की ओर निहारते बोले बाबू जी।फिर पूछा – बहू को नहीं ले आए बेटा?
‘अभी… जल्दी में आ गया अकेले।ले आऊंगा जाकर…।’ सकसकाते हुए कहा किसी तरह।
‘हां ले ही आओ जल्दी से।हित कुटुंब गांव वालों के किए चल रहा है अभी तो सबकुछ।कोई भी अपना न हो तो क्या अच्छा लगता है? जो अभी कर रहे, वैसी ही दस बातें करेंगे।और हां, मुझे तो जानते हो, जोगी जति ध्यानियों के बीच रहता हूँ।इसी में अम्मा का तो क्रिया कर्म तो किसी तरह पार लगाया।वैसे होती है मां छोटी संतान के हिस्से।पर खैर, वह तो चली गई।मगर अब मां के पीछे बाबू जी को कोई देखने वाला नहीं रहा यहां।कोई और स्त्री घर में है भी नहीं।तो तुरंत उसे लेकर आओ।और जाते हुए बाबू जी को अपने साथ लिए जाओ।गाड़ी एंबुलेंस कर के या जैसे।उधर शहर बाजार में डॉक्टर दवा इलाज आदि की सब सुविधाएं भी हैं…।’
बहाना तो था जाकर जल्दी से बस पकड़ने का।पर मुंह अंधेरे एक बार फिर आरों मेड़ों पगडंडियों पर भागता जा रहा था बेतहाशा।कल आते समय बाबू जी का सोग मनाता दौड़ रहा था आज अम्मा के लिए अकेले में कलेजा कूटता।आखिर घड़ी तक तुम्हारा ही नाम ले रही थी! तुम्हारी ही राह देख रही थीं आंखें जाने जाने तक।तुममें ही सांस टंगी थी जैसे…।बतलाया था बड़े भैया ने।और एक मैं था कि…।
संगिनी ने साफ इनकार कर दिया। ‘मुझे शौक नहीं! एक बच्चे को संभालने के नाम से तो मन घबराने लगता है भीतर-भीतर।किसी बूढ़े बीमार को कैसे संभालूंगी।मुझसे होगा नहीं।न वहां जाकर न इधर लाकर।इसलिए उधर जाऊंगी भी नहीं अभी।नहीं तो मढ़ देंगे मेरे गले में फटा ढोल…।
समझ में नहीं आ रहा था किस तरह किस मुंह से यह बात बताई जाए।कह भी नहीं सकता था और किसी से! अभी एक दिन और हाथ में था।किसी तरह उसे समझाने, बुझाने, राजी करने की कोशिश के लिए।श्राद्ध में पहुंच पाने के लिए कल निकलना जरूरी था।पर आज एक दिन पहले ही फोन आ गया बड़े भैया का।दफ्तर में डिस्प्ले वाले फोन पर।इस बार उठा लिया झट से।मुखिया जी के यहां से बोल रहे थे। ‘तुम निकल पड़ो तुरंत जैसे भी हो।जो जरिया मिले उससे पहुंच जाओ जल्दी से।अब तो बस हमीं रह गए हैं! बरफ की सिल्ली पर पड़े हैं बाबू जी…।’
संपर्क :एस-3/226, रिज़र्व बैंक अधिकारी आवास, गोकुलधाम, गोरेगांव (पूर्व), मुंबई – 400063 मो. 9930453711



Help chahiye sr mujhe main MA ki student hu or main is kahani me shodh kar rahi hu plzz kuch chije Jan ni hai
ज़रूर !
अपनी सुविधानुसार बात कर सकती हैं ।
संदेश भेजने के लिए व्हाट्सएप नंबर भी यही है, जो पते के साथ उल्लिखित है
मर्मस्पर्शी कहानी । निशब्द हूं ।आखिर दोष किसको दे ! बेटे को जो पत्नी की खुशी की खातिर मां बाप से दूरी बनाकर रखता है ? या पत्नी को जिसके जीवन में भोग विलास के आगे किसी का महत्व नही ।
आत्मविश्लेषण की जरूरत है ।
भौतिकतावाद की दौड़ में अंततः हम सबको अकेले ही जीने की आदत डाल लेनी चाहिए।
संतानोत्पत्ति का मोह त्याग कर सिर्फ वासनापूर्ति के लिए विवाह करने की अनिवार्यता को भी खत्म कर देना चाहिए।
अनेक अनेक धन्यवाद
ग्रामीण परिवेश और शहरी परिवेश में रहने के स्पष्ट संस्कार और बीच में पेंडुलम की तरह लटकता नायक और उसका अंतर्द्वंद….वास्तविकता के आसपास चहलकदमी करते सभी चरित्र और अंत का तो कहना ही क्या….शानदार कहानी …..आधुनिक प्रेमचंद की झलक दिखलाते प्रेम रंजन की अलग विशिष्टता है…!
बहुत बहुत धन्यवाद