
कविता संग्रह ‘शाल वन की धरा से’, ‘कसौटी पर कविताएं’, ‘उर्वि’ एवं ’शतरंग’। संप्रति शिक्षक के पद पर कार्यरत।
शहर के भीतर एक और शहर
कितने लोग हैं इस शहर में
फिर भी हर गली के मोड़ पर
एक अनकहा सन्नाटा बसता है
जैसे कोई शब्द खुद से डर गया हो
हजारों चेहरों के बीच
एक चेहरा रोज मेरा पीछा करता है
जो दिखता तो मुझ-सा है
पर बोलता किसी और की भाषा में
भीड़ के बीच मैं चलता हूँ
कंधे से कंधा टकराता है
पर आत्माएं नहीं टकरातीं
वे मोबाइल स्क्रीन की चमक में
अपनी ही परछाईं को पहचानती हैं
कॉफी के प्यालों में अब
गर्माहट नहीं
सिर्फ भाप के बाद
थोड़ा-सा धुआं बचता है
जो देर तक आंखों में रहता है
शायद इसलिए शहर में सबकी आंखें
लाल हो चली हैं
मैंने सोचा
क्या यह वही शहर है
जहां सपनों की खेती होती थी?
अब तो हर खिड़की के पीछे
एक नकली पौधा खड़ा है
जिसे धूप नहीं चाहिए
बस वाई-फाई चाहिए
लोग अब मिलते नहीं
वे ‘कनेक्ट’ होते हैं
सवाल अब पूछे नहीं जाते
सर्च किए जाते हैं
और उत्तर?
उत्तर अब गूगल के पास है
मनुष्य के नहीं
मैं खुद से पूछता हूँ
क्या मैं अभी भी जीवित हूँ
या बस एक चलता-फिरता एल्गोरिद्म
जो सिग्नल मिलने पर सोचता है?
रात गहराती है
लाइटें जलती हैं
पर भीतर का अंधेरा बढ़ता है
मैं छत पर जाता हूँ
जहां आसमान अब
कांच की दीवार के पीछे फंसा है
एक तारा टिमटिमाता है
शायद वह भी अकेला है
या शायद मैं ही उसे
अपनी तरह महसूस कर रहा हूँ
मुझे याद आता है
गांव का तालाब
जहां पानी में चेहरा देख
बच्चे हँसते थे
अब शहर के शीशे में
चेहरे दिखते हैं
पर हँसी कहीं गायब है
शहर में अब नींद नहीं आती
बस ‘अपडेट्स’ आते हैं
हर सुबह एक नया वर्जन
एक नया मैं
और हर रात एक पुराना मैं
‘डिलीट’ हो जाता है
मैं जानता हूँ
अकेलापन कोई शाप नहीं
यह मनुष्य का आईना है
जो जितना गहराई से देखता है
उतना ही अपने भीतर
किसी अनजान अंधेरे को पहचानता है
फिर भी मैं लिखता हूँ
क्योंकि शब्द ही अब बची हुई प्रार्थना हैं
क्योंकि शायद कविता ही
मनुष्य की अंतिम पहचान है।
क्वार्टर नंबर एम/एस/एस-17, निकट इंदिरा चौक गांधीनगर, अरगडा, जिला- रामगढ़, झारखंड- 829101 मो.7903005153


सामयिक और बिल्कुल अलग ढर्रे से लोगों को सोचने पर बाध्य करती यह कविता। कवि को साधुवाद!