वरिष्ठ कवि।  कविता संग्रह ‘आसान सी बातें’ और अंग्रेजी की एक किताब ‘पेपर बोट राइड’ प्रकाशित।

 

बात करती नहीं देनबा नदी

बात करती नहीं देनबा नदी
बस बढ़ जाती है आगे
कनखियों से देखती

अपनी आंखों का रंग पूछती है आकाश से
अपना चेहरा देखती है
चमकती सिंदूरी शाम के आईने में
कैसी दिखती हूँ
पूछती है घर जाती चिड़ियों से
ठिठोली करती है लजाती है
बालों में तारे गूंथती है रात को
अलसाई हुई बिस्तर पर
चांद गिराती है लापरवाही से
लहरों पर
कुछ बोलती है धीरे-धीरे मछलियों से

पर बोलती नहीं नदी मुझसे
क्योंकि अलग है उसकी भाषा
जिसे समझती है चिड़िया
समझता है आकाश
किनारे बैठा घड़ियाल जानता है
बोलता है सूरज
कभी बोलता था मंत्रद्रष्टा
ऋचा स्रष्टा बूढ़ा ऋषि
जिसे अब नहीं बोलता आदमी

आदमी नदी को अब नहीं समझता।

उस करवट में
इस करवट सबसे पहले आई
दूध वाले की मोटर सायकल की
कर्कश आवाज
फिर आई अखबार के खिड़की से
टकराने की झुंझलाहट
फिर भी बंद रखता हूँ आंखें
तो बस थोड़ी देर में आती है
सात बजे दिल्ली जाने वाले जहाज की
हल्की घरघराहट
जहाज अभी बादलों से ऊंचा उठा नहीं है
फिर जो सुनना नहीं चाहता
नींद के मुंह अंधेरे में
स्कूटर की बस की
काफी दूर से एक खराब
इंजन वाले ट्रक की
किसी के जोर-जोर से बोलने की
आती हैं आवाजें

पर कोई आहट ही नहीं सुबह-सुबह
सूरज के उगने की
हवा के बहने की
पत्तों के लहराकर गिरने की
कोई आवाज नहीं

करवट बदली
कि पता नहीं कैसे
थोड़ी देर में आई
शरीफे के पेड़ से चिड़ियों की आवाज
फिर पड़ोस के नीम से
गिलहरियों की किलकारी
फिर तालाब की छोटी लहरों के
बार-बार धोबी के पत्थर से
टकराने की आवाज
फिर कच्चे आम पर
ढेले का निशाना लगने की
धप्प की आवाज
दूर स्कूल की घंटी की
हल्की-सी टन-टन आई
मिट्टी की पगडंडियों पर दौड़ते
छोटे-छोटे पैरों की
बच्चों के हँसने की आवाज
रेस-टीप खेलने की
एक के बाद एक कई आवाजें आईं

हर सुबह बस इसी करवट में
मुझे खोलनी हैं आंखें
समय के लंबे गलियारे से दौड़कर
आती हैं आवाजें यहां।

मैं आदमी हो जाता

मैं खिल जाता
जब खिलता पलाश

पूरा आसमान साफ नीला होता
मैं धुल जाता

सूख कर कड़ा हो जाता
जब देखता एक हरे पेड़ को ठूंठ होते हुए

मीलों मील बेफिकर हो कर
बह जाता
जब बहती नर्मदा उफन कर बारिश में

सिकुड़ जाता एक घायल कीड़े-सा
सड़क के किनारे
कीचड़ में बैठी
पांवों में घाव लिए
बच्ची के सिकुड़ने से

खिलखिला देता सर्दी में उगे सूरज की तरह
जब वहीं कीचड़ में उकडूं बैठ
उस घाव पर मेरा छोटा बेटा मलहम लगाता
मैं आदमी हो जाता।

शहर में पलाश

पलाश जलते हैं जंगल में
चमकते हैं नव वधु के सिंदूर की तरह
पलाश आते हैं
किसी छोटे कस्बे को जाने वाली
धूल भरी रोड के किनारे
धूल से नहाए बच्चों की तरह

वसंत आया नहीं
कि आते हैं पलाश हर जगह
जहां काटा नहीं हमने उन्हें

दौड़कर आते हैं
पड़ोस के बच्चे की तरह
बिन बुलाए खिलखिलाते हुए

मगर देखना उन्हें
महानगर की भीड़ वाली सड़कों पर
बहुत अनमने लगते हैं
धूल सने चेहरों और
झुके कंधों में
दिन भर दिहाड़ी कमा कर गांव को लौटते
थके मजदूरों जैसे
बुझे हुए

पता नहीं क्यों
शहर तक नहीं आती है
जंगल में रुक जाती है उनकी आग।

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