प्रकाशित कहानी संग्रहपलाश वन के घुँघरू’, ‘सीढ़ियों का बाजार’, ‘किस करवटआदि।

काठ के घोड़े के ऊपर चढ़ा लाल, पीला, नीला रंगदार लहंगा लहराता तेरसू पैरों में घुंघरू बांधे नाच रहा था।घोड़े को नचाते हुए उसकी आंखें जुगनू-सी चमक उठती थीं।गोलाई में नाचते हुए घोड़ा जब आगे-पीछे कूदता, चारों ओर खड़ी भीड़ ताली बजाती।बूढ़े बच्चों को पीछे खिसकने का इशारा करने लगते।मिलियहू काका टेर लगाते- ‘सात समुंदर पार से आयल हऽऽ राजा/सोनवा रानी जइहें ससुरालऽऽऽ’

तेरसू जोश से भर कर तेजी से घूमता।झमर-झमर घोड़े का लहंगा कभी नीचे झूलता, कभी हवा से फूल कर छाते-सा ऊपर उठ जाता।कठघोड़वा के साथ नाचती धरती – नाचता पूरा आसमान!

सोलहवें में कदम रखा था तेरसू ने।तब से कठघोड़वा नाच की तलब जगी थी।आजमगढ़ के ‘श्याम उस्ताद’ का बड़ा नाम था कठघोड़वा नाच में।सभी गुर सिद्ध थे उस्ताद को।कमसिन तेरसू की रेख भी न जमी थी।भोले मुखड़े को देख उस्ताद का मन पसीज गया, पर शर्त थी ‘लकड़ी का घोड़ा तैयार करने का हुनर भी सीखना होगा।घोड़े को घोड़ा मत समझना, वही असली उस्ताद है।घुंघरू की तरह उसे भी माथे पर रखना।ताल बेताला नहीं होना चाहिए। ‘कहरवा’ का रियाज पक्का होना चाहिए।’ श्याम उस्ताद ने शिष्य को बड़े मनोयोग से नाच सिखाया।

गांव-गांव तेरसू उस्ताद के साथ घूमा।उस्ताद ने हर जगह उसे नाचने का अवसर दिया।श्याम उस्ताद की बेटी रूपा तेरसू को सोनवा रानी जैसी लगती।सांवला, गदराया शरीर, बड़ी-बड़ी चंचल आंखें।रूपा को देखते ही तेरसू भरमा जाता।श्याम उस्ताद के सिखाए सभी पाठ-गुर भूल जाता।टकटकी बांध उसकी आंखों में खो जाता।रूपा खिलखिला पड़ती और मड़ई में भाग जाती।श्याम उस्ताद ने आंधी-पानी से बचने के लिए छप्पर-टप्पर की अच्छी जुड़ाई कर रखी थी।कोठरी के बीच में शीशम का मोटा तना मड़ई को मजबूती से साध रहा था।बरामदे में बड़ा बैठका खपड़े से छवाया था।श्याम उस्ताद की प्रसिद्धि कई जिले तक थी।न्योता आता रहता था।फसल कटने पर रोकड़ की जगह लोग बोझा पहुंचवा देते थे।घर में चावल की बोरियां गंजी रहती थीं।इलाके में गेहूं की पैदावार कम थी।कभी-कभी गेहूं खरीदना पड़ता था।तेरसू अपना बस्ती जिले का गांव छोड़ आजमगढ़ में श्याम उस्ताद का शागिर्द बन चुका था।

नाच के लिए दो जोड़े कठघोड़ेश्याम उस्ताद के पास थे।एक उसका निजी था।दूसरे से वह शिष्यों को प्रशिक्षित करता था।गांव के बूढ़ेपुरनिये कठघोड़वा के रसिकजन थे, बड़ा आनंद उठाते, लेकिन नए युवक फिल्मी गानों पर लौंडा नाचके दीवाने होते जा रहे थे।

श्याम उस्ताद ने कई बड़े कठघोड़वा-नचइये पैदा किए, लेकिन अब कोई सीखना नहीं चाहता था।तेरसू की लगन देख श्याम उस्ताद उसे अपनी पूरी विद्या सौंप देना चाहता था।उस्ताद ने पहले ‘डफरा’ बजाना सिखाना शुरू किया।अब डफरा बजाने वाले गिने-चुने ही बचे थे।हाथ और लकड़ी दोनों से ताल देकर चमड़े के सीने पर तरंगों से तूफान सा उठता है जो ताल कहरवा की मस्ती तन-मन में पैदा कर देता है।लोग झूम उठते हैं। ‘कठघोड़वा नर्तक’ अपनी ताल लय से घोड़े की विभिन्न चालें दर्शाता हुआ भांवरें घूमता है।श्याम उस्ताद का मानना है, ताल के ज्ञान के बिना सब बेताला हो जाता है।पहले ताल-लय, फिर नाच।वाद्य को बजाने से ताल, लय सब सधने लगता है।बड़ी-बड़ी बातें तेरसू को समझ में नहीं आती थीं।आया था नाच सीखने, कहां डफरा बजाने के चक्कर में पड़ गया।रूपा, तेरसू की झुंझलाहट पर खिलखिला उठती, ‘बापू से सीखना इतना आसान ना है – बापू बड़े गर्म मिजाज के गुस्से वाले हैं- ‘तू क्यों नहीं सीखती कठघोड़वा नाच…’

‘लड़कियां नहीं नाचतीं…’

‘क्यों…’

लड़कियों को चौका-बर्तन… खाना पकाना है… फिर…

‘फिर क्या?’

रूपा के चेहरे पर लाली छा जाती।

‘फिर क्या… बोल न…’

‘धत… कूढ़ मगज… इतना भी नहीं जानता तू…’

तेरसू की आंखें और फैल जातीं।

‘बुझौवल बुझाती है तू… बता न…’

‘फिर ब्याह…’ कहकर रूपा अंदर भाग जाती।

तेरसू ठंडी सांस भरता।ब्याह तो लड़कियों का होना ही है।उसके गांव की सभी समौरिया ब्याह गईं।कितना अच्छा होता, रूपा का ब्याह न होतायहीं पर रहती, उसके साथ बोलतीबतियाती।अपनी सोच पर मुस्करा उठा तेरसू।

श्याम उस्ताद की नजरों ने तेरसू और रूपा की अंतरंगता को पकड़ लिया।रूपा पर पहरे कड़े होने लगे और तेरसू पर डांट की बौछारें पड़ने लगीं।तेरसू जी जान से उस्ताद को खुश करने का प्रयास करता, लेकिन श्याम उस्ताद की भौहें सीधी न होतीं।किसी और शिष्य के न होने से तेरसू को संरक्षण देना श्याम उस्ताद की मजबूरी थी।तेरसू को तैयार करने से ही उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सकती थी।अभी रूपा का ब्याह भी रचाना था।बात आजमगढ़ के ही एक गांव में पक्की थी।लड़का बंबई में कमाता था।नाच वालों के घर वह बेटी नहीं ब्याहना चाहता था।नाच वालों की दयनीय स्थिति से वह परिचित था।

तेरसू बड़ी कुशलता से नाच सीख रहा था।घोड़े की हर चाल में वह पारंगत होता जा रहा था।उसकी नजरें रूपा को ढूंढती रहतीं।रूपा दिखाई न देती।एक दिन आम के बाग में टिकोरा बीनती हुई रूपा के सामने वह आ खड़ा हुआ।

‘आजकल तू दिखाई नहीं देती, मेरा मन नाचने में नहीं लगता…’

‘तू इस गांव की रीत नहीं जानता क्या… बापू मुझे छोड़ेंगे नहीं।अब मुझसे बात न करना।’

‘रूपा…, तू मुझे भा गई है।मन होता है, तुझे देखता रहूँ।’ रूपा का चेहरा पीला पड़ गया।

‘बापू तूझे काट डालेंगे… तू मानेगा नहीं… मैं जा रही हूँ।’ इतना कहकर रूपा घर की ओर दौड़ पड़ी।उसकी लाल चुन्नी हवा में लहराती रही।

श्याम उस्ताद ने नाच के कई बयाने ले लिए थे।पैसा जुटाना था।जेठ में रूपा का ब्याह तय हो गया था।तेरसू अनमना रहने लगा था।एक दिन श्याम उस्ताद ने तेरसू को बुलाकर कहा, ‘अब हमारी लाज तुम्हारे हाथ है।घर में फूटी कौड़ी न बची है।रूपा का ब्याह जेठ में न होगा तो लड़के वाले मुकर जाएंगे…।’

तेरसू ने कौल दिया, ‘आप निश्चिंत रहें, हमारे ऊपर भरोसा रखें…।’

न खाने की सुध, न सोने की।तेरसू जी जान से रातदिन नाच में जुट गया।डफरा बजाने वाले के पैसे बचाने के लिए वह पैर और हाथ में घुंघरू बांधता और तुकबंदी को कहरवा में पिरोकर ऊंची तान से ललकारता।श्याम उस्ताद बेटी के ब्याह की तैयारी में जुटे थे।

अकसर तेरसू अकेला ही जाता।उसने कठघोड़वा नाच को अपने तरीके से साध लिया था।जो भी कमाता उस्ताद को सौंप देता।ब्याह का दिन निकट आ रहा था।तेरसू की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।एक दिन रूपा ने तेरसू को रास्ते में रोका, ‘तुझे लाज नहीं आती… मेरे ब्याह की तैयारी में जुटा है।बापू से बात क्यों नहीं करता…’

‘हिम्मत ना है… डर लगता है तेरे बापू से… तू ही बात कर ले… हम तुम्हारे बिना जी न पाएंगे रूपा।जिंदगी भर सिर-आंखों पर बिठा का रखेंगे तुझे…’

‘जो डरा सो मरा… तुझसे भला तो वह आजमगढ़ वाला है…’ रूपा की आंखों से अंगारे बरस रहे थे।रूपा फिर सामने न आई।रूपा की डोली विदा हुई।तेरसू का कहीं पता न था।

श्याम उस्ताद ने तेरसू को बहुत ढूंढा, फिर हारकर चुप बैठ गया।बहुत दिनों से श्याम उस्ताद ने कठघोड़ों को नहीं देखा था।उसे कोठरी खोलने की नौबत ही नहीं आई थी जिसमें दोनों कठघोड़े रखे थे।मन का भारीपन थोड़ा कम हुआ तो रूपा की मां ने कहा, ‘कब तक तेरसू को ढूंढ़ने में समय गवाएंगे, घर में अनाज खत्म हो रहा है… नाचना तो पड़ेगा ही।’

श्याम उस्ताद ने कोठरी खोली तो गाज गिरी।एक कठघोड़ा गायब था।पति-पत्नी दोनों का शक तेरसू पर ही था।श्याम उस्ताद भड़क उठे, ‘हरामखोर, दगाबाज, चोरी भी करेगा यह उम्मीद नहीं थी।बुढ़ापे में ऐसी चोट दी है कमीने ने… खून उगल कर मरेगा… उस्ताद के साथ कोई ऐसे दगा करता है… आएगा तो चमड़ी उधेड़ कर रख दूंगा…।’

‘रूपा की मां बिफर पड़ी, ‘चोट्टा… मुंह कैसे दिखाएगा…’

तेरसू ने अपने गांव के प्रधान के यहां हलवाहे का काम शुरू कर दिया।पुआल वाली कोठरी में उसे रहने की जगह मिल गई।कठघोड़वा को वह पुआल में छिपा कर रखता था।मन में कभी तरंग उठती तो ‘कठघोड़वा’ को देख कर संतोष कर लेता।नाचने का सिलसिला खत्म हो गया था।मन भी उचाट हो गया था।खेत जोतता, बैलों को दाना-सानी करना बस यही काम था।खाना मिल जाता था और मजूरी का अनाज भी, जिसे बेचकर वह अपनी जरूरत की चीजें खरीद लेता।कई वर्ष ऐसे ही बीत गए।रूपा की खोज-खबर वह गांव जवांर से लेता रहता।उसके मन में कभी-कभी तरंग उठती, अपने रचे फगुआ, बारहमासा पर नाचने की, मंडली बनाने की।अपनी नृत्य की दुनिया में वह विचरण करता, टेर लगाता…।

बसंत की छटा छाई री, इऽऽ बसंत की छटा

जब से गए मेरी सुधियो न लीन्ही

मोरा जियरा धरत नाहीं धीर, लागे तीर री

बसंत की छटा छाई री, इऽऽ बसंत की छटा

लाल झालर, नील-पीले वस्त्रों से सजे कठघोड़वा पर सवार, वह राजकुमार सा हाथ में तलवार लिए सोनवा रानी को ब्याहने चल पड़ता।आगे की पंक्तियां धुंधली पड़ने लगतीं, आंखों से आंसू टपक पड़ते।

प्रधान जी की बेटी की शादी थी।बारात के साथ ‘लवंडा नाच’ आया था।दुबले पतले सींकिया लड़के जब लड़की बन चोटी, लहंगा-चोली पहन बन-ठन के नाचने लगे तो उनकी कमर की लचक पर गांव वाले मचलने लगे।तेरसू को लड़कों का यह जनाना रंग-ढंग न जंचा।ताव में उसने कठघोड़वा निकाला।पैर में घुंघरू बांधा और मंच पर घूम-घूम कर नाचने लगा।अचानक हलवाहे तेरसू का यह नवीन रूप देख लोग अवाक थे।तेरसू का रंग जम गया था। ‘लवंडा नाच’ के मैनेजर को अपने रुपये खतरे में दिखाई पड़ने लगे।उसने इशारा किया।कुछ गुंडों ने तेरसू को मंच से खींच कर उतारा और पीटने लगे।तेरसू अपने कठघोड़वा को बचाने में लगा था।गांव के लोगों ने तेरसू को छुड़ाया, लेकिन तेरसू के टखने की हड्डी चटक चुकी थी।

तेरसू तन-मन से टूट चुका था।अब उसे कठघोड़वा को बचाने की भी चिंता सताने लगी थी।गांव के शरारती लड़कों की नजर में ‘कठघोड़वा’ चढ़ चुका था।लड़कों ने तेरसू को ‘कठघोड़वा’ कहकर चिढ़ाना शुरू कर दिया था।

रूपा विधवा होकर वापस अपने मायके लौट आई थी।उसके पति की जहरीली शराब पीने से मौत हो गई थी।यह खबर तेरसू को बेचैन कर रही थी।टखने की हड्डी ठीक से न जुड़ पाई थी।तेरसू भचक कर चलता था।जिस ‘कठघोड़वा’ को वह गुरुगृह से बड़ी साध से मंडली बनाने की आस में चुरा लाया था, आज वही ‘कठघोड़वा’ बोझ हो गया था।

रूपा को एक नजर देखने की साध उसे गुरुगृह आजमगढ़ के बुढ़नपुर गांव खींच लाई।पैर ठीक न होने की वजह से उसने अपने गांव के संगी की मदद ली।कठघोड़वावापस अपने स्थान पर आ पहुंचा।कठघोड़वाके साथ तेरसू को देख रूपा चकित थी।दस वर्ष का समय बीत चुका था।

‘हम उस्ताद से माफी मांगने आए हैं।रूपा, तुम्हारा दुख सुनकर अपने को रोक न पाए।’

‘बापू पिछले साल गुजर गए… अम्मा पहले ही चल बसी थीं।’

‘ओह… हम तुमसे भी क्षमा मांगते हैं, रूपा…।’

रूपा मौन रही।

पुराना वैभव दिखाई न दे रहा था।चारों ओर विपन्नता बिखरी थी जो उघड़े छप्पर और कपड़ों के पैबंदों से झांक रही थी।

‘इऽऽ रख लो, लौटाने आए हैं’ तेरसू ने कठघोड़ा की ओर इशारा किया।

‘दुसरका तो बिक गया…’ रूपा ने ठंडी सांस लेते हुए कहा।

‘ओह… ऐसे कैसे चलेगा… कुछ उपाय तो करना होगा…’

‘काऽऽ, अब कौन सा उपाय होगा… तुम तो नाच भी नहीं सकते…।रूपा की बात ने तेरसू के मन में आस जगा दी।

‘तुम तो नाच सकती हो रूपा… हम मंडली बनाएंगे…’

‘लड़की लोग कठघोड़वा का नाच कहां नाचती हैं…?’

‘कहीं लिखा है काऽऽ…  हम तुम्हें सिखाएंगे… हम तो गीत भी रचते हैं… सुनोगी?’

रूपा ने मौन समर्थन दिया।तेरसू का मन मयूर नाच रहा था।उत्साह के अतिरेक में उसने टेर देकर गाना शुरू किया-

मो पर करि शासन गए शरद शिशिर हेमंत
अब आए हो भाग से रे ऋतुराज बसंत
तुम्हारे धावन पवन नित आवत जात तुरंत
शोध करावो देश किस मेरे कंत बसंत…

रूपा की आंखें चमकने लगीं।सपने महक उठे।दोनों ही इस आंच को महसूस कर रहे थे।

संपर्क :बी4/1अन्नपूर्णा नगर कॉलोनी, विद्यापीठ रोड, वाराणसी 221002