कवयित्री और समीक्षक। कविता संग्रह ‘पोखर का पानी’ प्रकाशित। संप्रति स्वतंत्र लेखन।

दादी और मैं

मेरी दादी
जब भी मेरे घर आती
वह जैसे समूची आती
मन-आत्मा सब हमारे लिए लेकर आती
जब हमारे संग होती
तब न दादाजी की चिंता न चाचा और बच्चों की
न उसे अपने घर की वैसी फिकर होती
जैसे वह वहां रहने पर किया करती

बचपन में जब भी मैं पढ़ा करती
दादी बगल के सोफे में बैठी
घंटों मुझे निहारती रहती
थोड़ा ध्यान पुस्तकों से हटने पर
मैं देखती
वह अब भी निहार रही है मुझे
प्रसन्न मुख, गर्वित नेत्रों से
एकटक
मैं कहती सो जाओ दादी
वह कहती- ‘सोऊंगी न तू अपनी पढ़ाई कर’

दादी जब भी आती
वही क्रिया लगातार बनी रहती
आखिर एक दिन मैंने पूछा दादी से-
‘वह क्यों निहारती रहती है मुझे?’
उसने मुस्कुराते हुए कहा-
‘मैं देखती हूँ तुम्हें ध्यान में रत
और सोचती हूँ जब तुम पढ़कर उठोगी
तो मैं तुमसे ढेर सारी बातें करूंगी
किताबों में क्या पढ़ा तुमने
स्कूल की तुम्हारी सहेलियों के बारे में
और जानना चाहूंगी तुम्हारी पंसद-नापसंद
और बस तुम्हें निहार लेने भर से
अपनी आत्मा को सुखी मानती रहूंगी’

आज जब दादी मेरे लिए स्मृति हो चुकी है
तो मैं उसकी लालसा भरी
चमकदार आंखों के पानी से भींग जाती हूँ
आज मैं जब अपने छोटे बच्चों से घिरी हूँ
तो इंतजार की परिभाषा को
करीब से महसूस कर पा रही हूँ
दादी के रूप में।

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