युवा शायर। अद्यतन गजल संग्रह ‘हाशिए पर आदमी’। विभिन्न पत्रिकाओं में गजलें प्रकाशित।

एक

दर्द को अश्आर में कहने के फन से राब्ता
हिज्र की रातों ने जोड़ा है सुखन से राब्ता

पेड़ से दीमक का, रोगों का बदन से राब्ता
यूं भी है कुछ सर-फिरों का, इस वतन से राब्ता

दिल के साथी बने हैं दर्द-ओ-गम कुछ इस कदर
जिस कदर है रूह का मेरे बदन से राब्ता

जिंदगी थी, जिंदगी में जिंदगी थी ही नहीं
जब तलक था जिंदगी की अंजुमन से राब्ता

इश्क में यूं राब्ता रक्खा करो माशूक से
ज्यूं चमन का गुल से, सूरज का किरन से राब्ता

गर सुखन-वर इश्क, उल्फत, प्यार से अंजान है
हो न पाएगा सुखन का, बांकपन से राब्ता

वक्त-ए-रुख्सत तुमसे मिलना चाहता हूँ इसतरह
जिस तरह होता है जिस्मों का, कफन से राब्ता।

दो

इक पहन रक्खा है और दो चार खूंटी पर टंगे हैं
हर बशर के घर में कुछ किरदार खूंटी पर टंगे हैं

जिन उसूलों का खजाना जां से बढ़कर कीमती था
दौर-ए-हाजिर में हुए बेकार, खूंटी पर टंगे हैं

कुछ भी कह लीजै गले का हार मत कहिए हमें अब
आप के उतरे गले के हार, खूंटी पर टंगे हैं

झांककर देखो कभी बदनाम गलियों के मकां में
शहर के कितने ही इज्जत-दार, खूंटी पर टंगे हैं

वजन बटुए का ही भारी पड़ रहा है आशिकी पर
अब मुहब्बत, इश्क, उल्फत, प्यार, खूंटी पर टंगे हैं

भेड़िए सरदार बन अब कर रहे हैं रहनुमाई
और मनुजता के सभी अवतार, खूंटी पर टंगे हैं।

तीन

सुन न पाया खुद को ही, दुनिया का डर हावीरहा
‘दिल’ पे मेरे जब तलक, मेरा ये ‘सर’ हावी रहा

शहर की आब-ओ-हवा तन पर तो हावी हो गई
मन पे लेकिन गांव का, छोटा सा घर हावी रहा

मंजिलें मिलने की खातिर राह देखेंगी तेरी
हर सफर की मुश्किलों पर तू अगर हावी रहा

खाक में मिलने तलक भी खुद से मिल पाए नहीं
जिनके सर पर दौलत-ओ-जर उम्र भर हावी रहा

‘खेतिहर’, मजदूर में तब्दील हो कर रह गए
गांव पर कुछ इस तरह से भी शहर हावी रहा

इस बदलते दौर की वे नब्ज पढ़ पाए नहीं
हाशिए पर आ गए जिन पर हुनर हावी रहा

जिनको थी मंजिल की चाहत मंजिलें पा थम गए
जिनमें थी यायावरी उनपर सफर हावी रहा

दुश्मनों की बद्दुआएं, भी दुआ बनकर लगीं
मुझ पे यूं मां की दुआओं का असर हावी रहा।

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