जोगमाया चकमा

(1960) चकमा भाषा की प्रतिष्ठित कवयित्री।कथालेखिका, संपादिका और अनुवादिका।आपकी कुल आठ पुस्तकें प्रकाशित।त्रिपुरा सरकार के भाषा सम्मान से सम्मानित।

अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : .पी.झा

(1971) हिंदी एवं अंग्रेजी के कविकथाकार और परस्पर अनुवादक हैं।आपने अनुवादअध्ययन में पीएच.डी. की है।अब तक हिंदी/अंग्रेजी में 40 अनूदित पुस्तकें प्रकाशित।दो कवितासंग्रह सहित एक दर्जन मौलिक पुस्तकें हिंदी एवं अंग्रेजी में।संप्रति एक मीडिया संस्थान में कार्यरत।

झुम्मा कथा

मेरे सीने में
बसी हैं अनेक पहाड़ियां
और घेरी हुई हैं इन्हें
चारों ओर से
झुम्मा कथाएँ,
आग की भीषण ज्वाला में
फिर से दमक उठेगा
उजड़ा हुआ जंगल।
ओ रुद्रप्रताप!
आज भी तुम्हारे लिए
दहकी हुई माटी की कोख में
पनप।-सँवर रही है एक सुनहली घाटी
उन्मुक्त टंगीघर
और झूम की फसल।

प्यासा जल

एक क्षितिज से दूसरे तक
संग-संग चलने के लिए
बना है हमारा पथ
यहां पड़ी है थाती
एक तबाह गांव की
दरकता है तेजी से
दर्द का पहाड़ अतीत की ओर
धवल चांदनी के दुधिया प्रसार में
बीमार ग्रामीणों की देह पर
दिख रहे हैं लहू के धब्बे
पीछे छूट गईं
इन हरी-भरी घाटियों को देखो
जिनकी पलकें नहीं झपकतीं
प्यासी हिरणियों की तरह
नीले पहाड़ों की आमलकी हरताकी को
चुनते हुए
सीने में बसे
हीरक जल की चमक के संग
तुम्हें पी रहा है
मानवता का प्यासा जल।

वसंत – एक पुनरावलोकन

मुरझाया हुआ प्यार
मुड़कर
पीछे निहारता है
रक्तिम रेशमी कपास से
भरे जंगल को
जो था दिल में बसा
वह है गायब
पिछले अनेक वसंतों से
मानवीय संबंधों के दरकते दायरे
और….
यदि प्यार में फासले हो जाएं
तो मानस हो जाता है निरंक
ऊपर अंतहीन आकाश में
नहीं दिखती है एक भी चिड़िया
नहीं दिखता है प्रिय नाम
और न ही प्रिय वसंत।

जोगमाया चकमा : ओल्ड कार्टाबारी कॉम्प्लेक्स, राधानगर, अगरतला, पश्चिम त्रिपुरा-799001 मो. 9436125022

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