वरिष्ठ कवि। कविता संग्रह, ‘अब भी’, ‘सामने से मेरे’ और ‘डुमरांव नजर आएगा’। भोजपुरी में भी लेखन।

हार कर नहीं हारा

क़स्बे की चाय दुकान में
टूटही बेंच
हिलती मेज़ की संगति में रहते हुए
लिखी मैंने कई कविताएं मोबाइल से
दोपहर शाम के वक़्त

लिखते वक्त घिरे रहना
सामान्य जनों से
महसूस करना अपनापा
भर देता है खुशियों से

उधर संभ्रांत जनों के लिए
यहां मेरा बैठना लगा ओछापन
जबकि महसूस नहीं किया मैंने
अकेलापन कभी इस जगह

कविताओं ने ही पढ़ाया पाठ
जीवन की सजलता का
बचाया मुझे काठ होने से

हारकर भी नहीं हारा
बनने नहीं दिया
जीवन को कारा

हरदम रहा विरोध में झूठ के
डरा नहीं ताकतवर से

बना रहा सदा
अलमस्त
पस्त नहीं हुआ।

संपर्क : ‘सुयश’, 631/58, ज्ञान विहार कालोनी, कमता (फैज़ाबाद रोड), लखनऊ–26028 मो. 7355644658