युवा कवयित्री।संप्रति अध्यापन।

1.
आसान कहां
किसी सूरज के प्रेम में पृथ्वी हो जाना
न चुंबन, न आलिंगन
न धड़कनों पर कान रखकर
सांसों का प्रेम गीत सुन पाना
बस दूर से निहारना और घूमते रहना
दुखों भरे उसी विरह पथ पर
मिलन की प्रतीक्षा लिए निरंतर।

2.
यकीनन पृथ्वी स्त्री ही है
जो घूमती रहती है उम्र भर
किसी के प्रेम में पड़कर
उसके घर, परिवार
बच्चों को संभालती चकरघिन्नी बनी
बस उस एक के इर्दगिर्द।

3.
स्त्री अगर किसी से प्रेम करती है
फिर कभी उसका साथ नहीं छोड़ती
भले उसे लाख तपिश क्यों न सहनी पड़े
झुलस ही क्यों न जाए
सूरज के प्रेम में पड़ी
पृथ्वी की तरह।

4.
पृथ्वी गोल है
बिलकुल सपाट
बहुत कठोर
यह भ्रम है
कभी ध्यान से देखना उसकी गहरी आंखों में
मिल जाएंगी तुम्हें
उसके पलकों के नीचे जमी नमकीन झीलें
प्रेम से छूना उसकी काया
अनगिनत खरोंचों से भरी उसकी देह
तुम्हारी अंगुली के पोरों को लहूलुहान कर देगी
धीरे से खोलना उसके मन की गिरहों को
बहुत रीती और पिघली मिलेगी भीतर से
बिलकुल एक स्त्री की तरह।

5.
जब दोनों हाथों से लूटी खसौटी जाओ
दबा दी जाओ अनगिनत जिम्मेदारियों के तले
तुम्हारे किए को उपकार
नहीं अधिकार समझा जाने लगे
तब हे स्त्री
डोल जाया करो न तुम भी
अपनी धुरी से।

6.
कोरी कल्पना
और किस्से कहानी से अधिक कुछ भी नहीं
ये सारी बातें
कि पृथ्वी टिकी है
गाय के सींग
शेषनाग के फन
सूर्य की शक्ति
या फिर लटकी है अंतरिक्ष के बीचों बीच
गुरुत्वाकर्षण के बल पर
सच तो यह है
कि अपनी करुणा, प्रेम
सृजन और जुनून के बल पर
स्त्रियां लादे घूम रही हैं पृथ्वी का बोझा
अपनी पीठ पर युगों युगों से।

8.
स्त्री देखती है नींद में ख्वाब
ख्वाब में घर के काम
दूधवाले, सब्जीवाले का हिसाब
बच्चों का होमवर्क
खोजती है पति का रूमाल, मोजा, टाई
दोहराती है सास ससुर के रूटीन
हेल्थ चेकअप की डेट
इसी बीच झांक आती है पल भर को
मायके का आंगन
निरंतर घूमती रहती है एक औरत
अपने कर्तव्य पथ पर
क्योंकि जानती है वह
पृथ्वी के रुक जाने का अर्थ है
संपूर्ण सृष्टि का रुक जाना।