सुपरिचित कवि। अद्यतन कविता संकलन ‘इन हाथों के बिना’। केदारनाथ अग्रवाल स्मृति शोध संस्थान से जुड़े।

उत्सव का द़ृश्य

न अब नदी थी
न घाट थे
न वे पत्थर थे
जिन पर वह एड़ियां
घिसती थी अपनी

यह एक द़ृश्य था
जो अब नहीं है
घाट के पत्थरों के
रोज कुछ न कुछ पिघलने का
इस द़ृश्य में
मछखोई चिड़िया भी शामिल थी
और शामिल थे
नदी के कगार में खड़े पेड़
जहां चिड़ियों के घर थे
उन्होंने द़ृश्य के इस उत्सव में
अपनी छायाओं को भेजा था

यह द़ृश्य था
नदी से नहाकर निकलती
एक नदी का
पानी की टपकती उन बूंदों के
उत्सव का दृश्य था
जो कुछ दिनों पहले
मेरी आंखों के सामने से गुजरा।

संपर्क :​ डी. एम. कालोनी, सिविल लाइन, बांदा-210001 मो.9450169568