सुपरिचित कवि। तीन कविता संग्रह ‘दूसरे दिन के लिए’, ‘पदचाप के साथ‘ और ‘इंकार की भाषा’ प्रकाशित। संप्रति अध्यापन।

 चप्पल

और टूट गई चप्पल भी एक दिन रखे-रखे
जिसे पहनने वाला कोई नहीं था
जो पांव थे वे निकल गए थे खाली पैर
बिना बताए एक ऐसी यात्रा पर
लौटना जहां से संभव नहीं होता

वह चप्पल वहीं कोने में पड़ी रहती
झाड़ू लगा कर गंदगी साफ होती
पोंछा लगता
सब कुछ होता
चप्पल को भी धो दिया जाता था कभी-कभी

लेकिन जिस नाप का वह था
वैसा पैर नहीं था घर में किसी का
इसलिए चप्पल की तरफ
किसी का ध्यान नहीं गया
आखिर उस नाप के पैर भी कोई
खोजने कहां तक जाता

चप्पल थी कोने में
कोई कागज का टुकड़ा नहीं था
कपड़ा नहीं था पुराना और बेकार
फिर भी एक दिन छूने से पहले टूट गई चप्पल
फीता खुल गया
रंग उड़ गया चिथड़ों में बदलकर

चप्पल थी तो टूट गई
और भी पता नहीं क्या क्या टूट गया होगा
उसके जाने के बाद
जो माथे पर लिए चलता था घर
गया तो पांव की तरह
माथा भी खाली था।

अख़बार में

जो कुछ छपता है वह दुनिया जानती है
लोग पढ़ते हैं पूछते हैं एक दूसरे से
फिर पता करते हैं कि सच क्या है
यहां-वहां से

खबरों से घिरे हुए लोग
घिरे हुए हैं चारों तरफ से
अखबार की कतरनें हवा में उड़ रही हैं
अफवाहें उड़ रही हैं
डर फैल रहा है
खुशी कम हो रही है
लोग खुश होना तो चाहते हैं
लेकिन खुश दिखना नहीं चाहते

न जाने कौन सा तनाव है
न जाने कौन सी चिंता जो
नमक की तरह गलाती जाती है
एक मजबूत देह को

अखबार में सब कुछ है
बस उस डर का कोई जिक्र नहीं
जो खा जाता है एक दिन पूरे परिवार को
फिर अगले दिन अखबार में
उसकी कोई खबर नहीं होती।

संपर्क : क्रांति भवन, कृष्णा नगर, खगरिया-851204 मो. 8986933049