
सहायक प्राध्यापक, दार्जिलिंग गवर्नमेंट कॉलेज।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सफलता के रूप में मिलने वाली आजादी विभाजन की त्रासदी साथ लेकर आई थी। देश विभाजन एक ऐसी त्रासद घटना थी, जिसके साथ मानवता का क्रूरतम चेहरा सामने आया। इस त्रासदी ने दो देशों की सीमाएं ही तय नहीं कीं बल्कि सदियों से साथ रह रहे दो परस्पर निर्भर समुदायों को दो अलग समुदायों में विभाजित कर दिया- अलग और विरोधी। यह ऐसी घटना थी जिसने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया। कई लेखकों ने इस घटना को उठाया और विश्लेषित किया। यशपाल ने ‘झूठा सच’ (1958 और 1960), कुर्रतुल ऐन हैदर ने ‘आग का दरिया’ (1959), अब्दुल्ला हुसैन ने ‘उदास नस्लें’ (1963), राही मासूम रजा ने ‘आधा गांव’ (1966), भीष्म साहनी ने ‘तमस’ (1973), बलवंत सिंह ने ‘काले कोस’ (1999) से लेकर मंटो, कृष्ण बलदेव वैद, अज्ञेय, मोहन राकेश जैसे कई लेखकों ने इस त्रासदी को अपने लेखन में दोबारा जिया। कृष्णा सोबती ने विभाजन की त्रासदी पर ‘सिक्का बदल गया’, ‘मेरी मां कहां है’, ‘डरो मत मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा’, ‘खून’, ‘मिट्टी’, ‘सरस्वती’ जैसी कहानियों से लेकर ‘चन्ना’, ‘जिंदगीनामा’ और आत्मकथात्मक उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ लिखा।
उनकी आरंभिक कहानी ‘सिक्का बदल गया’ देश विभाजन की त्रासदी को बेहद शांत और मार्मिक ढंग से उकेरने वाली एक महत्वपूर्ण कहानी है। 1948 में प्रकाशित और ‘बादलों के घेरे’ में संकलित यह कहानी कृष्णा सोबती की लेखकीय कलम की शक्ति और उस सधे हुए रचना कौशल की पहचान कराती है जिसका निरंतर प्रमाण उनकी बाद की रचनाओं में है। देश विभाजन की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह कहानी महज राजनीतिक तख्तापलट की कथा नहीं है। यह कथा है मानवीय संबंधों के बदलने की। देश विभाजन को ‘राजनीतिक एजेंडा’ से अधिक ‘मानवीय त्रासदी’ मानने वाली लेखिका ने इस कहानी के जरिए दिखाना चाहा है कि 1947 में केवल राजनीतिक सत्ता और देश की भौगोलिक पहचान का ही सिक्का नहीं बदला बल्कि एक भाषा, बोली और जीवन शैली पर आधारित सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का सिक्का भी बदल गया। इस आंतरिक परिवर्तन, संवेदनात्मक क्षति का परिणाम यह हुआ कि आपसी प्रेम, विश्वास और भाईचारे की जगह परस्पर संदेह, घृणा और हिंसा का वह सिक्का चल निकला। इसकी जहरीली चमक दोनों मुल्कों की स्थायी दुश्मनी के रूप में आज भी बरकरार है। देश विभाजन से मनुष्य के अंतर्जगत में हुए परिवर्तन, उसकी संवेदनात्मक क्षति को उकेरने का प्रयास लेखिका ने इस कहानी में किया है। यहां उसकी इस विशेषता की तरफ ध्यान जाना चाहिए कि क्रूर, हिंसात्मक घटनाओं-स्थितियों का वर्णन भी यहां बेहद शांत, गंभीर और अहिंसात्मक ढंग से होता है। दरअसल वह किसी संवाददाता की तरह आंखों-देखा हाल नहीं सुनातीं, बल्कि एक संजीदा साहित्यकार के रूप में उन हिंसाओं-क्रूरताओं के दूरगामी प्रभावों का विश्लेषण करती हैं।
कहानी का आरंभ जिस शांत और निस्तब्ध वातावरण में होता है वह शाहनी को सुकून देने के बजाए उसे किसी आसन्न संकट के प्रति भयभीत करता है। वर्षों से जिस चनाब का पानी उसकी मन-आत्मा को तृप्ति प्रदान करता रहा, आज उसी चनाब का किनारा और किनारे की रेत में असंख्य पैरों के निशान उसे डरा रहे थे। हालांकि शाहनी अपनी हवेली से पूरे सम्मान और मर्यादा के साथ निकलती है, लेकिन वह जान चुकी है कि उसका गांव, उसकी हवेली, उसके आसामी अब अपने नहीं रहे। राजनीतिक फैसले की आंधी ने एक समाज और संस्कृति के दो परस्पर निर्भर समुदायों को अचानक दो अलग ही नहीं, दो विरोधी संप्रदायों में बांट दिया। शाहनी सोचती है, ‘कौन नहीं है आज वहां? सारा गांव है, जो उसके इशारे पर नाचता था कभी। उसकी असामियां हैं, जिन्हें उसने अपने नाते-रिश्तों से कभी कम नहीं समझा। लेकिन नहीं, आज उसका कोई नहीं, आज वह अकेली है।’
इतना ही नहीं, शेरा भी जिसका शाहनी ने अपने बेटे की तरह पालन-पोषण किया था, और जिस पर उसके अनगिनत एहसान थे, फिरोज जैसे दंगाइयों के भड़काने पर शाहनी की हत्या कर उसकी हवेली लूटने की बात सोचता है। दूसरी तरफ विभाजन पूर्व समाज और संस्कृति में परस्पर प्रेम, साहचर्य और अपनेपन की ऐसी मधुर स्मृतियां भी उसके भीतर जिंदा थीं, जिन्हें एक झटके में दिमाग से खुरचकर मिटा देना संभव नहीं हो पा रहा था। कृष्णा सोबती ने दिखाना चाहा है कि इतनी हिंसा, नफरत और हत्याओं के बाद भी मानवीय मूल्य पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
कृष्णा सोबती देश विभाजन पर आधारित अपने कथा साहित्य में इस बुनियादी सवाल के सामने हैं कि क्या भारत–पाकिस्तान बनाने के राजनीतिक फैसले ने हिंदू–मुस्लिम दिलों में अचानक दरारें पैदा कर दीं या यह एक धीमी प्रक्रिया थी जिसके बीज इतिहास में कहीं मौजूद थे।
पंजाब की आर्थिक विषमाता की सांप्रदायिक भूमिका का समार्जशास्त्रीय अध्ययन करते हुए मैलकॉम ल्याल दर्लिंग ने स्पष्ट किया है कि समाज में मौजूद आर्थिक विभेद धीरे-धीरे सांप्रदायिक वैमनस्य का रूप धारण करता जाता है और आर्थिक लड़ाई अपने परिणामों में आर्थिक नहीं रह जाती, सांप्रदायिक बन जाती है। शेरा के मन में जमींदारी-महाजनी व्यवस्था के प्रति भी एक गुस्सा था, पर अंततः सब पर सांप्रदायिकता ही भारी पड़ती गई।
शाहनी अपनी हवेली से सोने-चांदी या नगदी नहीं, स्मृतियों की पूंजी लेकर निकलती है। इस मार्मिक दृश्य का वर्णन लेखिका ने आंसू की स्याही से किया है, ‘शाहनी रो-रोकर नहीं, शान से निकलेगी इस पुरखों के घर से, मान से लांघेगी यह देहरी, जिसपर एक दिन वह रानी बनकर आ खड़ी हुई थी। अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालकर शाहनी ने दुपट्टे से आंखें पोंछीं और ड्योढ़ी के बाहर हो गई। … शाहजी के मरने के बाद भी जिस कुल की अमानत को उसने सहेजकर रखा, आज वह उसे धोखा दे गई। शाहनी ने दोनों हाथ जोड़ लिए यही अंतिम दर्शन था, यही अंतिम प्रणाम था। शाहनी की आंखें फिर कभी इस ऊंची हवेली को न देख पाएंगी।’ राजनीतिक अंधड़ में घर से बेघर होकर शरणार्थी कैंप पहुंची शाहनी की पीड़ा बाह्य, भौतिक परिवर्तन के बजाए अंतर्जगत में हुए परिवर्तन, मानवीय संबंधों के बदलने की पीड़ा है। कहानी के अंत में वह कहती है, ‘सिक्का क्या बदलेगा, वह तो मैं पीछे छोड़ आई’!
कृष्णा सोबती उस पीढ़ी की रचनाकारों में हैं जिनके लिए विभाजन किसी ऐतिहासिक घटना के बजाए जीवंत इतिहास है। विभाजन-पूर्व पंजाब के जिला गुजरात में जन्मी लेखिका की युवावस्था और शेष जीवन भारत में गुजरा। 1947 में दो देशों के बीच खिंची विभाजन रेखा ने जैसे कृष्णा सोबती के जीवन को भी दो हिस्सों में बांट दिया। बचपन की धरती पर लौटना फिर कभी संभव नहीं हो सका, लेकिन उसकी स्मृतियों ने साथ भी नहीं छोड़ा, ‘कौन जानेगा, कौन समझेगा अपने वतनों को छोड़ने और उनसे मुंह मोड़ने के दर्दों की पीड़ा को। जेहलम, चनाब बहते रहेंगे इसी धरती पर। लहराते रहेंगे खुली-खुली हवाओं के झोंके इसी धरती पर इसी तरह। हर रुत मौसम में इसी तरह, बिलकुल इसी तरह। सिर्फ हम यहां नहीं होंगे, नहीं होंगे, फिर कभी नहीं होंगे, नहीं।’ ‘जिंदगीनामा’ उपन्यास की आरंभिक काव्यात्मक पंक्तियां अपने वतन से, पुरखों की यादों से, उस पूरी धरती-समस्त परिवेश से अलविदा कह चले मन की भावभीनी श्रद्धांजलि है। वर्तमान की पीड़ा भी- एक साझी संस्कृति और निर्ममतापूर्वक बीचो-बीच चाक कर दी गई जिंदगी जीने की पीड़ा।
‘जिंदगीनामा’ में अगर देश-विभाजन की आशंका के संकेत हैं तो कृष्णा सोबती की अंतिम रचना, उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’ में इस त्रासदी की विभीषिका है। यह बेहद तकलीफदेह एहसास है कि ‘सिक्का बदल गया’ जैसी अपनी आरंभिक कहानियों में विभाजन की जिस पीड़ा को कृष्णा सोबती ने अभिव्यक्त किया था, लगभग सात दशकों की लंबी रचनायात्रा के आखिरी पड़ाव पर पहुंचकर भी उस दर्द की तासीर जैसे कम नहीं हुई। बंटवारे के बाद बाहरी और आंतरिक टूटन की पीड़ा लेखिका को अंत तक घायल करती रही।
कृष्णा सोबती अपनी आखिरी कृति में नायिका की हैसियत से उपस्थित होकर उस त्रासदी को दोबारा जीती हैं। यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी के घट चुकने के बाद शेष बचे जीवन की क्रूर वास्तविकताओं, विस्थापित नियतियों का साक्षात्कार कराता है। जैसे बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद उजड़े-बिखरे जीवन का कोई क्रूर चित्र हो। उपन्यास में एक तरफ जहां बीचो-बीच चाक कर दिए गए मुल्क की लहूलुहान साझी विरासत है, ‘ज्ञान और ईमान/गीता और कुरान।/दोनों कुतर रहे हैं अपने-अपने नाखूनों को।/सूफियों की मजारें खामोश हैं।/मंदिर भौंचक्क ताक रहे हैं’ (गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान) वहीं दूसरी तरफ बंट चुकी भावनाओं, टूट चुके संवेदनात्मक पुलों की पीड़ा बोलती है, ‘इन सबके बीच कैसे गुम हो गया-/हर दिल को गरमाता वह राष्ट्रगान- /हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलिस्तां हमारा।/हम चहकते नहीं, खूंखारते हैं।/अब तो हम तेज किए गए गए चाकू हैं।/हम आग का पलीता हैं।/हम दुश्मनों को चाक कर देनेवाली गरम हिंसा हैं।/हम दुल्हनों की बांह काट देनेवाले टोके हैं।/हम गंडासे हैं।/अब हम हम नहीं हैं, हथियार हैं।’ (वही)। प्रेम, स्नेह और सौहार्द की परंपरा खत्म कर हिंसा, नफरत और लूटपाट का नया अध्याय सामने है जिसमें लिखा जानेवाला इतिहास राजनीतिक उन्माद, सांप्रदायिक हिंसा और भींड़ की क्रूरता का होगा।
यही कारण है कि कृष्णा सोबती के लिए विभाजन राजनीतिक एजेंडा से अधिक सांस्कृतिक और मानवीय त्रासदी है। उनके यहां इस बात की पीड़ा बहुत गहरी है कि जब दो भौगोलिक सीमाएं नई सरहदों में बदलती हैं तो मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं रहता। सीमाओं के अंदर बसने वाले लाखों की संख्या में विस्थापित होते हैं तो वह भयावह अध्याय शुरू होता है जो विभाजन के समय हुआ। मुख्य बात यह है कि अपनी आंखों से अपने जीवन और मुल्क को चाक होते देखने के क्रूर अनुभव के बाद भी कृष्णा सोबती ने हमेशा महसूस किया कि इतनी नफरत, हिंसा और हत्याओं के बाद भी मानवीय मूल्यों को बहाल किया जा सकता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक, सामासिक संस्कृति वाले देश के नागरिक के रूप में अपनी पहचान स्पष्ट करते हुए कृष्णा सोबती लिखती हैं, ‘लोकतांत्रिक भारत का नागरिक होने के नाते मैं अपने होने में न सिर्फ हिंदू हूँ, न मुसलमान, न सिक्ख और न फारसी। मुझमें, मेरे अस्तित्व और चेतना से जुड़े हैं लोकतांत्रिक देश के मूल्य और सिद्धांत भी जो मुझमें भारतीय होने का एहसास जगाते हैं। एक स्वस्थ समाज की पहचान उसके इतिहास, संस्कृति और साहित्य से होती है। परंपरा और परिवर्तनों के फलस्वरूप उस पुराने की पड़ताल से भी उभरती है जो रूढ़ियों और परिवर्तनों के फलस्वरूप जनमानस की सोच में लगातार बने रहते हैं और उसके स्वभाव, रुचि और सोच के अटूट अंग हो जाते हैं। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन को प्रतिबिंबित करते हैं।’ इस सामासिक संस्कृति की झलक कृष्णा सोबती के व्यक्तित्व और पूरे जीवन में तो मिलती ही है, उनके साहित्य, विशेषकर विभाजन साहित्य में भी स्पष्ट देखी-पहचानी जा सकती है।
देश विभाजन के त्रासद अध्याय से कृष्णा सोबती साझी संस्कृति की कथा कहती हैं, ‘मैं उन खौफनाक वक्तों की पौध हूँ, विभाजन को झेले हुए हूँ, फिर भी बांटना चाहती हूँ आपसे कि मेरी धर्मनिरपेक्षता को पिछले पचास वर्षों में शक-सुबह से किसी सांप्रदायिकता ने जख्मी नहीं किया।’ कृष्णा सोबती का विभाजन साहित्य अपने-आप में उन मानवीय मूल्यों का दस्तावेज है जो सम्मिलित संघर्षों की देन, त्याग और कुर्बानी से लिखा जाता है।
कृष्णा सोबती की आरंभिक रचना ‘सिक्का बदल गया’ के स्त्री चरित्र शाहनी की यह आहत आकांक्षा कृष्णा सोबती की कलम से निकली आखिरी कृति में भी बनी रहती है। वे लिखती हैं, ‘इन खूनी हलचलों की कीमत पर मिली आजादी – रब्ब करे इस कातिल आजादी, इस तकसीम के बाद बचे-खुचों को अंग्रेजी चंगुल से निकलना रास आए। दोनों ओर जो कुर्बान हुए, मर-खप गए वे तो वतन के लिए शहीद हुए – जो बच गए वे अपने-अपने मुल्कों की बरकतों को माथे लगाएं, लंबी उम्र भोगें।’ (गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान)। यह आहत आकांक्षा भावी पीढ़ी के लिए उस लेखिका की सच्ची विरासत है, जिसने विभाजन की लहूलुहान स्मृतियों को अपने भीतर दबाए रखने के बावजूद सांप्रदायिक हिंसा और उन्माद की नहीं बल्कि मनुष्यता और मानवीय मूल्यों को बचाए और बनाए रखने की कहानी कही है।
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