
युवा गजलकार। हिंदी प्राध्यापक।

ले गया था
वो आंखों का भी मंजर ले गया था
मेरा आंसू समंदर ले गया था
कभी उसकी जमींदारी रही थी
गया तो सिर्फ बिस्तर ले गया था
ये सच है जीत ली थी उसने दुनिया
मगर फिर क्या सिकंदर ले गया था
अजब उल्फत उसे महबूब से थी
लगा जो सर पे पत्थर ले गया था
बंटी लोगों में सारी योजनाएं
बचा जो थोड़ा अफसर ले गया था
मैं मरता भी भला कैसे यहां पर
मेरा हर जहर शंकर ले गया था
मेरी रोटी को दो हिस्सों में करके
बचाकर सारा बंदर ले गया था।
ग्राम/पोस्ट-माफी, वाया-अस्थावां, जिला-नालंदा, बिहार 803107 मो. 9934847941
