प्रस्तुति : मनोज मोहन

हिंदी के साहित्यिक-सांस्कृतिक दुनिया में निरंतर सक्रिय। वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमान : समय समाज संस्कृति’  के संपादकीय विभाग से संबद्ध।

दुनिया में विज्ञान की जगह टेक्नोलॉजी का महत्व बढ़ा है और जैसे पश्चिमी देश ही एक बार फिर अपनी टेक्नोलॉजी की श्रेष्ठता के बल पर अपनी सभ्यता की श्रेष्ठता साबित करने में लगे हैं। उसी पश्चिम में आज वैज्ञानिक सबसे ज्यादा बेबस, उदास और आंदोलनरत हैं, क्योंकि वे स्वतंत्रता और आर्थिक प्रोत्साहन का अभाव महसूस करते हैं। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही है। उल्लेखनीय है कि अब सभी खोजें और उत्पादन बाजार द्वारा नियंत्रित हैं। इस परिदृश्य में विज्ञान की 21वीं सदी में क्या भूमिका है, यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। इसके अलावा, विज्ञान और वर्तमान सभ्यता के बीच क्या संबंध है, यह सवाल भी उतना ही बड़ा है जितना विज्ञान और वर्तमान अर्थव्यवस्था के संबंध पर विचार करना।

वागर्थ के ‘वर्तमान विश्व में विज्ञान का हाल विषय पर बहस में शामिल हैं- सुषमा नैथानी, सराह इकबाल, रमेश उपाध्याय, अवधेश प्रसाद सिंह, योगेंद्र आहूजा और नवीन कुमार नैथानी

सवाल

  1. विज्ञान और टैक्नोलॉजी में क्या फ़र्क़ है?
  2. अतीत में विज्ञान और वैज्ञानिक खोजों के महत्व को कैसे देखा गया?
  3. आज की अति-विकसित सभ्यता में विज्ञान का क्या महत्व है?
  4. विश्व में चल रहे विज्ञान आंदोलन के प्रमुख मुद्दों के बारे में बताइये?
  5. भारत में विज्ञान एक सामाजिक शक्ति क्यों न बन सका?

विज्ञान अब भी प्रभुत्वशाली देशों का हथियार है।

सुषमा नैथानी

एसोसियेट रिसर्च प्रोफ़ेसर, ऑरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी अमेरिका। ‘करेंट प्लांट बायोलोज़ी’ जर्नल की प्रमुख संपादक। काव्य संग्रह ‘धूप में ही मिलेगी छाँह कहीं’ (2019), (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास)से कृषि और समाज पर किताब ‘अन्न कहाँ से आता है’ (2020)

(1) पहले लोग सीधे कह देते थे कि टैक्नोलॉजी विज्ञान का उत्पाद है। लेकिन बात अब उससे आगे निकल गई है। नई टैक्नोलॉजी से नए तरह के प्रयोग किए जा सकते हैं और विज्ञान की समझ में नई छलांग लगाई जा सकती है, यह हम लगातार देखते हैं। तो जो नए सायंटिफ़िक ब्रेक थ्रू हैं वह टैक्नोलॉजी का उत्पाद है। शायद यह कहना ठीक है कि दोनों की ज़मीन एक ही है। विज्ञान और टैक्नोलॉजी दोनों ही के विकास में तर्क, ट्रायल और एरर, और अनुभव जनित ज्ञान की समीक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। दोनों सहायक हैं और एक के बिना दूसरे क्षेत्र में विकास नहीं किया जा सकता है। बहुत महीन फ़र्क़ शायद यह हो सकता है कि विज्ञान हमारे चारों तरफ़ अति सूक्ष्म जैविक और अ-जैविक से लेकर ब्रह्मांड तक के रहस्यों को खोलने का काम करता है और टैक्नोलॉजी इस ज्ञान से सबक़ लेकर नई चीज़ बनाने का काम करती है जो प्रकृति में पहले से मौज़ूद नहीं है।

(2) अतीत में वैज्ञानिक खोजें जिनका तात्कालिक फ़ायदा दिखता हो, हमेशा हाथों-हाथ ली गईं। पहिया हो या विभिन्न धातुओं का आविष्कार हो, हल का हो या बारूद का या ऐटम बम का, सबने अपने समाजों को अन्य के मुक़ाबले अधिक प्रभुत्वशाली बनाने का काम किया। इसी तरह चिकित्सा, खेती, से लेकर रोज़मर्रा के जीवन में जो परेशानियाँ हैं जैसी ही उनका कोई तर्कसंगत उपाय मिल जाता है, मनुष्य समाज को जीने का नया संबल मिलता है। अभी जैसे कोविड-19 के लिए टीका बन गया है तो पूरी दुनिया में ख़ुशी और उम्मीद की लहर उठी है। लेकिन यह भी सच है कि नए ज्ञान को आसानी से नहीं अपनाया गया, मसलन गैलेलियो के सौरमंडल और डार्विन की एवोलूशन के सिद्धांत को अब भी पूरी तरह समाज ने समझा न पूरी तरह अपनाया है। जी.एम.ओ. फ़सलों को लेकर चल रही कंट्रोवरसी से हम सब परिचित हैं। समाज हमेशा आड़े-तिरछे, रास्तों पर चार क़दम आगे और फिर दो क़दम पीछे की संगत में चलता है। हम मनुष्य कभी किसी सीधी रेखा में नहीं चलते तो विज्ञान के साथ भी यही बर्ताव होगा।

(3) अति विकसित सभ्यता तो वही कही जाएगी जब दुनिया के अधिकतर लोग आराम से और डिग्निटी के साथ जीवन जी सके। मैं नहीं मानती कि यह सभ्यता कोई अति विकसित सभ्यता है। पूरी दुनिया में बहुत कम लोग हैं जिनके जीवन में कोई आश्वस्ति है। अब भी भूख और सरवाइवल के लिए लोग क्या-क्या नहीं कर रहे और कहाँ-कहाँ नहीं भटक रहे हैं? अति विकसित सभ्यता का भ्रम पालने और ऐसी शब्दावली के इस्तेमाल से पहले एकदफ़े अमेरिकी मानवशास्त्री मार्शल सालिंज़ का ‘ओरिजिनल अफ्लूएंट सोसायटी’ लेख लोगों को ज़रूर पढ़ना चाहिए। विकसित देशों के मध्यवर्ग और विकासशील देशों के उच्च वर्ग के पास सहूलियत और गैजेट्स (विज्ञान की सिर्फ़ तलछट) है, लेकिन यह सभ्यता अति विकसित नहीं कही जा सकती। फ़िलहाल तो यह सब जो टैक्नोलॉजी हैं वह लोगों को लगातार मोनिटर करने, बेवज़ह की चीज़ों में उलझाने, और उनको अधिकाधिक सामान बेचने का काम कर रही है। आम व्यक्ति सिर्फ़ उपभोक्ता है, उसकी जेब तय करती है कि विज्ञान के पेड़ से वह कितने फल लोप सकता है। सबको विज्ञान का एक जैसा फ़ायदा कहाँ मिल रहा है? अभी कोविड की वैक्सीन बाज़ार में आ जाए तो वह अमेरिका और यूरोप में छह महीने या सालभर के भीतर सबको मिल सकती है, लेकिन ग़रीब मुल्कों के सबसे ग़रीब तबके तक अगले 5-10 साल तक भी शायद न पहुँचे। बाक़ी विज्ञान अब भी प्रभुत्वशाली देशों का हथियार है।

(4) मुझे ऐसी किसी विज्ञान आंदोलन की जानकारी नहीं है, जिसका एक संगठित और पारदर्शी ढाँचा हो, और उसके एजेंडा में समाज में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार हो या कम से कम गंभीर तरीक़े से विज्ञान के क्षेत्र में ही मौज़ूद नस्लवाद, जातिवाद या मर्दवाद की समीक्षा और उसे कुछ कम करने के लिए कोई कारगर प्लान हो। बहुत से सायंस लिटेरेसी प्रोजेक्ट हैं जो कई कोर्पोरेट, सरकारी या ग़ैरसरकारी अनुदान से चल रहे हैं, उनकी पारदर्शिता और अकाउंटबिलिटी (अपनी वार्षिक रिपोर्ट भरने से अलग) किसके प्रति है, यह मैं नहीं जानती हूँ। उनमें से जो अच्छा काम हो रहा है वह विधार्थियों के बीच ‘हैंड्ज़-आन’ (करके सीखो) तरीक़े से पढ़ाने का तरीक़ा है। वह बहुत पहले से मोंटेसरी स्कूल पद्धति का हिस्सा रहा है, उसमें कुछ नया नहीं है, उसका विस्तार अब कुछ NGO की मदद से भारत में सरकारी स्कूल में पहुँचाने की कोशिश है।

2017 के बाद प्रतिवर्ष ‘सायंस मार्च’ अमेरिका में और फिर उसकी प्रेरणा से दुनिया में हो रहे हैं, तो इसके मूल में पिछले 5-6 सालों में उभरी पोप्यूलिस्ट मूल्यहीन/तथ्यहीन राजनीति का विरोध है, और ऑल्ट न्यूज़/फेंक न्यूज़/ पीत पत्रकारिता जिस तरह से मीडिया की मुख्य धारा बन गए हैं उसको लेकर चिंता शामिल है। यह सब विरोध बहुत स्वत: स्फूर्त हैं, सोशल मीडिया पर इनकी सूचना फैलती है, लोग कहीं एकत्र होते हैं और फिर भीड़ बिला जाती है। 8-10 लोग हर शहर में जो यह ऑर्गनायज़ करते हैं उनके अतिरिक्त कोई किसी को नहीं जानता है। लेकिन यह इस मायने में महत्वपूर्ण हैं कि बड़ी संख्या में दुनियाभर में लोग सच की, तथ्यों की परवाह करते हैं। लेकिन इनका रोल भी स्वत:स्फूर्त कैंडल मार्च की ही तरह है। एक सामूहिक प्रतिरोध की तरह।

वैज्ञानिकों की एक प्रमुख चिंत्ता क्लाइमेट चेंज को लेकर ज़रूर है, लेकिन उनके काम के फ़्रंटियर एकाधिक है। विज्ञान आंदोलन उनकी प्राथमिक चिंता नहीं है। बाक़ी दुनियाभर में बहुत सी भलमनसी रखने वाले वैज्ञानिक हैं, शिक्षक हैं और दूसरे बुद्धिजीवी हैं जो बेहद व्यक्तिगत प्रयासों से सरल भाषा में विज्ञान को आम लोगों के लिए पॉप्युलर जानर में लिखते रहे हैं। डिजिटल क्रांति के बाद विकिपीडिया एक व्यक्तिगत से सामूहिक प्रयास बन गया है जहाँ हर विषय पर मुफ़्त में जानकारी दुनिया की कई भाषाओं में मिल जाती हैं। हालाँकि वहाँ सब कुछ सही नहीं होता लेकिन वह पीपल लिटरेसी का फ़िलहाल सबसे बड़ा आंदोलन कहा जा सकता है।

(5) भारत में सामाजिक चेतना का बड़ा हिस्सा धार्मिक चेतना से भरा हुआ है, जिसके मूल में आस्था है। परंपरा में जहाँ भी जो औथोरिटी हैं उससे सवाल पूछने की मनाही न सही लेकिन दबिश ज़रूर है, माँ-बाप, अपने से उम्र/पद, जाति/ सोशल स्टेटस में जो भी बड़ा है, उससे बराबरी के स्तर पर बातचीत संभव नहीं है, स्वस्थ असहमति और वाद-विवाद बहुत रेयर है। इस ग़ैर-बराबरी के मूल में हिंसा और डर है (जिसे सामाजिक स्वीकृति है)। ज्ञान-विज्ञान समाज, समय और इतिहास से स्वायत नहीं है, उसी का हिस्सा है। समाजों की चेतना और उनकी जो मटीरियल हक़ीक़त है उसी हिसाब से विज्ञान भी है। विज्ञान या किसी भी तरह का ज्ञान का संधान हो वह स्वतंत्र संवाद की मांग करता है, मिनिमम डेमोक्रेसी की मांग करता है। वह यदि पर्याप्त नहीं है तो विज्ञान सामाजिक शक्ति कैसे बन सकता है?

दूसरी बात यह है कि विज्ञान आगे की तरफ़ बढ़ने और देखने की जीवन दृष्टि है। भारतीय समाज अतीत की तरफ़ देखता है, आप पीछे की तरफ़ मुंह करके आगे नहीं बढ़ सकते। किस तरह से हमारा समाज अपनी धूरी पर 180 डिग्री घूम सके इसके बारे में सोचना पड़ेगा और निरंतर प्रयास करना होगा।

 

संपर्क : sushma.naithani@gmail.com

वैज्ञानिक खुलकर जनता से कैसे संवाद स्थापित करें?

सराह इकबाल

भारत सरकार के डीबीटी/वेलकम ट्रस्ट इंडिया एलायंस के संचार एवं जन-जुड़ाव डिविजन की प्रधान के रूप में कार्यरत

वैज्ञानिक विकास को यदि कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाए तो विज्ञान हमारे दैनंदिन जीवन में एक बड़ा परिवर्तन ला सकता है। दरअसल विज्ञान और कला दोनों ही मानवीय अनुभवों को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से परस्पर एक दूसरे के अविभाज्य अंग के रूप में कार्य करते हैं। वर्तमान समय में विज्ञान का जनसामान्य से परिचय कराने में कला की भूमिका उल्लेखनीय रही है। दूसरी ओर वैज्ञानिक प्रगति से कला की अभिव्यक्ति क्षमता भी काफी उन्नत हुई है। इस प्रकार दोनों ने मिलकर हमारे चतुर्दिक फैले संसार को समझने की हमारी क्षमता को व्यापक स्तर पर विकसित किया है।

इस समय वैज्ञानिकों का एक ऐसा वर्ग है जो यह मानता है कि वैज्ञानिक खोजों एवं उसकी उपलब्धियों की जानकारी जनता तक पहुँचाना बहुत ही जरूरी है। लेकिन इसमें बाधक बन रहा है उस पद्धति का ज्ञान नहीं होना, जिससे इस जानकारी को उन तक पहुँचाया जा सके।

बुनियादी विज्ञान की तुलना में स्थानांतरणीय विज्ञान (जिसकी जानकारी जनता को दी जानी चाहिए) और कुछ अन्य क्षेत्रों, जैसे संरक्षण और पारिस्थितिकी, जन-स्वास्थ्य, खगोल विज्ञान आदि में तो जनता के साथ संवाद निहायत जरूरी है। मौलिक अनुसंधान के लिए रुचि जागृत करना और उसके लिए सहयोग-समर्थन प्राप्त करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। अधुनातन संवाद और संचार पद्धति के बिना यह काम संभव नहीं है।

भारत में आज भी विज्ञान-संबंधी जानकारी देने के लिए पहले से प्रचलित पुरानी पद्धतियों को ही अपनाया जाता है, जिसमें आलेख आदि का विशेष रूप से सहारा लिया जाता है। लेकिन जनता की जरूरतों का अध्ययन नहीं किया जाता और न ही यह जानने की कोशिश की जाती है कि वह जनता कौन है, जिसके साथ संवाद किया जाना आवश्यक है। वह जनता विज्ञान के बारे में क्या सोचती है और उसके बारे में कितना ज्ञान रखती है।

हम आज भी विज्ञान के संबंध में संवाद करने की उस पद्धति को नहीं अपना पाए हैं, जिसके माध्यम से वैज्ञानिक खुलकर जनता के साथ सीधे संवाद कर सकें, उनकी राय ले सकें, और उनके साथ मिलकर उन नीतियों का निर्धारण तथा अनुसंधान के उन क्षेत्रों की पहचान कर सकें जो सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

दरअसल अनुसंधान जनता पर, जनता के लिए और जनता के साथ होना चाहिए। भारत में अभी तक जनता पर और जनता के लिए अनुसंधान की दिशा में ही हम थोड़े-बहुत ही आगे बढ़ पाए हैं।

विज्ञान केवल तथ्यों और आंकड़ों का संग्रहण नहीं है। यह गंभीर और तार्किक रूप से सोचने का एक तरीका है। मनुष्य स्वभाव से ही काफी जिज्ञासु होता है और उसमें अपनी समस्याओं को समझने तथा उसका समाधान खोजने की अंतर्निहित क्षमता होती है। ये गुण किसी खास पेशे या कार्यक्षेत्र में लगे लोगों में ही विशेष रूप से नहीं होते, बल्कि सभी पेशे या क्षेत्रों में कार्य कर रहे लोगों के लिए ये अनिवार्य होते हैं ताकि वे तर्कसंगत तथा साक्ष्य-आधारित निर्णय ले सकें, जिससे जन-सामान्य और इस धरती का कल्याण सुनिश्चित हो सके। वर्तमान शिक्षा प्रणाली इन गुणों के विकास एवं पोषण के प्रति गंभीर नहीं है।

न केवल वैज्ञानिक जानकारी को जनता के साथ साझा करना जरूरी है, बल्कि यह बताना भी जरूरी है कि वैज्ञानिक अनुसंधान की कार्यविधि क्या होती है, खासकर यह बताने के लिए कि विज्ञान अनिश्चित एवं जटिल हो सकता है, उसमें तेजी से बदलाव आ सकता है और उसका नैतिक प्रभाव भी समाज पर पड़ सकता है। इस संबंध में कोविड 19 संकट को लिया जा सकता है, जिसने हमें सोये से जगाने लिए एक प्रकार से बिगुल फूँका है।

वैज्ञानिक अनिश्चितता और अनुसंधान की जटिल प्रकृति को संप्रेषित करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए जनता के साथ पूरी निष्ठा और निरंतरता के साथ संवाद करना जरूरी है; क्योंकि विज्ञान के संचार और संप्रेषण का एक बड़ा उद्देश्य समाज के सभी स्तरों पर साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करना है। हालाँकि साक्ष्य के रूप में केवल तथ्यों एवं आँकड़ों को साझा करने से ही गंभीर चिंतन को बढ़ावा मिल जाएगा ऐसा नहीं कहा जा सकता। उसके लिए विज्ञान की प्रक्रिया और संप्रेषण में जनता की साझेदारी आवश्यक होती है, क्योंकि जन-साझेदारी से ही परिवर्तन घटित हो सकता है।

कोविड 19 संकट ने जनता से विज्ञान के जुड़ाव की कमियों को उजागर किया है। इस समय हम जिस संकट से गुजर रहे हैं, इसी तरह की किसी भी भावी स्थिति में जनसंपर्क तभी सफल हो पाएगा जब विज्ञान और जनता के बीच सार्थक संवाद और जुड़ाव पहले से विद्यमान हो।

जनता के साथ विज्ञान के जुड़ाव या संप्रेषण को वैज्ञानिक अनुसंधान का एक अभिन्न अंग माना जाना चाहिए, न कि ‘बाद में देखा जाएगा’ जैसा भाव होना चाहिए। जनता से संबंध स्थापित करने के किसी भी प्रयास की सफलता और

उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि विज्ञान और समाज के बीच रिश्ता बनाने के प्रति हम कितने ईमानदार और समर्पित हैं। इसके लिए प्रेक्षागृह में सामने बैठे श्रोताओं या जनता की जरूरतों, जीवन-मूल्यों, विश्वासों तथा उनके ज्ञान के स्तर की जानकारी हमें पहले से होनी चाहिए। अपने विचारों को अच्छी तरह से संप्रेषित कर सकें इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि हम सामने बैठे अपने श्रोताओं को समझें, उनके बारे पूरी जानकारी रखें।

कोविड 19 ने विज्ञान के प्रति हमारी सोई हुई रुचि को जागृत किया है। … बहुत बार यह पूछा जाता है कि किसी संस्थान में अनुसंधान के लिए दी गई निधि, खासकर भारत में सामान्य जनसमूह के लिए कितनी हितकारी साबित होती है? अनेक बार जनता जानना चाहती है कि वैज्ञानिक जो कार्य कर रहे हैं उसका आम जनता के जीवन पर कितना प्रभाव पड़ने वाला है। अत: वैज्ञानिक संगठनों की भलाई के लिए भी एक सक्षम और कल्याणकारी अनुसंधान संस्कृति बनाने की तत्काल जरूरत है।

प्रस्तुति : जयश्री राजगोपालन, वरिष्ठ प्रबंधक, ग्लोबल कम्युनिटी इंगेजमेंट

अंग्रेजी से अनुवाद : अवधेश प्रसाद सिंह

विज्ञान सबका होकर ही सामाजिक शक्ति बन सकता है

रमेश उपाध्याय

प्रसिद्ध कथाकार और ‘कथन’ पत्रिका के संपादक। बीस कहानी संग्रह, पाँच उपन्यास, तीन नाटक, कई नुक्कड़ नाटक, चार आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित।

जब यह पूछा जाता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में क्या फर्क है, प्रश्नकर्ता की अपेक्षा शायद यह होती है कि दोनों को परिभाषित किया जाए। लेकिन प्रौद्योगिकी को तो इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि वह किसी काम को करने के लिए विज्ञान के आधार पर विकसित प्रविधि है, लेकिन विज्ञान को परिभाषित नहीं किया जा सकता। उसे विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया जाता रहा है, लेकिन उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन के अनुसार विज्ञान मनुष्य के लिए अब तक की सबसे ज्यादा वस्तुपरक चीज है, लेकिन एक बनती हुई चीज के रूप में वह इतनी आत्मपरक भी है कि ‘विज्ञान क्या है?’ पूछने पर विभिन्न कालों में विभिन्न प्रकार के लोगों से विभिन्न प्रकार के उत्तर मिलते हैं। इसलिए विज्ञान किसी परिभाषा में नहीं बँधता।

प्रसिद्ध विज्ञान चिंतक और लेखक जे. डी. (जॉन डेस्मंड) बर्नाल ने अपनी पुस्तक ‘साइंस इन हिस्टरी’ में ‘विज्ञान क्या है?’ का उत्तर देते हुए बताया है कि विज्ञान आज तक के संचित ज्ञान का कुल योग नहीं, बल्कि उसका कुल परिणाम होता है और यह परिणाम स्थिर नहीं होता। विज्ञान में अब तक के ज्ञात तथ्यों और प्रतिपादित सिद्धांतों आदि की निरंतर परीक्षा होती रहती है और बहुत-सी पुरानी चीजों को ध्वस्त करने वाली नई चीजें सामने आती रहती हैं। फिर भी विज्ञान का विकास कभी रुकता नहीं, निरंतर होता रहता है। उसकी कल्पना हम एक ऐसी मशीन के रूप में कर सकते हैं, जिसमें लगातार टूट-फूट और मरम्मत होती रहती है, सुधार और परिवर्तन होते रहते हैं, और फिर भी जो हमेशा चलती और काम करती रहती है।

लेकिन मशीन का यह रूपक कई प्रश्न खड़े कर सकता है। मसलन, यह मशीन क्या काम करती है? मशीन अपने-आप में कोई काम नहीं करती, वह कोई काम करने के लिए बनाई जाती है, तो वह कौन है, जो इस मशीन को बनाता है? और, मशीन बनाने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी वह कहाँ से लाता है? और यह भी कि विज्ञान-रूपी मशीन बनाने के लिए प्रौद्योगिकी जरूरी है, तो क्या प्रौद्योगिकी विज्ञान से पहले पैदा होती है?

पहले विज्ञान या पहले प्रौद्योगिकी? यह प्रश्न ‘पहले मुर्गी या पहले अंडा?’ जैसा निरर्थक प्रश्न है, लेकिन दोनों में फर्क करना जरूरी है। क्यों जरूरी है, यह बात हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं। हमारे यहाँ परीक्षाओं में अक्सर ‘विज्ञान वरदान है या अभिशाप?’ विषय पर निबंध लिखने के लिए कहा जाता है। इसके उत्तर में परमाणु शक्ति से संभव किए जानेवाले मानवोपयोगी कार्यों के उदाहरणों से उसे वरदान सिद्ध किया जाता है और महाविनाशकारी परमाणु बम के उदाहरण से अभिशाप। लेकिन ये उदाहरण विज्ञान के नहीं, प्रौद्योगिकी के उदाहरण हैं।

विज्ञान परमाणु शक्ति का ज्ञान है, जबकि उस ज्ञान का उपयोग करते हुए जो काम किए जा सकते हैं, उन्हें करना प्रौद्योगिकी है। विज्ञान अपने-आपमें न वरदान है न अभिशाप, लेकिन उसके आधार पर विकसित प्रौद्योगिकी वरदान या अभिशाप हो सकती है। अतः विज्ञान और प्रौद्योगिकी दो भिन्न चीजें हैं और विज्ञान के बारे में बात करते समय इस भिन्नता का ध्यान रखा जाना चाहिए।

लेकिन बहुत-से सचेत और प्रबुद्ध लोग भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी में फर्क नहीं करते, या नहीं कर पाते, तो इसका कारण यह है कि दोनों भिन्न होते हुए भी आरंभ में लंबे समय तक एक ही या साथ-साथ रहे हैं। अतीत में विज्ञान मनुष्य के दैनंदिन जीवन से अलग कोई ऐसा काम नहीं था, जिसे आजकल वैज्ञानिक लोग प्रयोगशालाओं में या अनुसंधान केंद्रों में करते हैं। आरंभ में यह काम जंगल में कंद-मूल-फल खोजने, शिकार करने, पशुपालन करने, खेती करने, खाना पकाकर खाने, कपड़ा बनाकर पहनने, घर बनाकर रहने, वाहन बनाकर चलने और बोझ ढोने आदि के कामों के दौरान प्रकृति के नियमों को जानने, मानवीय आवश्यकताओं के लिए उनका इस्तेमाल करने और उनके आधार पर शिकार और खेती जैसे कामों के लिए औजार बनाने तथा आत्मरक्षा और आक्रमण के लिए शस्त्रास्त्र विकसित करने की दैनंदिन गतिविधियों का अभिन्न अंग था।

आजकल विज्ञान वैज्ञानिक कहलानेवाले विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किया जानेवाला काम है, लेकिन अतीत में वह एक सामान्य सामाजिक गतिविधि था, जिसमें स्त्रियाँ और पुरुष, बूढ़े और युवा, सभी भाग लेते थे। इस प्रकार विज्ञान मनुष्य की जीवन-प्रणाली तथा समाज की उत्पादन-प्रणाली का अभिन्न अंग था और उसके विकास, उपयोग तथा उपभोग में सभी मनुष्यों की बराबर की हिस्सेदारी होती थी।

लेकिन श्रम-विभाजन और व्यक्तिगत संपत्ति के उदय के साथ जब मानव समाज में स्वामी और सेवक जैसे संबंध बने, स्त्री-पुरुष समानता की जगह स्त्री को पुरुष की दासी या निजी संपत्ति माना जाने लगा, स्त्री दासों की तरह बेची और खरीदी जानेवाली वस्तु बन गई, पूरा समाज ऊँचे-नीचे वर्गों के साथ-साथ वर्णों और जातियों में बँट गया, तथाकथित निम्न वर्णों और नीची जातियों के लोगों को शिक्षा और ज्ञान के अधिकार से वंचित कर दिया गया, तो विज्ञान पूरे समाज की सामान्य दैनंदिन गतिविधि न रहकर स्वामी वर्ग की सेवा में नियुक्त और उसी वर्ग के हित में काम करनेवाले कुछ शिक्षित-प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा किया जानेवाला काम बन गया, जो वैज्ञानिक कहलाते थे।

इस प्रकार विज्ञान एक सामाजिक शक्ति न रहकर वर्गीय शक्ति बन गया, जो एक तरफ वर्गीय शोषण, दमन, उत्पीड़न और नियंत्रण के लिए, तो दूसरी तरफ राज्य को साम्राज्य बनाने के लिए किए जानेवाले युद्धों और बड़े-बड़े जनसंहारों के लिए इस्तेमाल की जाने लगी।

पूँजीवादी औद्योगीकरण के दौरान विज्ञान के आधार पर कम से कम समय में अधिक से अधिक उत्पादन करनेवाली मशीनों की प्रौद्योगिकी विकसित की गई, लेकिन समाज की व्यवस्था ऐसी बनाई गई कि मशीनों पर काम करनेवाले मजदूरों को अपना शोषण अधिक से अधिक कराने के लिए बाध्य किया जा सके। होना तो यह चाहिए था कि आठ घंटे का काम चार घंटे में कर देने वाली मशीन पर काम करने वाले मजदूर के वे चार घंटे कम किए जाते, लेकिन हुआ यह कि उसके काम के घंटे बढ़ा दिए गए। इससे कारखानों के मालिकों को कई गुना ज्यादा मुनाफा होने लगा और मजदूरों का शोषण कई गुना ज्यादा बढ़ गया। मजदूरों ने आंदोलन करके काम के घंटे कम कराए, तो मालिकों ने पहले से भी ज्यादा तेजी से काम करनेवाली मशीनें बनवाना और उनके जरिए मजदूरों का शोषण और अपना मुनाफा बढ़ाना शुरू कर दिया। इससे एक तरफ असंख्य मजदूर बेरोजगार हुए, जो कम मजदूरी पर अधिक काम करके अपना शोषण कराने को तैयार रहने लगे और दूसरी तरफ ज्यादातर मजदूर शिक्षा, स्वास्थ्य, पारिवारिकता और सामाजिकता से वंचित पशु जैसा जीवन जीने को बाध्य होकर अमानुषीकरण का शिकार होने लगे।पूँजीवाद की यह व्यवस्था आज भी कमोबेश उसी तरह चल रही है।

लेकिन जब कोई व्यवस्था लंबे समय तक यथावत चलती रहती है, तो उसमें परिवर्तन और विकास करनेवाला विज्ञान ठहर-सा जाता है और उस व्यवस्था को यथावत बनाए रखने वाली प्रौद्योगिकी नए-नए रूप लेकर सामने आती रहती है।

मसलन, हाथ या पैर से चलनेवाली मशीन की प्रौद्योगिकी, वाष्प और विद्युत से चलनेवाली मशीन की प्रौद्योगिकी, और अब कंप्यूटर से चलनेवाली मशीन की प्रौद्योगिकी। लेकिन यह सारा विकास समाज की व्यवस्था को बदलकर बेहतर बनाने के लिए नहीं, बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था को यथावत बनाए रखने के लिए किया जाता रहा है।

पूँजीवादी व्यवस्था की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि वह हर चीज को पूँजीपतियों के मुनाफे से जोड़कर देखती है। विज्ञान को लोगों तक पहुँचाने के लिए और उनमें वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए सभी को विज्ञान की शिक्षा उपलब्ध कराना जरूरी होता है। लेकिन इससे पूँजीपतियों को दोहरा नुकसान होता है–एक तरफ वैज्ञानिक शिक्षा के निजीकरण से होने वाला मुनाफा कम हो जाता है, तो दूसरी तरफ वैज्ञानिक शिक्षा से समाज में जो तर्क-शक्ति बढ़ती है, वह लोगों को पूँजीवादी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाने और उसे बदलने की ओर ले जा सकती है, लेकिन मनुष्य के व्यक्तित्व और समाज के विकास के लिए आवश्यक है कि शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें मानविकी, विज्ञान, समाजविज्ञान, साहित्य, कला, प्रौद्योगिकी आदि की शिक्षा सबको बिना किसी भेदभाव के मिले। शिक्षा में विशेषीकरण वाली वर्तमान व्यवस्था की जगह ऐसी सामान्य शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें कवियों-कलाकारों के लिए विज्ञान का ज्ञान आवश्यक हो, तो वैज्ञानिकों और डॉक्टरों-इंजीनियरों आदि के लिए साहित्य और कला का ज्ञान। अन्यथा दोनों तरह के लोगों की दो दुनिया और दो संस्कृतियाँ हो जाती हैं, जैसा कि अंग्रेज वैज्ञानिक और साहित्यकार सी. पी. (चार्ल्स पर्सी) स्नो ने अपनी पुस्तक ‘टू कल्चर्स’ में दिखाते हुए लिखा है कि ये दोनों दो अलग दुनियाओं में रहते हैं, जबकि दोनों की दुनिया एक ही है और उसे बेहतर बनाने के लिए दोनों को निकट आकर परस्पर संवाद ही नहीं, मिल-जुलकर काम भी करना चाहिए।

किसी को भी यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि एक तरफ भारतीय समाज में नई से नई प्रौद्योगिकी (जैसे मोबाइल फोन और कंप्यूटर) का उपयोग तेजी से बढ़-फैल रहा है, लेकिन उतनी ही तेजी से लोगों में अज्ञान और अंधविश्वास बढ़-फैल रहे हैं।

भारतीय वैज्ञानिक और उर्दू के प्रसिद्ध शायर गौहर रजा ने इसका कारण बताते हुए कहा है कि ‘समाज में प्रौद्योगिकी का स्तर जितना ऊँचा हो गया है, उतने ही ऊँचे स्तर का विज्ञान लोगों को नहीं मिला है। यह वैसा ही है, जैसे लोगों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से उखाड़कर कहीं दूसरी जगह रोप दिया जाए। लोगों के दिमाग में प्रकृति और समाज को समझने का जो मॉडल बना हुआ है, उसको बदलने के लिए उपयुक्त विज्ञान उनको दिए बिना आप उनके जीवन में उन्नत किस्म की प्रौद्योगिकी ले आते हैं, तो होता यह है कि अवाम की जिंदगी में बहुत-सी नई चीजें होने लगती हैं, पर उनको समझने का तरीका पुराना ही रहता है। चीजों की पुरानी सांस्कृतिक व्याख्याएँ पीछे छूट जाती हैं और उनकी नई सांस्कृतिक व्याख्याएँ लोगों को मिलती नहीं। इससे समाज में बहुत भयानक किस्म की विकृतियाँ पैदा होती हैं और मेरा यह मानना है कि वे बड़ी भयानक शक्ल ले सकती हैं।’

हमारे समाज में यही हो रहा है। ऐसा न हो और विज्ञान एक सामाजिक शक्ति बने, इसके लिए आवश्यक है कि विज्ञान किसी एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे समाज का विज्ञान हो और हमारी शिक्षा-प्रणाली तथा उत्पादन-प्रणाली ऐसी हो, जिसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भेद मिट जाए; सामान्य जन और वैज्ञानिक का भेद मिट जाए।

107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063 मो. 9818244708

विज्ञान को समाज के प्रति उत्तरदायी होना है

अवधेश प्रसाद सिंह

लेखक, भाषाविद और अनुवादक।

(1) विज्ञान और प्रौद्योगिकी एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। वे दोनों एक दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं। विज्ञान का संबंध सिद्धांतों, आविष्कारों, आधारभूत कारणों और नियमों से है, जबकि प्रौद्योगिकी का संबंध वैज्ञानिक आविष्कारों के फलस्वरूप उत्पन्न उत्पादों, प्रक्रियाओं और विनिर्मितियों से है। विज्ञान का लक्ष्य है मानवता के हित के लिए ज्ञान की खोज करना, प्रौद्योगिकी का लक्ष्य ऐसे उत्पादों का निर्माण करना है जो समस्याओं का समाधान करे तथा मानव जीवन को बेहतर बनाए। इस प्रकार प्रौद्योगिकी विज्ञान का व्यावहारिक पक्ष है।

विज्ञान इस जिज्ञासा की पूर्ति है कि यह संसार कैसे बना और इसकी क्रियाविधि क्या है। वह बताता है कि प्राकृतिक घटनाएँ क्यों घटित होती हैं और ब्रह्मांड में विद्यमान चीजें आज जिस रूप में कार्य कर रही हैं, क्या उन्होंने अतीत में भी वैसे ही काम किया था और भविष्य में भी उनके काम करने की वैसी ही संभावना है! वैज्ञानिक अपने प्रयोगों और पर्यवेक्षणों के द्वारा प्राकृतिक घटनाक्रमों के मूल कारणों का पता लगाते हैं। इसमें उनकी अनुसंधानवृत्ति एवं व्यवस्थित तर्कपूर्ण दृष्टिकोण का विशेष महत्व होता है, क्योंकि तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर चारों ओर मौजूद चीजों के बारे किया गया विश्लेषण ही नए निष्कर्षों का आधार बनता है। यह प्रक्रिया भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान, भूविज्ञान, वनस्पति-विज्ञान, मनोविज्ञान आदि सभी दिशाओं में निरंतर चलती रहती है।

विज्ञान का उपयोग नई तकनीकों को विकसित करने, बीमारियों के इलाज, और कई अन्य प्रकार की समस्याओं के निदान के लिए किया जाता है। इस कार्य में प्रौद्योगिकी सहायक की भूमिका निभाती है। तकनीक, कौशल, प्रक्रियाओं और उत्पादों का उपयोग विज्ञान के विकास से लेकर औद्योगिक, वाणिज्यिक और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के साथसाथ उत्पादों के निर्माण और उपयोग में व्यावहारिक अनुप्रयोग के लिए किया जाता है।

आज हम ऐसी तमाम चीजों से घिरे हुए हैं जो निश्चित तकनीक की मदद से बनाई गई हैं। हमारे काम में सरलता पैदा करने, संवाद करने, यात्रा करने, नया कुछ रचने, व्यापार आदि करने में सहायक के रूप में प्रौद्योगिकी सर्वत्र विद्यमान है। वह हमारी क्षमताओं के विस्तार में अहम भूमिका निभाती है और विभिन्न वैज्ञानिक समस्याओं का समाधान भी सुनिश्चित करती है। हम यह भी देखते हैं कि विज्ञान द्वारा अर्जित ज्ञान में समयानुसार विकास होता रहता है, तो प्रौद्योगिकी में निरंतर बदलाव और पिछले तकनीक की तुलना में लगातार सुधार होता रहता है। कुल मिलाकर विज्ञान का संबंध ज्ञान से है और प्रौद्योगिकी का संबंध कार्य-माध्यमों से। परंतु जब मानव जीवन की समस्याओं के हल का प्रश्न हो या उसके विध्वंस का, तो दोनों मिलकर कार्य करते हैं।

(2) अतीत में वैज्ञानिक खोजों और नवप्रवर्तनों का संबंध सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ था। विज्ञान ने बुनियादी पक्ष पर कार्य करते हुए समाज और मानवता की विभिन्न समस्याओं के समाधान में विकास की विभिन्न सीढ़ियों को पार किया है। विज्ञान के विकास के लंबे इतिहास में प्रगति की धारा तेज और मंद होती रही है। कई बार खोजकर्ताओं के बीच मतभेद भी कम नहीं रहे हैं। अलग-अलग देशों में आविष्कारों की गति दिखाई पड़ती है। यूनान, भारत, चीन, अरब आदि देशों में विज्ञान का अंकुरण सैकड़ों साल पहले हुए, पर वह फला-फूला विशेष रूप से यूरोप और अमेरिका में। इसकी वजह थी औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात पश्चिमी देशों में होना।

हालांकि प्रौद्योगिकी के मामले में भारत की भूमिका को भी बिलकुल खारिज नहीं किया जा सकता। धातुओं को पिघलाने, इत्र के आसवन, रंग बनाने, चीनी बनाने आदि के क्षेत्र में भारत ई.पू. तीन शताब्दी पहले से कार्य कर रहा था। भारत में काँच का उत्पादन ढाई हजार साल पहले शुरू हो गया था। माना जाता है कि आर्यभट्ट की पुस्तक ‘आर्यभट्टीय’ का 13वीं शताब्दी में लैटिन में अनुवाद किया गया, तब जाकर यूरोप के गणितज्ञों ने त्रिभुजों के क्षेत्रफल, गोलाकार पिंडों के आयतन, वर्ग और वर्गमूल की गणना करने की पद्धतियाँ सीखीं।

कॉपरनिकस और गैलीलियो से एक हजार साल पहले आर्यभट्ट ने ग्रहणों के बारे में जानकारी दी और यह भी बताया कि चंद्रमा के प्रकाश का स्रोत सूर्य है। छठी शताब्दी में वाराहमिहिर ने खगोलशास्त्र के सिद्धांतों की रचना की, जिसके आधार पर बाद में यूनानी खगोल-विद्या की आधारशिला रखी गई। सातवीं सदी में ब्रह्मगुप्त ने धनात्मक और ऋणात्मक परिणामों की चर्चा की। गणित के क्षेत्र में भारतीयों के योगदान से सभी परिचित हैं। दशमलव प्रणाली, अंक स्थान 1 से 9 तक के अंक और शून्य की अवधारणा भारत की देन है। यह परंपरा अर्वाचीन काल में श्रीनिवास रामानुजन (1887), जगदीशचंद्र बोस (1858-1937), सी. वी. रमन (1888-1970), एम. विश्वेश्वरैया (1860-1962), सत्येंद्रनाथ बोस (1874-1974) और सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (1910-1995) तक जारी रही है।

प्राचीन काल में विश्व के अन्य देशों में विज्ञान का क्रमिक विकास हुआ। पहले की ब्रह्मांड की मिथकीय परिकल्पनाओं के आगे बढ़कर ग्रीक दार्शनिकों ने कई तर्कपूर्ण सिद्धांतों की रचना की। उन्होंने लगभग पच्चीस सौ वर्ष पहले खगोलशास्त्र, गणित और जीवविज्ञान की अनेक शाखाओं नई अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं। पर उन्हें अनेक विरोधों का भी सामना करना पड़ा। जनता के अज्ञान का लाभ उठाते हुए सत्ताओं और धर्माधिकारियों ने विज्ञान को खारिज ही नहीं किया, वैज्ञानिकों को दंडित भी किया। पर विज्ञान का विकास रुका नहीं। विरोध और समर्थन के साथ वह आगे बढ़ता रहा। अगले चरण में वह अपने उद्देश्य, पद्धति और सामाजिक कर्तव्यों की दृष्टि से काफी परिवर्तनों से होकर गुजरा है।

मध्यकाल में विज्ञान के विकास की गति धीमी रही। इस आधार पर मध्यकाल को कई बार अंधकार युग कहा गया। पर इस संबंध में विज्ञान-इतिहासकारों में सहमति नहीं है। उनके अनुसार 13वीं सदी में रसायन के क्षेत्र में काफी खोजें हुईं। इस संदर्भ में कुछ तथ्य भी उल्लेखनीय हैं, जैसे इसी काल में कुछ प्राचीनतम विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई, जहाँ विज्ञान के विकास पर काफी कार्य हुए, जैसे ऑक्सफोर्ड (1167), कैंब्रिज (1209), मोंटपेलियर (1220), पडुआ (1222), सोरबोन (1253), वलाडोलिड (1292)। औद्योगिक क्रांति के बाद तो विज्ञान का अप्रत्याशित रूप से विकास हुआ।

मध्ययुग के अंतिम चरण में और उसके बाद अनेक वैज्ञानिकों ने विज्ञान को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिनमें न्यूटन, ब्रूनो, कोपरनिकस, गैलीलियो, आर्कीमिडिज, तानेकानी, ब्लादिमीर, फॉक, डिराक, डॉकिन्स, डार्बिन आदि शामिल हैं।

20वीं सदी की शुरुआत को आइंस्टीन की वैज्ञानिक खोजों के रूप में चिह्नित किया गया। विभिन्न खोजों के बल पर उन्होंने विज्ञान को नई ऊँचाई दी और अनेक वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणास्रोत बने। 1921 में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया। इस समय प्राकृतिक विज्ञान, खगोलशास्त्र, रसायन और जीवविज्ञान के क्षेत्र में नवीन अनुसंधान किए गए। विज्ञान के इतिहास में वर्ष 1953 एक मील का पत्थर साबित हुआ जब क्रीक और वाटसन ने डीएनए की खोज कर विज्ञान के क्षेत्र में एक नया युग शुरू किया। इसी सदी के उत्तरार्ध में सेमिकंडक्टर, नैनोटेक्नोलॉजी आदि की खोज से सूचना प्रौद्योगिकी का विकास हुआ। फिर परमाणु भौतिकी में उप परमाणु कणों की खोज हुई।

स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा से संबंधित मुद्दों द्वारा संचालित विज्ञान ने आमतौर पर अनिश्चितता, विवादित मूल्यों, उच्च जोखिम तथा तात्कालिक लाभ वाले निर्णय लिए हैं। तभी यह कहा गया कि विज्ञान स्थायी विकास को चरितार्थ करने में विफल रहा है। इसने विज्ञान के क्षेत्र में संदेह का वातावरण पैदा किया। यह कहना मुश्किल हो गया कि निकाला गया कोई निष्कर्ष कितना सही है, क्योंकि सामान्य मशीनी परिणाम उसे समझा नहीं पाता और बहुत कुछ अपने में छिपाए रखता है। कई बार तथ्यों के प्रतिपादन में जिन प्रक्रियाओं से गुजरना होता है, वे भी संदेह के घेरे में आ जाते हैं। विज्ञान के पास बहुत कुछ है जिसे समाज को दिया जा सकता है, किंतु तभी जब समाज को इस बात पर विश्वास हो कि वैज्ञानिक जो कह रहे हैं वह सही है और वे मानवता के लिए हितकारी हैं।

(3) अति आधुनिक सभ्यता के विकास की बुनियाद विज्ञान ने ही रखी है। विकसित राष्ट्र आज जिन उन्नत सुविधाओं का भोग कर रहे हैं वह वैज्ञानिक प्रगति के कारण ही है। दूसरी ओर भौतिक और जैविक दुनिया के बारे में लोगों का ज्ञान बढ़ाने में भी विज्ञान की भूमिका उल्लेखनीय है। वे महत्वपूर्ण मुद्दे, जिनका संबंध जीवन के संपोषण से जुड़ा है। स्वास्थ्य, ऊर्जा, सुरक्षा और उन्नत जीवनशैली आदि विज्ञान के द्वारा ही संभव हैं। वैज्ञानिक नवाचार ने अत्याधुनिक सभ्यताओं की जीवन पद्धति में व्यापक परिवर्तन उत्पन्न किया है।

मानव सभ्यता से विज्ञान का संबंध उतना ही पुराना है जितना स्वयं मानव सभ्यता। आरंभ से ही मानवों में जिज्ञासा और खोज की प्रवृत्ति रही है, जिसे तर्कपूर्ण निष्पत्ति तक पहुँचाने की दिशा में वे निरंतर प्रयत्नशील रहे हैं। इसी प्रयास के तहत उन्होंने जीवन और जगत के अनेक रहस्यों को सुलझाने का प्रयास किया और आरंभिक सभ्यता को अनेक अंधेरे रास्ते से बाहर निकाला। हालांकि अंधविश्वास उनके साथ गठजोड़ किए पीछे-पीछे चलता रहा है, पर हर सभ्यता में ज्ञान-विज्ञान का पलड़ा हमेशा भारी रहा है। आधुनिक सभ्यता में भी देखें तो अंधेरे रास्तों की कमी नहीं रही है, पर विज्ञान पुन: उनके सामने चुनौतियाँ खड़ी करता रहा और अंधेरों को खत्म करने में सफल रहा है।

विज्ञान के शांतिपूर्ण प्रयोग से जीवन यापन, स्वास्थ्य, कृषि, खनन, परिवहन, विनिर्माण आदि विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई, वहीं सामाजिक सरोकारों की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य हुए। लेकिन विज्ञान की देन जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह तथ्य भी है कि सरकारी गलत नीतियों, स्वार्थपरता, राजनेताओं की अहं की तुष्टि और उससे उत्पन्न हुई विनाशकारी सोच के कारण विज्ञान ने विध्वंसक रूप धारण किया।

बारूदी विस्फोट जहाँ पहाड़ों की छाती फोड़ मानव को सुगम पथ प्रदान करने का माध्यम बना तथा सभ्यता के विकास में मूल्यवान योगदान दिया, वहीं हिंसक विस्फोटों ने अपूरणीय क्षति भी की। आत्मरक्षा और प्रतिरक्षा प्रणाली में सहयोगी भूमिका निभाने वाला विज्ञान अपने दुष्पराक्रम को दर्शाते हुए परमाणु हथियारों की सृष्टि कर रहा है। हिरोशिमा और नागासाकी तो एक नाम भर हैं, ऐसे कितने हिरोशिमा और नागासाकी धरती पर भिन्न रूपों में विद्यमान हैं, जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के गलत प्रयोग के परिणामों को भुगत रहे हैं और उनके अभिशाप को झेल रहे हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी सामाजिक सरोकारों को पूरा करने के लिए सकारात्मक भूमिका निभाए इसके लिए जरूरी है कि वैज्ञानिक अनुसंधानों को सरकारी संरक्षण प्राप्त हो और उसके अनुरूप सरकारी नीतियों का निर्धारण हो। आज की स्थिति में विज्ञान का नकारात्मक पक्ष अधिक प्रभुत्वशाली है। वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी में अपनी अग्रता के बल पर अति विकसित सभ्यताएँ कमजोर, अविकसित तथा जीवन की जरूरत को कठिनाई से पूरा करने वाले देशों पर प्रकारांतर से शासन कर रही हैं।

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि विकसित सभ्यताओं ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी का कारोबार चला रखा है। उन्होंने अपने अनुसंधान पर जितने खर्च किए हैं, उससे कई गुना अधिक प्रतिलाभ पूरे विश्व के विकासशील और पिछड़े देशों से वसूला है।

(4) विगत कई दशकों के दौरान विज्ञान आंदोलनों ने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। आमजन ने महसूस किया है कि देश के वैज्ञानिक सामाजिक अनुबंध और उसकी जरूरतों से दूर हो गए हैं। उन्हें सरकार के प्रति नहीं, समाज के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। इन विचार ने विज्ञान आंदोलन को जन्म दिया। उनकी मांग थी कि विज्ञान के बुनियादी और व्यावहारिक दोनों पक्षों पर विचार करते हुए विज्ञान के विकास की दिशा में सरकारों को कार्य करना चाहिए। वे चाहते थे कि बुनियादी विज्ञान में उत्कृष्टता के बिना नवाचारी व्यावहारिक विज्ञान को विकसित नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि शोधकर्ताओं के दो वर्गों का निर्धारण होना चाहिए, क्योंकि एक ही समूह से बुनियादी और व्यावहारिक दोनों तरह के शोध करने की उम्मीद सही नहीं है। वैज्ञानिकों के बीच असहमतियों को सकारात्मक नजरिए से देखना चाहिए।

दरअसल 20वीं सदी के उत्तरार्ध से विज्ञान और प्रौद्योगिकी कार्पोरेट जगत के हाथों की कठपुतली की तरह कार्य कर रही थी। समाज में एक कार्पोरेट संस्कृति विकसित हो रही थी, जिसका पूरा ध्यान अपने व्यावसायिक हितों पर लगा हुआ था। वे प्रत्येक उत्पाद या सेवा को व्यापार की दृष्टि से देखते थे, गुणवत्ता का मूल्यांकन न करके मात्रात्मकता को वरीयता दे रहे थे और तात्कालिक सफलता ही उनका मूल उद्देश्य और वैज्ञानिक प्रगति का पैमाना बन गया था।

अमेरिका में विज्ञान को जनता के हितों के प्रति समर्पित भाव से कार्य करते न देखकर जनता में आक्रोश पैदा हुआ, जिसने आंदोलन का रूप लिया। 1969 और 1989 के बीच अनेक अमेरिकी वैज्ञानिकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के समूह ने देश के सामाजिकार्थिक हितों की रक्षा के लिए न्यायपूर्ण और संगत विज्ञान को अपनाने के लिए वैज्ञानिकों तथा संबद्ध लोगों का आह्वान किया।

आगे चलकर 21वीं सदी में विज्ञान का उपयोग केवल कार्पोरेट लाभों तथा सैन्य कारणों के लिए करने का विरोध किया गया। अनेक आलेखों, प्रदर्शनों, प्रतिरोधी आयोजनों आदि के माध्यम से आंदोलन के सदस्यों ने वैज्ञानिक ज्ञान को रहस्यमयता से मुक्त करके उसे पारदर्शी बनाने का आह्वान किया और जनता को प्रोत्साहित किया कि वह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों के प्रति खुद को जागरूक रखे और वैज्ञानिकों को जनता से संवाद करने के लिए जोर डाला। विभिन्न आलेखों के माध्यम से विज्ञान की मुख्यधारा की समझ को चुनौती दी गई और उसे राजनीतिक मकसद से प्रेरित बताया गया। जनहितैषी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अध्ययन के लिए विभिन्न केंद्रों की स्थापना पर बल दिया गया। विज्ञान आंदोलन से जुड़े लोगों ने विज्ञान, न्याय, लोकतंत्र, स्थिरता और राजनीतिक ताकत पर चल रहे विवादों में जम कर हिस्सा लिया।

भारत में भी आमजन के बीच विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लोकप्रिय बनाने के लिए जन विज्ञान आंदोलन प्रारंभ हुए, जिसकी शुरुआत केरल में ‘शास्त्र साहित्य परिषद’ की स्थापना से हुई। देश के अन्य हिस्सों में भी कई संस्थाओं का निर्माण हुआ, जिनमें भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, असम साइंस सोसाइटी, विज्ञान प्रचार समिति (उड़ीसा), ऑल इंडिया पीपल्स साइंस नेटवर्क आदि उल्लेखनीय हैं। इस आंदोलन में वैज्ञानिक, इंजीनियर, प्रौद्योगिकी से जुड़े लोग, शिक्षक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विद्यार्थी, नीति-विश्लेषक, पत्रकार आदि शामिल थे। इनका उद्देश्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास, प्राकृतिक पर्यावरण और वनों का संरक्षण, वैश्विक कार्पोरेटों एवं विश्व बैंक की विशाल परियोजनाओं का विरोध, जीवन एवं स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार और अनुसंधान, सांस्कृतिक पहचान, आम जनता के बीच वैज्ञानिक जानकारी का प्रसार आदि था। विज्ञान आंदोलन में देश के अनेक स्वैच्छिक समूहों की भागीदारी थी। अनेक समूहों ने गीत, कविता, कला-प्रदर्शनी, नृत्य, कठपुतली नाच, नाटक आदि का आयोजन कर लोगों का ध्यान अपनी गतिविधियों की ओर आकर्षित किया। इस आंदोलन ने जनता को वैज्ञानिक सोच को अपनाने के लिए प्रेरित किया। आंदोलन से जुड़े लोग तथ्यों पर भरोसा करते थे, अंधविश्वास को नकारते थे, नए साक्ष्यों के परिप्रेक्ष्य में पुराने विश्वासों को बदलने की वकालत करते थे, स्वतंत्र साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालते थे और खुले मन से विचार करने पर बल देते थे।

इस आंदोलन में इस बात पर भी जोर दिया गया कि विज्ञान और समाज के बीच आपसी समझ विकसित करने के लिए वैज्ञानिकों और समाज के बीच परस्पर संवाद हो। जनता विज्ञान और वैज्ञानिक आविष्कारों के प्रति तभी जागरूक हो सकेगी जब वैज्ञानिक उनसे सीधे तौर पर जुड़कर विज्ञान के विभिन्न पहलुओं की जानकारी देंगे और उनके हितों के प्रति उन्हें सतर्क करेंगे।

हालांकि यह आंदोलन पूरी तरह सफल नहीं हो सका, जिसके मूल में वैज्ञानिक टेंपर का अभाव बताया गया।

(5) भारत में एक सामाजिक शक्ति के रूप में विज्ञान के न उभरने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि हमारे देश में सामाजिक तौर पर जनता को विज्ञान से जोड़ने का प्रयास नहीं किया गया है। इसके कारण वे विज्ञान की अहमियत से अनजान हैं और उसके लाभ-हानि को नहीं पहचान पाते। विज्ञान एक महत्वपूर्ण ताकत है, यह समझ जब तक पैदा नहीं होगी, तब तक विज्ञान के सामाजिक शक्ति बनने के प्रति संदेह है। अशिक्षा की भी एक बड़ी भूमिका है, जिसके कारण बहुसंख्यक आबादी आज भी वैज्ञानिक सोच से बहुत दूर है।

भारतीय समाज ज्ञान आधारित समाज नहीं बन सका, अंधविश्वास और कूपमंडूकता अभी भी प्राय: सभी क्षेत्रों में विद्यमान है। इसलिए जरूरी है कि आमजन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के नवाचारों एवं उपलब्धियों को उनकी बोलचाल की भाषा में उन तक पहुँचाया जाए।

दूसरी ओर, देश के विद्यार्थियों में आरंभिक काल से यह बोध पुष्ट करने का प्रयास नहीं किया गया कि विज्ञान उन्हें सही जानकारी देकर जीवन को बेहतर ढंग से जीने के योग्य बनाता है। वे जिज्ञासाओं के माध्यम से विज्ञान से जुड़कर विद्यमान चीजों के बारे में समझ पैदा कर सकते हैं और वे सही तथा गलत का निर्णय ले सकते हैं। वे तथ्यों के पुनर्स्थापन के द्वारा झूठे और अतार्किक विचारों को अस्वीकार कर सकते हैं, और किसी भी प्रकार के अंधविश्वास और धोखे से बच सकते हैं। यही नहीं, इससे उनमें अपनी दुरवस्था के लिए सवाल पूछने और उससे उबरने की ताकत पैदा होगी।

समाज के लोगों एवं विद्यार्थियों को यह भी बताया जाना चाहिए कि ज्ञानवान समाज ही नवप्रवर्तन की दिशा में अग्रसर हो सकता है। नवप्रवर्तन रचनात्मकता से आता है, जो अनुसंधान, खोज और नवोन्मेष के रूप में बहुआयामी होती है। रचनात्मक व्यक्ति उपलब्ध विचारों के संयोजन, परिवर्तन अथवा पुन:प्रयुक्ति से अनुसंधान या कल्पना करने में समर्थ होता है। रचनाधर्मी व्यक्ति परिवर्तन एवं नवीनता का स्वागत करता है, विचारों एवं संभावनाओं के साथ प्रयोग करने के लिए जागरूक रहता है और उसका उदार दृष्टिकोण जीवन में विकास की दिशा में अग्रसर करता है।

विज्ञान के सामाजिक शक्ति नहीं बन पाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि विज्ञान ने इस देश की गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी आदि को मिटाने में कोई उल्लेखनीय भूमिका नहीं निभाई। जबकि आमजन इन समस्याओं को बुरी तरह से झेल रहा है। यही कारण है कि विज्ञान के अध्ययन को वह सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिली है जो मिलनी चाहिए थी। मेधावी विद्यार्थी विज्ञान की तुलना में अन्य विषयों को अधिक पढ़ना चाहते हैं, ताकि वे आई. ए. एस., आई. पी. एस., एम. बी. ए., सी. ए. आदि बन सकें, जहाँ कमाई की उम्मीद अधिक है।

एक कारण यह भी है कि राजनीति की तरह विज्ञान के क्षेत्र में, अर्थात वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों में भी अफसरशाही, पक्षपात, भाई-भतीजावाद, क्षेत्रवाद, चापलूसी, भ्रष्टाचार, तानाशाही जैसी स्थितियाँ हैं, जो मेधावी छात्रों को विज्ञान से विमुख रहने को बाध्य करती हैं। ऐसे में विद्यार्थी विज्ञान को अपना कैरियर नहीं बनाना चाहते, फिर वह सामाजिक शक्ति कैसे बने?

इसके लिए राजनेता भी जिम्मेदार हैं। अधिकांश राजनेता वैज्ञानिक निरक्षरता या विज्ञान की समझ न होने के कारण विज्ञान को महत्व नहीं देते। उनमें उसके प्रति उदासीनता है, जिससे विज्ञान का क्षेत्र गतिहीनता का शिकार है। सरकारों द्वारा वैज्ञानिक क्रियाकलापों, शोध आदि पर उस परिमाण में निवेश भी नहीं किया जाता, जिससे विज्ञान को अपेक्षित स्तर तक विकसित होने का अवसर मिलता और वह देश, समाज और व्यक्ति के जीवन स्तर को उठाने में मदद करता। एक आंकड़े के अनुसार वैज्ञानिक अनुसंधान पर खर्च करनेवाले दस देशों में भारत आठवें पायदान पर है। वह अपने सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.9 प्रतिशत हिस्सा वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं प्रौद्योगिकी के विकास पर खर्च करता है, जबकि अमेरिका 2.70 प्रतिशत। दूसरे स्थान पर चीन है, जिसका खर्च जीडीपी का दो प्रतिशत है। इसी प्रकार जापान, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, इजरायल और स्वीडेन जैसे देश अनुसंधान पर अपने जीडीपी का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। इन देशों की तुलना में भारत का खर्च नगण्य ही है।

अगर हमें विज्ञान को सामाजिक शक्ति के रूप में विकसित करना है, देश की गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याओं से मुक्त करने में उसकी भूमिका को सिद्ध करना है तो हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण करना होगा। विज्ञान के महत्व को रेखांकित करते हुए सरकारी और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर आमजन के जीवन से विज्ञान को जोड़ने के लिए नए सिरे से सोचना होगा।

बहुत जरूरी है कि विज्ञान और समाज के बीच की दूरियाँ खत्म हों।

 

134 डी, लेनिन सरणी, कोलकाता-700013 मो.09903213630

वैज्ञानिक चेतना की जरूरत सिर्फ लैब में नहीं हर जगह है

योगेंद्र आहूजा

तीन कथा संग्रह : ‘अँधेरे में हंसी’, ‘पांच मिनट और अन्य कहानियां’, ‘लफ्फाज़ और अन्य कहानियां’।

(1) ज्ञान की कामना इंसान की चेतना का एक अटूट हिस्सा है, यह उसमें अंतर्भूत है । इंसान प्रकृति का हिस्सा है और उसमें खुद की स्थिति को समझने, अपने लिए उसे परिभाषित करने और बोधगम्य बनाने की कोशिश वह हमेशा करता रहा है । धरती, सितारे, अंतरिक्ष, कायनात, समय, चेतना – यानी कुल मिलाकर समूची ‘अस्ति’ और उसके बीच उसकी अपनी हस्ती और न जाने कितने ही रहस्य हैं, जिन्हें उजागर करने, अधिकाधिक समझ सकने की कोशिशों से विज्ञान उत्पन्न हुआ है ।

मनुष्य की कामनाओं की शक्ल हमेशा एक-सी नहीं रही है और न उनकी तृप्ति के तरीके समान रहे हैं, वे बदलते रहे हैं। सुदूर अतीत में जब दर्शन और विज्ञान एक दूसरे से जुदा न थे, थेल्स या हिरेक्लिटस और अरस्तू सरीखे यूनानी दार्शनिकों या भारत में महर्षि कणाद, आर्यभट्ट, वराहमिहिर जैसे वैज्ञानिक मनीषियों में यह सिर्फ ज्ञान के दायरे का अधिकाधिक विस्तार करने की कामना रही होगी। ज्ञान ख़ुद अपना लक्ष्य और अपने आपमें आनंद का स्रोत होता है । कमोबेश यह आधुनिक समय के कॉपरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन, यूक्लिड, आइंस्टीन, हीजेनबर्ग, या स्टीफेन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों, गणितज्ञों के बारे में भी कहा जा सकता है । केप्लर, कॉपरनिकस और गैलीलियो जब ग्रहों, उपग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति और गति का अध्ययन कर रहे थे तो उन पर किसी तरह का नियंत्रण पाने के लिए, काबू या कब्ज़ा करने के लिए नहीं । नील्स बोर सरीखे वैज्ञानिकों ने परमाणु की संरचना को समझना चाहा था तो उनका उद्देश्य परमाणु बम बनाना नहीं था । इसी तरह यह सोचना नामुमकिन है कि ‘ब्लैक होल्स’ के बारे में विचार करते हुए स्टीफेन हाकिंग के मन में उन्हें इस्तेमाल करने या ‘विजित’ कर सकने जैसा कोई ख्याल रहा होगा । लेकिन हमारे समय में ज्ञान की प्रकृति अधिकाधिक उपयोगितामूलक होती गई है । अब प्रकृति पर कब्ज़ा करने, काबू पाने, उसे नियंत्रित या रूपांतरित करने का मनोवेग ही प्रबल है ।

टेक्नोलॉजी विज्ञान का उप-उत्पाद है – पुराने दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के विशुद्ध जिज्ञासु, प्रेम-मूलक विज्ञान का नहीं, उपयोगितामूलक विज्ञान का। उसके पीछे प्रकृति-प्रेम नहीं, प्रकृति को काबू करने का, विजित करने का मनोभाव अधिक कार्यशील है। हमारे वैज्ञानिक कहे जाने वाले समय में पुरानी नस्ल का विशुद्ध वैज्ञानिक दुर्लभ है । वह कहीं हाशिये पर है, अवरुद्ध । इसके उलट टेक्नोलॉजिस्ट, जो प्रकृति को नष्ट-भ्रष्ट करता, उससे अधिकाधिक निचोड़ने या ‘छीनने’ के इरादे से प्रेरित होता है, वैज्ञानिक के रूप में सम्मानित है!

इस समय जो सर्वाधिक विकसित विज्ञान (फिजिक्स) है उसके गंभीर अध्येता जानते हैं कि वह दर्शन या तत्वमीमांसा के स्तर पर लगभग विफल है। आधुनिकतम भौतिकी हमें सवालों के निश्चित जवाब नहीं देती, या कहें, जितने जवाब देती है, उनसे कहीं अधिक नए सवाल देती है। हर सवाल और भी मुश्किल नए सवालों को या संदेहों को जन्म देता है। इसके उलट तकनीकविद को अपने उद्देश्यों में असाधारण सफलता मिली है। ऐसी कितनी ही कल्पनाएँ हमारे समय की सचाई हैं जो आधी या एक सदी पहले असंभव जान पड़ती थीं। तकनीक के रूप में विज्ञान की सफलता विस्मयकारी है। इसने इंसान में यह उम्मीद जगा दी है, सच्ची या झूठी, कि हर कल्पना साकार की जा सकती है, कुछ भी नामुमकिन नहीं।

 

आमतौर पर विज्ञान और तकनीक एक दूसरे से अलग, असंबद्ध इलाके नहीं हैं और विशुद्ध विज्ञान का आगे का सफ़र भी विकसित तकनीक के बिना संभव नहीं है। 2012 में स्विट्ज़रलैंड स्थित CERN प्रयोगशाला में 27 किलोमीटर लंबी सुरंगनुमा Large Hadron Collider (LHC) मशीन में परमाणुओं की टकराहट से हिग्स बोसोन कण (गॉड पार्टिकल) की पुष्टि का जो अभूतपूर्व विराट प्रयोग किया गया, उसमें सौ से ज्यादा देशों और लगभग दस हज़ार वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया था। इस समय की अतिविकसित तकनीक के बिना यह कैसे संभव हो पाता?

इस बात का महत्व अपने आपमें कम नहीं है कि बहुत सारे तकनीकी आविष्कारों ने इंसान को अनावश्यक, अनुत्पादक, उबाऊ श्रम से मुक्त किया है। 

(2)  ईसा पूर्व पांचवीं-छठी शताब्दी के थेल्स, हिरेक्लिटस, पायथागोरस, पार्मेनाइडीज़ सरीखे यूनानी दार्शनिक दुनिया के आदि वैज्ञानिक थे। विज्ञान भारतीय चिंतन परंपरा का भी हिस्सा रहा है। वैशेषिक दर्शन के प्रणेता आचार्य कणाद एक भौतिक विज्ञानी थे। उनके शिष्य प्रशस्तपाद ने ‘पदार्थधर्मसंग्रह’ लिखा था, जिसमें अणुओं और परमाणुओं का विवेचन है। ‘लीलावती’ गणित और खगोलशास्त्र का ग्रंथ है। सुकरात वैज्ञानिक नहीं थे, लेकिन सत्य के अन्वेषण की उनकी पद्धति वैज्ञानिक थी। उन्होंने अपने समय की सत्ता और देवताओं दोनों की अथॉरिटी को ठुकरा दिया और पूर्वनिर्धारित मान्यताओं को रद्द कर सवाल किए। उन्हें जहर का प्याला पीना पड़ा । जबकि उनके शिष्य प्लेटो और उनके भी शिष्य अरस्तू अपने-अपने समय की सत्ताओं के द्वारा सम्मानित हुए थे।

मध्ययुग में वैज्ञानिकों को सिर्फ धर्मसत्ता से नहीं, राजसत्ता से भी संघर्ष करना पड़ा था। इटली में ब्रूनो को 16वीं सदी में जिंदा जलाया गया। केप्लर और कॉपरनिकस को अपमान झेलना पड़ा । गैलीलियो रोम की धार्मिक अदालत के सामने लिखित रूप में सूर्य की स्थिरता के सिद्धांत को त्यागने की घोषणा करके और क्षमा मांग करके ही प्राण बचा पाए । वैज्ञानिक विचारों को, खास तौर पर जहाँ वे धर्मविरुद्ध थीं, कभी आसानी से स्वीकार नहीं किया गया । पाकिस्तान जैसे देशों में जहाँ धर्मसत्ता प्रबल है, डार्विन का नाम नफरत और उपहास से लिया जाता है। अमेरिका जैसे विकसित देश के ‘अलाबामा’ प्रांत में सरकार के द्वारा निर्दिष्ट है कि पाठ्यपुस्तकों में जहाँ डार्विन के विकासवाद का जिक्र आता है, चिप्पी (स्टिकर) चिपकाई जाए, क्योंकि यह केवल एक थ्योरी है, निश्चित तथ्य नहीं। इसी तरह कुछ अन्य प्रांतों में निर्देश हैं कि विकासवाद और बाइबिल में सृष्टिरचना के जो विवरण हैं, दोनों को साथ-साथ पढ़ाया जाए।

(3) ‘अतिविकसित सभ्यता’ एक लोडेड टर्म है। इस समय के किसी भी देश या समाज के बारे में इसका इस्तेमाल करने में मुझे संकोच है । विज्ञान से हासिल तमाम तकनीकें, कम्प्यूटर्स या इन्टरनेट बेशक ज़रूरी सहूलियतें हैं, लेकिन ‘सभ्यता अलग चीज़ है । विज्ञान और तकनीक का आज की दुनिया में महत्व बेशक है और आगामी दशाब्दियों में और बढ़ेगा । आनेवाला समय कृत्रिम बुद्धि (AI ), स्वचालित मशीनों, जैव-प्रौद्योगिकी और जटिल बायोमैट्रिक अल्गारिद्मों का है। अभी तक वैज्ञानिक तकनीकें अधिकांशतः मनुष्य के बाह्यजगत से सम्बद्ध रही हैं । इजरायली इतिहासविद युवाल नोवा हरारी के मुताबिक अब तकनीक इंसान के भीतर के गोपन इलाकों यानी उसके मनस या चेतना या अंतःकरण तक उतरने की तैयारी में है ।

आने वाले वक्त में इंसान के जज्बात, रुझान, इच्छाएं और रुचियां और भावावेग और भीतर की उथलपुथल, सब कुछ निगरानी और नियंत्रण के दायरे में होगा । इंसान के अंतर्जगत में सेंध लगाईं जाएगी । युवाल के भयावह पूर्वानुमान के मुताबिक़ जैसे मच्छर मारे जाते हैं, वैसे ही मनुष्य के विचार मारे जा सकेंगे । सरकारों या कॉर्पोरेट्स के द्वारा ऐसी कोशिश की जाएगी ।

मशीनें मनुष्यों की ओर से अब खुद निर्णय लेंगी और उन्हें क्रियान्वित करेंगी । इनसे वैश्विक राजनीति, समाजों की संरचना, सरकारों और उनके आपसी संबंधों और खुद इंसान की चेतना में जो तब्दीलियां आएंगी, उनका सही-सही आकलन फिलहाल संभव नहीं है । गरीबी और तमाम दुखों, तकलीफों का उन्मूलन संभव है लेकिन उतना ही संभव है संपूर्ण पारिस्थितकीय ध्वंस और निर्दयता के एक नए युग की शुरुआत । लेकिन यह सब अनुमान के दायरे में ही है । AI सरीखी तकनीकों के प्रभावों के पूरे और सही आकलन के लिए भी शायद AI और उन्हीं तकनीकों की दरकार होगी । वैसे ही जैसे आज कंप्यूटर और इंटरनेट के व्यापक प्रभावों का कोई अध्ययन कंप्यूटर और इंटरनेट के बिना नामुमकिन है ।   

 

(4) इस समय विश्व में कौन-सा विज्ञान आंदोलन चल रहा है, मुझे जानकारी नहीं है । इसके उलट इस समय तो लगता है जैसे मानव जाति तर्कवाद, विवेकवाद को, वस्तुपरकता को – जिसे शताब्दियों के दौरान इतनी मुश्किल से हासिल किया गया – उलट देने पर आमादा है। ऐसे एक आंदोलन की ज़रूरत बेशक है । सबसे पहले विज्ञान की दुनिया में, वैज्ञानिकों के बीच ही । विज्ञान में कोई भी रिसर्च अधिकतम सूक्ष्मता, परिशुद्धता की मांग करता है । किसी नतीजे को स्वीकार करने से पहले उसे बार-बार परीक्षणों से जांचा जाता है । इसके बाद भी नई खोजों की रोशनी में उसे बिना किसी मोह के तत्काल बदला या त्याग दिया जा सकता है । एक वैज्ञानिक लैब में जिस पद्धति का अनुसरण करता है – वही प्रयोगशाला से बाहर आने पर धर्म, नस्ल, जाति, दूसरे देशों, राजनीति आदि के बारे में अपने पूर्वग्रह और तमाम अवैज्ञानिक बातें करता नज़र आता है। वह पूजापाठ भी करता है, घंटी बजाता है । एक खगोल-विज्ञानी यानी एस्ट्रोनोमर भी एस्ट्रोलोजर से मुहूर्त निकलवाता नज़र आए तो आश्चर्य नहीं । वैज्ञानिकों को यह समझने की जरूरत है कि वैज्ञानिक चेतना की जरूरत सिर्फ लैब में या उनकी विशेषज्ञता के क्षेत्र में नहीं, हर जगह है ।   

(5) हमारे देश में विज्ञान से जुड़े लोगों में ही वैज्ञानिक चेतना का अभाव है तो विज्ञान के एक सामाजिक शक्ति बन सकने की बात बहुत दूर की है । 

11/63 सेक्टर 3, राजेंद्र नगर, साहिबाबाद, गाजियाबाद ईमेल ahujayogendra@gmail.com

विज्ञान की खोजें अब आर्थिक शक्तियां तय करती हैं

नवीन कुमार नैथानी

राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय डोईवाला (देहरादून) में एसोसिएट प्रोफेसर (भौतिकी)। एक कहानी संग्रह ‘सौरी की कहानियाँ’

विज्ञान और टेक्नोलॉजी एक दूसरे से जुडे़ हुए किंतु अलग – अलग क्षेत्र हैं। सामान्य बातचीत में प्रायः इन्हें एक दूसरे के पर्याय के रूप में देख लिया जाता है। टेक्नोलोजी उतनी ही पुरानी है जितनी सभ्यता। सभ्यता को विज्ञान तक पहुंचने में सदियां लग गईं, जबकि मनुष्य टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल प्रागैतिहासिक समय से करता आ रहा है। आग संभवतः टेक्नोलॉजी के प्रारंभिक दौर की देन है। टेक्नोलॉजी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए हर युग से मनुष्य के साथ रही है।

सभ्यता जिस तरह से विकास करती रही, उसी के साथ-साथ टेक्नोलॉजी का भी विकास होता गया। विभिन्न औजारों को बनाना और खेती का विकास करना टेक्नोलॉजी के बिना संभव नहीं था। विज्ञान शायद प्रकृति के निरीक्षण और प्राकृतिक घटनाओं की निरंतरता में लक्षित विशेष पैटर्न के अनुभवों को समझने की कोशिश से उपजा। मनुष्य अन्य प्राणियों से अलग इसीलिए है कि वह प्रकृति के भरोसे नहीं बैठ गया। उसने अपनी शारीरिक सीमाओं का अतिक्रमण कर प्राकृतिक घटनाओं के बीच घुसपैठ की चेष्टा की। इन्हीं प्रयासों के दौरान विज्ञान सामने आया। प्रारंभ में शायद नदी किनारे की सभ्यताओं में बारिश, बाढ़, ओला-वृष्टि जैसी प्राकृतिक घटनाओं की पुनरावृत्ति से उत्पन्न पैटर्न को समझने की कोशिशों से विज्ञान की आधारशिला पड़ी। आज हम जिसे विज्ञान कहते हैं वह निश्चित रूप से प्रकृति और जीवन, बल्कि, कहें तो ब्रह्मांड को जानने और समझने की विशेष पद्धति है जो सदियों के अनुभवों, पर्यवेक्षणों और तर्क-शक्ति के निरंतर उपयोग से अस्तित्व में आई है। वस्तुनिष्ठता और प्रयोगों की सार्वभैमिकता इस पद्धति के आधार-स्तंभ रहे हैं।

यहाँ यह बात भी कह देनी जरूरी लग रही है कि प्रारंभिक दौर में हम जितनी आसानी से टेक्नोलोजी और विज्ञान के फ़र्क को बतला सकते हैं आज वह फ़र्क उतना सरल नहीं रह गया है।

हुआ यह है कि प्रारंभ में विज्ञान के विकास ने टेक्नोलॉजी के उत्थान में बड़ी भूमिका निभाई। बाद में टेक्नोलोजी ने विज्ञान के लिए नए रास्ते खोले। आज हम सूक्ष्म जगत के बारे में इतना कुछ जानते हैं तो वह टेक्नोलॉजी के कारण! उसी तरह ब्रह्मांड की विराटता का अनुभव भी टेक्नोलॉजी के कारण ही कर पा रहे हैं।

कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां हम विज्ञान, टेक्नोलॉजी और दीगर अनुशासनों में बहुत ज्यादा भेद नहीं कर पाते! उदाहरण के लिए आजकल बहुतायत में इस्तेमाल होनेवाले पद ‘कृत्रिम बुद्धि’ (आर्टिफ़िशिअल  इन्टेलिजेंस) को लें। सामान्य आदमी के लिए यह टेक्नोलॉजी का मसला है। रोजर पेनरोज़ ने लगभग तीस साल पहले एक किताब लिखी थी ‘एम्परर्स माइंड’। यह मुख्य रूप से कृत्रिम बुद्धि से संबद्ध समस्याओं से जूझने के साथ गणित, भौतिकी और मनोविज्ञान के भीतर डूबते हुए चेतना के सवालों को पाठकों के सामने रखती है। तब उस किताब से गुजर कर आश्चर्य हुआ था। लगा था कि विज्ञान की जटिलताओं से अछूते पाठक के लिए इसे आत्मसात करना मुश्किल होगा। आज उस किताब को एक आम पाठक ज्यादा सहजता के साथ ग्रहण कर सकेगा। आज हम जिस समय में रह रहे हैं वहां टेक्नोलॉजी के कारण वे सब चीजें अमूर्त अवधारणाओं से बाहर निकल कर हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। अगर सरल भाषा में कहें तो टेक्नोलॉजी व्यवहार से उपजी और विज्ञान जिज्ञासा से फलीभूत हुआ। विज्ञान के मूल में यह जिज्ञासा दर्शन की जिज्ञासा से थोड़ा अलग है।

एक प्रजाति के रूप में मनुष्य की गतिशीलता जैसे-जैसे बढ़ी वैसे-वैसे उसके लिए टेक्नोलॉजी में और सुधार की जरूरतें भी बढ़ती गईं। जहाँ-जहाँ आर्थिक गतिविधियां बढ़ती गईं, वहाँ-वहाँ वैज्ञानिक गतिविधियों को भी फलने–फूलने का मौका मिलता रहा। आधुनिक काल की शुरुआत में जब आर्थिक गतिविधियों का केंद्र यूरोप हुआ तो वैज्ञानिक गतिविधियाँ भी यूरोप-केंद्रित रहीं। बाद में आर्थिक गतिविधियाँ यूरोप से हट कर अमेरिका की तरफ अधिक होने लगीं और वैज्ञानिक गतिविधियों का केंद्र भी उधर सरक गया।

विकास के क्रम में धीरे-धीरे विज्ञान की टेक्नोलॉजी पर निर्भरता बढ़ती गई और उसी अनुपात में पूंजी पर भी।

आज विज्ञान की मूलभूत खोजों के लिए बेहतरीन मस्तिष्कों के साथ बहुत ज्यादा संसाधन और पूंजी की भी जरूरत होती है। यह समझना बहुत आसान है कि आज क्यों कुछ देश वैज्ञानिक गतिविधियों में बहुत आगे हैं और बहुत सारे देश बहुत पीछे हैं।

विज्ञान के साथ राजनीति उसी तरह जुड़ी है जिस तरह आर्थिक गतिविधियों के साथ।अगर यह कहा जाए कि आधुनिक विज्ञान की नींव में व्यापार की बहुत बड़ी भूमिका है तो गलत न होगा। समुद्री रास्तों पर नाविकों के पथ-प्रदर्शन की जरूरत ने वेधशालाओं को सक्रिय और अधुनातन होने के लिए बाध्य किया। फलस्वरूप खगोलविद टाय को ब्राह्मांड के तीस सालों के पर्यवेक्षणों पर आधारित केपलर के नियमों ने ग्रहों की गति के पैटर्न को समझा और थोड़े ही वक्त बाद न्यूटन का आविर्भाव हो गया। यह संयोग नहीं था कि गैलीलियो के मन में हाल ही के नायाब अन्वेषण दूरबीन को आकाश की तरफ उठा कर देखने का खयाल आया! विज्ञान के भीतर शुरू से एक निरंतरता रही है!

इस निरंतर विकास की यात्रा इतनी सरल भी नहीं रही है। विज्ञान को एक दूसरे मोर्चे पर निरंतर संघर्ष करना पड़ा है। सत्ता पर वर्चस्व की लड़ाई में धर्म बहुत पहले से एक प्रमुख कारक बना रहा है! विज्ञान को अपनी विकास-यात्रा में संस्थागत धर्म के साथ संघर्ष करना पड़ा। गैलीलियो की जिंदगी से हम सब परिचित हैं। वर्चस्व की यह लड़ाई आज भी जारी है। आज यह संघर्ष बहुस्तरीय और जटिल हो गया है। सामान्यतः यह धारणा व्याप्त है कि विज्ञान हमारी बहुत सारी समस्याओं को आसानी से हल कर देगा!

विज्ञान के विकास के लिए एक चीज बहुत जरूरी है- तथ्यों और सूचनाओं का निर्बाध संचार। वर्चस्व की राजनीति सबसे पहले इन्हीं पर अंकुश लगाती है। दूसरे विश्व-युद्ध के समय और उसके बाद शीत-युद्ध के दौर में यह प्रवृत्ति खूब पनपी । शीत-युद्ध की समाप्ति के बाद कुछ लोग उम्मीद कर रहे थे कि अब खुली विश्व-व्यवस्था में सूचनाओं का प्रसार बिना रोक-टोक के जारी रहेगा। लेकिन हम सब गवाह हैं कि यह सिर्फ सदिच्छा ही थी!

कुल मिलाकर विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र समाज और इसकी राजनीति से अलग नहीं हैं। वस्तुपरकता विज्ञान का एक प्रमुख मूल्य है। यह वह प्रमुख गुण है, जिसे हमें आत्मसात करना चाहिए।

वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न समाजों में वस्तुनिष्ठता एक प्रमुख जीवनमूल्य होना चाहिए। लेकिन व्यवहार में हम इसे नहीं पाते। यहाँ विज्ञान एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल होता है। नई खोज और अनुसंधानों की दिशा वैज्ञानिक तथ्य तय नहीं करते, बल्कि आर्थिक/राजनीतिक शक्तियाँ इन्हें तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

यहाँ एक और बात भी कह देनी जरूरी है। कई बार सत्ताओं द्वारा वैज्ञानिक तथ्यों का इस्तेमाल अपने वर्चस्व को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इससे बचने के लिए हमें अपने विवेक को हमेशा जागृत रखना होगा – वह विवेक जो मनुष्य के पक्ष में देख सकने की दृष्टि देता है। आनुवंशिक गुणों के बारे में वैज्ञानिक खोजों ने हमारे जीवन में बहुत प्रभाव डाला है। यदि कुछ नस्लवादी शक्तियाँ इन खोजों का हवाला देते हुए, नस्लीय श्रेष्ठता के सिद्धांतों को हवा देते हुए मनुष्य-विरोधी विचारों को स्थापित करती हैं तो हमारा यह विवेक ही मनुष्यता को आगे ले जाएगा।

ग्राम एवं पोस्ट भोगपुर, जिला देहरादून -248143/ मो. 9690836550 nknaithani@gmail.com

वैज्ञानिकों एवं समाज के बीच संवाद का समय आ गया है

हेलेन जर्स्की

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी। साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी, हॉलैंड

विज्ञान और विशेषज्ञता के प्रति जनता के विश्वास को बढ़ाना बहुत जरूरी है। आज विज्ञान क्रमश: जटिल होता जा रहा है और उसको स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करना कठिन हो रहा है।

आज आत्म-परीक्षण की आवश्यकता है, जो कठिन कार्य है, लेकिन संकट मँडरा रहा है और हम वैज्ञानिकों को आईने से बाहर झाँकने की जरूरत है। सरसरी दृष्टि से विज्ञान की दृश्यावलियों को देखनेवाला व्यक्ति बड़ी-बड़ी उपलब्धियों को देखकर आत्ममुग्ध है। उसके सामने आनुवंशिकी की समझ पर इतराने वाला भव्य टॉवर है, आधुनिक इलेक्ट्रोनिक्स के सहज उपलब्ध अत्याधुनिक उपकरण हैं और प्रत्येक काल्पनिक विषय पर ज्ञान के चौंकानेवाले फव्वारे हैं। इन्हें देख वह विमोहित है। किंतु ये सारी चीजें उस बुनियाद पर टिकी हैं जो विज्ञान को समाज से जोड़ती है, और यही वह जगह है जहाँ समस्याएँ मुंह बाए खड़ी हैं।

सतह पर विज्ञान पहले की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक दिखाई पड़ता है। सभी प्रकार के वैज्ञानिक आलेखों का अनुपात बढ़ रहा है और वे नि:शुल्क ऑनलाइन उपलब्ध हैं। विश्वविद्यालयों के वेबसाइट वर्तमान अनुसंधान के बारे में जानकारियों के अंबार से अटे पड़े हैं। समाज में वैज्ञानिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन आधुनिक विज्ञान जटिलताओं के संजाल में है, क्योंकि दुनिया जटिल हो रही है। ऐसी स्थिति में आज विज्ञान को समझाना कठिन कार्य है।

वैज्ञानिक अकेले ही ‘वैकल्पिक तथ्यों’ से नहीं लड़ सकते 

जेनी रॉन

ब्रिटिश-अमेरिकी वैज्ञानिक। ‘साइंस इज वाइटल’ संस्था के संपादक।

हमें वैज्ञानिक पद्धति में नए तरीके से विश्वास अर्जित करना पड़ेगा। वह तरीका जो पारदर्शी और उन्मुक्त तथा मानवीय हो। इसके लिए विज्ञान और समाज के बीच संबंधों को सचेतनता के साथ फिर से मजबूत करना होगा, न कि नए प्रकार के अहंकार-भरे विचारों की खोज करके उन्हें परोसना होगा। इसका तरीका बहुत आसान है — यह है संवाद, बातचीत करना। इसका अर्थ है ‘दूसरे’ से बात करने के लिए अपना समय निकालना। अपने पड़ोसियों, फेसबुक मित्रों और उन लोगों से विचारों को साझा करना है जिनसे बात करने में हम सामान्यत: झिझकते हैं। ऐसे हर व्यक्ति से संवाद करना है जो हमारे सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा हैं। हमें सिर्फ अपनी बात नहीं कहनी है, बल्कि उनको सुनना भी है और इज्जत के साथ उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करनी है।

विज्ञान और विशेषज्ञता में जनता के विश्वास को अर्जित करने के लिए हमें खुद को बदलना होगा और साथ ही उनको भी बदलने की कोशिश करनी होगी। लेकिन दिक्कत यहाँ है कि हम अपने गंभीर ज्ञान और ऊँचे जीवन-स्तर के अहं में हैं। अत: खुली बहस के द्वारा विचारों की सही खोज अत्यंत आवश्यक है।